SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT, CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF 89TH BIRTHDAY OF MAHAMUNI DR VINAY KUMAR JI ALOK AT ANUVRAT GROUND, SECTOR 24 C, CHANDIGARH ON JANUARY 30, 2025.

महामुनि डॉ. विनय कुमार श्री ‘‘आलोक’’ जी के 89वें जन्मदिन पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 30.01.2025, गुरूवारसमयः सुबह 11:00 बजेस्थानः चंडीगढ़

     

आदरणीय महामुनि डॉ. विनय कुमार श्री ‘‘आलोक’’ जी, मंच पर विराजमान सभी महानुभाव, और मेरे प्रिय भाइयों एवं बहनों, 

आज अणुव्रत समिति द्वारा आयोजित इस धर्म सद्भावना के पावन कार्यक्रम में उपस्थित होकर मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानता हूं। यह एक विशेष अवसर है, जब हम महामुनि डॉ. विनय कुमार श्री ‘‘आलोक’’ जी के 89वें जन्मदिवस का उत्सव मना रहे हैं, जो धर्म, सद्भावना, और मानवता की मिसाल हैं।

मैं मानता हूं कि अणुव्रत समिति द्वारा विगत कई वर्षों से किए जा रहे सामाजिक और आर्थिक विकास के कार्य न केवल सराहनीय हैं, बल्कि यह समाज में एक नया आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं।

जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी से बचना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संपत्ति की अति इच्छा से बचना) हैं। इन सिद्धांतों के माध्यम से ही महामुनि डॉ. विनय कुमार जी ‘‘आलोक’’ जी ने न केवल अपने अनुयायियों को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है, बल्कि उन्होंने समूचे समाज को यह समझाने का प्रयास किया है कि ये सिद्धांत केवल धार्मिक नहीं हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने के लिए आवश्यक मूल्य हैं।

महामुनि जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर हमें समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है, तो हमें पहले स्वयं में बदलाव लाना होगा। इसके लिए हमें अपने आचरण, विचार, और कर्मों पर ध्यान देना होगा। 

जैन धर्म में तपस्या, संयम, और साधना के माध्यम से आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। महामुनि जी ने न केवल इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारा, बल्कि उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि हमें अपने आचार-विचार से समाज में अच्छाई लानी है। 

जैन धर्म भारत की प्राचीन और शाश्वत धार्मिक परंपराओं में से एक है। इसकी स्थापना पहले तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान जी द्वारा की गई थी। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकरों की परंपरा है, जिनमें अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का नाम सबसे प्रसिद्ध हैं। भगवान महावीर ने अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, और अचौर्य जैसे पांच महान व्रतों के महत्व को प्रतिपादित किया।

जैन धर्म एक ऐसा धर्म है जो न केवल मानवता के प्रति, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के प्रति भी संवेदनशीलता सिखाता है। अहिंसा के सिद्धांत के कारण जैन धर्म के अनुयायी वनस्पति, जल, वायु, और पृथ्वी को भी पवित्र मानते हैं। यह धर्म हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की शिक्षा देता है, जो आज के समय में पर्यावरण संकट से निपटने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय सिद्धांत है अहिंसा। यह केवल मनुष्यों के प्रति हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, और यहां तक कि अदृश्य सूक्ष्मजीवों के प्रति भी करुणा और सम्मान का भाव सिखाता है। जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि प्रत्येक जीवित प्राणी की आत्मा में समान दिव्यता होती है और इसे नुकसान पहुंचाना पाप के समान है।

आधुनिक युग में जैन धर्म के सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हैं। बढ़ती हिंसा, भौतिकवाद, और पर्यावरणीय असंतुलन के इस दौर में जैन धर्म की अहिंसा, अपरिग्रह, और संयम जैसे सिद्धांत हमें एक बेहतर और संतुलित जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं।

जैन धर्म ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अमूल्य योगदान दिया है। इसका प्रभाव साहित्य, वास्तुकला, कला, और शिक्षा में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जैन ग्रंथों में विज्ञान, गणित, और तर्कशास्त्र के महत्वपूर्ण सिद्धांत वर्णित हैं। 

आदरणीय महानुभावो, महान जैन संत, विचारक और समाज सुधारक आचार्य तुलसी जी ने अणुव्रत आंदोलन से समाज में नई क्रांति पैदा कर दी थी। अणुव्रत आंदोलन देश के आजाद होने के साथ-साथ शुरू हुआ था और आज भी उसी गति से चल रहा है। अणुव्रत आंदोलन राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त, नशा मुक्त, सांप्रदायिक मुक्त करने के लिए शुरू हुआ था।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आचार्य श्री तुलसी जी से दीक्षित महामुनि डॉ. विनय कुमार जी ‘‘आलोक’’ ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लगभग 70 वर्षों से अधिक समय से, आप इस मिशन में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं और अणुव्रत के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। आपका समर्पण और तपस्या अणुव्रत आंदोलन को वास्तविकता में बदलने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

महामुनि डॉ. विनय कुमार जी ’‘आलोक’’ जी, आपने लगभग 1 लाख किलोमीटर की पदयात्रा की है, जिससे आपने पूरे देश में इस महान संदेश को प्रचारित किया है। यह पद यात्रा केवल भौतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह समाज में जागृति लाने का एक अनमोल प्रयास है।

आपने लोगों को भ्रष्टाचार, नशे, और सांप्रदायिकता से दूर रहने की प्रेरणा दी और यह भी बताया कि समाज में सुधार तभी संभव है जब हम अपनी सोच, आचरण और मूल्यों को बदलें।

