SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF SRIMAD BHAGWAT KATHA AT CHANDIGARH ON DECEMBER 30, 2025.
- by Admin
- 2025-12-30 18:30
‘भागवत कथा’ के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चन्द कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 30.12.2025, मंगलवार समयः शाम 4:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज मेरे लिए यह अत्यंत सौभाग्य और आत्मिक आनंद का विषय है कि मुझे इस पावन भागवत कथा में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ है। इस अवसर पर मैं व्यासपीठ पर विराजमान परम पूज्य नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज जी को सादर नमन करता हूँ तथा इस पुण्य आयोजन के लिए नृसिंह भक्ति सेवा संस्थान को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएँ देता हूँ।
मैं समझता हूं कि नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज जी एक ऐसे विलक्षण संत व्यक्तित्व हैं, जिनमें आध्यात्मिक साधना, उच्च शैक्षणिक योग्यता और समाज-सेवा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आपका जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के ग्राम कगड़ी, श्रीनगर में हुआ। आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राणी विज्ञान (जूलॉजी) में एम.एससी., दिल्ली विश्वविद्यालय से बैचलर एवं मास्टर ऑफ जर्नलिज्म, भुवनेश्वर (ओडिशा) से संस्कृत व्याकरण में आचार्य तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
आपने ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य, ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी माधवाश्रम जी महाराज से संन्यास गुरु दीक्षा ग्रहण की। देश-विदेश में अब तक आपने 1 हजार 385 भागवत कथाओं का सफल आयोजन किया है और आज चंडीगढ़ सेक्टर-56 में 1 हजार 386वीं श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हो रहा है।
वर्ष 1990 में आपने नृसिंह भक्ति सेवा संस्थान, भारतवर्ष की स्थापना की, जो मानवता की सेवा का सशक्त माध्यम बना है। इस संस्थान के अंतर्गत भूकंप, सुनामी तथा अन्य आपदाओं में अनाथ हुए बच्चों को गोद लेकर उन्हें देश-विदेश में उच्चतम शिक्षा प्रदान की जा रही है। वर्तमान में लगभग 1 हजार 400 बच्चों की निःशुल्क शिक्षा, आवास एवं भोजन की व्यवस्था संस्थान द्वारा की जा रही है। इसके अतिरिक्त, शारीरिक रूप से दिव्यांग कन्याओं के लिए निःशुल्क शिक्षा एवं आवास की व्यवस्था तथा सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु देश-विदेश में 98 एनजीओ की स्थापना आपके सेवा कार्यों की व्यापकता को दर्शाती है।
आपके उत्कृष्ट योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान प्राप्त हुआ है। केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में आपको मानव संसाधन विकास मंत्रालय की परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में नामित किया गया। काशी विद्वत परिषद द्वारा आपको भागवत भूषण सम्मान से अलंकृत किया गया है। वर्तमान में आप सनातन धर्म विकास परिषद, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं, जहाँ आपको कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है। आपका जीवन वास्तव में सेवा, साधना और सनातन मूल्यों के संरक्षण का प्रेरणादायी उदाहरण है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
हम सब भारतीय हैं, और भारत केवल एक भौगोलिक या राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक प्राचीन, सतत और जीवन्त सभ्यता है। यह सभ्यता केवल कानूनों से नहीं, बल्कि संस्कारों, मूल्यों और आचार-विचार से संचालित होती रही है। भारतीय चिंतन में व्यक्ति के बाहरी आचरण से अधिक उसके आंतरिक संस्कारों को महत्व दिया गया है, क्योंकि सुदृढ़ संस्कार ही समाज और राष्ट्र की स्थायी नींव बनते हैं।
आज यह अवसर हमें विश्व के समक्ष सनातन धर्म के वैश्विक और सार्वकालिक स्वरूप पर विचार करने का भी है। सनातन धर्म किसी का विरोधी नहीं है, बल्कि समावेशी है; यह विविधता को स्वीकार करता है, परिवर्तन के साथ सामंजस्य स्थापित करता है और सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाता है।
यही कारण है कि सनातन धर्म विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता होते हुए भी आदिकाल से आज तक जीवंत, प्रासंगिक और मार्गदर्शक बना हुआ है, जबकि इतिहास में अनेक सभ्यताएँ केवल इसलिए लुप्त हो गईं क्योंकि वे संकीर्णता, टकराव और नकारात्मकता पर आधारित थीं। सनातन का मूल मंत्र “वसुधैव कुटुम्बकम्” आज भी मानवता को शांति, सह-अस्तित्व और सार्वभौमिक कल्याण का संदेश देता है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब हम सभी यहाँ पावन भागवत कथा का श्रवण कर रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि हम इसके आरंभ और उत्पत्ति के पावन संदर्भ को भी जानें, ताकि इस दिव्य कथा के भाव, उद्देश्य और आध्यात्मिक संदेश को और अधिक गहराई से समझ सकें।
