SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF RAM NAVAMI ORGANISED BY SHRI CHAITANYA GAUDIYA MATH AT CHANDIGARH ON MARCH 27, 2026.

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  • 2026-03-27 14:05

श्री चैतन्य गौड़िय मठ द्वारा अयोजित ‘राम नवमी’ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 27.03.2026, शुक्रवारसमयः दोपहर 12:15 बजेस्थानः चंडीगढ़

जय श्री राम!

आज श्री चैतन्य गौड़ीय मठ, सेक्टर-20बी, चंडीगढ़ में ‘राम नवमी महोत्व’ के इस पावन अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता और आध्यात्मिक संतोष का अनुभव हो रहा है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सनातन मूल्यों के पुनर्जागरण का एक महान पर्व है।

राम नवमी का यह पावन अवसर हमें भगवान श्रीराम के आदर्शों को स्मरण करने और उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करने का अवसर प्रदान करता है। ऐसे दिव्य आयोजनों के माध्यम से न केवल हमारी आस्था मज़बूत होती है, बल्कि समाज में सकारात्मक ऊर्जा, सद्भाव और नैतिक मूल्यों का भी संचार होता है।

मैं इस पावन एवं भव्य आयोजन के लिए श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के समस्त संत-महात्माओं, आचार्यों और आयोजकों का हृदय से आभार एवं अभिनंदन करता हूँ, जिन्होंने इस दिव्य अवसर पर मुझे आमंत्रित किया। आपने जिस श्रद्धा, समर्पण और उत्कृष्ट व्यवस्था के साथ इस महोत्सव का आयोजन किया है, वह वास्तव में प्रशंसनीय है और समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।

मुझे ज्ञात हुआ है कि श्री चौतन्य गौड़ीय मठ, सेक्टर-20, चंडीगढ़ की स्थापना वर्ष 1971 में पूज्य श्रीमद् भक्ति दायित्व माधव गोस्वामी जी महाराज के मार्गदर्शन में हुई। चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा मंदिर, संस्कृत विद्यालय और डिस्पेंसरी के संचालन हेतु भूमि प्रदान की गई, जिसे बाद में और विस्तारित किया गया।

यह मठ एक अखिल भारतीय पंजीकृत धार्मिक एवं सामाजिक संस्था है, जो शुद्ध कृष्ण भक्ति के प्रसार के साथ-साथ समाज सेवा के विविध कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही है। चंडीगढ़ में हजारों श्रद्धालु इससे जुड़े हुए हैं, जो इसकी सेवा परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

जानकर हर्ष हुआ कि मठ परिसर में चैरिटेबल आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी और डेंटल क्लिनिक के माध्यम से जरूरतमंदों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। इसके साथ ही गरीब एवं वंचित वर्ग के लोगों को उपचार और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है।

कोविड-19 महामारी के दौरान, जब गरीब और श्रमिक वर्ग गंभीर संकट में था, तब मठ ने हजारों लोगों को भोजन उपलब्ध कराकर सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। इस योगदान के लिए चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा संस्था को सम्मानित भी किया गया।

इसके अतिरिक्त, संस्था गरीब बच्चों को शिक्षा सामग्री उपलब्ध कराकर और उनकी पढ़ाई में सहयोग देकर समाज के कमजोर वर्ग के उत्थान में योगदान दे रही है।

श्री चैतन्य गौड़ीय मठ, वैष्णव भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम, भक्ति और हरिनाम संकीर्तन के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल और सशक्त मार्ग प्रेम, भक्ति और समर्पण है।

प्रिय श्रद्धालुजनो,

राम नवमी भगवान श्रीराम के अवतरण का पावन दिवस है, जो हमें धर्म, सत्य और मर्यादा के उन आदर्शों की याद दिलाता है, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन से स्थापित किया। भगवान श्रीराम ने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना है।

भगवान श्रीराम केवल एक पूजनीय देवता ही नहीं, बल्कि जीवन के सर्वोच्च आदर्शों के प्रतीक हैं। ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में उन्होंने हर परिस्थिति में धर्म, सत्य और कर्तव्य का पालन किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कर्तव्य को अधिकार से ऊपर रखना चाहिए, परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए, और कठिन परिस्थितियों में भी सत्य के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए।

वनवास के कठिन वर्षों से लेकर रावण जैसे अत्याचारी के विरुद्ध संघर्ष तक, श्रीराम ने धैर्य, संयम, करुणा और न्याय का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। “रामो विग्रहवान् धर्मः” यह वाक्य उनके जीवन का सटीक चित्रण करता है, जो हमें बताता है कि श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।

प्रभु श्रीराम का जीवन और उनके आदर्श वाल्मीकि की संस्कृत रामायण से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस, कंबन की तमिल रामायणम् तथा भारत और विश्व की अनेक भाषाओं में रचित विविध रूपांतरणों तक व्यापक रूप से अभिव्यक्त होते हैं। भाषाएँ और शैलियाँ भले भिन्न हों, पर धर्म का सार एक ही रहता है, जो साझा मूल्यों के माध्यम से विविध परंपराओं, संस्कृतियों और समाजों को एक सूत्र में बाँधता है।

भारत के प्राचीन धर्मग्रंथ विश्व-शांति, सह-अस्तित्व, सद्भाव और संतुलन पर विशेष बल देते हुए इन्हें शाश्वत और सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। रामचरितमानस, भगवद्गीता, आदि पुराण तथा जैन आगम जैसे महान ग्रंथ केवल धार्मिक आस्था के स्रोत नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक चेतना के प्रकाशस्तंभ हैं, जो मानवता को नैतिकता, करुणा और आत्मबोध के मार्ग पर निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

