SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF SHATABDI VARSH MAHOTSAV BY SHRI VARDHMAN SATHANAKVASI JAIN AT MAHARASHTRA ON JANUARY 11, 2026.
- by Admin
- 2026-01-11 13:00
गुरुदेव श्री अम्बालाल जी का संयम शताब्दी वर्ष, राजराजेश्वरी गुरुमाता श्री प्रेमवती जी का जन्म शताब्दी वर्ष तथा गुरुदेव श्री सौभाग्य मुनिजी का संयम अमृत (हीरक) वर्ष के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 11.01.2026, रविवार समयः सुबह 11:00 बजे स्थानः मुंबई
जय जिनेंद्र!
आज इस अत्यंत पावन, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से गौरवपूर्ण अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे गहन आत्मिक संतोष और अपार सौभाग्य की अनुभूति हो रही है। आज का यह समारोह केवल एक आयोजन नहीं है, बल्कि यह संयम, साधना, त्याग और आत्मोन्नयन की महान परंपरा का त्रिवेणी पर्व है।
इस अत्यंत पावन, धार्मिक और प्रेरणादायक कार्यक्रम में मुझे आमंत्रित कर जो सम्मान प्रदान किया गया है, उसके लिए मैं श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ (मेवाड़), मुंबई के सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
ऐसे आयोजन केवल स्मृति पर्व नहीं होते, बल्कि ये समाज की आत्मा को पुनर्जीवित करने के अवसर होते हैं।
संघ द्वारा शिक्षा, सेवा, संस्कार, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के क्षेत्रों में किए जा रहे कार्य यह सिद्ध करते हैं कि जब आध्यात्म सेवा से जुड़ता है, तब वह राष्ट्र-निर्माण का आधार बन जाता है।
मैं भगवान महावीर से प्रार्थना करता हूँ कि वे आपको निरंतर ऐसी ही प्रेरणा प्रदान करें, जिससे इस महानगर में रहने वाले प्रवासी बंधुओं के जीवन में धर्म के प्रति जिज्ञासा बनी रहे, संस्कारों के प्रति निष्ठा बनी रहे और गुरुभगवंतों के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण अक्षुण्ण रहे।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज हम तीन महान आध्यात्मिक विभूतियों से जुड़े तीन विशेष अवसरों का साक्षी बन रहे हैं:-
प.पू. गुरुदेव श्री अम्बालाल जी का संयम शताब्दी वर्ष,
प.पू. गुरुमाता श्री प्रेमवती जी का जन्म शताब्दी वर्ष,
तथा प.पू. गुरुदेव श्री सौभाग्य मुनिजी का संयम अमृत (हीरक) वर्ष।
ये तीनों अवसर मिलकर हमें जैन परंपरा की उस अविरल, दिव्य और तेजस्वी धारा से जोड़ते हैं, जो आत्मशुद्धि, अहिंसा, अपरिग्रह, तप और करुणा को जीवन का आधार मानती है। यह धारा केवल साधु-साध्वियों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को संयमित, संतुलित और संवेदनशील जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
यह मेरा सौभाग्य रहा है कि जीवन के आरंभिक काल से ही मुझे इन पुण्य आत्माओं के सान्निध्य में रहने तथा इनके उदात्त जीवन से सद्गुणों को आत्मसात करने का अवसर प्राप्त हुआ। इन महापुरुषों का स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन मेरे लिए सदैव नैतिक शक्ति और आत्मिक ऊर्जा का स्रोत रहा है। स्थानकवासी परंपरा में इन महान विभूतियों का सान्निध्य मात्र ही नहीं, बल्कि उनका आचरण ही हम सभी के लिए जीवंत उपदेश है, जो निरंतर आत्मनिरीक्षण और आत्मविकास की प्रेरणा देता है।
