SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF EARMARKING OF LAND CEREMONY FOR ESTABLISHMENT OF COMPRESSED BIO-GAS (CBG) PLANT AT DADUMAJRA CHANDIGARH ON JANUARY 19, 2026.

सी.बी.जी. प्लांट हेतु भूमि की निशानदेही के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 19.01.2026,  सोमवारसमयः दोपहर 12:30 बजेस्थानः चंडीगढ़

 

नमस्कार!

आज नगर निगम चंडीगढ़ और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के सहयोग से संपीड़ित बायोगैस यानी कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट (CBG Plant) की स्थापना हेतु भूमि की निशानदेही के इस महत्वपूर्ण अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत हर्ष, संतोष और गर्व का विषय है।

आज का दिन चंडीगढ़ के लिए एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम का प्रतीक है। डड्डूमाजरा में जैविक कचरे से संपीड़ित बायोगैस प्लांट की स्थापना केवल एक परियोजना नहीं है, बल्कि यह हमारे शहर को स्वच्छ, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक ठोस पहल है।

आज मैं इस अवसर पर विशेष रूप से डड्डूमाजरा के नागरिकों को हार्दिक बधाई देता हूँ, क्योंकि इस सीबीजी प्लांट की स्थापना से उनकी वर्षों पुरानी समस्या का एक स्थायी समाधान होने जा रहा है। 

आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और ऊर्जा संकट जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब इस प्रकार की परियोजनाएँ आशा की किरण बनकर उभरती हैं। यह पहल हमें यह संदेश देती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

आज देश के लगभग सभी शहर बढ़ते कचरे, सीमित लैंडफिल क्षमता और पर्यावरण प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चंडीगढ़, जो अपने सुव्यवस्थित शहरी ढांचे के लिए जाना जाता है, वह भी इन समस्याओं से अछूता नहीं रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया था कि हम कचरा प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक और स्थायी समाधान अपनाएँ।

इसी सोच के साथ नगर निगम चंडीगढ़ और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के बीच यह महत्वपूर्ण सहयोग स्थापित किया गया है। डिजाइन-निर्माण-वित-संचालन मॉडल के अंतर्गत, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड दादूमाजरा डंपिंग ग्राउंड पर इस आधुनिक सीबीजी प्लांट की स्थापना और संचालन करेगा। नगर निगम द्वारा लगभग 10 एकड़ भूमि लीज पर उपलब्ध कराई गई है, जिसमें भविष्य में विस्तार की भी व्यवस्था है।

लगभग सवा सौ करोड़ रूपये की लागत वाली यह परियोजना तकनीकी रूप से मजबूत और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसमें प्रतिदिन लगभग 200 टन अलग किया गया जैविक कचरा और 30 टन गोबर का उपयोग किया जाएगा। संचालन में सीमित मात्रा में मिश्रित कचरा लेने की अनुमति दी गई है, परंतु कचरे के पृथक्करण पर विशेष जोर दिया गया है।

मैं इस अवसर पर इस परियोजना के एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालना चाहता हूं। यह सीबीजी प्लांट नगर निगम पर किसी भी वित्तीय बोझ के बिना स्थापित किया जा रहा है। न तो कोई पूंजीगत लागत है, न संचालन खर्च, न रखरखाव का कोई व्यय। इससे पहले इसी तरह का एक प्रस्ताव था, जिसमें नगर निगम को लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते। वर्तमान मॉडल को अपनाकर यह पूरा खर्च बचाया गया, जिससे नगर निगम को लगभग 100 करोड़ रुपये की सीधी बचत हुई।

इस परियोजना के अंतर्गत भूमि के 33 प्रतिशत क्षेत्र में हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) विकसित की जाएगी, और इसका पूरा खर्च इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड वहन करेगा। प्लांट में उपयोग किए जाने वाले गोबर के परिवहन का खर्च भी कॉर्पोरेशन द्वारा वहन किया जाएगा। यह सभी पहलें नगर निगम को दीर्घकालीन आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ देंगी।

देवियो और सज्जनो,

पर्यावरण की दृष्टि से यह परियोजना अत्यंत लाभकारी है। जैविक कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण से लैंडफिल पर निर्भरता कम होगी और मीथेन गैस के उत्सर्जन में कमी आएगी।

जहाँ तक यहाँ उत्पादित होने वाली संपीड़ित बायोगैस का संबंध है, इसका उपयोग मुख्य रूप से वाहनों के ईंधन के रूप में किया जाएगा। यह स्वच्छ, पर्यावरण-अनुकूल और स्वदेशी ऊर्जा स्रोत न केवल पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर हमारी निर्भरता को कम करेगा, बल्कि सार्वजनिक परिवहन, नगर निगम के वाहनों तथा अन्य वाणिज्यिक वाहनों में प्रयोग होकर प्रदूषण में कमी, ईंधन लागत में बचत और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी सुदृढ़ करेगा। यह “कचरे से कंचन” की अवधारणा का सशक्त उदाहरण है।

मेरा मानना है कि यह पहल हरित परिवहन को बढ़ावा देने और चंडीगढ़ को एक क्लीन-एनर्जी सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी। यह परियोजना केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सभी मानकों का पूर्ण पालन करती है।