प्रिय श्रद्धालुजनो,

दुनिया में जैसे माता-पिता हर परिस्थिति में अपने बच्चों का भला चाहते हैं और उनके सुख-दुःख में सदैव साथ खड़े रहते हैं, उसी प्रकार भगवान भी हम सभी प्राणियों के कल्याण के लिए समय-समय पर विविध लीलाएँ करते हैं। उनकी प्रत्येक लीला केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सत्य और मार्गदर्शन का स्रोत होती है, जो हमें सही आचरण और जीवन जीने की दिशा प्रदान करती है।

हजारों वर्ष पूर्व भगवान श्रीराम जी ने जो लीलाएँ कीं, वे केवल उस युग के लिए ही नहीं थीं, बल्कि आज भी उतनी ही प्रासंगिक और शिक्षाप्रद हैं। भगवान की प्रत्येक लीला में मानव जीवन के लिए कोई न कोई संदेश छिपा होता है। आज के समय में भी भगवान श्रीराम की लीलाएँ हमें नैतिकता, कर्तव्य और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाती हैं।

विशेष रूप से भगवान श्रीराम ने अपने आचरण से हमें यह सिखाया कि परिवार और समाज में बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है और उनकी सेवा किस प्रकार की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा हैः

“प्रातः काल उठि के रघुनाथा, मातु पितु गुरु नवहिं माथा।”

अर्थात् भगवान श्रीराम प्रतिदिन सुबह उठकर अपनी माताओं, पिता और गुरुजनों को प्रणाम करते थे। यह हमें सिखाता है कि विनम्रता, आदर और संस्कार ही सच्चे जीवन की आधारशिला हैं।

भगवान श्रीराम ने अपने भाइयों, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करके यह संदेश दिया कि अपने समान और अपने से छोटे लोगों के प्रति स्नेह, सहयोग और उदारता का भाव रखना चाहिए। उन्होंने यह भी सिखाया कि रिश्तों में छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर प्रेम और एकता बनाए रखना ही सच्ची पारिवारिक शक्ति है।

माता सीता के प्रति उनके व्यवहार में गहरी आत्मीयता, सम्मान और निष्ठा दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवनसाथी के साथ ऐसा विश्वासपूर्ण संबंध स्थापित किया, जो हर परिस्थिति में अटूट रहा।

चाहे रावण जैसे शक्तिशाली शत्रु का सामना करना हो या वनवास की कठिनाइयाँ सहनी हों, उन्होंने हर स्थिति में अपने कर्तव्य और प्रेम का निर्वहन किया। यह हमें सिखाता है कि दांपत्य जीवन परस्पर विश्वास, सम्मान और समर्पण पर आधारित होना चाहिए।

भगवान श्रीराम ने एक आदर्श शासक के रूप में भी यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि यदि कोई व्यक्ति समाज में उच्च पद पर है, तो उसे निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और करुणामय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। 

उन्होंने अपनी प्रजा को अपने परिवार के समान माना और प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान व्यवहार किया। यही ‘रामराज्य’ का मूल भाव है जहाँ न्याय, समानता और सद्भाव का वातावरण हो।

आज के इस तेजी से बदलते युग में, जब समाज अनेक नैतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भगवान श्रीराम के आदर्श हमारे लिए एक सशक्त मार्गदर्शक बनते हैं। हम अक्सर ‘रामराज्य’ की कल्पना करते हैं, जिसका अर्थ है एक ऐसा समाज जहाँ कमजोर सुरक्षित हो, वंचित समर्थ हो, और समाज अपने भीतर से मजबूत हो।

गोस्वामी तुलसीदास जी का यह वचन हमें बार-बार स्मरण कराता है, “परहित सरिस धरम नहीं भाई।” अर्थात् दूसरों के कल्याण से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यह पंक्ति भारतीय जीवन-दर्शन का सार है। यह हमें सिखाती है कि जब हम किसी पीड़ित का दुःख बाँटते हैं, किसी निराश को आशा देते हैं और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करते हैं, तभी हम वास्तविक अर्थों में धर्म का आचरण करते हैं। यही संदेश हमारे जीवन को सार्थक बनाता है।

यदि हम अपने जीवन में श्रीराम के आदर्शों को अपनाएँ, तो हम एक सशक्त, नैतिक और समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं। यह केवल एक आदर्श कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसा लक्ष्य है जिसे हम अपने आचरण और प्रयासों से प्राप्त कर सकते हैं।

श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रचारित हरिनाम संकीर्तन की परंपरा हमें यह सिखाती है कि ईश्वर का स्मरण और नाम जप ही जीवन की सच्ची शांति का मार्ग है। भक्ति, कीर्तन और सेवा के माध्यम से हम अपने जीवन को पवित्र और सार्थक बना सकते हैं।

ऐसे धार्मिक आयोजन केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होते, बल्कि ये समाज में एकता, सद्भाव और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुदृढ़ करने और नई पीढ़ी को अपने मूल्यों से जोड़ने का कार्य भी करते हैं।

आज जब भारत ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को भी सशक्त बनाए रखें। विकास तभी सार्थक होगा, जब उसमें नैतिकता, संस्कृति और मानवता का समावेश होगा।

प्रिय श्रद्धालुजनों, आज के इस पावन अवसर पर मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि अपने जीवन में सत्य, धर्म और कर्तव्य को अपनाएँ, भक्ति और सेवा को अपना मार्ग बनाएं, और समाज में प्रेम, सद्भाव तथा एकता को बढ़ावा दें।

अंत में, मैं श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के सभी संतों, आचार्यों और आयोजकों को इस भव्य आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। मैं भगवान श्रीराम से प्रार्थना करता हूँ कि वे हम सभी को धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति दें और हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करें।

आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

धन्यवाद,

जय हिंद!

जय श्रीराम!