मेवाड़ संघ, मुंबई द्वारा इस महान त्रिशताब्दी पर्व को लेकर जो श्रद्धा, उत्साह और संगठित प्रयास दिखाई दे रहे हैं, तथा जिन विविध आयोजनों के माध्यम से आप आने वाली पीढ़ियों को धर्म, संस्कार, संयम और सेवा के मूल्यों से जोड़ रहे हैं, उसके लिए मैं संघ के सभी सदस्यों को हृदय से साधुवाद देता हूँ। ऐसे आयोजन केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों के चरित्र-निर्माण की आधारशिला होते हैं।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
मेवाड़ की धरती सदा से धर्म, शौर्य, त्याग और स्वाभिमान के लिए प्रसिद्ध रही है। यह वह पावन भूमि है जहाँ इतिहास केवल युद्धों का नहीं, बल्कि संतों की साधना, तपस्या और करुणा का भी साक्षी रहा है। मेवाड़ की संत परंपरा में एक से बढ़कर एक ऐसे संत हुए हैं जिनका जीवन त्याग, चमत्कारिक साधना और आत्मिक ऊँचाइयों से परिपूर्ण रहा है। उनका सम्पूर्ण जीवन सात्विकता, तप और लोककल्याण का जीवंत प्रमाण रहा है।
आज भी उसी गौरवशाली परंपरा का निर्वहन करते हुए हमारे साधु-साध्वी भगवंत, बिना किसी भौतिक सुविधा के, नगर-नगर और गांव-गांव पैदल विचरण करते हुए धर्म की पताका को ऊँचा उठाए हुए हैं।
चाहे प्रचंड गर्मी हो, कड़ाके की ठंड हो या वर्षा ऋतु की कठिनाइयाँ, वे निरंतर आत्मसंयम, अहिंसा और सदाचार का संदेश देते हुए जन-जन को जागृत कर रहे हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन ही उपदेश है, उनका प्रत्येक चरण लोकमंगल का संदेश है। वास्तव में, इनके तप, त्याग और तपस्या के लिए जितना कहा जाए, उतना ही कम है।
वास्तव में, हमारे लिए यह अत्यंत गौरव और सौभाग्य का विषय है कि यही तपस्वी, त्यागमयी और लोककल्याणकारी परंपरा हमें प.पू. गुरुदेव श्री अम्बालाल जी, प.पू. गुरुमाता श्री प्रेमवती जी तथा प.पू. गुरुदेव श्री सौभाग्य मुनिजी के दिव्य जीवन में भी प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है। इन तीनों महान विभूतियों का सम्पूर्ण जीवन इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण रहा है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
संयम जैन दर्शन का केंद्रबिंदु है। संयम केवल व्रत या तपस्या नहीं, बल्कि वह जीवन-पद्धति है, जो मन, वचन और कर्म, तीनों को शुद्ध करता है। संयम हमें सिखाता है कि इच्छाओं पर विजय ही वास्तविक विजय है, और आत्मसंयम ही सच्चा साम्राज्य है।
गुरुदेव श्री अम्बालाल जी का संयम शताब्दी वर्ष हमें स्मरण कराता है कि एक संयमी जीवन कैसे हजारों जीवनों को दिशा देता है। उनका संपूर्ण जीवन तप, त्याग, सरलता और साधना का अनुपम उदाहरण रहा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता पद में नहीं, बल्कि पवित्र आचरण में निहित होती है।
साथ ही, राजराजेश्वरी गुरुमाता श्री प्रेमवती जी का जन्म शताब्दी वर्ष नारी-साधना, त्याग और करुणा का अमृत उत्सव है। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि नारी केवल सामाजिक संरचना की धुरी ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना की प्रखर संवाहिका भी है।
उनका जीवन मौन सेवा, अंतःशुद्धि और मातृत्वपूर्ण करुणा का प्रतीक रहा। उन्होंने असंख्य आत्माओं को अनुशासन, भक्ति और संयम की ओर प्रेरित किया और यह सिद्ध किया कि सच्चा नेतृत्व शब्दों से नहीं, बल्कि स्वयं के आचरण से जन्म लेता है।
इसके अलावा, गुरुदेव श्री सौभाग्य मुनिजी का संयम अमृत (हीरक) वर्ष केवल दीर्घ तपस्या का उत्सव नहीं, बल्कि उस अमृतमय प्रभाव का उत्सव है, जो उन्होंने अपने संयमी, तपस्वी और करुणामय जीवन से समाज में प्रवाहित किया है।
