SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF CONVOCATION OF LOVELY PROFESSIONAL UNIVERSITY AT JALANDHAR ON JANUARY 9, 2026.

लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के 12वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 09.01.2026,  शुक्रवारसमयः दोपहर 3:30 बजेस्थानः जालंधर

         

आप सभी को सुप्रभात!

आज मुझे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के इस 12वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर आपके बीच उपस्थित होकर अत्यंत गौरव और प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। आज का यह दिन अत्यंत विशेष है, जो उत्सव, गर्व, भावनाओं और आकांक्षाओं का दिन है।

मेरे प्यारे युवा साथियो, आज हम यहां केवल उपाधियां प्रदान करने के लिए एकत्रित नहीं हुए हैं, बल्कि आपकी साधना, परिश्रम, अनुशासन और उस परिवर्तनकारी यात्रा का उत्सव मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं, जिसने आपको आज इस मुकाम तक पहुँचाया है।

इस अवसर पर मैं इस प्रतिष्ठित संस्थान के विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें साझा करना चाहूंगा।

वर्ष 2001 में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की स्थापना एक स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ की गई थी, ऐसी शिक्षा प्रदान करना जो भारत को रूपांतरित कर सके। ऐसी शिक्षा जो केवल मस्तिष्क को तथ्यों से नहीं भरती, बल्कि हृदय को संस्कारित करती है, चरित्र का निर्माण करती है और जीवन तथा समाज के लिए उत्तरदायी नागरिक तैयार करती है। यहां विद्यार्थियों को केवल सीखना नहीं, बल्कि सोचना, प्रश्न करना, सृजन करना और दूसरों की परवाह करना सिखाया जाता है।

एल.पी.यू. की शिक्षण पद्धति, जिसे ‘ऐजु-रिवोल्यूशन’ कहा जाता है, व्यवहारिक शिक्षा, टीम वर्क, वास्तविक जीवन के अनुभव, नैतिक आचरण और समाज-सेवा पर आधारित है। यहां विद्यार्थी केवल परीक्षाओं में नहीं, बल्कि जीवन में सफल होने के लिए तैयार किए जाते हैं।

यह विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त है तथा इसे NAAC द्वारा A++  की सर्वोच्च ग्रेड प्रदान की गई है, जो इसकी शैक्षणिक गुणवत्ता और निरंतर प्रगति को दर्शाती है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भी एल.पी.यू. की सशक्त उपस्थिति है। राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF)2025 में एल.पी.यू. को भारत के सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में 31वां स्थान प्राप्त हुआ है। साथ ही, टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026 में एल.पी.यू. भारत में 5वें स्थान पर रहा तथा वैश्विक स्तर पर 501-600 बैंड में शामिल हुआ।

इसके अलावा, टाइम्स हायर एजुकेशन इम्पैक्ट रैंकिंग 2025 में यह भारत में दूसरे और विश्व में 48वें स्थान पर रहा। इसी प्रकार नवाचार के क्षेत्र में एलपीयू को भारत में चौथा और विश्व में 109वां स्थान प्राप्त हुआ। इसे क्यू.एस. वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026 में भी वैश्विक स्तर पर स्थान मिला है।

विशेष रूप से एलपीयू का रोजगार क्षमता पर केंद्रित दृष्टिकोण सराहनीय है। उद्योग जगत के साथ मजबूत साझेदारियों के परिणामस्वरूप 6 हजार से अधिक प्लेसमेंट ऑफर प्राप्त हुए हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, कॉग्निजेंट सहित अनेक प्रतिष्ठित वैश्विक कंपनियों में विद्यार्थियों का चयन हुआ है।

एल.पी.यू. आज 150 से अधिक शैक्षणिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारत एवं 50 से अधिक देशों के 3 हजार विद्यार्थियों सहित लगभग 5 लाख छात्रों को एक बहुसांस्कृतिक परिवेश प्रदान कर रहा है।

मैं समझता हूं कि इन तमाम उपलब्धियों के पीछे संस्थापक कुलाधिपति डॉ. अशोक कुमार मित्तल जी का दूरदर्शी नेतृत्व है, जिन्होंने समावेशी, कौशल-आधारित और मूल्य-आधारित शिक्षा को एलपीयू की पहचान बनाया।

