SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF CONFERENCE OF VICE CHANCELLORS AND PRINCIPALS OF BORDER AREAS COLLEGES OF PUNJAB AT PUNJAB LOK BHAVAN ON 28. 12 2025.

‘कुलपति सम्मेलन एवं सीमावर्ती क्षेत्रीय महाविद्यालय सम्मेलन’ पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चन्द कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 28.12.2025, रविवारसमयः सुबह 10:00 बजेस्थानः पंजाब लोक भवन

         

नमस्कार!

आज ‘कुलपतियों का सम्मेलन एवं सीमावर्ती क्षेत्र के महाविद्यालयों का सम्मेलन’ के इस अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे विशेष प्रसन्नता और संतोष का अनुभव हो रहा है।

आज के इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में देश की उच्च शिक्षा प्रणाली, विशेषकर पंजाब के सीमावर्ती जिलों में स्थित महाविद्यालयों, से जुड़े विषयों पर गहन, सार्थक एवं दूरदर्शी विचार-विमर्श किया गया है।

यह उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी पंजाब लोकभवन में विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों जैसे NAAC मान्यता, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन तथा नशा मुक्ति पर विस्तृत एवं सार्थक विचार-विमर्श किया गया था।

आज का यह सम्मेलन उसी सतत संवाद एवं संस्थागत चिंतन की अगली कड़ी है, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों को अधिक सशक्त, संवेदनशील, समावेशी एवं परिणामोन्मुख बनाना है।

सीमावर्ती क्षेत्रों की शिक्षा केवल एक अकादमिक विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता, आंतरिक सुरक्षा और मानव संसाधन विकास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। इन क्षेत्रों में स्थित महाविद्यालय युवाओं को दिशा, अवसर और आत्मविश्वास प्रदान कर उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

देवियो और सज्जनो,

यह सर्वविदित है कि सीमावर्ती जिलों के महाविद्यालयों को भौगोलिक कठिनाइयों, सुरक्षा-संवेदनशीलता, सीमित संसाधनों की कमी, फैकल्टी की उपलब्धता तथा अधोसंरचना संबंधी बाधाओं जैसी विशिष्ट चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इन परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि नीति-निर्माण एवं क्रियान्वयन विशेष संवेदनशीलता, लचीलापन और क्षेत्र-विशेष दृष्टिकोण के साथ किया जाए।

प्रो. अश्वनी भल्ला, पूर्व उप-निदेशक, उच्च शिक्षा, पंजाब, ने इन समस्याओं को नीतिगत एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उनके द्वारा सुझाए गए लक्षित वित्तपोषण, फैकल्टी सुदृढ़ीकरण, डिजिटल अवसंरचना का विस्तार, NAAC-उन्मुख गुणवत्ता सुधार तथा स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़ा पाठ्यक्रम के सुझाव सीमावर्ती महाविद्यालयों को सशक्त बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

मैं यह विशेष रूप से सुझाव देना चाहूँगा कि सीमावर्ती क्षेत्रों के सभी महाविद्यालय NAAC मान्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए A अथवा A++ ग्रेड प्राप्त करने हेतु ठोस, समयबद्ध एवं निगरानी-आधारित कार्ययोजना अपनाएँ, ताकि शैक्षणिक गुणवत्ता, संस्थागत विश्वसनीयता तथा विद्यार्थियों के भविष्य के अवसरों में गुणात्मक सुधार सुनिश्चित हो सके।

इन सभी समाधानों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु राज्य सरकार, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

देवियो और सज्जनो,

डॉ. सुनीता सिवाच, संयुक्त सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), द्वारा प्रस्तुत छात्रवृत्ति योजनाओं से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी योग्य विद्यार्थी केवल आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा से वंचित न रहे। यूजीसी की छात्रवृत्तियाँ समावेशी शिक्षा, सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की मजबूत आधारशिला हैं।

सीमावर्ती एवं वंचित क्षेत्रों में छात्रवृत्ति संबंधी जागरूकता, समयबद्ध आवेदन प्रक्रिया तथा संस्थागत सहयोग को विशेष प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इसके अलावा, डॉ. अखिलेश गुप्ता ने ज्ञान सृजन से मूल्य सृजन की ओर बढ़ते विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (STI) परिदृश्य को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया।

