SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF ANNUAL CONVOCATION OF BABA FARID UNIVERSITY AT FARIDKOT ON JANUARY 10, 2026.
- by Admin
- 2026-01-10 13:00
बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के दीक्षांत समारोह पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 10.01.2026, शनिवार समयः सुबह 10:30 बजे स्थानः फरीदकोट
नमस्कार
आज बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज़ के संघटक महाविद्यालयों के दीक्षांत समारोह के अवसर पर, इस पावन भूमि फरीदकोट में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत गर्व और गहन आत्मसंतोष की अनुभूति हो रही है।”
सर्वप्रथम, मैं आज इस संस्थान से संबद्ध 7 कॉलेजों से उपाधियाँ प्राप्त करने वाले सभी 139 विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई देता हूँ। साथ ही, इस उपलब्धि में सहभागी सभी अभिभावकों और परिवारजनों के प्रति भी मैं अपना सादर अभिनंदन एवं आभार व्यक्त करता हूँ।
आज वर्ष 1998 में स्थापित इस प्रतिष्ठित संस्थान में उपस्थित होकर मुझे गर्व और सम्मान की अनुभूति हो रही है कि यह विश्वविद्यालय महान सूफी संत और आध्यात्मिक विभूति बाबा शेख फरीद जी के नाम पर स्थापित है। फरीदकोट की पहचान बाबा फरीद जी की महान विरासत से अभिन्न रूप से जुड़ी है।
सन् 1173 में जन्मे बाबा फरीद जी प्रेम, शांति और मानवता के संदेशवाहक थे। उनकी शिक्षाएँ करुणा, सादगी और निःस्वार्थ सेवा पर आधारित थीं। स्वास्थ्य विज्ञान को समर्पित इस विश्वविद्यालय का उनके नाम से जुड़ा होना अत्यंत अर्थपूर्ण है, क्योंकि चिकित्सा का मूल उद्देश्य भी मानवीय पीड़ा को कम करना और जीवन की रक्षा करना है।
फरीदकोट की इस पावन भूमि पर बाबा फरीद जी की स्मृति में ऐतिहासिक गुरुद्वारा टिल्ला बाबा फरीद स्थित है। उनकी रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं, जो यह दर्शाती हैं कि उनका संदेश संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक है। उनका सिद्धांत, ‘दूसरों के लिए वही चाहो जो तुम अपने लिए चाहते हो’, आज भी सामाजिक समरसता का आधार है।
इस अवसर पर उनकी वाणी की ये पंक्तियाँ विशेष स्मरणीय हैं:
‘फरीदा बुरे दा भला कर, गुस्सा मन न हठाए।
देही रोग न लगई, पल्ले सब कुछ पाए।’
अतः चिकित्सा क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए हमें स्मरण रखना चाहिए कि सच्ची सेवा केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि प्रेम, सहानुभूति और मानवता के प्रति समर्पण से पूर्ण होती है।
देवियो और सज्जनो,
बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज़ ने निरंतर प्रगति करते हुए पंजाब में चिकित्सा, दंत चिकित्सा, नर्सिंग और सहायक स्वास्थ्य शिक्षा के एक सशक्त केंद्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। इसके स्नातक देश-विदेश में टरशरी अस्पतालों, जिला व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, शिक्षण, अनुसंधान और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में सेवाएँ दे रहे हैं।
राष्ट्रीय प्राथमिकताओं जैसे कौशल विकास, नवाचार और रोजगारोन्मुखता के अनुरूप विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक सुधारों, रणनीतिक सहयोगों और उद्योग सहभागिता से अपने अकादमिक व व्यावसायिक पारितंत्र को सुदृढ़ किया है।
मुझे यह उल्लेख करते हुए विशेष संतोष का अनुभव हो रहा है कि गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदकोट में एमबीबीएस सीटों की संख्या दोगुनी की गई और कई नई विशेषता व सुपर-स्पेशलिटी विभाग शुरू हुए, जिससे टरशरी और क्वाटरनरी स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत हुईं। अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों की स्थापना से संस्थान की उपचार क्षमता बढ़ी। परिसर विकास के तहत फरीदकोट व पटियाला के स्किल सेंटरों में छात्रावासों का निर्माण-नवीनीकरण, नया क्रिटिकल केयर ब्लॉक और व्यापक सौंदर्यीकरण कार्य पूरे किए गए।