देवियो और सज्जनो,

मुझे ज्ञात हुआ है कि आज का यह दीक्षांत समारोह 2024 और 2025 बैच के नियमित, दूरस्थ शिक्षा, ऑनलाइन, अंशकालिक तथा पीएचडी कार्यक्रमों के कुल 42 हजार 947 विद्यार्थियों के लिए आयोजित किया गया है और आज 13 हजार 128 विद्यार्थियों को औपचारिक रूप से उपाधियाँ प्रदान की जा रही हैं। इनमें 321 टॉपर्स और 43 गोल्ड मेडलिस्ट भी शामिल हैं, जिन्होंने अपने परिश्रम, अनुशासन और प्रतिभा से विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ाया है।

मैं इन सभी उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को हृदय से हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ।

मेरे प्यारे युवा साथियो,

दीक्षांत केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं होता, यह उत्तरदायित्व का भी क्षण होता है। आज जब आप जीवन के एक नए चरण में आगे बढ़ रहे हैं, तो आप सभी से मेरा आग्रह है कि आप अपनी शिक्षा, प्रशिक्षण और अपनी मूल दक्षताओं का सर्वोत्तम उपयोग करें। सीखना और समझना ही जीवन का सार है। 

हम भारत में एक ऐसी पवित्र परंपरा के उत्तराधिकारी हैं जिसमें हमारे गुरुओं, संतों और ऋषियों ने निस्वार्थ भाव से हमारे मन को पोषित किया और हमारी बुद्धि को आकार दिया है। ज्ञान प्रदान करना सदियों से विश्वास और श्रद्धा के वातावरण में एक बहुत ही व्यवस्थित, श्रमसाध्य और पवित्र कार्य रहा है। यह हमारे संस्कारों में रचा-बसा है कि जहाँ हमारे माता-पिता हमें जन्म देते हैं, वहीं हमारे ‘गुरु’ हमारे चरित्र और आकांक्षाओं को आकार देते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है, “आचार्य देवो भव” अर्थात् आचार्य ईश्वर के समान हैं। एक प्रसिद्ध श्लोक है, “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।” यह स्पष्ट करता है कि विद्यार्थी के जीवन में शिक्षक की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

महात्मा गांधीजी ने कहा था, “मैं सदैव मानता हूँ कि विद्यार्थी के लिए उसका सच्चा पाठ्यपुस्तक उसका शिक्षक ही होता है।” शिक्षक की करुणा, संवेदनशीलता और प्रेरणा ही प्रत्येक बालक के भविष्य का निर्माण करती है। शिक्षक का प्रत्येक व्यवहार, प्रत्येक विचार और प्रत्येक कर्म, अनजाने ही, बालक के व्यक्तित्व को गढ़ता है।

मेरे प्रिय शिक्षकों,

आप शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। राष्ट्र का भविष्य आपके हाथों में है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, “यदि लोग मुझे एक अच्छे शिक्षक के रूप में याद रखें, तो यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।”

अपने इस पवित्र पेशे को पूरे हृदय से अपनाइए। हमें आप पर गर्व है। देश के युवाओं को सक्षम पेशेवर और श्रेष्ठ मानव बनाने का दायित्व आपके कंधों पर है।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और आर्थिक विकास में उल्लेखनीय प्रगति की है। किंतु विकास केवल कारखानों, बाँधों और सड़कों से नहीं होता। सच्चा विकास मनुष्य, उसके मूल्यों और उसकी सांस्कृतिक व आध्यात्मिक निष्ठा से होता है। मूल्य-आधारित समग्र शिक्षा के माध्यम से नैतिक दिशा तय करने में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत निर्णायक है।

आपको हमारी युवा पीढ़ी में मातृभूमि के प्रति प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा, सभी के प्रति करुणा, बहुलतावाद के प्रति सहिष्णुता, नारी सम्मान, जीवन में ईमानदारी, आचरण में संयम और कर्म में अनुशासन व उत्तरदायित्व के मूल सभ्यतागत मूल्यों का संचार करना होगा।

