SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF HARIVALLABH SANGEET SAMMELAN AT JALANDHAR ON DECEMBER 27.12.2025.
- by Admin
- 2025-12-27 22:25
‘हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन’ की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चन्द कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 27.12.2025, शनिवार समयः शाम 6:00 बजे स्थानः जालंधर
नमस्कार!
आज मैं अत्यंत गर्व और भावपूर्ण सम्मान के साथ श्री बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन के 150वें वर्ष के इस ऐतिहासिक अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर अत्यंत हर्ष, गौरव और आत्मिक संतोष का अनुभव कर रहा हूं। मैं इस आयोजन के लिए ‘श्री बाबा हरिवल्लभ संगीत महासभा’ को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूं।
यह अत्यंत ही हर्ष और गर्व का विषय है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की इस कालजयी परंपरा ने डेढ़ शताब्दी तक निरंतर रस, राग और आध्यात्मिकता का अद्भुत संचार किया है। यह स्वयं में एक ऐसी धरोहर है जो हमारे सांस्कृतिक इतिहास और संगीत साधना को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करती रही है।
मैं समझता हूं कि जालंधर स्थित श्री बाबा हरिवल्लभ संगीत महासभा भारतीय शास्त्रीय संगीत के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार की एक अनुपम परंपरा है, जो सन् 1875 से निरंतर विश्वविख्यात श्री बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन का आयोजन करती आ रही है।
प्रतिवर्ष दिसंबर के अंतिम सप्ताह में जालंधर के देवी तालाब स्थित इस पावन संगीत-तीर्थ पर आयोजित होने वाला यह तीन दिवसीय महोत्सव, शास्त्रीय संगीत की साधना, विकास और जनसंपर्क को सशक्त रूप प्रदान करता है। यह श्रद्धा, साधना और परंपरा का जीवंत संगम है, जहाँ संगीत को आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में अनुभव किया जाता है।
मुझे ज्ञात हुआ है कि महासभा आयोजनों के साथ-साथ संगीत शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है। इसके संगीत पाठ्यक्रम भावी पीढ़ी के कलाकारों को शास्त्रीय संगीत की शुद्ध और गहन शिक्षा प्रदान करते हैं।
आज यह महोत्सव भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी संगीत प्रेमियों को आकर्षित करता है। तीन दिनों में 15 से 20 प्रतिष्ठित एवं उभरते कलाकारों को सजीव प्रस्तुति का अवसर मिलता है, जिससे परंपरा और नवाचार के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित होता है।
देवियो और सज्जनो,
इस गौरवशाली परंपरा के संस्थापक परम श्रद्धेय बाबा हरिवल्लभ जी का जीवन स्वयं एक प्रेरक साधना-गाथा है। उनका जन्म 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होशियारपुर जिले के बाजवारा गांव में हुआ। अल्पायु में माता-पिता के साये से वंचित होने के बावजूद, संगीत और अध्यात्म ने उनके जीवन को दिशा दी।
उनके नाना उन्हें जालंधर लाए और अक्सर देवी तालाब ले जाते थे, जहाँ वे स्वामी तुलजागिरी जी के भजनों को सुनते थे। इन दिव्य स्वरों और आध्यात्मिक वातावरण ने उनके भीतर संगीत साधना का वह बीज रोपा, जो आगे चलकर एक महान और जीवंत परंपरा के रूप में विकसित हुआ।
श्री बाबा हरिवल्लभ जी ने अपने जीवन से हमें यह संदेश दिया कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा की साधना और ईश्वर से संवाद का पवित्र माध्यम है। इसी महान परंपरा को जालंधर की धरती पर 150 वर्षों तक जीवित रखना एक अनोखी उपलब्धि है और यह पूरे पंजाब, पूरे भारत और विश्वभर के संगीत-प्रेमियों के लिए गौरव का विषय है।
