SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF ATTENDING OF SRIMAD BHAGWAT KATHA AT DURGA MANDIR PANCHKULA ON JANUARY 17, 2026.

गर्ग परिवार द्वारा आयोजित ‘श्रीमद भागवत कथा’’ के अवसर पर
राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 17.01.2026, शनिवार समयः शाम 5:30 बजे स्थानः पंचकूला

नमस्कार!
आज इस पुण्य और पावन अवसर पर, पंचकूला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत आत्मिक आनंद, सौभाग्य और आंतरिक शांति का अनुभव हो रहा है। 
सर्वप्रथम मैं व्यासपीठ पर विराजमान परम पूज्य कथावाचक आचार्य श्री श्याम सुंदर शास्त्री जी को सादर नमन करता हूँ तथा इस पावन आध्यात्मिक अनुष्ठान के आयोजन हेतु श्री जगमोहन गर्ग जी एवं उनके समस्त परिवार को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएँ देता हूँ, जिन्होंने इस आयोजन के माध्यम से समाज को सनातन धर्म की मूल चेतना से जोड़ने का पुण्य कार्य किया है।
मैं समझता हूं कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से वे न केवल भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का संरक्षण कर रहे हैं, बल्कि समाज में सद्भाव, सदाचार और सत्प्रेरणा का संचार भी कर रहे हैं।
हम सभी जानते हैं कि श्री जगमोहन गर्ग जी ट्राईसिटी के जाने माने समाजसेवी हैं, जो चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली में होने वाले धर्मार्थ के कार्यों में बढ़ चढ़कर के हिस्सा लेते हैं एवं तन-मन-धन से सहयोग भी करते हैं। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे गरीबों की मदद करने का काम हो या साधु संतों की सेवा हो, चाहे अभावग्रस्त लोगों को मदद की ज़रूरत हो, हर क्षेत्र में जगमोहन जी एवं उनका परिवार बढ़ चढ़कर के हिस्सा लेते है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
श्रीमद्भागवत महापुराण भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक दिव्य, अमृतमय और जीवन-दर्शन से परिपूर्ण ग्रंथ है। इसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का सार कहा गया है। इसकी उत्पत्ति की कथा स्वयं हमें यह सिखाती है कि केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, जब तक उसमें भक्ति का मधुर रस और लोककल्याण की भावना न जुड़ी हो। 
महर्षि वेदव्यास जी ने जब वेदों, उपनिषदों, महाभारत और अठारह पुराणों की रचना के उपरांत भी अपने हृदय में अपूर्णता का अनुभव किया, तब देवर्षि नारद के मार्गदर्शन से उन्होंने श्रीमद्भागवत की रचना की, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का अनुपम सेतु बन गया।
भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है; यह जीवन जीने की कला है। यह हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी कैसे आसक्ति से मुक्त रहा जाए, कैसे कर्तव्य का पालन करते हुए भी अहंकार से ऊपर उठा जाए, और कैसे प्रेम, करुणा व सेवा के माध्यम से ईश्वर की अनुभूति की जाए। भागवत का प्रत्येक प्रसंग, चाहे वह ध्रुव का अडिग संकल्प हो, प्रह्लाद की अटूट भक्ति हो, गजेन्द्र की करुण पुकार हो, या गोपियों का निष्काम प्रेम, मानव जीवन को ऊँचाइयों की ओर ले जाने वाला संदेश देता है।
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन स्वयं एक संपूर्ण दर्शन है। वे योगेश्वर भी हैं और लोकनायक भी। वे बालकृष्ण बनकर हमें निष्कपट आनंद का बोध कराते हैं, माखनचोर बनकर प्रेम का अधिकार सिखाते हैं, मित्र बनकर सुदामा जैसे निर्धन ब्राह्मण को गले लगाकर सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं, और कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश देकर हमें कर्तव्य, कर्मयोग और आत्मबोध का मार्ग दिखाते हैं। श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिकता पलायन नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और श्रेष्ठता स्थापित करने का माध्यम है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब हम पावन श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर रहे हैं, तो इसके आरंभ और उत्पत्ति के दिव्य संदर्भ को जानना आवश्यक है, ताकि हम इसके आध्यात्मिक भाव और उद्देश्य को गहराई से समझ सकें।