इस परियोजना की समय-सीमा चरणबद्ध रूप से निर्धारित की गई है और इसे वर्ष 2028 के अंत तक चालू करने का लक्ष्य है। यह दर्शाता है कि यह पहल केवल अल्पकालिक नहीं, बल्कि चंडीगढ़ के दीर्घकालिक पर्यावरणीय भविष्य के लिए की गई है।

देवियो और सज्जनो,

भारत आज “विकसित भारत 2047” के संकल्प के साथ अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है। विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्र है जहाँ विकास पर्यावरण के साथ संतुलन बनाकर हो, जहाँ ऊर्जा स्वच्छ हो, संसाधनों का उपयोग विवेकपूर्ण हो और नागरिक कर्तव्यबोध से प्रेरित हों। सीबीजी प्लांट की स्थापना इसी दूरदर्शी सोच का साकार रूप है।

महात्मा गांधी जी कहा करते थे, “प्रकृति के पास हर व्यक्ति की आवश्यकता के लिए पर्याप्त है, लेकिन लालच के लिए नहीं।” यह परियोजना हमें याद दिलाती है कि हमें संसाधनों का दोहन नहीं, बल्कि उनका संरक्षण और पुनःउपयोग करना चाहिए।

संपीड़ित बायोगैस जैसी पहलें इस बात का उदाहरण हैं कि ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ को एक साथ साधते हुए हम किस प्रकार कचरे को बोझ नहीं, बल्कि संसाधन में परिवर्तित कर सकते हैं। यह परियोजना हमें उपभोग की संस्कृति से उत्तरदायित्व की संस्कृति की ओर ले जाने का आह्वान करती है, जहाँ प्रत्येक नागरिक यह समझे कि प्रकृति केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।

देवियो और सज्जनो,

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी का नैतिक कर्तव्य है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 51(ए) में प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य निर्धारित किया गया है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन करे। स्वच्छता, कचरा पृथक्करण, जल संरक्षण, ऊर्जा बचत और हरित जीवनशैली, ये सभी नागरिक कर्तव्य के आधुनिक रूप हैं।

हालाँकि, केवल ढांचा खड़ा कर देना ही पर्याप्त नहीं है। यह सीबीजी प्लांट तभी सफल होगा जब नागरिक घरों, बाजारों और संस्थानों में कचरे को अलग-अलग करने की आदत अपनाएँगे। स्वच्छ और पृथक किया गया कचरा ही इस प्रणाली की रीढ़ है। अतः मैं चंडीगढ़ के प्रत्येक नागरिक से आग्रह करता हूँ कि वे इस अभियान के सक्रिय सहभागी बनें।

स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, “जिस राष्ट्र के नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होते हैं, वही राष्ट्र सच्चे अर्थों में महान बनता है।” आज हमें इस कथन को जीवन में उतारने की आवश्यकता है।

साथियो,

भारत के लिए स्वच्छता कोई नई अवधारणा नहीं है। हमारे प्राचीन एवं वैदिक ग्रंथों जैसे मनुस्मृति, गणेश पुराण, पतंजलि योग सूत्र, ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा दक्ष स्मृति में स्वच्छता को न केवल शारीरिक शुद्धता, बल्कि मानसिक और सामाजिक पवित्रता से भी जोड़ा गया है। यह दर्शाता है कि भारत में स्वच्छता को सदैव एक नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया है।

इतिहास साक्षी है कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय विकसित उन्नत जल-निकास प्रणाली यह प्रमाणित करती है कि हमारे पूर्वज स्वच्छता और जन-स्वास्थ्य के महत्व को भली-भांति समझते थे। नियोजित नगर, ढकी हुई नालियाँ और जल प्रबंधन की वैज्ञानिक व्यवस्था यह बताती है कि स्वच्छता हमारे लिए केवल व्यवहार नहीं, बल्कि सुनियोजित जीवन-पद्धति थी।

स्वच्छता वास्तव में भारतीय जीवनशैली का अभिन्न अंग रही है। यही कारण है कि आज जब हम कचरा प्रबंधन, बायोगैस उत्पादन और हरित ऊर्जा की बात करते हैं, तो हम किसी नई सोच की नहीं, बल्कि अपनी ही प्राचीन परंपराओं के आधुनिक रूप की बात कर रहे होते हैं। सीबीजी प्लांट जैसी परियोजनाएँ हमारी उसी सभ्यतागत चेतना को समकालीन तकनीक से जोड़ने का प्रयास हैं।

महात्मा गांधी जी स्वच्छता को स्वतंत्रता से भी अधिक महत्व देते थे। उनका मानना था कि स्वच्छता की आदत बचपन से ही डाली जानी चाहिए। इस संदर्भ में उनसे जुड़ा एक अत्यंत प्रेरणादायी प्रसंग उल्लेखनीय है। जब बापू ने कस्तूरबा गांधी जी से बच्चों के लिए स्कूल खोलने का आग्रह किया तो कस्तूरबा जी ने पूछा कि वे बच्चों को क्या पढ़ाएँगी, तो गांधी जी ने कहा, “बच्चों की शिक्षा का पहला पाठ स्वच्छता है। किसानों के बच्चों को इकट्ठा करो, उनकी आँखें-दाँत देखो, उन्हें स्नान कराओ, सफाई की आदत डालो। यह कम शिक्षा नहीं है।”

