SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF HUMARE JEEVAN ME PRAYAVARAN KA MAHATAV AT MOHALI ON DECEMBER 29, 2025.

विश्व परमार्थ फाउंडेशन के ‘पर्यावरण संरक्षण’ के कार्यक्रम के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चन्द कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 29.12.2025, सोमवार

समयः शाम 5:00 बजे

स्थानः मोहाली

 

नमस्कार!

पर्यावरण संरक्षण के विषय से जुड़े इस पावन एवं महत्वपूर्ण कार्यक्रम में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता एवं आत्मिक संतोष की अनुभूति हो रही है। सर्वप्रथम मैं इस नेक पहल के लिए विश्व परमार्थ फाउंडेशन तथा इसके प्रेरणास्रोत, पूज्य स्वामी सम्पूर्णानंद ब्रह्मचारी जी को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने सेवा, साधना और समाज-कल्याण को अपने जीवन का ध्येय बनाकर पर्यावरण संरक्षण जैसे युग-प्रासंगिक विषय को जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया है।

मुझे इस पवित्र भूमि से अपना जुड़ाव याद करते हुए गर्व हो रहा है। पिछले वर्ष, मैंने स्वयं श्री अमृतेश्वर महादेव मंदिर का उद्घाटन किया था। वह क्षण मेरे लिए अविस्मरणीय था, क्योंकि वह उद्घाटन केवल एक मंदिर का नहीं था, वह आस्था, संस्कृति, और सामूहिक चेतना का उद्घाटन था।

और आज, उसी भूमि से जब स्वामी सम्पूर्णानंद ब्रह्मचारी जी के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण का यह संदेश उठ रहा है, तो यह सिद्ध करता है कि जहां आध्यात्म की जड़ें गहरी होती हैं, वहां प्रकृति की रक्षा का भाव भी सबसे प्रबल होता है।

आदरणीय स्वामी सम्पूर्णानन्द ब्रह्मचारी जी, की प्रशंसा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। आपका जीवन बाल्यकाल से ही त्याग, तप और ब्रह्मचर्य के आदर्शों से सुशोभित रहा है। अग्नि अखाड़ा के सचिव के रूप में आपने अनेक कुम्भ आयोजनों का सफल नेतृत्व किया, जो आपकी संगठन क्षमता और सनातन सेवा भावना का प्रमाण है। 

आपके मार्गदर्शन में पर्यावरण संरक्षण के अनेक कार्यक्रम समाज को नई दिशा दे रहे हैं। आप केवल संत नहीं, बल्कि प्रेरणा के प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मानवता, संस्कृति और प्रकृति की रक्षा के लिए निरंतर समर्पित हैं। आप केवल पर्यावरण के लिए कार्यक्रम नहीं करवा रहे, आप प्रकृति को उसकी खोई हुई गरिमा लौटाने का यज्ञ कर रहे हैं। 

मुझे यह जानकर अत्यंत गर्व और प्रसन्नता है कि आपके द्वारा वर्ष 2015 में स्थापित विश्व परमार्थ फाउंडेशन अब तक पर्यावरण संरक्षण, जल-संवर्धन, वृक्षारोपण, स्वच्छता, शिक्षा, नारी-सशक्तिकरण और जन-जागरण से जुड़े विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न कर चुका है।

यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। यह निरंतरता का प्रमाण है। यह सामाजिक दायित्व की गंभीरता का प्रमाण है। यह संस्था की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। संस्था ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपना दायित्व निभाते हुए विभिन्न वृक्षारोपण कार्यक्रमों के माध्यम से केवल वृक्ष नहीं लगाए, बल्कि विश्वास लगाया, जिम्मेदारी बोई, और परिवर्तन सींचा।

देवियो और सज्जनो,

आज के इस आयोजन में भी, स्वामी जी के नेतृत्व में, जो संदेश दिया जा रहा है, वह केवल ज्ञान का संदेश नहीं, वह अनुभव, आचरण, और प्रेरणा का संदेश है।

परमार्थ का अर्थ है, स्व से परे जाकर दूसरों के लिए जीना। और पर्यावरण की रक्षा, इससे बड़ा परमार्थ और क्या हो सकता है? एक वृक्ष लगाना धरती को जीवन देना है। एक नदी को स्वच्छ रखना सभ्यता को जीवित रखना है। एक बच्चे को प्रकृति से जोड़ना भविष्य को सुरक्षित रखना है। और समाज को जागरूक करना मानवता को अमर रखना है।

आज हम मंदिरों, संस्थानों, विद्यालयों, पंचायतों, और समाज के हर स्तर पर पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ते हुए देख रहे हैं, और इसमें विश्व परमार्थ फाउंडेशन जैसी संस्थाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पर्यावरण संरक्षण का यह कार्यक्रम न केवल हमें प्रकृति के महत्व और उसकी समृद्ध जैव विविधता के प्रति सजग करता है, बल्कि यह भी स्मरण कराता है कि पृथ्वी का संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सभी की है।

हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है। वर्तमान में, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्रदूषण जैसी समस्याएँ हमारे सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़ी हैं। 

इन चुनौतियों का समाधान केवल सरकारों या संगठनों के प्रयासों से ही संभव नहीं है बल्कि इसके लिए समाज के हर वर्ग, विशेषकर शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है, जिसे आप बखूबी निभा रहे हैं। 

महात्मा गांधी जी ने कहा था, ‘‘पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन हर व्यक्ति के लोभ के लिए नहीं।‘’ इस भावना को आत्मसात करना आज के युग की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

देवियो और सज्जनो,

पंजाब केवल पाँच नदियों की धरती नहीं है, बल्कि यह श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और महान संत परंपरा की वह पावन भूमि है, जहाँ आध्यात्मिक चेतना और प्रकृति के प्रति संवेदना एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। इस धरती की आत्मा में केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व का गहन दर्शन निहित है। 

श्री गुरु नानक देव जी ने “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत” के माध्यम से सदियों पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वायु, जल और पृथ्वी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन के पवित्र आधार हैं, जिनका संरक्षण करना हमारा नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है।

वास्तव में, जब हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं, तो हम केवल प्रकृति का संरक्षण नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। इस प्रकार पंजाब की आध्यात्मिक विरासत हमें यह सिखाती है कि पर्यावरण संरक्षण कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का स्वाभाविक विस्तार है।

देवियो और सज्जनो,

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को देवतुल्य स्थान प्राप्त है। प्राचीन ग्रंथों में पृथ्वी को ‘माता’ कहा गया है-“माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्या’’ - जिसका अर्थ है, “पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।‘’ 

वेदों में अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश को पंचमहाभूत के रूप में श्रद्धा और पूज्यता के साथ स्वीकार किया गया है। ये पंचतत्व केवल प्राकृतिक तत्व नहीं, बल्कि हमारे जीवन, स्वास्थ्य और अस्तित्व के मूल आधार हैं। भारतीय दर्शन में इनका संरक्षण इसलिए आवश्यक माना गया है, क्योंकि इन्हीं के संतुलन से सृष्टि का संतुलन बना रहता है। 

जब अग्नि शुद्ध रहती है, वायु निर्मल होती है, जल स्वच्छ होता है, पृथ्वी उर्वर होती है और आकाश प्रदूषणमुक्त होता है, तभी मानव जीवन सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध बनता है। इस प्रकार वेद हमें यह बोध कराते हैं कि पंचमहाभूतों का सम्मान और संरक्षण करना केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि मानव कल्याण का शाश्वत मार्ग है। 

हमारे पूर्वजों ने वृक्षों और नदियों की पूजा की है। पीपल, वट, तुलसी जैसे वृक्षों को पवित्र मानकर उनकी आराधना की जाती है। गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियों को देवी का दर्जा दिया गया है। 

यह श्रद्धा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक प्रभावी पद्धति रही है। यही हमारी दृष्टि प्रदूषणमुक्त वातावरण निर्माण करके संसार को सुखी बनाने में सहायक होगी। 

भारत की परंपरा में पर्यावरण को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अंग माना गया है। हमारे ग्रंथों में ‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’ अर्थात ‘जो वृक्षों की रक्षा करता है, उसकी प्रकृति रक्षा करती है’, जैसे सिद्धांत हमें प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का बोध कराते हैं।

आज जब पर्यावरणीय संकट गहराते जा रहे हैं, भारतीय संस्कृति की पर्यावरणीय चेतना हमें समाधान का मार्ग दिखाती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में प्रकृति के संरक्षण पर बल दिया गया है, जो आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। 

आज पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग की अभूतपूर्व चुनौती का सामना कर रहा है। यह वास्तव में प्रकृति के साथ मानव द्वारा की गई अनियंत्रित छेड़छाड़ का प्रत्यक्ष परिणाम है। जब हम वनों का अंधाधुंध दोहन करते हैं और प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ते हैं, तो उसका प्रभाव पूरे विश्व को झेलना पड़ता है।

ऐसे में यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि जहाँ भी उपयुक्त स्थान उपलब्ध हो, वहाँ अधिक से अधिक वृक्ष लगाए जाएँ। वृक्ष केवल पर्यावरण की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि वे प्राणवायु प्रदान करते हैं, जलवायु को संतुलित रखते हैं, वर्षा चक्र को सहारा देते हैं और जीवन की रक्षा करने वाले मौन प्रहरी के रूप में कार्य करते हैं। वास्तव में, वृक्षों का संरक्षण और संवर्धन ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य की नींव है।