हर्ष की बात है कि इस प्रतिष्ठित संस्थान ने सतत विकास में प्लैटिनम ‘ग्रीन यूनिवर्सिटी’ प्रत्यायन तथा 2025-2028 के लिए पर्यावरण व ऊर्जा ऑडिट प्रमाणन प्राप्त किया है। इसने डिजिटल इकोसिस्टम का उन्नयन कर पेपरलेस विश्वविद्यालय की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं।
संस्थान द्वारा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोगों के माध्यम से प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ अनेक समझौते किए गए, जिनमें एन.एस.डी.सी. (नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) तथा एन.एस.डी.सी.आई. (एन.एस.डी.सी. इंटरनेशनल) के साथ रोजगार उन्मुखी कौशल विकास के लिए किए गए समझौते प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय सेना के वेस्टर्न कमांड के सहयोग से अग्निवीरों, पूर्व सैनिकों तथा कार्यरत कार्मिकों के कौशल विकास हेतु ‘ट्रेन-द-ट्रेनर’ कार्यक्रम भी प्रारंभ किया गया।
मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि 79वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के अवसर पर इंटरनेशनल ग्रीन यूनिवर्सिटी अवॉर्ड-2024 सहित इस संस्थान को अनेक सम्मान मिले हैं। संस्थान द्वारा आयुष मंत्रालय के सहयोग से अश्वगंधा पर राष्ट्रीय अभियान शुरू किया गया तथा विभिन्न राष्ट्रीय आयोजनों के माध्यम से देशभक्ति और सामाजिक दायित्व को भी बढ़ावा दिया गया।
मैं समझता हूं कि संस्थान की ये उपलब्धियाँ स्वास्थ्य शिक्षा, रोगी सेवा, अनुसंधान, सतत विकास तथा राष्ट्र-निर्माण के क्षेत्रों में उत्कृष्टता के प्रति दूरदर्शी नेतृत्व और अटूट प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण हैं।
प्रिय स्नातकों,
आज का यह दीक्षांत समारोह केवल एक औपचारिक शैक्षणिक समारोह नहीं है, बल्कि वह महत्वपूर्ण क्षण है जो चिकित्सा विद्यार्थियों को ऐसे चिकित्सकों में रूपांतरित करता है, जिन्हें मानव जीवन की अमूल्य जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
आज, जब आप अपने जीवन के अगले चरण की ओर बढ़ रहे हैं, तो आप न केवल इस प्रतिष्ठित संस्था से प्राप्त ज्ञान और कौशल लेकर जा रहे हैं, बल्कि समाज की सेवा के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी अपने साथ लेकर जा रहे हैं।
हमारी सभ्यता में चिकित्सा को कभी मात्र एक पेशा नहीं माना गया है। इसे सदैव मानवता की सेवा के रूप में देखा गया है। हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा हमें यह स्मरण कराती हैः “न वैद्यः केवलं औषधं दद्यात्, सकरुणां अपिदद्यात्।” अर्थात् एक चिकित्सक को केवल औषधि ही नहीं, करुणा भी प्रदान करनी चाहिए।
हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है, ‘आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थ साधनम्’ अर्थात् स्वास्थ्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य है और जीवन की प्रत्येक उपलब्धि तथा समस्त प्रगति का मूल आधार है।
जब हम स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करते हैं, तो हम केवल व्यक्ति के शरीर का उपचार नहीं करते, बल्कि उसकी गरिमा, कार्यक्षमता और आशा को भी नवजीवन प्रदान करते हैं। यह प्रभाव केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके परिवारों और समूचे समुदायों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।
एक चिकित्सक का प्रभाव केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह रोग-निवारण, स्वास्थ्य शिक्षा, टीकाकरण, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, मातृ एवं शिशु देखभाल तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों तक विस्तृत होता है। आप केवल स्वास्थ्य सेवा प्रदाता नहीं हैं, आप सामाजिक परिवर्तन के संवाहक भी हैं।