मुझे ज्ञात हुआ है कि सन् 1875 में बाबा तुजागिरी जी की प्रथम पुण्यतिथि पर बाबा हरिवल्लभ ने संगीत सम्मेलन का आयोजन किया था। तब से वार्षिक हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन आयोजित करने की यह परंपरा निरंतर जारी है।
जहां तक मुझे ज्ञात है, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी भी 1919 में हुए इस सम्मेलन में उपस्थित लोगों में से एक थे। निस्संदेह, डेढ़ शताब्दी की लंबी यात्रा में यह त्योहार राष्ट्रीय सांस्कृतिक कैलेंडर का एक अभिन्न अंग बन गया है। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने भी श्री बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन को भारत के सबसे पुराने संगीत समारोह के रूप में मान्यता दी है।
मैं उन वरिष्ठ तथा युवा कलाकारों का विशेष रूप से अभिनंदन करता हूँ, जो अपनी कला से इस मंच को सम्मान और ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह मंच पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित भीमसेन जोशी, उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ, पंडित रविशंकर, उस्ताद अमजद अली ख़ाँ जैसी कई महान विभूतियों और अनगिनत अन्य मनीषियों की यादों से पवित्र है। यहाँ की हर धुन, हर आलाप और हर राग, इतिहास के अनगिनत स्वर्णिम अध्यायों का साक्षी है।
देवियो और सज्जनो,
भारतीय संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है; यह आत्मा की भाषा, चित्त की साधना और ईश्वर से संवाद का सशक्त माध्यम है। हमारे शास्त्रों में “नादब्रह्म” की अवधारणा इस सत्य को दर्शाती है कि नाद अर्थात् ध्वनि ही ब्रह्म है। संगीत का आधार नाद ही है। नाद से श्रुति, श्रुति से स्वर तथा स्वर से ही राग की उत्पत्ति होती है।
संगीत को हमारे ऋषियों ने ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ा। सामवेद को भारतीय संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। इसमें स्वर, ताल और लय को आध्यात्मिक अनुशासन के साथ विकसित किया गया। सामवेद में निहित मंत्रों का गायन यज्ञों और हवनों के दौरान तीन से सात सुरों में किया जाता रहा है, जिससे वातावरण पवित्र होता है और साधक के मन में एकाग्रता तथा शांति का संचार होता है।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गुरबाणी ने संगीत को भक्ति और आत्मिक उत्थान का सहज साधन बनाया। सिख गुरुओं ने गुरबाणी को रागों में रचकर यह संदेश दिया कि ईश्वर की आराधना केवल शब्दों से नहीं, बल्कि सुरों की साधना से भी होती है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में विभिन्न रागों में रचित गुरबाणी मानव मन को अहंकार से मुक्त कर प्रेम, करुणा और समानता का मार्ग दिखाती है। गुरबाणी का कीर्तन आत्मा को शांति प्रदान करता है और समाज में सद्भाव तथा समरसता का भाव जागृत करता है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत का उल्लेख रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के विभिन्न कांडों में संगीत के प्रयोग का वर्णन है। विशेष रूप से अयोध्या में आयोजित उत्सवों के दौरान ढोल, शंख और अन्य वाद्यों की ध्वनियों का उल्लेख मिलता है। महाभारत में भी संगीत का महत्वपूर्ण स्थान है। कृष्ण की बाँसुरी का जादुई प्रभाव, सप्त स्वरों और गांधार ग्राम का उल्लेख, शंख, ढोल और अन्य वाद्यों का प्रयोग युद्ध और उत्सवों में दिखाया गया है।
साथियो,