गांधी जी की यह सोच हमें सिखाती है कि स्वच्छता केवल व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि संस्कार का विषय है। यदि हम बचपन से ही बच्चों में स्वच्छता, पर्यावरण के प्रति सम्मान और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की भावना विकसित करें, तो वे जीवन भर जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।

गांधी जी की स्वच्छता के प्रति संवेदनशीलता और जीवन-दर्शन से प्रेरित होकर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने वर्ष 2014 में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की थी। आज यह अभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बन चुका है। 

स्वच्छ भारत अभियान आज केवल साफ-सफाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के लिए समृद्धि, रोजगार और नवाचार का एक सशक्त माध्यम बन गया है। करोड़ों शौचालयों के निर्माण से लेकर कचरा प्रबंधन तक, इस अभियान ने गांव-गांव और शहर-शहर में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। राजमिस्त्री, प्लंबर, श्रमिकों के साथ-साथ महिला राजमिस्त्रियों की एक नई पीढ़ी का उभरना इस अभियान की सामाजिक शक्ति को दर्शाता है।

आज ‘क्लीन-टेक’ और ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ के क्षेत्र में हजारों स्टार्ट-अप सक्रिय हैं। कचरे से कम्पोस्ट, बायोगैस, बिजली और उपयोगी सामग्री तैयार हो रही है। गोबरधन योजना और सीबीजी प्लांट्स के माध्यम से गांवों और शहरों में सर्कुलर इकॉनॉमी को नई गति मिली है, जिससे किसानों और पशुपालकों को भी अतिरिक्त आय के अवसर मिल रहे हैं।

साथ ही, हमें यह भी समझना होगा कि बढ़ते शहरीकरण और उपभोग के साथ कचरे की चुनौती और जटिल होगी। इसलिए भविष्य के लिए हमें बेहतर रीसाइक्लिंग, जल संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण तकनीकों को अपनाना होगा। नमामि गंगे, अमृत मिशन और अमृत सरोवर जैसे अभियान बताते हैं कि सरकार और नागरिक मिलकर बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।

स्वच्छता का सीधा संबंध पर्यटन, स्वास्थ्य और जीवन-गुणवत्ता से है। इसलिए यह हमारा सामूहिक दायित्व है कि हम अपने शहरों, गांवों, तीर्थस्थलों और धरोहरों को स्वच्छ रखें और स्वच्छता को जीवन-शैली का स्थायी अंग बनाएं।

 

भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है, “माता भूमिः पुत्रो·हं पृथिव्याः।” (Mata Bhumih Putroham Prithivyah) जिसका अर्थ है कि ‘‘पृथ्वी मेरी माता है, और मैं (मनुष्य) पृथ्वी का पुत्र हूँ’’। हमारी परंपरा हमें सिखाती है कि पृथ्वी का दोहन नहीं, बल्कि उसकी सेवा ही सच्चा विकास है। 

आज जब हम सीबीजी प्लांट हेतु भूमि की निशानदेही करके इसके स्थापना का शुभारंभ कर रहे हैं, तो वास्तव में हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ भविष्य का बीजारोपण कर रहे हैं।

आज की यह पहल यह भी दर्शाती है कि शहरी विकास केवल कंक्रीट के ढांचे खड़े करने का नाम नहीं, बल्कि ऐसे समाधान विकसित करने का नाम है जो मानव, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, तीनों के हित में हों।

“विकसित भारत 2047” का सपना तभी साकार होगा जब हमारे शहर स्वच्छ, हरित, ऊर्जा-सक्षम और नागरिक कर्तव्यों से परिपूर्ण होंगे। चंडीगढ़ जैसे नियोजित शहरों की भूमिका इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

मैं समझता हूं कि डड्डूमाजरा में सीबीजी प्लांट की स्थापना सुशासन, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह परियोजना न केवल चंडीगढ़ के लिए, बल्कि देश के अन्य शहरों के लिए भी एक प्रेरणा है। यह दिखाती है कि कचरा केवल एक समस्या नहीं, बल्कि सही प्रबंधन के साथ एक उपयोगी संसाधन बन सकता है।

अंत में, मैं नगर निगम चंडीगढ़, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, इस परियोजना से जुड़े सभी अधिकारियों, अभियंताओं और कर्मियों को इस दूरदर्शी पहल के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। मैं विश्वास व्यक्त करता हूँ कि यह सीबीजी प्लांट चंडीगढ़ को स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास का अग्रणी मॉडल बनाएगा।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम केवल विकास के उपभोक्ता नहीं, बल्कि पर्यावरण के संरक्षक और भावी पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनेंगे।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ मैं इस प्लांट के शीघ्र अति शीघ्र निर्माण, समयबद्ध पूर्णता और सफल संचालन की कामना करता हूँ।

धन्यवाद, 

जय हिन्द!