SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF PRATHAM MAASIK KRIPA DIWAS – 2026 AND VISIT OF CHARITABLE MULTI SPECIALITY HOSPITAL AT KARNAL HARYANA ON JANUARY 17, 2026.

श्री आत्म मनोहर जैन संस्थान के ‘‘श्रद्धालु संगम’’ समारोह के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 17.01.2026,  शनिवारसमयः दोपहर 12:00 बजेस्थानः करनाल हरियाणा

  

जय जिनेन्द्र!

आज इस पावन “श्रद्धालु संगम” में, श्री घंटाकर्ण महावीर देवता जी की कृपा-स्मृति में, दानवीर कर्ण की नगरी करनाल में स्थित इस श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर में आप सभी के बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य, आत्मिक आनंद और आंतरिक शांति का विषय है।

महा-चमत्कारी मनवांछित फलदाता श्री घंटाकर्ण महावीर देवता और सात्विक, व्यसनमुक्त जीवन जीने का प्रण कराते हुए ओसवाल वंश की संस्थापिका कुलदेवी श्री ओसिया माता (जिन्हें सच्चियायी माता कहा जाता है) का यह तीर्थस्थान सभी श्रद्धालुओं की भक्ति-भावना का आधारभूत उपासना स्थल है।

प्रत्येक माह कृष्ण चतुर्दशी को आयोजित होने वाला यह संगम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्म-चेतना के जागरण, चरित्र निर्माण और जीवन को सात्विक दिशा देने का एक दिव्य अवसर है। 

मैं इस पुनीत आयोजन के लिए श्री आत्म मनोहर जैन संस्थान समूह को हार्दिक बधाई देता हूँ, जो निरंतर श्रद्धा, सेवा और साधना की त्रिवेणी को समाज तक पहुँचा रहा है।

यह अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है कि राष्ट्रसंत श्री मनोहर मुनि जी महाराज द्वारा वर्ष 1997 में स्थापित यह संस्था शिक्षा, सेवा और संस्कार के क्षेत्र में बहुआयामी योगदान दे रही है। 

विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा का प्रसार, अस्पतालों के माध्यम से रोगियों का उपचार, अध्यात्म केंद्रों द्वारा संस्कारों का प्रबोधन एवं समाज में चरित्र निर्माण, तथा जीवदया केंद्रों के माध्यम से पशु-पक्षियों के संरक्षण, दाना-पानी और उपचार की सुदृढ़ व्यवस्थाएँ, ये सभी कार्य इस संस्था की लोककल्याणकारी प्रतिबद्धता के सशक्त प्रमाण हैं।

मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई है कि अब संस्था द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा एवं आयुर्वेद पर आधारित “जैन निरामयम केंद्र” भी प्रारंभ किया जा रहा है, जहाँ जैन जीवन पद्धति के अनुरूप प्राकृतिक और समग्र उपचार उपलब्ध कराए जाएंगे। यह पहल निश्चय ही स्वस्थ जीवन, संतुलित जीवनशैली और समग्र कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी।

ये सभी कार्य जैन परंपरा के “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” के सिद्धांत को साकार कर रहे हैं। यह संस्थान समाज को यह संदेश दे रहा है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा ही उसका सर्वोच्च स्वरूप है।

संत गौरव श्री पीयूष मुनि जी के दिशानिर्देशन में उनकी सेवा-समर्पण-सद्भाव की सजीवन झांकी यहाँ सकलतापूर्वक संचालित किए जा रहे सभी सेवा प्रकल्पों में झलक रही है। संस्थान द्वारा सेवा की अनुपम मिसाल कायम की जा रही है।

प्रिय श्रद्धालुजनों,

श्री घंटाकर्ण महावीर देवता जी केवल जैन परंपरा में ही श्रद्धेय नहीं हैं, बल्कि उन्हें हिंदू और बौद्ध परंपराओं में भी आदर और श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। वे भक्ति, साहस, रक्षा और लोककल्याण के प्रतीक माने जाते हैं। 

विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं में उनका स्मरण इस सत्य का सशक्त प्रमाण है कि भारत की सनातन संस्कृति की आत्मा समावेशिता, सह-अस्तित्व और सार्वभौमिक करुणा में निहित है।

श्री घंटाकर्ण महावीर देवता जी की उपासना हमें यह संदेश देती है कि आस्था का वास्तविक स्वरूप किसी एक मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह मानव मात्र के कल्याण, भय से मुक्ति और आत्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है। 

यही कारण है कि विविध परंपराओं के श्रद्धालु उन्हें अपने-अपने भाव से स्मरण करते हुए शांति, साहस और संरक्षण की कामना करते हैं।

श्रद्धा का अर्थ है समर्पण। और समर्पण का अर्थ है अहंकार का विसर्जन। जब व्यक्ति अहंकार छोड़कर सेवा का मार्ग अपनाता है, तभी वह सच्चा श्रद्धालु बनता है। श्री घंटाकर्ण महावीर देवता जी की आराधना हमें यही प्रेरणा देती है कि हम भय, लोभ और क्रोध से ऊपर उठकर धर्म, धैर्य और दया के मार्ग पर अग्रसर हों।

प्रिय श्रद्धालुजनों,

जैन परंपरा में देव आराधना केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि अंतर्मन के परिष्कार की साधना है, जहाँ श्रद्धा विवेक से जुड़ती है, और भक्ति करुणा में रूपांतरित होती है।

आज का युग भौतिक प्रगति का युग है। विज्ञान, तकनीक और सुविधाओं ने जीवन को तीव्र गति दी है, किंतु मन की शांति, संवेदना और संतुलन उतने ही आवश्यक हैं। इसी संतुलन का नाम है अध्यात्म। अध्यात्म हमें बाहरी जगत से अधिक अपने भीतर की यात्रा पर ले जाता है, जहाँ अहंकार क्षीण होता है, करुणा पुष्ट होती है और विवेक जागृत होता है। जब मन स्थिर होता है, तभी जीवन सार्थक होता है।