एक समय था जब तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, सोमपुरा और ओदंतपुरी जैसे विश्वविख्यात ज्ञानपीठ भारत की पहचान थे। आज हमें पुनः उसी गौरव को प्राप्त करना है और इस पथ पर हमारा नेतृत्व शिक्षक ही करेंगे।

आपका पेशा केवल आजीविका नहीं, बल्कि आत्म-विकास और समाज-निर्माण का माध्यम है। समाज आज आपसे मार्गदर्शन और चेतना की अपेक्षा करता है। गर्व से कहिए, मैं शिक्षक हूँ, मैं राष्ट्र निर्माता हूँ।

आज के सोशल मीडिया युग में, जब अर्धसत्य और भ्रम चारों ओर फैले हैं, शिक्षा का उद्देश्य है सत्य और असत्य में भेद करना सिखाना। आपका नैतिक दायित्व है कि आप विद्यार्थियों को गहराई से विश्वास करना और आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता प्रदान करें।

याद रखिए, केवल बुद्धिमत्ता पर्याप्त नहीं है, चरित्र सहित बुद्धिमत्ता ही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है। बिना चरित्र निर्माण के सभ्य समाज असुरक्षा और हिंसा की ओर बढ़ेगा।

बच्चे इसलिए सफल होते हैं क्योंकि कोई शिक्षक उनमें यह विश्वास जगाता है कि वे कर सकते हैं, वे सक्षम हैं, वे महत्वपूर्ण हैं।

आइए, हम स्वयं को पुनः समर्पित करें कि प्रत्येक बच्चे में श्रेष्ठता की खोज करेंगे। शिक्षक वह दीपक है, जो स्वयं जलकर दूसरों का पथ प्रकाशित करता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने शिक्षक को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, “मेरे शिक्षक द्वारा करुणा, सौंदर्य और सत्य के दिखाए गए आदर्श ने मुझे जीवन का सामना मुस्कराते हुए करना सिखाया है।”

यही शिक्षक का ध्येय है, ज्ञान भी देना और जीवन का प्रकाश भी।

मेरे प्रिय विद्यार्थियों,

दीक्षांत केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं होता, यह उत्तरदायित्व का भी क्षण होता है। शिक्षा एक मंज़िल नहीं, बल्कि उड़ान का मंच है। अब समाज आपसे आपके कौशल, ईमानदारी, विचारों, साहस और संवेदनशीलता की अपेक्षा करेगा।

हमारे राष्ट्र को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल सफल पेशेवर ही नहीं, बल्कि सच्चे राष्ट्र-निर्माता हों, जो सत्य और नैतिकता को प्राथमिकता दें, जो उद्देश्यपूर्ण नवाचार करें, और जो समाज के प्रति गहरी संवेदना रखें।

याद रखिए, शिक्षा ज्ञान देती है, लेकिन मूल्य जीवन को दिशा देते हैं। विनम्र बनिए। करुणाशील बनिए। साहसी बनिए। जिज्ञासु बनिए। उत्कृष्टता का लक्ष्य रखिए, परंतु सेवा को अपना संस्कार बनाइए।

आप अपने जीवन में निरंतर सीखते रहिए, क्योंकि सीखना केवल शिक्षा की औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह जीवन की निरंतर चलने वाली साधना है। जो व्यक्ति सीखना छोड़ देता है, वह प्रगति करना भी छोड़ देता है।

मैं यहाँ आप सभी के साथ एक अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग साझा करना चाहता हूँ, जो संस्कृत साहित्य के महानतम कवि और नाटककार महाकवि कालिदास के जीवन से जुड़ा है।

जब कालिदास मात्र छह महीने के थे, तभी उनके माता-पिता का साया उनके सिर से उठ गया। उनका पालन-पोषण एक साधारण चरवाहे द्वारा किया गया। उन्हें किसी भी प्रकार की औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी। उन्हें जीवन के प्रारंभिक वर्षों में उपेक्षा, आलोचनाओं और अनेक अपमानों का सामना करना पड़ा।

