SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF NATIONAL YOUTH DAY & STATE LEVEL PRIZE DISTRIBUTION OF SWAMI VIVEKANAND GK COMPETITION AT SHIMLA ON JANUARY 12, 2026.
- by Admin
- 2026-01-12 18:10
एबीवीपी द्वारा राष्ट्रीय युवा दिवस के उपलक्ष्य पर ‘‘युवा सम्मान’’ समारोह के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 12.01.2026, सोमवार समयः शाम 4:00 बजे स्थानः हिमाचल प्रदेश
नमस्कार!
आज हिमालय की इस पुण्यभूमि, शिमला के ऐतिहासिक गैटी थिएटर में, राष्ट्रीय युवा दिवस के उपलक्ष्य पर अयोजित युवा सम्मान समारोह के अवसर पर आप सबके बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव और आनंद का विषय है।
सर्वप्रथम, मैं आज पुरस्कार प्राप्त करने वाले सभी 12 विद्यार्थियों को हृदय से बधाई देता हूँ। आपकी उपलब्धि यह दर्शाती है कि आज का युवा केवल अंकों में नहीं, विचारों में भी समृद्ध है।
मुझे बताया गया है कि इन सभी युवाओं को ’’स्वामी विवेकानंद सामान्य ज्ञान परीक्षा’’ के राज्य स्तरीय विजेताओं के रूप में सम्मानित किया गया है। इस अवसर पर कुल 12 पुरस्कार प्रदान किए गए हैं, जिनमें ’राज्य स्तर’ पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार सहित तीन ‘प्रोत्साहन पुरस्कार’’ और ज़िला स्तर पर (शिमला) ’प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार’ सहित तीन ‘प्रोत्साहन पुरस्कार’ शामिल हैं।
मुझे ज्ञात हुआ है कि एबीवीपी प्रत्येक वर्ष इस परीक्षा का आयोजन करता है, जिसमें राज्यभर से हजारों विद्यार्थी भाग लेते हैं। यह परीक्षा केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि विवेकानंद जी के विचारों को युवा मन में रोपित करने का सशक्त माध्यम है। सामान्य ज्ञान से आगे बढ़कर यह पहल विद्यार्थियों में भारतीय विचारधारा, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय दृष्टि को विकसित करती है।
मुझे इस बात का हर्ष है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और सुनील उपाध्याय एजुकेशनल ट्रस्ट, शिमला द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह कार्यक्रम दर्शाता है कि जब छात्र संगठन और शैक्षिक-सामाजिक संस्थाएँ मिलकर कार्य करती हैं, तो युवा सशक्तिकरण की दिशा में एक सार्थक और दूरगामी पहल संभव होती है।
साथियो,
हम सभी जानते हैं कि वर्ष 1949 में स्थापित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन है, जिसने अपनी स्थापना के बाद से देश की एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
एबीवीपी केवल एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की चेतना से प्रेरित एक व्यापक युवा आंदोलन है। यह संगठन देशभर के शैक्षणिक परिसरों में विद्यार्थियों को संगठनात्मक कौशल देने के साथ-साथ उन्हें सामाजिक सरोकारों से जोड़ता है, आपदा के समय सेवा के लिए प्रेरित करता है, शिक्षा की गुणवत्ता पर विमर्श करता है और राष्ट्रहित के प्रश्नों पर जागरूकता फैलाता है। संगठन का मूलमंत्र-‘‘छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति’’ यह स्पष्ट करता है कि यह संगठन छात्रों की शक्ति को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने का कार्य करता है।
आज एबीवीपी भारत का सबसे बड़ा छात्र संगठन है। शिक्षा में भारतीयता, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी की भावना, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों पर परिषद द्वारा किए जा रहे प्रयास युवाओं को एक सकारात्मक, रचनात्मक और जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर करते हैं।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ अनेक भाषाएँ, धर्म और संस्कृतियां सह-अस्तित्व में हैं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने “कश्मीर हो या गुवाहाटी, अपना देश, अपनी माटी” के भाव के साथ अपने कार्यों और पहलों के माध्यम से युवाओं को एकता के सूत्र में पिरोने का निरंतर प्रयास किया है।
