SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF INTERNATIONAL JAYANTI MAHOTSAV 2026 AT PANCHKULA ON JANUARY 8, 2026.
- by Admin
- 2026-01-08 21:20
गुरूदेव ब्रह्मर्षि विश्वात्मा बावरा जी महाराज की 92वीं जयंती पर
राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 08.01.2026, गुरूवार
समयः शाम 6:00 बजे
स्थानः पिंजोर पंचकुला
पूज्य संत-महात्माओं, विद्वानजनों, एवं उपस्थित श्रद्धालुजनों,
आज का यह पावन अवसर हम सभी के लिए अत्यंत सौभाग्य का विषय है। हम यहां परम पूज्य गुरुदेव ब्रह्मर्षि विश्वात्मा बावरा जी महाराज की 92वीं जयंती के शुभ अवसर पर एकत्रित हुए हैं, एक ऐसे दिव्य संत जिन्होंने अपने जीवन को मानवता के आध्यात्मिक उत्थान, विश्व-शांति और आत्मबोध के प्रसार के लिए पूर्णतः समर्पित कर दिया।
सतगुरुदेव परम् पूज्य ब्रह्मर्षि स्वामी विश्वात्मा बावरा जी महाराज इंटरनेशनल ब्रह्मर्षि मिशन के संस्थापक एवं महान आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक थे। उनका जीवन त्याग, तप, साधना और करुणा का जीवंत प्रतीक है।
पूज्य सतगुरुदेव जी का जन्म 11 जनवरी 1934 को ज्ञानपुर, वाराणसी में माँ गंगा के पावन तट पर हुआ। बाल्यकाल से ही उनमें वैराग्य और आध्यात्मिक चेतना के स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगे थे। मात्र अठारह वर्ष की आयु में उन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर अयोध्या में श्री वैष्णव संप्रदाय में दीक्षा प्राप्त की। अपने गुरु योगेश्वर भगवान चंद्र मौली जी महाराज के मार्गदर्शन में उन्होंने अयोध्या, चित्रकूट, उदयपुर, चिंतपूर्णी और हिमालय में कठोर साधना कर उच्चतम समाधि अवस्थाएँ प्राप्त कीं।
सतगुरुदेव जी न केवल उच्चकोटि के योगी थे, बल्कि महान विद्वान भी थे। उन्होंने विश्व के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और विविध शास्त्रों का अध्ययन किया। गुरु-आज्ञा से उन्होंने संन्यास जीवन अपनाकर वर्षों तक भिक्षा पर जीवन यापन किया और देशभर में भ्रमण कर भगवद्गीता, उपनिषद, योग और वेदांत का व्यावहारिक संदेश जन-जन तक पहुँचाया।
1965 में उदयपुर में प्रथम केंद्र तथा 1974 में पिंजौर (हरियाणा) में ब्रह्मर्षि आश्रम की स्थापना उनके मिशन की ऐतिहासिक उपलब्धि रही। “बुद्धि, प्रेम और सेवा” उनके जीवन का आदर्श था। 1985 में चंडीगढ़ में मेटाफिजिकल साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना के साथ उन्होंने अपने आध्यात्मिक आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया और अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, नीदरलैंड, सूरीनाम, डेनमार्क, नार्वे, इटली, पोर्टोगाल फ़िजी और मॉरीशस आदि देशों में केंद्र स्थापित किए।
पूज्य सतगुरुदेव जी ‘ब्रह्मविद्या’ और ‘महायोग’ के प्रखर प्रतिपादक थे, जिसमें हठ, मंत्र, लय और राज योग का समन्वय है। उनकी शिक्षाएँ जाति, पंथ और राष्ट्र की सीमाओं से परे, सार्वभौमिक मानव मूल्यों पर आधारित थीं। उन्होंने लगभग 150 विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देकर पूर्व की आध्यात्मिक चेतना और पश्चिम की वैज्ञानिक दृष्टि का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।
7 फरवरी 2002 को वे महासमाधि को प्राप्त हुए। यद्यपि वे आज साकार रूप में हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनकी दिव्य चेतना, शिक्षाएँ और मानवतावादी संदेश आज भी असंख्य जीवनों को आलोकित और प्रेरित कर रहे हैं।
वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय ब्रह्मर्षि मिशन की परमाध्यक्षा, परम पूज्य ब्रह्मवादिनी स्वामी कृष्णकांता जी महाराज, इस महान आध्यात्मिक परंपरा का सशक्त नेतृत्व कर रही हैं। उनके मार्गदर्शन में मिशन के लगभग 30 विद्यालयों के माध्यम से करीब 40 हजार बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार, नैतिक मूल्य और भारतीय संस्कृति का संदेश दिया जा रहा है।
उनके आध्यात्मिक नेतृत्व में मिशन के 40 संन्यासी देश-विदेश में सक्रिय होकर सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और विश्व-बंधुत्व की भावना का प्रचार कर रहे हैं। यह अभियान आज एक वैश्विक चेतना आंदोलन का स्वरूप ले चुका है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
भारत भूमि संतों, ऋषियों और महापुरुषों की पुण्यभूमि रही है। युग-युगांतर से हमारे संतों ने मानवता को सत्य, अहिंसा, प्रेम और करुणा का मार्ग दिखाया है। आदियोगी शिव से लेकर वेदव्यास, महर्षि वाल्मीकि, भगवान बुद्ध, महावीर स्वामी, आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, गुरु नानक देव जी, कबीरदास, संत रविदास, मीराबाई, तुलसीदास, गुरु गोबिंद सिंह जी, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी तक, यह अखंड संत-परंपरा मानवता के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान की आधारशिला रही है।
इन संतों ने सदा भाषा, जाति, पंथ, संप्रदाय और भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर मानव को मानव से जोड़ने का महान कार्य किया है। किसी ने अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए ज्ञान का दीप जलाया, किसी ने प्रेम और समर्पण की धारा बहाकर भक्ति की सरिता प्रवाहित की, किसी ने दीन-दुखियों की सेवा को ही ईश्वर-सेवा मानकर सेवा को साधना बनाया, तो किसी ने राष्ट्र और समाज को आत्मबोध, नैतिकता और कर्तव्यपरायणता की आध्यात्मिक चेतना से जागृत किया।
हमारे संत केवल आश्रमों तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने जीवन को ही प्रयोगशाला बनाकर मानव मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा की। उन्होंने व्यक्ति के चरित्र निर्माण को समाज-निर्माण का आधार बनाया और यह संदेश दिया कि बाहरी परिवर्तन तभी सार्थक है, जब भीतर का मनुष्य बदलता है। उनके वचनों में वेदों की गूढ़ता थी, आचरण में करुणा की सरलता थी और कर्म में लोककल्याण की भावना थी।
संत-परंपरा ने सदैव समरसता, सह-अस्तित्व और करुणा का मार्ग दिखाया है। उन्होंने भय के स्थान पर विश्वास, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, और स्वार्थ के स्थान पर सेवा को प्रतिष्ठित किया। इसी कारण हमारे संत न केवल धार्मिक मार्गदर्शक बने, बल्कि युग-निर्माता, समाज-सुधारक और मानवता के शाश्वत पथ-प्रदर्शक भी बने। गुरुदेव ब्रह्मर्षि विश्वात्मा बावरा जी महाराज इसी महान परंपरा की एक उज्ज्वल कड़ी थे।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सनातन जीवनशैली है। यह भूमि ऋषियों, मुनियों और अवतारों की रही है, जिन्होंने अपने तप, ज्ञान और साधना से पूरी मानवता को सत्य, धर्म और करुणा का मार्ग दिखाया। सनातन धर्म वह शाश्वत ज्योति है, जो युगों-युगों से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशमान करती आई है।
“सनातन” शब्द का अर्थ है - “शाश्वत”, यानी जो सदा से है और सदा रहेगा। जबकि “धर्म” का अर्थ है - धारण करने योग्य, अर्थात् जो सृष्टि, समाज और व्यक्ति का आधार हो। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश और जल की शीतलता कभी समाप्त नहीं होती, उसी प्रकार सनातन धर्म की आत्मा भी अनादि और अविनाशी है।
यह कोई संकीर्ण मत या पंथ नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक समग्र दृष्टि है। सनातन हमें सिखाता है कि सत्य एक है, मार्ग अनेक हैं। यह सह-अस्तित्व, सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम् और अहिंसा परमो धर्मः जैसे सिद्धांतों पर आधारित है।