श्रीमद्भागवत महापुराण भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अत्यंत पावन ग्रंथ है, जिसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का सार कहा गया है। महर्षि वेदव्यास जी ने वेदों, महाभारत और 18 पुराणों की रचना के उपरांत भी आत्मिक अपूर्णता का अनुभव किया। देवर्षि नारद के उपदेश से प्रेरित होकर उन्होंने समाधि में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का साक्षात्कार किया और श्रीमद्भागवत की रचना की। यह ग्रंथ केवल कथाओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीव और ईश्वर के बीच प्रेम और एकात्मता का जीवंत दर्शन है।
श्रीमद्भागवत महापुराण 18 महापुराणों में से एक है, जिसमें 12 स्कंध, 18 अध्याय, और लगभग 700 श्लोक हैं। यह ग्रंथ भक्ति योग, ज्ञान, और वैराग्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। भागवत पुराण का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्तों की कहानियों, और धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करना है।
श्रीमद्भागवत की कथा परंपरा नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित एक स्थान) में सूतजी ( वेदों और पुराणों के प्रमुख कथावाचक थे) के उपदेशों तथा राजा परीक्षित को शुकदेव जी द्वारा सुनाई गई दिव्य कथा से आगे बढ़ी। मृत्यु के समीप खड़े राजा परीक्षित को भागवत श्रवण कराकर यह सिद्ध किया गया कि भक्ति भय और मृत्यु पर भी विजय का मार्ग है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत मानवता के लिए करुणा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत संदेश है।
भागवत कथा की परंपरा प्राचीन काल से मौखिक रूप में गुरु-शिष्य संवाद के रूप में प्रचलित रही है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के दौरान संत कवियों और भक्तों ने इसे जन-जन तक पहुँचाया। आधुनिक काल में कथा का स्वरूप भव्य मंच, साज-सज्जा, और डिजिटल प्रसारण के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
श्रीमद्भागवत कथा का प्रत्येक प्रसंग मानव जीवन के लिए एक जीवंत शिक्षा है। ध्रुव बालक की कथा हमें अटूट संकल्प और भक्ति की शक्ति का बोध कराती है। केवल पाँच वर्ष की आयु में, सौतेली माँ के कटु वचनों से आहत होकर ध्रुव ने वन में जाकर कठोर तप किया। नारद मुनि के मार्गदर्शन में उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया। अंततः प्रभु प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। तब ध्रुव ने कहा, “प्रभू, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे तो आपका दर्शन ही पर्याप्त है।” यह प्रसंग सिखाता है कि जब भक्ति निःस्वार्थ हो जाती है, तब सांसारिक इच्छाएँ स्वयं विलीन हो जाती हैं।
इसके अलावा, प्रह्लाद की कथा भक्ति, साहस और सत्यनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है। असुरराज हिरण्यकशिपु के पुत्र होते हुए भी प्रह्लाद बाल्यकाल से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। पिता के असंख्य अत्याचार, प्रलोभन और भय भी उनकी आस्था को डिगा न सके। अंततः स्तंभ से प्रकट होकर भगवान नरसिंह ने प्रह्लाद की रक्षा की और अधर्म का अंत किया। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति के मार्ग में चाहे कितनी ही बाधाएँ आएँ, ईश्वर अपने भक्त की रक्षा अवश्य करते हैं।
साथ ही, श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण-सुदामा की कथा सच्ची मित्रता, करुणा और समता का आदर्श प्रस्तुत करती है। निर्धन सुदामा जब द्वारका पहुँचे, तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उठकर उन्हें गले लगाते हैं, चरण धोते हैं और राजसिंहासन पर बैठाते हैं। सुदामा कुछ माँग नहीं पाते, पर श्रीकृष्ण उनके टूटे-फूटे जीवन को भी समृद्धि और सम्मान से भर देते हैं। यह प्रसंग सिखाता है कि ईश्वर से जुड़ाव अहंकार नहीं, विनम्रता सिखाता है, और सच्ची मित्रता स्वार्थ नहीं, करुणा से संचालित होती है।
भगवद् गीता भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है, जो काल, देश और परिस्थितियों की सीमाओं से परे जाकर संपूर्ण मानवता को मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह ग्रंथ केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन को समझने, उसे संतुलित ढंग से जीने और कर्तव्यपथ पर दृढ़ रहने की एक सार्वभौमिक मार्गदर्शिका है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज का युग भौतिक प्रगति का युग है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं, परंतु इसके साथ-साथ मानसिक अशांति, तनाव, प्रतिस्पर्धा और नैतिक विचलन की चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में श्रीमद्भागवत कथा जैसे आध्यात्मिक आयोजन मानव को उसकी मूल चेतना से जोड़ते हैं। 