देवियो और सज्जनो,

मैं समझता हूं कि पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमाएँ नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र की सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता की पहली पंक्ति हैं। इन क्षेत्रों ने देश की रक्षा में अमूल्य योगदान दिया है, किंतु ऐतिहासिक कारणों से यहाँ शैक्षिक, आर्थिक और बुनियादी ढाँचागत चुनौतियाँ भी विद्यमान रही हैं। सीमित संसाधन, आवागमन की कठिनाइयाँ, रोजगार के अवसरों की कमी, तथा कभी-कभी सामाजिक अस्थिरता, ये सभी कारक शिक्षा की गुणवत्ता और पहुँच को प्रभावित करते हैं।

परंतु साथ ही, इन क्षेत्रों में ऊर्जावान युवा शक्ति, समृद्ध कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, साहसी और अनुशासित सामाजिक चरित्र, तथा देशभक्ति की गहरी भावना जैसी असीम संभावनाएँ भी हैं। आवश्यकता है कि शिक्षा को इन संभावनाओं के अनुरूप ढाला जाए और युवाओं को सशक्त बनाया जाए।

आज के युग में शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वह है, जो ज्ञान के साथ कौशल, मूल्यों के साथ नवाचार, और स्थानीय आवश्यकताओं के साथ वैश्विक दृष्टि को जोड़ती है। सीमावर्ती क्षेत्रों में यह आवश्यकता और भी अधिक प्रबल है, क्योंकि यहाँ की शिक्षा को रोज़गारोन्मुख, उद्यमशीलता-प्रेरित और सामाजिक रूप से उत्तरदायी होना चाहिए।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमावर्ती क्षेत्र के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाला छात्र, देश के किसी भी प्रतिष्ठित संस्थान के छात्र से कम अवसरों और संसाधनों में न रहे। इसके लिए शिक्षकों की गुणवत्ता, आधुनिक पाठ्यक्रम, अनुसंधान सुविधाएँ, डिजिटल अवसंरचना और उद्योग-शिक्षा सहयोग अत्यंत आवश्यक हैं।

माननीय कुलपतिगण, आप केवल विश्वविद्यालयों के प्रशासक नहीं, बल्कि शैक्षणिक दिशा-दर्शक और परिवर्तन के अग्रदूत हैं। आपसे अपेक्षा है कि आप सीमावर्ती क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को समझते हुए लचीले और नवाचारी शैक्षणिक मॉडल विकसित करें। कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, सीमा प्रबंधन, रक्षा अध्ययन, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएँ और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विशेष पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाएँ। स्थानीय उद्योगों, सहकारी संस्थाओं और स्टार्ट-अप्स के साथ सार्थक साझेदारी विकसित की जाए।

मैं यह भी सुझाव देना चाहूँगा कि सीमावर्ती जिलों के महाविद्यालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीकों, डेटा एनालिटिक्स, साइबर स्किल्स एवं उभरती प्रौद्योगिकियों को अपने शिक्षण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बनाएं। ए.आई-आधारित शिक्षा, शॉर्ट-टर्म स्किल कोर्स, इंडस्ट्री-लिंक्ड सर्टिफिकेशन, इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप एवं स्टार्ट-अप सहयोग के माध्यम से विद्यार्थियों को कम समय में उद्योगों में रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

इसके साथ-साथ अनुसंधान प्रस्ताव लेखन, प्रतिस्पर्धी फंडिंग तथा नवाचार-आधारित परियोजनाओं में, विशेष रूप से युवा शिक्षकों और छात्रों के लिए क्षमता निर्माण समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

देवियो और सज्जनो,

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 हमारे लिए एक सशक्त मार्गदर्शक है। यह हमें गुणवत्ता, समावेशन, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धाकी स्पष्ट दिशा प्रदान करती है। साथ ही, यह नीति बहु-विषयक शिक्षा, कौशल विकास, भारतीय ज्ञान परंपरा, डिजिटल शिक्षा और शोध-संस्कृति को बढ़ावा देती है। सीमावर्ती क्षेत्रों में इस नीति का प्रभावी क्रियान्वयन सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