सनातन धर्म एक ऐसी जीवन-पद्धति है, जिसमें प्रकृति-पूजा है, क्योंकि हम पृथ्वी को माता मानते हैं; इसमें नारी-सम्मान है, क्योंकि शक्ति को सृष्टि का मूल कहा गया है; इसमें कर्म का सिद्धांत है, जो व्यक्ति को उसके उत्तरदायित्व का बोध कराता है; और इसमें मोक्ष का मार्ग है, जो जीवन के परम लक्ष्य की ओर ले जाता है।
सनातन धर्म का मूल दर्शन ‘सत्व’, ‘रज’ और ‘तम’ रूपी ‘त्रिगुण’ के सिद्धांत पर आधारित है। ‘सत्व’ सत्य, प्रकाश और संतुलन का प्रतीक है; ‘रज’ कर्म, आकांक्षा और परिवर्तनशीलता का; जबकि ‘तम’ अज्ञान और जड़ता को दर्शाता है। जीवन का उद्देश्य इन तीनों गुणों में संतुलन साधकर सत्य और धर्म की उच्चतम चेतना तक पहुँचना है।
कर्म, अर्थात कार्य, सनातन धर्म की आत्मा है। “जैसा करोगे, वैसा फल पाओगे”, यह सिद्धांत वेद, पुराण, उपनिषद और गीता सभी में प्रतिपादित है। कर्म का संदेश है कि आज की परिस्थितियाँ हमारे पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम हैं, और आज किए गए कर्म हमारे भविष्य का निर्धारण करेंगे।
सनातन धर्म की जड़ें वैदिक काल, लगभग पाँच से सात हजार वर्ष पूर्व के ऋग्वैदिक युग तक जाती हैं। उपनिषद, महाभारत, रामायण और पुराणों ने इसके विचारों को गहराई दी, पर इसकी मूल अवधारणा सदैव यही रही कि धर्म समयानुसार परिवर्तित होते हुए भी अपने “सनातन” स्वरूप में निरंतर प्रवाहित रहता है।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद सनातन धर्म के चार वेद हैं, जो ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, कर्मकांड, समाज, शिक्षा और चिकित्सा आदि के मूल स्रोत हैं। वेदों को “श्रुति” अर्थात ईश्वर-प्रकाशित ज्ञान कहा जाता है। वेदों में ब्रह्मांड, प्रकृति, दैविक शक्तियाँ, मानव धर्म, समाज और ज्ञान-विज्ञान के तात्त्विक विचार सम्मिलित हैं।
700 श्लोकों की गीता को “सनातन धर्म का सार” कहा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता की सबसे बड़ी देन है कि यह हर परिस्थिति में सकारात्मक, कर्मठ, निस्वार्थ, और समत्वयोगी जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। गीता में स्पष्ट निर्देश है, “यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः।” यानी श्रेष्ठ पुरुष जैसा करता है, समाज उसका अनुसरण करता है।
सनातन धर्म, ‘धर्म’ (कर्तव्य व नैतिकता), ‘अर्थ’ (साधन-संपन्नता), ‘काम’ (इच्छाएं), और ‘मोक्ष’ (आत्ममुक्ति) रूपी “चार पुरुषार्थों” के माध्यम से जीवन का समग्र उद्देश्य दिखाता है। यह विचारधारा जीवन के हर चरण, समस्या व महत्वाकांक्षा के लिए स्पष्ट रूपरेखा देती है। इन चारों का संतुलित समावेश ही आदर्श मानव जीवन का आधार माना गया है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब पूरी दुनिया आर्थिक, तकनीकी और भौतिक प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ रही है, तब मनुष्य का आंतरिक संतुलन, नैतिकता और करुणा पीछे छूटते जा रहे हैं। ऐसे समय में सनातन धर्म के सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा, त्याग, संयम और आत्म-साक्षात्कार के मूल्य हमें आत्मचिंतन की राह दिखाते हैं।
सनातन संस्कृति यह नहीं कहती कि आधुनिकता का विरोध करो, वह कहती है, “आधुनिक बनो, परंतु अपनी जड़ों से जुड़े रहो।” यह हमें सिखाती है कि विज्ञान और अध्यात्म, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
भारतीय संस्कृति ने कभी किसी पर अपनी विचारधारा थोपने का प्रयास नहीं किया। इसने सदा कहा कि “एकम सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” यानी सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में कहते हैं। यह उदारता, यह सहिष्णुता, यह समावेशी दृष्टि ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