उन्होंने आध्यात्म को केवल प्रवचन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे संस्कार निर्माण, युवा मार्गदर्शन, सामाजिक सेवा और संस्थागत उत्थान से जोड़ा। उनके मार्गदर्शन में संघ को नई दिशा, नई ऊर्जा और नई चेतना मिली।
ऐसे संत वास्तव में “जन-जन के भाग्य विधाता” होते हैं, क्योंकि वे व्यक्ति के भाग्य को नहीं, बल्कि उसकी दृष्टि को बदलते हैं, और दृष्टि बदलते ही जीवन बदल जाता है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
जैन धर्म केवल एक संप्रदाय नहीं, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि, जीवन की मर्यादा और विश्व-कल्याण का एक शाश्वत जीवन-दर्शन है। यह धर्म मनुष्य को बाहरी जगत से अधिक उसके आंतरिक संसार की ओर उन्मुख करता है। जैन दर्शन का मूल केंद्र आत्मा है। यह मानता है कि प्रत्येक जीव में आत्मा विद्यमान है और प्रत्येक आत्मा अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति और अनंत आनंद से युक्त है। बंधन बाहर नहीं, भीतर हैं और मुक्ति भी भीतर ही है। इसलिए जैन धर्म आत्मोन्नयन के लिए संयम, तप, ध्यान और सदाचार का मार्ग प्रशस्त करता है।
जैन धर्म की आत्मा अहिंसा है। भगवान महावीर का अमर संदेश “अहिंसा परमो धर्मः” केवल शारीरिक हिंसा से बचने का उपदेश नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता, वाणी की मधुरता और कर्मों की करुणा का समग्र दर्शन है। जैन परंपरा सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव के प्रति भी संवेदनशीलता का आग्रह करती है। आज जब विश्व हिंसा, घृणा और असहिष्णुता से जूझ रहा है, तब जैन अहिंसा वैश्विक शांति और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाती है।
जैन दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत अनेकांतवाद है। यह सिखाता है कि सत्य एक हो सकता है, परंतु उसके दृष्टिकोण अनेक होते हैं। कोई भी व्यक्ति संपूर्ण सत्य का अकेला स्वामी नहीं हो सकता। यह विचारधारा संवाद, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान को जन्म देती है। आज के वैचारिक संघर्षों, धार्मिक असहिष्णुता और सामाजिक विभाजन के युग में अनेकांतवाद समाज को संतुलन व सौहार्द की दिशा प्रदान करता है।
जैन धर्म का तीसरा प्रमुख स्तंभ अपरिग्रह है, अर्थात आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। यह सिद्धांत आज के उपभोक्तावादी युग में अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। पर्यावरण संकट, सामाजिक असमानता और मानसिक तनाव का मूल कारण असीमित इच्छाएँ हैं। जैन धर्म सिखाता है कि साधनों को नहीं, इच्छाओं को सीमित करना ही सच्चा समाधान है। अपरिग्रह जीवन में संतोष, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है।
जैन साधना पद्धति में तप और संयम का विशेष महत्व है। तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा को समर्थ और निर्मल बनाना है। संयम मन को दिशा देता है, तप उसे शक्ति देता है और ध्यान उसे शांति प्रदान करता है। जैन साधना व्यक्ति को आत्मनियंत्रण, धैर्य और विवेक का प्रशिक्षण देती है। आज के तनावग्रस्त समाज के लिए जैन ध्यान और संयम मानसिक स्वास्थ्य का प्रभावी साधन बन सकते हैं।