स्थानीय भाषाओं में शिक्षण, लचीली प्रवेश-निकास प्रणाली, क्रेडिट बैंक, और व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण, ये सभी कदम सीमावर्ती क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को अधिक सुलभ और प्रासंगिक बनाएँगे।

विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों को स्थानीय आवश्यकताओं, क्षेत्रीय चुनौतियों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के संतुलन के साथ अपने शैक्षणिक, प्रशासनिक और अकादमिक निर्णय लेने होंगे।

सीमावर्ती जिलों के महाविद्यालयों को कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, जहाँ शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा सके।

साथियो,

हम सभी जानते हैं कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त एवं दीर्घकालिक माध्यम है, क्योंकि यह केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति को चरित्रवान, विचारशील और कर्मठ नागरिक बनाती है। एक शिक्षित समाज ही सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर और समृद्ध हो सकता है, जहाँ युवा आविष्कारक, उद्यमी और नेता बनकर देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाते हैं। 

इतिहास गवाह है कि जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे राष्ट्रों ने शिक्षा पर जोर देकर ही आर्थिक चमत्कार किए, जबकि हमारे स्वतंत्र भारत ने भी महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर और सरदार पटेल जैसे महान शिक्षित नेताओं के बल पर स्वाधीनता प्राप्त की।

आज के संदर्भ में शिक्षा डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और नैतिक मूल्यों के माध्यम से राष्ट्र को मजबूत करती है। यह गरीबी, अज्ञानता और सामाजिक असमानता की जड़ों को काटती है, जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है। 

पंजाब जैसे राज्य में, जहाँ युवा शक्ति प्रचुर है, शिक्षा के माध्यम से हम खेल, कृषि, उद्योग और सांस्कृतिक क्षेत्रों में नेतृत्व तैयार कर सकते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल जी मानते थे कि, “मजबूत सीमाओं का आधार केवल हथियार नहीं, बल्कि शिक्षित और जागरूक नागरिक होते हैं”, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। 

सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि वहाँ के नागरिकों की शिक्षा, चेतना और राष्ट्रनिष्ठा से सुदृढ़ होती है। जब सीमावर्ती क्षेत्रों का युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से सशक्त होता है, तो वह समाज की स्थिरता, शांति और राष्ट्रीय सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाता है। इसलिए, इन क्षेत्रों में उच्च शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना देश की आंतरिक शक्ति और सीमाओं की सुरक्षा का स्थायी आधार है।

डिजिटल युग में सीमाएँ सिमट रही हैं। ऑनलाइन शिक्षा, वर्चुअल प्रयोगशालाएँ, डिजिटल लाइब्रेरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित शिक्षण पद्धतियाँ सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए समान अवसर प्रदान कर सकती हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल अवसंरचना सुदृढ़ हो और शिक्षक व विद्यार्थी दोनों डिजिटल साक्षरता में दक्ष हों।

महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे खेल, संस्कृति, एनसीसी, एनएसएस, सामुदायिक सेवा और मूल्य-आधारित शिक्षा को मजबूत करें, ताकि युवाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास हो।

देवियो और सज्जनो,

पिछले एक दशक में भारत ने वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय उन्नति की है। आज भारत का उच्च शिक्षा क्षेत्र विश्व का तीसरा सबसे बड़ा शिक्षा तंत्र है। वर्ष 2014 में जहाँ हमारे देश में 16 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 23 हो गई है और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) की संख्या 2014 के 13 से बढ़कर आज 21 हो चुकी है। 

विश्वविद्यालयों के स्तर पर भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 2014 में 760 विश्वविद्यालय थे, जो अब बढ़कर 1 हजार 338 हो गए हैं। वहीं 2014 में 38 हजार 498 कॉलेज थे जो अब बढ़कर 52 हजार 81 हो गए हैं। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी असाधारण वृद्धि दर्ज की गई है। 2014 में 387 मेडिकल कॉलेज थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर 816 तक पहुँच गई है। और एम्स की संख्या भी 2014 में 7 से बढ़कर अब 20 हो गई है।