भागवत महापुराण की उत्पत्ति भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक पावन और गूढ़ अध्याय है। पुराण परंपरा में श्रीमद्भागवत को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का सार माना गया है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की, जिन्होंने वेदों का संकलन, महाभारत और अठारह पुराणों की रचना के बावजूद अपने भीतर आत्मिक अपूर्णता का अनुभव किया, क्योंकि भक्ति-तत्त्व का पूर्ण और रसपूर्ण प्रकाशन अभी शेष था।
इसी अवस्था में देवर्षि नारद ने व्यास जी को यह बोध कराया कि ईश्वर की लीलाओं, नाम और गुणों का सरल, सर्वसुलभ और भावपूर्ण वर्णन ही आत्मा को संतोष और शांति दे सकता है। उनके उपदेश से प्रेरित होकर व्यास जी ने समाधि में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप और लीलाओं का साक्षात्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना हुई। यह ग्रंथ केवल कथाओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीव और ईश्वर के बीच प्रेम, समर्पण और एकात्मता का जीवंत दर्शन है।
श्रीमद्भागवत की कथा परंपरा नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित एक स्थान) में सूतजी ( वेदों और पुराणों के प्रमुख कथावाचक थे) के माध्यम से तथा राजा परीक्षित को शुकदेव जी द्वारा किए गए उपदेश से आगे बढ़ी। मृत्यु के समीप खड़े राजा परीक्षित को भागवत श्रवण कराकर यह सिद्ध किया गया कि भक्ति भय और मृत्यु पर भी विजय का मार्ग है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत मानवता के लिए करुणा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का दिव्य संदेश है, जो आज भी सुख, शांति और मोक्ष का पथ प्रशस्त करता है।
भागवत कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता और संस्कृति की आत्मा है। यह हमारे सनातनी साहित्य के बिखरे हुए अमूल्य रत्नों की उस दिव्य माला की तरह है, जिसमें भागवत पुराण हीरे के समान दीप्तिमान है। श्रीमद्भागवत महापुराण हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराता है और यह सिखाता है कि भक्ति, ज्ञान और कर्म, तीनों का समन्वय ही मानव जीवन को सार्थक बनाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ केवल कथाएँ नहीं हैं, बल्कि वे मानवता के लिए धर्म, करुणा, प्रेम और न्याय का शाश्वत संदेश हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण 18 महापुराणों में से एक है, जिसमें 12 स्कंध, 18 अध्याय, और लगभग 700 श्लोक हैं। यह ग्रंथ भक्ति योग, ज्ञान, और वैराग्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। भागवत पुराण का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्तों की कहानियों, और धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करना है।
श्रीमद्भागवत कथा में श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता का प्रसंग अत्यंत प्रेरक है। जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो श्रीकृष्ण ने उन्हें गले लगाकर सम्मान दिया। यह प्रसंग सच्ची मित्रता, त्याग, और प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करता है। एक सक्षम मित्र को अपने अन्य मित्रों को भी सक्षम बनाने का प्रयास करना चाहिए तभी समाज में निर्धनता समाप्त हो सकती है।
इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया। इस लीला के माध्यम से उन्होंने मानवमात्र को यह संदेश दिया कि जीवन की समस्याएं भले ही पहाड़ जितनी विशाल हों, लेकिन आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ उनका सामना किया जाए तो समाधान संभव है।
भागवत कथा हमें यह बोध कराती है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धता और लोककल्याण है। आज के भौतिकतावादी और तनावपूर्ण युग में भागवत कथा मन को शांति, आत्मा को संतुलन और समाज को नैतिक दिशा प्रदान करती है।
भागवत कथा की परंपरा प्राचीन काल से मौखिक रूप में गुरु-शिष्य संवाद के रूप में प्रचलित रही है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के दौरान संत कवियों और भक्तों ने इसे जन-जन तक पहुँचाया। आधुनिक काल में कथा का स्वरूप भव्य मंच, साज-सज्जा, और डिजिटल प्रसारण के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
भगवद् गीता भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है, जो काल, देश और परिस्थितियों की सीमाओं से परे जाकर संपूर्ण मानवता को मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह ग्रंथ केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन को समझने, उसे संतुलित ढंग से जीने और कर्तव्यपथ पर दृढ़ रहने की एक सार्वभौमिक मार्गदर्शिका है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन के संशय के क्षणों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना सहस्रों वर्ष पूर्व था। गीता हमें सिखाती है कि जीवन का युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होता है, जहाँ भय, मोह, लोभ और अहंकार से संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में विजय का मार्ग कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के समन्वय से होकर गुजरता है।