साथियो,

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपना कार्यभार सँभालते ही प्रदूषण जैसे जहर की समस्या को अनुभव करते हुए स्वच्छ भारत की संकल्पना हमारे सामने रखी थी, जिसे देशवासियों ने भरपूर समर्थन दिया। धीरे-धीरे भारत स्वच्छता की ओर बढ़ रहा है तथा पर्यावरण के प्रति सचेत हो रहा है। 

केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाने हेतु कई महत्वपूर्ण नीतिगत एवं कार्यक्रमात्मक पहलें की हैं। पर्यावरण ऑडिट नियम, 2025 के माध्यम से पर्यावरणीय अनुपालन की निगरानी और लेखा-परीक्षा की व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावशाली बनाया गया है, जिससे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में बेहतर प्रवर्तन और नीति सुधार संभव हो सका है।

पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार को जन-आंदोलन का स्वरूप देने के लिए ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम तथा इको-मार्क योजना लागू की गई हैं, जिनके माध्यम से नागरिकों, संस्थानों और उपभोक्ताओं को हरित गतिविधियों एवं सतत उपभोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा आरंभ किया गया ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान पर्यावरण संरक्षण को भावनात्मक जुड़ाव से जोड़ने का प्रेरक उदाहरण है। 

वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटने हेतु वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरूआत की गई है, जिसका उद्देश्य देश के विभिन्न शहरों में वायु गुणवत्ता में सुधार लाना है। इसके साथ-साथ मिशन लाइफ (Mission LiFE – Lifestyle for Environment) के माध्यम से पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम और वन (संरक्षण) अधिनियम जैसे विधायी उपायों द्वारा संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार और जैव विविधता की रक्षा सुनिश्चित की जा रही है। ये सभी प्रयास इस बात को रेखांकित करते हैं कि केंद्र सरकार पर्यावरण संरक्षण को एक सतत राष्ट्रीय दायित्व के रूप में आगे बढ़ा रही है।

देवियो और सज्जनो,

आज आवश्यकता है कि हम प्रकृति के साथ अपने संबंधों पर पुनः विचार करें। हमें प्राकृतिक संसाधनों का भोग नहीं उपयोग करना ही होगा एवं जल, ऊर्जा की बचत करते हुए धरती माता के संरक्षण हेतु औषधीय एवं ऑक्सीजन देने वाले पौधों को लगाना तथा हरियाली को बढ़ावा देकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करना होगा।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, “हम मनुष्य पृथ्वी पर केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि संरक्षक हैं।‘’ हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि पेड़ लगाना, जल बचाना और प्रकृति से जुड़ना केवल एक कार्य नहीं, बल्कि एक धर्म है।

आज आवश्यकता है कि हम वृक्षों को जन-आंदोलन का रूप दें; हम जल को संस्कार का रूप दें; हम स्वच्छता को आदत का रूप दें; हम प्रकृति रक्षा को धर्म का रूप दें; और हम पर्यावरण को नीति, नीयत और जीवनशैली का रूप दें।

यह यात्रा केवल भाषणों से पूरी नहीं होगी, यह भागीदारी से पूरी होगी। यह सरकार, समाज, संस्था एवं साधु-संतों के सामूहिक प्रयास से पूरी होगी।

मैं आज विशेष रूप से प्रदेश की मातृशक्ति और युवा पीढ़ी से आग्रह करता हूं कि माताएं जब संस्कार देती हैं, तो पीढ़ियां बदल देती हैं। और युवा जब संकल्प लेते हैं, तो इतिहास बदल देते हैं।

आप पर्यावरण संरक्षण के अपने संकल्प की शुरूआत अपने घरों से करें। आप पौधे लगाएं, पॉलीथिन कम करें, पानी बचाएं, लोगों को प्रकृति से जोड़ें, और धरती को अपना परिवार समझें।

अंत में, मैं यही कहूंगा कि प्रकृति हमारी विरासत है, पर्यावरण हमारा दायित्व है, और इसकी रक्षा हमारा परमार्थ है।

आज स्वामी सम्पूर्णानन्द ब्रह्मचारी जी के तपस्वी नेतृत्व में जो आंदोलन आगे बढ़ रहा है, वह निश्चित रूप से पंजाब ही नहीं, पूरे भारत और विश्व को प्रेरित करेगा।

मैं विश्व परमार्थ फाउंडेशन और इसके सभी सहयोगियों, और इस यज्ञ में अपनी आहुति देने वाले हर प्रकृति-प्रेमी को शुभकामनाएं देता हूं।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम विकास करेंगे, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं। हम सांस लेंगे, लेकिन प्रकृति का गला घोंटकर नहीं। हम भविष्य बनाएंगे, लेकिन पर्यावरण मिटाकर नहीं।

“पर्यावरण बचाओ, भविष्य सजाओ’’, इस मूल मंत्र को लेकर हम आगे बढ़ें और पृथ्वी को पुनः संतुलन की ओर ले जाने में अपनी भूमिका निभाएं।

धन्यवाद,

जय हिन्द!