इसके साथ ही संगठन छात्रों के बीच संवाद, सह-अस्तित्व और आपसी समझ को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सम्मेलन व संगोष्ठियाँ, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम, तथा सीमावर्ती और दूरदराज क्षेत्रों में विविध गतिविधियों का नियमित आयोजन करता रहा है।
ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से एबीवीपी ने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रत्येक छात्र भारतीय संस्कृति और विविधता को आत्मसात कर देश की एकता को सशक्त बनाए, इस दिशा में संगठन का यह सतत प्रयास वास्तव में सराहनीय है।
इसी क्रम में मैं वर्ष 2016 में स्थापित सुनील उपाध्याय एजुकेशनल ट्रस्ट, शिमला के योगदान की विशेष रूप से सराहना करना चाहता हूँ। यह ट्रस्ट वर्षों से शैक्षिक जागरूकता, प्रतिभा प्रोत्साहन, वंचित वर्गों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुँच, छात्रवृत्ति एवं मार्गदर्शन, तथा सांस्कृतिक-शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से सर्वांगीण विकास के लिए निरंतर सक्रिय रहा है। इसके साथ ही, ट्रस्ट की पहचान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में भी अत्यंत प्रभावशाली रही है।
ट्रस्ट द्वारा नियमित रूप से रक्तदान शिविरों का आयोजन, जरूरतमंद एवं दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सा शिविर, तथा शीत ऋतु में वस्त्र संग्रह कर उन्हें जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाने जैसे कार्य समाज के प्रति इसकी गहरी संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। ये पहलें केवल सहायता नहीं, बल्कि करुणा, सहभागिता और मानवीय गरिमा का सशक्त संदेश देती हैं।
प्रिय युवाओं
‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ स्वामी विवेकानंद जी की जयंती के रूप में मनाया जाता है, जिसकी शुरूआत भारत सरकार द्वारा वर्ष 1984 में की गई थी। स्वामी विवेकानंद केवल एक महान संत या दार्शनिक नहीं थे; वे भारत के नवजागरण के शिल्पी, आत्मविश्वास के उद्घोषक और चरित्र-निर्माण के अद्वितीय प्रेरक थे।
उनका संदेश “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए” आज भी हर युवा के लिए दीपस्तंभ की भाँति मार्गदर्शन करता है। उनके विचारों में राष्ट्रभक्ति, सेवा, आत्मनिर्भरता, निष्ठा और साहस का ऐसा संगम है जो किसी भी समाज को भीतर से सशक्त कर सकता है। विवेकानंद जी का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्ची शिक्षा वही है जो चरित्र गढ़े, आत्मविश्वास जगाए और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव विकसित करे।
साथियो,
मेरा मानना है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेनाओं, संसाधनों या अर्थव्यवस्था में ही नहीं, बल्कि उसके युवाओं के चरित्र, चेतना और संकल्प में बसती है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब किसी राष्ट्र के युवा जागृत हुए हैं, तब-तब उस राष्ट्र ने नई दिशा पाई है, नए शिखर छुए हैं और अपनी नई पहचान गढ़ी है।
आज भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है। यह हमारे लिए केवल एक जनसांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अवसर है। यह अवसर है भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने का। भारत का भविष्य आज के युवाओं के विचारों, आचरण और कर्मों में आकार ले रहा है।
युवाओं के चरित्र का निर्माण किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होता है। ज्ञान, तकनीक और कौशल अत्यंत आवश्यक हैं, किंतु उनसे भी अधिक आवश्यक है चरित्र। डिग्रियाँ रोजगार दिला सकती हैं, प्रतिभा ऊँचाई दे सकती है, परंतु चरित्र ही विश्वास, स्थायित्व और नेतृत्व प्रदान करता है। भारत को आज केवल कुशल युवा नहीं, बल्कि सदाचारी, संवेदनशील और उत्तरदायी युवा चाहिए।
विकसित भारत 2047 का सपना केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है नैतिक शासन, समावेशी विकास, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संतुलन और अवसरों की समानता। यह तभी संभव है जब भारत का युवा करियर के साथ-साथ कर्तव्य को भी अपने जीवन का ध्येय बनाए और व्यक्तिगत सफलता को राष्ट्र निर्माण से जोड़े।