आदरणीय महानुभावो,

मेरा मानना है कि महामुनि जी का जीवन विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। मैं आज के इस मंच से युवाओं को यह संदेश देना चाहता हूं कि वे आपके जीवन से प्रेरणा लें। आपके उपदेश हमें सिखाते हैं कि सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं है, बल्कि यह दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में है।

आदरणीय महामुनि डॉ. ‘‘आलोक’’ जी, हमने आपके जीवन से यह सीखा है कि अगर हम एक उद्देश्य के प्रति अपने जीवन को समर्पित करें, तो हम न केवल अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी एक सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

आपका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा और प्रकाश का एक अटूट स्रोत है। आप न केवल एक व्यक्तित्व हैं, बल्कि एक ऐसी महान धरोहर हैं, जिसने मानवता, आध्यात्मिकता और सेवा के मूल्यों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया है। आपने अपनी पूरी जीवन यात्रा को समाज के कल्याण और लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है।

शिक्षा, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और आध्यात्मिक उत्थान जैसे अनेक क्षेत्रों में आपने जो अमूल्य योगदान दिया है, वह सदैव अनुकरणीय रहेगा। आपने अपने कार्यों और उपदेशों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि सच्चा धर्म वह है जो मानवता को एक सूत्र में बांधने का काम करे।

‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ के महान सिद्धांत को आपने न केवल अपने जीवन में आत्मसात किया है, अपितु इसे अपने कार्यों और शिक्षाओं के माध्यम से समाज में व्यापक रूप से प्रसारित भी किया है। आपके इस संदेश ने समाज के हर वर्ग को यह समझने में मदद की है कि हमारी असली ताकत हमारी एकता, करुणा और प्रेम में निहित है।

आपने जीवनभर यह सिखाया है कि धर्म और अध्यात्म का सच्चा अर्थ केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक ऐसा मार्ग है, जो दूसरों के कल्याण, न्याय और समानता की भावना से प्रेरित है। आपके प्रयासों ने यह दिखाया है कि कैसे ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ की भावना को अपनाकर हम दुनिया को एक बेहतर स्थान बना सकते हैं।

आदरणीय महानुभावो,

आज, आदरणीय महामुनि डॉ. ‘‘आलोक’’ जी के 89वें जन्मदिवस के पावन अवसर पर अणुव्रत समिति द्वारा आयोजित इस ‘धर्म सद्भावना कार्यक्रम’ का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

यह अवसर न केवल हमारे प्रिय गुरु जी के जीवन और उनके द्वारा किए गए अविस्मरणीय योगदान का उत्सव है, बल्कि यह हमें एकजुट होकर धर्म, सद्भावना और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है।

यह आयोजन हमारे समाज में सद्भावना, एकता और धार्मिक सौहार्द की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। आज जब समाज में विभाजनकारी शक्तियाँ सक्रिय हैं, ऐसे समय में इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में प्रेम, एकता और भाईचारे की भावना को मजबूत करने में सहायक होते हैं।

धर्म हमारे जीवन का अटूट हिस्सा है, लेकिन यह ध्यान में रखना जरूरी है कि धर्म का उद्देश्य केवल व्यक्ति की आत्मा का उन्नयन नहीं है, बल्कि यह समाज में भाईचारे, समानता और शांति स्थापित करने का भी माध्यम है। हमारे महान संतों और धर्माचार्यों ने हमेशा यही सिखाया है कि धर्म का असली सार उस दिव्य शक्ति का आशीर्वाद पाने में नहीं, बल्कि मानवता की सेवा करने में है।

आज जब हम इस धर्म सद्भावना कार्यक्रम का हिस्सा हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि विश्व का हर धर्म हमें एक ही मानवता की सेवा करने की दिशा में जोड़ता है। हमें अपने भेदभावों को छोड़कर एक दूसरे की संस्कृति, परंपराओं और विश्वासों का सम्मान करना चाहिए। यही हमारी भारतीयता की सच्ची पहचान है।

हमारे देश में विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाओं के लोग एक साथ रहते हैं और यह विविधता हमारे समाज की ताकत है। यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम इस विविधता को समझें और उसे सम्मान दें, न कि उसे किसी प्रकार के तनाव या विवाद का कारण बनाएं। धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता, समझ और सम्मान का आह्वान है।

मैं विशेष रूप से इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी धार्मिक गुरुओं और विचारकों को बधाई देना चाहता हूँ, जिन्होंने इस आयोजन को सफल बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। आपके मार्गदर्शन और उपदेशों के माध्यम से हम समाज में धर्म, सद्भावना और सहिष्णुता की भावना को और अधिक सशक्त बना सकते हैं।

आइए, हम सब मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाएं और एकता, शांति और सद्भावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। हम सभी का उद्देश्य एक ही है, वह है मानवता की सेवा और समाज में एकता और शांति की स्थापना। यही हमारे समाज का मूल मंत्र है।

अंत में, मैं एक बार फिर महामुनि डॉ. विनय कुमार श्री ‘‘आलोक’’ जी को उनके 89वें जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए यह कहना चाहूंगा कि उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके उपदेश, उनकी शिक्षाएं और उनका दृष्टिकोण हमें एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में प्रेरित करते हैं।

आइए, हम सब मिलकर उनके दिखाए मार्ग पर चलें और एक ऐसा समाज बनाएं, जो शांति, सद्भावना और एकता के मूल्यों पर आधारित हो।

महामुनि जी को मेरी ओर से पुनः हार्दिक शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

जय हिंद!