मुग़ल काल से भारतीय संगीत ने अपनी बुलन्दियों को छुआ। तानसेन, जोकि अकबर के नवरत्नों में से एक थे, उन्होंने भैरव, मल्हार, रागेश्वरी, दरबारी रोडी, दरबारी कानाडा, सारंग, जैसे कई रागों का निर्माण किया था। उन्होंने भारत में शास्त्रीय संगीत के विकास में अपना अपूर्व योगदान दिया है। उनके गहरे मित्र कवि सूरदास ने उनके बारे में लिखा है - भलो भयो विधि ना दिए शेषनाग के कान। धरा मेरू सब डोलते तानसेन की तान।।
उनके आश्चर्यजनिक संगीत कौशल के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि उनके संगीत से पशु-पक्षी एकत्रित हो जाते थे, जब वे गाते थे तो पत्थर पिघल जाता था और हिंसक जंगली जानवर भी शांत हो जाते थे, जब वह मल्हार गाते थे, तो बारिश हो जाती थी, दीपक राग गाने पर दीये जल उठते थे। इन किंवदंतियों के ऐतिहासिक प्रमाण भले ही न हों, किन्तु उनमें इस सत्यता का अंश ज़रूर है कि अगर तानसेन जैसा महान गायक हो तो संगीत में असीम संभावनाएँ निहित हैं।
साथियो,
हमारे देश की मिट्टी का संगीत, यहां उपजा संगीत न केवल हमें खुशी देता है, बल्कि यह हमारे दिल और दिमाग को भी छू जाता है और हमें सुकून प्रदान करता है। जब हम किसी भी शैली का कोई शास्त्रीय संगीत सुनते हैं, फिर चाहे यह हमारी समझ में आता हो या न आता हो, लेकिन अगर हम इसे ध्यान से सुनें, तो हमें परम शांति का अनुभव होता है।
भारतीय संगीत हिमालय की ऊँचाइयों की तरह आत्मा को उठाता है, गंगा की गहराई की तरह हृदय को छूता है, अजंता-एलोरा की सुंदरता की तरह सौंदर्य भरता है, ब्रह्मपुत्र की विशालता की तरह अंतरात्मा को फैलाता है, और समुद्र की लहरों की तरह आत्मा को अनंत लय में डुबो देता है। यह संगीत भारतीय समाज के आध्यात्मिक जीवन का प्रतिबिंब है, जहाँ जीवन और धर्म संगीत के माध्यम से एक हो जाते हैं।
भारतीय लोक संगीत हो, शास्त्रीय संगीत हो या फिल्म संगीत हो, उसने हमेशा देश और समाज को जोड़ने का ही काम किया है। यह भक्ति आंदोलन का आधार बना, सूफी परंपरा का स्वर बना, और लोकजीवन का अभिन्न अंग रहा। शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भजन, कीर्तन, कव्वाली, सभी ने सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया।
संगीत हम सभी को धर्म और जाति से ऊपर उठकर एकजुट रहने का संदेश देता है। उत्तर भारत का हिंदुस्तानी संगीत, दक्षिण का कर्नाटिक संगीत और बंगाल का रबींद्र संगीत, असम का ज्योति संगीत और जम्मू-कश्मीर का सूफी संगीत, ये सभी हमारी सभ्यता का आधार हैं।
हमारे देश की धरोहर भारतीय संगीत हम सभी के लिए एक वरदान है। इस विरासत में अपार शक्ति और ऊर्जा विद्यमान है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ‘‘वयम् राष्ट्रे जागृयाम’’ अर्थात् हमें हर पल सतर्क रहना चाहिए। हमें अपनी विरासत के लिए हर पल काम करते रहना चाहिए।
आप में से अधिकांश लोग हमारी संस्कृति की बारीकियों और इसके विस्तार को समझते हैं। लेकिन आज की युवा पीढ़ी शायद इससे परिचित नहीं है। इस उदासीनता के कारण ही कई वाद्य यंत्र और शैलियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। बहुत से बच्चे अलग-अलग तरह के गिटार के बारे में तो जानते होंगे लेकिन उन्हें शायद ही सरोद और सारंगी के बीच का अंतर पता हो। यह उचित नहीं है और ऐसा नहीं होना चाहिए।
हमें अपनी विरासत के प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए। हमारी संस्कृति, कला, संगीत, साहित्य, हमारी विभिन्न भाषाएं और हमारी प्रकृति, ये सभी हमारी बहुमूल्य विरासत का हिस्सा हैं। कोई भी देश अपनी विरासत और संस्कृति को भूलकर आगे नहीं बढ़ पाया है। इस धरोहर की रक्षा करना और इसे और मजबूत करना हम सबका कर्तव्य है।