आचार्य चरक हमें स्मरण कराते हैं कि, ‘हिताहितं सुखं दुःखं आयुस्तस्य हिताहितम्’। इसका तात्पर्य यह है कि एक चिकित्सक को यह ज्ञान होना चाहिए कि जीवन के लिए क्या हितकर है और क्या अहितकर। यही विवेक चिकित्सा को केवल उपचार की विधा नहीं, बल्कि लोककल्याण का सशक्त माध्यम बनाता है।
डॉक्टर का कार्य न केवल व्यावसायिक जिम्मेदारी है, बल्कि यह समर्पण, त्याग और सेवा का प्रतीक भी है। डॉक्टरों को ‘धरती का भगवान’ कहा गया है। चाहे दिन हो या रात, पर्व हो या आपदा, डॉक्टर सदैव अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहते हैं।
इसलिए, हम सबका कर्तव्य है कि इस महान पेशे के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करते हुए, चिकित्सा व्यवस्था को और अधिक मजबूत और संवेदनशील बनाने के लिए सामूहिक प्रयास करें ताकि ‘‘सबका स्वास्थ्य, सबका विकास’’ का सपना वास्तव में साकार हो सके।
प्रिय युवा चिकित्सकों,
आप ऐसे समय में अपने करियर की शुरुआत कर रहे हैं जब चिकित्सा क्षेत्र में असाधारण परिवर्तन और चुनौतियाँ सामने हैं। हालिया वर्षों ने हमें यह स्पष्ट रूप से दिखाया है कि स्वास्थ्य सेवा न केवल राष्ट्रीय विकास, बल्कि आर्थिक स्थिरता और वैश्विक सहयोग का भी एक मूल स्तंभ है।
आज चिकित्सा क्षेत्र को न केवल क्लिनिकल कौशल की आवश्यकता है, बल्कि संवेदनशीलता, नैतिक प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक समझ और निरंतर सीखने की भूख की भी अत्यंत आवश्यकता है।
टेलीमेडिसिन, जेनोमिक्स, ए.आई. इन हेल्थकेयर, मेंटल हेल्थ अवेयरनेस और प्रिवेंटिव केयर के क्षेत्रों में हो रहे बदलावों के साथ, भविष्य रोमांचक तो है ही, लेकिन जटिल भी है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि इन बदलावों को खुले मन से स्वीकारें, नवीन ज्ञान के लिए सदैव जिज्ञासु रहें और अपनी जड़ों से जुड़े रहें।
देवियो और सज्जनो,
यदि हम देश के स्वास्थ्य ढांचे की बात करें तो आज हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। 2014 से अब तक 1 लाख से अधिक नई मेडिकल सीटें जोड़ी गई हैं, और आने वाले पाँच वर्षों में 75 हजार अतिरिक्त सीटें बनाने का लक्ष्य रखा गया है। पीजी सीटों में 80 प्रतिशत वृद्धि और नए एम्स की स्थापना से चिकित्सा ढाँचा सुदृढ़ हुआ है।
केंद्रीय बजट 2025-26 में स्वास्थ्य मंत्रालय को 99 हजार 858 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2014-15 से 191 प्रतिशत अधिक है। अगले तीन वर्षों में सभी जिला अस्पतालों में डेकेयर कैंसर केंद्र स्थापित होंगे, 36 दवाओं पर सीमा शुल्क छूट से उपचार सस्ता होगा और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में भारत को वैश्विक चिकित्सा गंतव्य बनाने की दिशा में कार्य हो रहा है।
चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी असाधारण वृद्धि दर्ज की गई है। 2014 में 387 मेडिकल कॉलेज थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर 816 तक पहुँच गई है। और एम्स की संख्या भी 2014 में 7 से बढ़कर अब 20 हो गई है।
वर्ष 2018 में शुरू की गई ‘आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक पात्र परिवार को 5 लाख तक की कैशलेस बीमा सुविधा दी जाती है।
‘प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन’ के तहत 17 हजार से अधिक उप-स्वास्थ्य केंद्रों को आयुष्मान आरोग्य मंदिर में विकसित किया जा रहा है तथा 11 हजार से अधिक शहरी आरोग्य मंदिरों की स्थापना झुग्गी-झोंपड़ी और वंचित क्षेत्रों में की जा रही है।
साथ ही 3 हजार 382 ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट्स, 730 एकीकृत जनस्वास्थ्य प्रयोगशालाएँ और 602 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक्स के निर्माण की प्रक्रिया जारी है। अब तक राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को लगभग 32 हजार 929 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दी जा चुकी है।