यह विस्तार भारत की शैक्षिक क्षमता को दर्शाता है, जो सरकार की दूरदर्शी नीतियों, बढ़ती मांग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का भी सशक्त प्रमाण है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत आज ज्ञान, कौशल और नवाचार के क्षेत्र में तेज़ी से वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।

यदि हमारे सभी उच्च शिक्षा संस्थान राष्ट्रीय शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति, नवाचार के विस्तार, और कौशल-विकास के उन्नयन में समर्पित भाव से आगे आएँ, तो भारत निश्चित ही वैश्विक ज्ञान के सुपरपावर के रूप में उभर सकता है।

साथियो,

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बहुत पहले ही शिक्षा और उद्योग के सहयोग को राष्ट्र की प्रगति का आधार माना था। आज भारत इस सोच को एक नए आयाम पर ले जा रहा है। हमारे सामने आधुनिक तकनीक के अनगिनत अवसर हैं। Artificial Intelligence, Internet of Things, Big Data, 3D Printing, Robotics, Geo-informatics, Smart Healthcare और Defence Tech, इन क्षेत्रों में भारत तेजी से वैश्विक-केंद्र के रूप में उभर रहा है।

युवा पीढ़ी को इन बदलावों के अनुरूप तैयार करना अब हमारी शिक्षा-व्यवस्था की जिम्मेदारी है ताकि भारत इन तकनीकी क्रांतियों में केवल सहभागी ही नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देने वाला अग्रणी देश बन सके।

और हाँ, हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि आधुनिक तकनीक के इस तीव्र गति वाले दौर में हमारी युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट न जाए। प्रगति और परंपरा दोनों का संतुलन बनाए रखना समय की माँग है। इसलिए आवश्यक है कि हम युवाओं को न केवल डिजिटल कौशल से सशक्त करें, बल्कि उन्हें अपने इतिहास, मूल्यों, भाषा, कला और सांस्कृतिक विरासत से भी गहराई से जोड़ें।

देवियो और सज्जनो,

सीमावर्ती क्षेत्रों के संदर्भ में एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील विषय सीमा-पार से होने वाली नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी का भी है। यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि हमारे युवाओं, समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। नशीले पदार्थों की तस्करी युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलकर उनकी ऊर्जा और भविष्य को नष्ट करती है, जबकि अवैध हथियार सामाजिक शांति और स्थिरता को भंग करते हैं। 

ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन्हें युवाओं को सही दिशा, जीवन-मूल्य और आत्मबल प्रदान करने का केंद्र बनना होगा। शिक्षा, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, कौशल विकास और परामर्श के माध्यम से युवाओं को नशे से दूर रखकर सकारात्मक जीवन-दृष्टि की ओर अग्रसर किया जा सकता है।

विकसित भारत 2047 का संकल्प तभी साकार होगा, जब हमारा युवा स्वस्थ, शिक्षित, कौशलयुक्त और आत्मविश्वासी होगा। नशा-मुक्त समाज इस लक्ष्य की अनिवार्य शर्त है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को चाहिए कि वे नशा-निरोधक जागरूकता कार्यक्रमों, सामुदायिक सहभागिता और मूल्य-आधारित शिक्षा को अपनी शैक्षणिक संस्कृति का अभिन्न अंग बनाएँ। जब शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व एक साथ आगे बढ़ते हैं, तभी सशक्त नागरिक और सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण होता है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि पूर्व बैठकों तथा आज के इस सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श से प्राप्त सुझाव नीतिगत निर्णयों, संस्थागत सुधारों एवं जमीनी क्रियान्वयन में अवश्य परिवर्तित होंगे।

अंत में मैं सभी सम्मानित वक्ताओं, वाईस-चांसलरों, प्रिंसिपलों एवं प्रतिभागियों का इस सतत, सार्थक और दूरदर्शी संवाद के लिए हार्दिक अभिनंदन करता हूँ तथा अपेक्षा करता हूँ कि हम सभी मिलकर सीमावर्ती जिलों में उच्च शिक्षा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की दिशा में निरंतर कार्य करते रहेंगे।

धन्यवाद,जय हिन्द!