भारत 140 करोड़ लोगों, 122 भाषाओं, 1600 बोलियों और 7 धर्मों का एक बहुआयामी राष्ट्र है, लेकिन फिर भी यह व्यवस्थित रूप से मज़बूती के साथ टिका हुआ है, जो हमारे देश की खूबसूरती को दर्शाता है।
इसलिए, हम में से प्रत्येक भारतीय को अपने पूर्वजों द्वारा हमें प्रदान की गई सांस्कृतिक विरासत का पूरा सम्मान करना चाहिए और इसके संरक्षण में अपना योगदान देना चाहिए। संविधान के तहत, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह हमारी संयुक्त संस्कृति की समृद्ध विरासत के महत्व को समझे और संरक्षित करे।
देवियो और सज्जनो,
आज का युग तनाव, भौतिकतावाद और जल्दबाज़ी से भरा हुआ है। ऐसे समय में संगीत न केवल एक मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम बन जाता है। संगीत की धुनें दिल की गहराइयों तक पहुँचकर तनाव को कम करती हैं, अशांत मन को शांत करती हैं और नकारात्मकता को दूर भगाती हैं।
इसके अलावा, संगीत भावनाओं को जागृत करता है। खुशी, दुख, उत्साह, विरह, आशा ये सभी भावनाएँ संगीत के माध्यम से जीवंत हो उठती हैं और इंसान को अपने आप से जोड़ती हैं। यही कारण है कि आज भी लोग संगीत की शरण में जाते हैं, ताकि अपने जीवन में फिर से भावनात्मक संतुलन और मानवीय संवेदना की ज्योत जलाई जा सके।
साथियो,
मुझे विशेष रूप से यह कहना है कि युवा पीढ़ी के लिए भारतीय संगीत केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की शक्ति है। संगीत अनुशासन सिखाता है, एकाग्रता बढ़ाता है, संवेदनशील बनाता है और आत्मविश्वास देता है।
आज आवश्यकता है कि हम अपने युवाओं को यह समझाएँ कि आधुनिकता और तकनीक के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना ही सच्ची प्रगति है। भारतीय संगीत में वह सामर्थ्य है जो उन्हें वैश्विक मंच पर पहचान दिला सकता है, बिना अपनी पहचान खोए।
भारतीय संगीत की यह अमूल्य धरोहर तभी सुरक्षित रह सकती है, जब हम संगीत शिक्षा को संस्थागत और सुलभ बनाएँ; दुर्लभ रागों, बंदिशों और परंपराओं का दस्तावेजीकरण करें; युवा कलाकारों को मंच और मार्गदर्शन दें; और तकनीक का उपयोग करते हुए परंपरा की आत्मा को सुरक्षित रखें। हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन जैसे आयोजन इस दिशा में प्रकाश स्तंभ हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाते रहेंगे।
साथियो,
जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो यह केवल आर्थिक या तकनीकी विकास की परिकल्पना नहीं है। यह सांस्कृतिक रूप से सशक्त, नैतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से जागरूक भारत का सपना है। और संगीत इस सपने की आत्मा है।
अंत में मैं सम्मेलन समिति को हृदय से बधाई देता हूँ, जिन्होंने 150 वर्षों की इस गौरवशाली विरासत को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि इसे युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का सराहनीय प्रयास भी किया। आज, जब आधुनिकता की तेज़ धारा कई परंपराओं को पीछे छोड़ देती है, तब इस प्रकार की संस्थाएँ हमारी संस्कृति का दीपक प्रज्वलित रखती हैं।
मैं बाबा हरिवल्लभ जी की अमर परंपरा को नमन करता हूँ और कामना करता हूँ कि यह संगीत-साधना सदियों तक यूँ ही खिलती व महकती रहे।
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, एक बार फिर से हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन की 150वीं वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई।
धन्यवाद,
जय हिन्द!