आज का युग ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार का युग है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप्स, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारत का युवा वैश्विक नेतृत्व की क्षमता रखता है। आत्मनिर्भर भारत का निर्माण तभी होगा जब युवा नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार सृजन करने वाले बनेंगे, उपभोक्ता नहीं, नवप्रवर्तक बनेंगे और समस्याओं के दर्शक नहीं, समाधान के वाहक बनेंगे।
एक महान राष्ट्र अपनी उपलब्धियों से ही नहीं, अपनी संवेदनशीलता से भी पहचाना जाता है। समाज में शिक्षा से वंचित बच्चे, अकेले बुजुर्ग, नशे की गिरफ्त में युवा और संकटग्रस्त प्रकृति, ये सभी युवाओं से उत्तरदायित्व की अपेक्षा करते हैं। सेवा केवल संस्थाओं का कार्य नहीं, बल्कि युवा चरित्र की पहचान होनी चाहिए। विवेकानंद जी का संदेश यही है कि आत्मविश्वास के साथ सेवा का भाव जुड़ जाए तो व्यक्ति महान बनता है और राष्ट्र सशक्त।
आज के युवा केवल वर्तमान के नागरिक नहीं हैं, वे भविष्य के संरक्षक भी हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और जैव-विविधता की क्षति आने वाली पीढ़ियों की चेतावनी हैं। यदि आज युवा प्रकृति की रक्षा का संकल्प लें, तो भारत सतत विकास और पर्यावरण नेतृत्व का वैश्विक उदाहरण बन सकता है।
मेरा मानना है कि राष्ट्रप्रेम केवल नारों या प्रतीकों से नहीं, बल्कि आचरण से सिद्ध होता है। ईमानदारी, अनुशासन, कानून का सम्मान, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और कर्तव्यों के निर्वहन में निष्ठा, यही सच्चे राष्ट्रप्रेम के स्वरूप हैं। चरित्रवान युवा ही सच्चा राष्ट्रनिर्माता बनता है।
स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे महान व्यक्तित्वों ने युवावस्था में ही यह सिद्ध कर दिया था कि जब साहस, करुणा और संकल्प एक साथ आते हैं, तब इतिहास की दिशा बदल जाती है।
मेरे युवा साथियो, भारत आपसे केवल सफलता नहीं, संस्कार, संवेदना और संकल्प चाहता है। अपने जीवन को केवल “मैं क्या बनूँ?” तक सीमित न रखें, यह भी पूछें, “मेरे होने से भारत को क्या लाभ होगा?” यदि आपका चरित्र ऊँचा होगा, तो भारत का मस्तक अपने-आप ऊँचा होगा।
प्रिय युवाओं,
आज का समय अवसरों से भरा है। आपको नवाचार करना है, पर अपनी जड़ों से जुड़े रहकर; आपको वैश्विक बनना है, पर भारतीयता के मूल्यों के साथ; आपको तेज़ी से आगे बढ़ना है, पर संवेदनशीलता और करुणा के साथ। विवेकानंद जी ने कहा था कि शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल नहीं, बल्कि चरित्रबल है। यही चरित्रबल हमें सही और गलत के बीच भेद करने की सामर्थ्य देता है।
अंत में, मैं आप सभी युवाओं से आग्रह करता हूँ कि स्वामी विवेकानंद के विचारों को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारें। अपने लक्ष्य ऊँचे रखें, पर अपने मूल्यों से समझौता न करें। अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखें, पर समाज के प्रति उत्तरदायित्व को कभी न भूलें।
जब भी जीवन में संशय आए, तो यह स्मरण रखें कि भारत आपसे बहुत अपेक्षा करता है, आपसे ईमानदारी की, परिश्रम की, साहस की और सेवा की। यदि आप अपने कर्म को राष्ट्र के साथ जोड़ देंगे, तो आपकी सफलता केवल आपकी नहीं रहेगी; वह देश की उपलब्धि बन जाएगी।
मैं इस सफल और प्रेरक आयोजन के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और सुनील उपाध्याय एजुकेशनल ट्रस्ट, शिमला, दोनों को पुनः बधाई देता हूँ, तथा राज्य स्तरीय विजेताओं को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ देता हूँ।
’’युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है’’-आइए, हम सब मिलकर स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को जीवन में उतारें, अपने सपनों को साकार करें, और भारत को विश्वगुरु बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ें।
धन्यवाद,
जय हिन्द!