भगवान श्रीकृष्ण का यह अमर संदेश “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”, हमें यह सिखाता है कि हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। यही संदेश आज के प्रतिस्पर्धात्मक और तनावपूर्ण युग में मानसिक शांति, नैतिक दृढ़ता और उद्देश्यपूर्ण जीवन की कुंजी है।
आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता, तनाव और नैतिक संकटों से जूझ रहा है, तब गीता का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन से आती है। सच्ची शक्ति हथियारों में नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और सत्यनिष्ठा में निहित होती है।
विश्व में पर्यावरण संकट की बात करें तो भगवद् गीता हमें बिना किसी स्वार्थ के अपने दायित्वों के पालन के कर्तव्ययोग का संदेश देती है। यही भाव पर्यावरण संरक्षण की मूल भावना है, जहाँ प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसका संरक्षण हमारा कर्तव्य बनता है। गीता में कहा गया है कि मनुष्य को प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जितना आवश्यक हो, क्योंकि संतुलन भंग होने पर विनाश निश्चित है।
गीता संतुलन, संयम और समन्वय की शिक्षा देती है। जब मनुष्य भोगवाद और लालच से ऊपर उठकर सादगीपूर्ण जीवन अपनाता है, तभी पृथ्वी, जल, वायु और वन जैसे प्राकृतिक तत्व सुरक्षित रह सकते हैं। इस प्रकार भगवद् गीता पर्यावरण के प्रति संवेदनशील, नैतिक और उत्तरदायी जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
मेरा मानना है कि भगवद् गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ जीवन, साहसी कर्म और प्रबुद्ध चेतना के लिए एक सार्वभौमिक मार्गदर्शक है। यह मानवता को एक सदाचारी, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों के माध्यम से यह हमें निरंतर स्मरण कराती है कि सच्ची नैतिक शक्ति बाहरी बल से नहीं, बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता, आत्मसंयम और धर्म के प्रति अटूट समर्पण से उत्पन्न होती है। गीता का यह संदेश व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों का सामना साहस, विवेक और संतुलन के साथ करने की प्रेरणा देता है तथा समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की चेतना विकसित करता है।
युवाओं के लिए भगवद् गीता एक अत्यंत प्रेरणादायी ग्रंथ है। यह उन्हें आत्मविश्वास, निर्णय-क्षमता और नैतिक साहस प्रदान करती है। गीता हमें यह सिखाती है कि सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मूल्यों के साथ आगे बढ़ने से प्राप्त होती है।
इसमें निहित कर्तव्यनिष्ठा, सत्य, संयम, सेवा और करुणा के जीवन-मूल्य युवाओं को एक सशक्त, संतुलित और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि हमारी युवा पीढ़ी गीता के संदेश को आत्मसात करे, तो वह न केवल अपने जीवन को दिशा दे सकेगी, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यदि हम अपनी नई पीढ़ी को सनातन मूल्यों से जोड़ पाए, तो निश्चय ही हमारा समाज और राष्ट्र अधिक सुदृढ़, शांत और समृद्ध बनेगा।
तेजी से बदलते इस युग में, जब तकनीक, भौतिकता और उपभोग का दबाव बढ़ रहा है, भगवद् गीता व्यक्तियों, समाजों और राष्ट्रों को शांति, संतुलन और सद्भाव की दिशा में मार्गदर्शन करती रहेगी। इसके शाश्वत उपदेश मानवता को संघर्ष से सहयोग की ओर, स्वार्थ से सेवा की ओर और अराजकता से अनुशासन की ओर ले जाते हैं।
भागवत कथा न केवल आध्यात्मिक चेतना को जागृत करती है, बल्कि व्यक्ति को अपने सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति भी सजग बनाती है। यही मूल्य आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रतिपादित आत्मनिर्भर भारत और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण की मजबूत आधारशिला हैं। जब राष्ट्र निर्माण की यात्रा आध्यात्मिक मूल्यों और नैतिक दृढ़ता से जुड़ती है, तब विकास केवल भौतिक नहीं, बल्कि समावेशी, संतुलित और स्थायी बनता है।
भागवत गीता का संदेश केवल पढ़ने या सुनने तक सीमित न रहे, बल्कि वह हमारे आचरण और निर्णयों में प्रतिबिंबित हो, यही इसकी सच्ची सार्थकता है। जब हम अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी, करुणा और विवेक के साथ करते हैं, तभी गीता हमारे जीवन में जीवंत होती है। मैं यही कहना चाहूँगा कि भगवद् गीता न केवल भारत की आत्मा है, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए शांति और मानवता का प्रकाश-स्तंभ है।
आइए, हम सभी इस पावन अवसर पर यह संकल्प लें कि हम गीता के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाकर एक न्यायपूर्ण, करुणामय और समरस समाज के निर्माण में योगदान देंगे।
अंत में, मैं एक बार फिर परम पूज्य स्वामी रसिक महाराज जी के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ और नृसिंह भक्ति सेवा संस्थान को इस भव्य एवं दिव्य आयोजन के लिए हार्दिक साधुवाद देता हूँ।
मेरी कामना है कि यह भागवत कथा सभी श्रद्धालुओं के जीवन में भक्ति, शांति, सद्भाव और सदाचार का संचार करे तथा हम सबको मानवता की सेवा और ईश्वर भक्ति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर करे।
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ,
हरि बोल।
धन्यवाद,
जय हिंद!