जैन धर्म आधुनिक विश्व की अनेक चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है। यह पर्यावरण संरक्षण का दर्शन है, करुणा और शाकाहार का विज्ञान है, मानसिक शांति का मार्ग है और नैतिक नेतृत्व का आधार है। आज जब विश्व टिकाऊ विकास की बात करता है, तब जैन धर्म हजारों वर्ष पूर्व ही संतुलित उपभोग, सह-अस्तित्व और करुणामय जीवन का मार्ग प्रशस्त कर चुका है।
जैन समाज ने सदैव शिक्षा, चिकित्सा, सेवा, नैतिकता और राष्ट्र-निर्माण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई है। विद्यालय, महाविद्यालय, चिकित्सालय, गौशालाएँ, आपदा सेवा और सामाजिक उत्थान के कार्यों में जैन समाज का योगदान केवल संख्या से नहीं, बल्कि संस्कारों और समर्पण से पहचाना जाता है। यह समाज धर्म को केवल उपासना तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे सेवा के रूप में जीता है।
आज जब हम विकसित भारत की परिकल्पना करते हैं, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि सच्चा विकास केवल आर्थिक नहीं, नैतिक और मानवीय भी होना चाहिए। अहिंसा से शांति, अनेकांत से सहिष्णुता, अपरिग्रह से संतुलन और संयम से चरित्र, ये सभी मूल्य विकसित भारत की आत्मा बन सकते हैं। जैन धर्म इस दृष्टि से भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।
अंततः, जैन धर्म केवल मोक्ष का मार्ग नहीं, बल्कि मानवता का मार्ग है। यह केवल साधुओं के लिए नहीं, समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। यदि हम इसके सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में उतार लें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन परिवर्तित होगा, बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व भी अधिक शांत, संतुलित और संवेदनशील बन सकेगा।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब हम विकसित भारत की ओर अग्रसर हैं, तब हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि विकास केवल भौतिक नहीं, नैतिक भी होना चाहिए। समृद्धि केवल साधनों की नहीं, संवेदनाओं की भी होनी चाहिए।
यदि भारत को सच्चे अर्थों में विकसित बनना है, तो उसे गुरुदेव अम्बालाल जी, गुरुमाता प्रेमवती जी और गुरुदेव सौभाग्य मुनिजी जैसे संतों के आदर्शों से प्रेरणा लेकर संयमी, करुणामय और कर्तव्यनिष्ठ समाज का निर्माण करना होगा।
इस संयम शताब्दी महोत्सव 2026 के मुख्य प्रेरणा स्रोत जिनशासन प्रभाविका परम पूज्य साध्वी विजयलता जी म.सा. आदि ठाना के कमल चरणों में वंदन नमन व विशेष कृतज्ञता। आपके आशीर्वाद से ही यह विशाल कार्यक्रम उत्कृष्टता की पराकाष्ठा पर पहुँचा।
मेवाड़ संघ मुंबई के सभी पदाधिकारी, सदस्य व विशेष अध्यक्ष श्री भेरूलाल जी, महामंत्री प्रकाश जी नाहर, कोषाध्यक्ष फूल चंद जी नाहर को धन्यवाद। आपकी मेहनत, लगन व गुरु भक्ति अविश्वसनीय है और इसी से कार्यक्रम आशातीत सफलता को प्राप्त हो रहा है।
अंत में, मैं इन तीनों पावन अवसरों के लिए संपूर्ण जैन समाज, मेवाड़ संघ और सभी आयोजकों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूँ।
आइए, हम सब इस ऐतिहासिक अवसर पर यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन में संयम उतारेंगे, विचारों में शुद्धता लाएंगे, आचरण में करुणा अपनाएंगे, और समाज में सद्भाव को सुदृढ़ करेंगे।
यही इन महान आत्माओं के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ मैं आप सभी को इस पावन आयोजन की हार्दिक शुभेच्छाएं देता हूँ।
धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय जिनेंद्र!