इसीलिए भारत की संस्कृति आज भी विश्व के कोने-कोने में लोगों को आकर्षित करती है। योग, ध्यान, आयुर्वेद, संस्कृत और भारतीय दर्शन, ये सब आज वैश्विक चेतना के केंद्र में हैं।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब भारत विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब हमें हमारे ग्रंथों में निहित शिक्षाओं को अपनाते हुए अपने कर्तव्यपथ पर अडिग रहना होगा। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा हैः ‘‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।’’ अर्थात, इस संसार में ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र चीज नहीं है।
इसलिए हमें ज्ञान प्राप्त करने, इसे जीवन में उतारने और अपने कर्मों द्वारा समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित होने की आवश्यकता है।
आज हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने सनातन मूल्यों और विरासत को न केवल स्वयं अपनाएँगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक इसे पहुँचाने का कार्य भी करेंगे।
इसके लिए हमें अपने धर्मशास्त्रों, ग्रंथों और उपनिषदों का अध्ययन करना होगा। अपनी संस्कृति के प्रति गौरव और सम्मान की भावना जागृत करनी होगी। भारतीय मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में आत्मसात करना होगा। संस्कृति, संस्कार और राष्ट्रभक्ति को अपने बच्चों तक पहुँचाना होगा।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब विश्व भौतिक प्रगति की चरम सीमा पर है, तब भी मनुष्य अशांत, असंतुष्ट और तनावग्रस्त है। इसका कारण यह है कि हमने बाहरी विकास को तो अपनाया, पर आंतरिक विकास को भुला दिया। यही वह बिंदु है जहां अध्यात्म की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।
अध्यात्म हमें स्वयं से, समाज से और सृष्टि से जोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतना हैं। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि उसके भीतर असीम शक्ति, करुणा और प्रेम का स्रोत विद्यमान है, तब उसके जीवन की दिशा बदल जाती है। क्रोध की जगह करुणा, अहंकार की जगह विनम्रता, स्वार्थ की जगह सेवा और भय की जगह विश्वास जन्म लेता है।
गुरुदेव ब्रह्मर्षि विश्वात्मा बावरा जी महाराज ने अपने सत्संगों, साधना और जीवन-व्यवहार से यही संदेश दिया कि आत्मशुद्धि ही समाज-शुद्धि का आधार है। उन्होंने युवाओं को चरित्र निर्माण, संयम और सेवा की ओर प्रेरित किया; गृहस्थों को कर्तव्य, संतुलन और सदाचार का मार्ग दिखाया; और समाज को यह बोध कराया कि आध्यात्मिकता के बिना कोई भी सभ्यता स्थायी नहीं हो सकती।
आज आवश्यकता है कि हम गुरुदेव के विचारों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारें। सत्यनिष्ठा, सेवा-भाव, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान, सामाजिक समरसता और राष्ट्रप्रेम, यही उनके जीवन-संदेश का सार था।
आइए, उनकी 92वीं जयंती पर हम यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन में अध्यात्म को स्थान देंगे; भौतिक प्रगति के साथ नैतिक और आत्मिक उन्नयन को भी समान महत्व देंगे; और सनातन मूल्यों को केवल विरासत नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार बनाएंगे।
अंत में, मैं परम पूज्य गुरुदेव ब्रह्मर्षि विश्वात्मा बावरा जी महाराज को कोटि-कोटि नमन करते हुए यही प्रार्थना करता हूं कि उनकी करुणा, उनकी चेतना और उनका मार्गदर्शन हम सभी को एक श्रेष्ठ, समरस और आध्यात्मिक मानवता के निर्माण की दिशा में प्रेरित करता रहे।
धन्यवाद,
जय हिन्द!