एक दिन, हताश होकर इधर-उधर भटकते हुए, वे नदी के किनारे पहुँचे और अपने जीवन को समाप्त करने का विचार करने लगे। तभी उन्होंने देखा कि कुछ महिलाएँ नदी के किनारे कपड़े धो रही हैं। उन्होंने गौर किया कि जिन पत्थरों पर महिलाएँ कपड़े पटक-पटक कर धो रही थीं, वे पत्थर बिल्कुल चिकने और गोल हो गए थे, जबकि अन्य पत्थर खुरदरे और ऊबड़-खाबड़ थे।

यह अवलोकन उनके मन में बिजली की तरह चमका और उन्हें यह आभास हुआ कि यदि कपड़े पटकने से कठोर पत्थर घिस सकते हैं और अपना आकार बदल सकते हैं, तो निरंतर ज्ञान के प्रहार से उनकी बुद्धि क्यों नहीं बदल सकती? बस, उसी क्षण उन्होंने देश का सबसे बुद्धिमान और विद्वान व्यक्ति बनने का संकल्प लिया। उनके इसी दृढ़ निश्चय का परिणाम है कि आज पूरी दुनिया उन्हें जानती है।

इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसकी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि उसके संकल्प, सतत् प्रयास और सीखने की जिज्ञासा में निहित होती है। कोई भी स्थिति, कोई भी अभाव, कोई भी असफलता, व्यक्ति की प्रगति को रोक नहीं सकती यदि उसके भीतर बदलने और बेहतर बनने का दृढ़ निश्चय हो।

हमारा संविधान हमें अधिकार ही नहीं देता, बल्कि हमारे कर्तव्यों का भी बोध कराता है। संविधान हमें यह स्मरण कराता है कि हमारा एक मूल कर्तव्य है, ‘व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए निरंतर प्रयास करना, ताकि हमारा राष्ट्र सतत रूप से प्रयास और उपलब्धियों के उच्चतर शिखरों की ओर अग्रसर हो।’

स्वामी विवेकानंद जी ने जब आह्वान किया था, ‘उठो, जागो, क्योंकि तुम्हारे देश को तुम्हारे महान त्याग की आवश्यकता है’, तो उन्होंने यह भी कहा था, ‘यह कार्य ऊर्जावान, सुदृढ़ और बौद्धिक युवा ही करेंगे; यही उनका दायित्व है।’

आज ऐसा ही परिवर्तन और नव-निर्माण का कालखंड हमारे समक्ष है, जब देश विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर सशक्त रूप से अग्रसर है। यह लक्ष्य केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं, बल्कि जागरूक, सक्षम और मूल्यनिष्ठ युवाशक्ति के माध्यम से ही साकार होगा।

इसलिए आज का युवा केवल अपने व्यक्तिगत भविष्य का निर्माता नहीं है, बल्कि राष्ट्र के भाग्य का शिल्पकार है। आपके विचार, आपका चरित्र, आपका परिश्रम और आपका नवाचार ही भारत को विकसित, सशक्त और विश्वगुरु बनाने की नींव रखेंगे।

प्रिय अभिभावकों, 

आज का यह गौरव आपका भी है। आपके त्याग, धैर्य और विश्वास के बिना यह संभव नहीं था।

सम्मानित शिक्षक एवं कर्मचारीगण, आपने समर्पण और संवेदनशीलता के साथ भविष्य का निर्माण किया है, मैं आपको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ।

माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन जी, आपकी गरिमामयी उपस्थिति ने इस समारोह को विशेष सम्मान प्रदान किया है और युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित किया है।

अंत में, वर्ष 2024 और 2025 के सभी स्नातक विद्यार्थियों को मैं हृदय से बधाई देता हूँ।

आपका भविष्य उज्ज्वल, सार्थक और उद्देश्यपूर्ण हो। आप यहाँ से प्राप्त मूल्यों को जीवन भर संजोए रखें। और अपनी शिक्षा से भारत को और अधिक सशक्त बनाने में योगदान दें।

आप सभी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

धन्यवाद,

जय हिन्द!