आज का युग डिजिटल स्वास्थ्य का युग है। ‘आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन’ के तहत National Health ID (ABHA Card) जारी किए जा रहे हैं, जिससे हर नागरिक का मेडिकल रिकॉर्ड ऑनलाइन सुरक्षित रूप में उपलब्ध रहेगा। अब किसी भी नागरिक का उपचार देश के किसी भी कोने में, किसी भी डॉक्टर द्वारा तुरंत किया जा सकता है।
भारत ने “स्वास्थ्य आत्मनिर्भरता” की दिशा में भी ऐतिहासिक प्रगति की है। आज भारत न केवल दवाइयों का, बल्कि वैक्सीन और चिकित्सा उपकरणों का भी प्रमुख वैश्विक उत्पादक बन चुका है। भारत को आज "Pharmacy of the World" कहा जाता है क्योंकि हम विश्व की 60 प्रतिशत से अधिक वैक्सीन और 20 प्रतिशत से अधिक जेनेरिक दवाएँ आपूर्ति करते हैं।
“मेक इन इंडिया” के तहत 300 से अधिक चिकित्सा उपकरणों का उत्पादन देश में ही किया जा रहा है। इससे रोजगार सृजन, लागत नियंत्रण और निर्यात में वृद्धि हुई है।
भारत ने मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से करोड़ों बच्चों और गर्भवती महिलाओं को टीकाकरण के दायरे में लाया है। 2021-22 में, इस अभियान ने 90 प्रतिशत से अधिक कवरेज हासिल की, जो एक अभूतपूर्व उपलब्धि है। कोविड महामारी के दौरान भारत ने Covaxin और Covishield जैसी वैक्सीन के माध्यम से विश्व का नेतृत्व किया और 200 से अधिक देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराई।
‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि योजना’ के तहत आज देशभर में 15 हजार से अधिक जनऔषधि केंद्र संचालित हो रहे हैं। यहाँ मरीजों को 60 से 90 प्रतिशत तक सस्ती दवाएँ उपलब्ध होती हैं। यह पहल ‘स्वास्थ्य समानता’ की दिशा में एक ठोस कदम है।
भारत की परंपरा में ‘‘आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी’’ (AYUSH) का विशेष स्थान है। विश्व के 30 से अधिक देशों में आयुष केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “अंतरराष्ट्रीय योग दिवस” का मान्यता प्राप्त होना भारत की सांस्कृतिक और स्वास्थ्य चेतना की विजय है।
भारत सरकार के ‘‘पोषण अभियान’’ और “प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना” जैसी पहलों ने महिलाओं और बच्चों के पोषण एवं मातृ स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार किया है।
आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस दिशा में सरकार ने “टेली-मानस” प्लेटफॉर्म की शुरुआत की है, जिसके माध्यम से देशभर में 1 हजार से अधिक मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र कार्यरत हैं।
प्रिय स्नातकों,
अब हम अमृत काल में हैं और विकसित भारत 2047 की दिशा में एक ऐतिहासिक यात्रा पर अग्रसर हैं। ‘फिट इंडिया’ का सपना तभी पूरा होगा जब चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हमारे कुशल और समर्पित स्वास्थ्य कर्मी अपनी पूरी क्षमता और प्रतिबद्धता के साथ इस लक्ष्य को प्राप्त करने में जुटे रहेंगे। इस यात्रा में सरकार, चिकित्सा संस्थान, टेक्नोलॉजी, अनुसंधान और सामाजिक सहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका है।
आइए, हम सभी मिलकर इस लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ें और यह सुनिश्चित करें कि 2047 का भारत न केवल आर्थिक और तकनीकी रूप से विकसित हो, बल्कि एक स्वास्थ्य-संपन्न, जागरूक और सशक्त राष्ट्र के रूप में भी स्थापित हो।
आज मैं प्रत्येक उपाधि प्राप्त करने वाले स्नातक तथा उनके परिवारजनों को हार्दिक बधाई देता हूँ और आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ, जो सत्यनिष्ठा, सेवा और उत्कृष्टता से परिभाषित हो। आप ज्ञान से उपचार करें, करुणा से सेवा करें और अंतरात्मा के साथ नेतृत्व करें।
मैं बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज़ के नेतृत्व एवं सम्पूर्ण टीम को उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए भी हार्दिक बधाई देता हूँ।
धन्यवाद
जय हिंद!