ये हमें स्मरण कराते हैं कि हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि संवेदनशील, करुणामय और उत्तरदायी प्राणी हैं। भागवत का संदेश है, “वसुधैव कुटुम्बकम्” अर्थात समस्त सृष्टि एक परिवार है। जब यह भाव जीवन में उतरता है, तभी समाज में समरसता, सह-अस्तित्व और शांति संभव होती है।
भागवत हमें यह भी सिखाती है कि सच्ची भक्ति कर्मविमुख नहीं बनाती, बल्कि कर्तव्यपरायण बनाती है। राजा परीक्षित का प्रसंग हमें स्मरण कराता है कि सीमित समय में भी यदि चेतना शुद्ध हो, तो जीवन सार्थक बन जाता है। सुकदेव मुनि की कथा-धारा यह दर्शाती है कि जब वाणी में सत्य, करुणा और अनुभूति हो, तो वह आत्माओं को जागृत कर देती है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवद् गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ जीवन, साहसी कर्म और प्रबुद्ध चेतना की एक सार्वभौमिक मार्गदर्शिका है। यह मानव को सदाचार, अनुशासन और कर्तव्यबोध के पथ पर अग्रसर करती है। 
भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश हमें निरंतर यह स्मरण कराते हैं कि वास्तविक नैतिक शक्ति बाहरी सामर्थ्य से नहीं, बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता, आत्मसंयम और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा से उत्पन्न होती है। गीता व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों का सामना साहस, विवेक और संतुलन के साथ करने की प्रेरणा देती है और उसे समाज व राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के प्रति सजग बनाती है।
युवाओं के लिए भगवद् गीता एक अत्यंत प्रेरणास्रोत ग्रंथ है। यह उन्हें आत्मविश्वास, निर्णय-क्षमता और नैतिक साहस प्रदान करती है तथा यह बोध कराती है कि सच्ची सफलता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मूल्यों के साथ आगे बढ़ने में निहित है। 
गीता में निहित कर्तव्यनिष्ठा, सत्य, संयम, सेवा और करुणा जैसे जीवन-मूल्य युवाओं को एक सशक्त, संतुलित और उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि हमारी युवा पीढ़ी गीता के संदेश को आत्मसात करे, तो वह न केवल अपने जीवन को सार्थक दिशा देगी, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।
तेजी से बदलते इस युग में, जब भौतिकता और तकनीक का प्रभाव बढ़ रहा है, भगवद् गीता मानवता को शांति, संतुलन और सद्भाव का मार्ग दिखाती है। इसके शाश्वत उपदेश हमें संघर्ष से सहयोग की ओर, स्वार्थ से सेवा की ओर और अराजकता से अनुशासन की ओर ले जाते हैं।
भागवत कथा और गीता का संदेश केवल श्रवण तक सीमित न रहकर हमारे आचरण और निर्णयों में परिलक्षित हो, यही उसकी सच्ची सार्थकता है। जब राष्ट्र निर्माण की यात्रा आध्यात्मिक मूल्यों और नैतिक दृढ़ता से जुड़ती है, तब विकास केवल भौतिक नहीं, बल्कि समावेशी, संतुलित और स्थायी बनता है। निस्संदेह, भगवद् गीता न केवल भारत की आत्मा है, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए शांति और मानवता का प्रकाश-स्तंभ है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
भारत की आध्यात्मिक शक्ति ही उसकी वास्तविक शक्ति रही है। हमारी संस्कृति ने सदा बाहरी विकास के साथ आंतरिक उत्थान पर बल दिया है। आज जब हम ‘विकसित भारत’ की संकल्पना की ओर अग्रसर हैं, तब यह आवश्यक है कि हमारी प्रगति केवल आर्थिक या भौतिक न होकर नैतिक, मानवीय और आध्यात्मिक भी हो। श्रीमद्भागवत कथा जैसे आयोजन इस संतुलित विकास की नींव को सुदृढ़ करते हैं।
मैं गर्ग परिवार की इस पहल की विशेष सराहना करता हूँ कि उन्होंने इस भागदौड़ भरे युग में समाज को आत्ममंथन, सत्संग और सद्ग्रंथों से जुड़ने का अवसर प्रदान किया है। 
ऐसे आयोजन आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं, उन्हें जीवन के शाश्वत मूल्यों से परिचित कराते हैं और एक सशक्त, संस्कारित तथा समरस समाज के निर्माण में योगदान देते हैं।
अंत में, मैं कामना करता हूँ कि इस श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से हम सभी के जीवन में भक्ति की मधुरता, विचारों की पवित्रता और कर्मों की श्रेष्ठता का संचार हो। भगवान श्रीकृष्ण जी की कृपा से यह आयोजन समाज में सद्भाव, शांति और सेवा की भावना को और अधिक प्रबल करे।

इन्हीं शब्दों के साथ, एक बार पुनः मैं गर्ग परिवार को इस पुण्य आयोजन के लिए बधाई देता हूँ, व्यासपीठ को नमन करता हूँ और आप सभी श्रद्धालुजनों के मंगलमय जीवन की कामना करता हूँ।
धन्यवाद,
जय श्रीकृष्ण!
हरि ओम्!