ईश्वर-स्मरण, नाम-जप और मंत्र-चेतना मानव जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जप केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि चेतना का संस्कार है। जब हम “जय महावीर”, “नमो अरिहंताणं” या भगवान के नाम का उच्चारण करते हैं, तब हम अपने भीतर की नकारात्मकता को विसर्जित करते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मंत्रों के उच्चार से मन एकाग्र होता है, तनाव घटता है और विचार शुद्ध होते हैं। यही शुद्ध विचार आगे चलकर शुद्ध कर्म बनते हैं, और शुद्ध कर्म ही जीवन को दिव्य बनाते हैं।

जैन दर्शन हमें अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह और संयम की शिक्षा देता है। ये केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि समरस समाज की आधारशिलाएँ हैं। अहिंसा हमें करुणा देती है, अनेकांत हमें सहिष्णुता देता है, अपरिग्रह हमें संतोष देता है और संयम हमें आत्मनियंत्रण सिखाता है। आज जब विश्व असहिष्णुता, तनाव और टकराव से गुजर रहा है, तब जैन दर्शन की ये शिक्षाएँ वैश्विक शांति का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

जैन धर्म आत्मकल्याण करने के साथ सभी गृहस्थ साधकों में परोपकार, समाजसेवा, अन्त्योदय के लिए पुरूषार्थ कर सभी जीवों को एक श्रेणी में रखकर सम्मानपूर्वक ढंग से जीवन जीने की प्रेरणा देता है। समाज के लिए सहयोग की भावना से सब कुछ अर्पित करने का संदेश जैन सिद्धान्तों का वर्तमान समय में बहुत बड़ी देन है। 

जैन समाज संख्या में कम होते हुए भी भगवान महावीर स्वामी जी, अन्य तीर्थंकरों तथा वर्तमान में उनके प्रतिनिधि के रूप में धरती को पावन कर रहे साधु-साध्वियों के उपदेशों को आचरण में उतारते हुए आर्थिक, व्यापारिक, औद्योगिक, जन सेवा, जीवदया, शिक्षा, चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। जैन धर्म से जुड़ा होने के कारण इस राष्ट्र की सर्वपक्षीय तरक्की में बहुमूल्य योगदान देने पर मुझे भी हर्ष का अनुभव होता है।

मैं आप सभी से आह्वान करना चाहूँगा कि आप अपने समर्थ्य तथा शक्ति के अनुरूप सेवा, परोपकार, सहयोग के क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाते हुए राष्ट्र धर्म निभाएँ। 

प्रिय श्रद्धालुजनों,

आज इस पावन स्थल से मैं विशेष रूप से अपने युवा साथियों से आग्रह करना चाहता हूँ कि आप जीवन की भौतिक उपलब्धियों, शिक्षा, करियर और तकनीकी प्रगति के साथ-साथ अध्यात्म को भी अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाइए। यही वह शक्ति है जो हमें भीतर से संतुलित करती है, कठिन परिस्थितियों में धैर्य प्रदान करती है और सफलता को विनम्रता से जोड़ती है।

आज का युवा अभूतपूर्व अवसरों के युग में जी रहा है, परंतु उसी अनुपात में तनाव, प्रतिस्पर्धा और असमंजस भी बढ़ा है। ऐसे समय में अध्यात्म हमें यह सिखाता है कि हम केवल उपभोग नहीं, बल्कि उद्देश्य के लिए भी जिएँ; केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि मानवता की सेवा के लिए भी आगे बढ़ें। जब युवा अपने भीतर की चेतना को जागृत करता है, तभी वह न केवल एक सफल पेशेवर बनता है, बल्कि एक संवेदनशील नागरिक और सच्चा राष्ट्र-निर्माता भी बनता है।

इसलिए मैं आप सबसे आह्वान करता हूँ कि प्रतिदिन कुछ क्षण आत्मचिंतन, प्रार्थना, ध्यान या सेवा के लिए अवश्य निकालें। यही अभ्यास आपके विचारों को शुद्ध करेगा, कर्मों को दिशा देगा और जीवन को सार्थकता से भर देगा।

प्रिय श्रद्धालुजनों,

इस तीर्थक्षेत्र में आकर मुझे आत्मिक, मानसिक आनंद का अविस्मरणीय अनुभव हुआ है। इस माध्यम से धर्मलाभ लेने का अवसर देने के लिए मैं संस्थान प्रबंधन को धन्यवाद देते हुए बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

श्रद्धालु संगम जैसे आयोजन समाज को जोड़ते हैं, पीढ़ियों को जोड़ते हैं और आत्माओं को जोड़ते हैं। यहाँ बालक-बालिकाएँ संस्कार पाते हैं, युवा दिशा पाते हैं और वरिष्ठजन अनुभूति पाते हैं। ऐसे आयोजन जीवन को केवल जीने का नहीं, बल्कि उसे उत्कर्ष की ओर मोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं।

अंत में, मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि श्री घंटाकर्ण महावीर देवता जी की कृपा आप सभी पर बनी रहे, यह श्रद्धालु संगम निरंतर समाज को आध्यात्मिक ऊर्जा देता रहे, और श्री आत्म मनोहर जैन संस्थान समूह सेवा, साधना और संस्कार के पथ पर निरंतर प्रगति करता रहे।

आप सभी के जीवन में शांति, स्वास्थ्य, सद्भाव और सतत आध्यात्मिक उन्नति की कामना के साथ, मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

जय महावीर!

जय जिनेन्द्र!