SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF SAMKALP PROGRAMME AT PUNJAB LOK BHAVAN, CHANDIGARH ON JANUARY 13, 2026.
- by Admin
- 2026-01-13 17:50
संकल्प चंडीगढ़ के ‘पर्व मिलन समारोह’ के अवसर पर
राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 13.01.2026, मंगलवार
समयः दोपहर 1:30 बजे
स्थानः लोकभवन पंजाब
नमस्कार!
समाज के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे सम्मानित गणमान्य अतिथिगण, तथा संकल्प से शिक्षा ग्रहण कर आज देश की प्रतिष्ठित सिविल सेवाओं में कार्यरत हमारे होनहार लगभग 20 पूर्व छात्रगण, आप सभी को मेरा सादर अभिवादन और लोहड़ी तथा मकर संक्रांति की बहुत-बहुत बधाई!
आज पर्व मिलन के इस पावन अवसर पर आप सबके बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। लोहड़ी का पर्व ऊर्जा, उत्साह और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह पर्व हमें परिश्रम, त्याग और सामूहिक प्रयासों के महत्व का स्मरण कराता है। ऐसे शुभ अवसर पर संकल्प जैसे प्रेरणादायी संस्थान के साथ जुड़ना मेरे लिए विशेष संतोष का विषय है।
हम सभी जानते हैं कि वर्ष 1986 में दिल्ली में संकल्प संस्थान की स्थापना की गई थी। इसके बाद, 2007 में संस्थान की चंडीगढ़ शाखा अस्तित्व में आई, ताकि उत्तरी भारत के प्रतिभावान उम्मीदवारों को देश की प्रशासनिक सेवाओं में करियर बनाने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया जा सके।
संकल्प संस्थान अपने नाम के अनुरूप छात्रों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाने में उनकी ताकत और आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करता है। संस्थान छात्रों के भीतर दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास, और सेवा भावना को विकसित करता है, यह छात्रों को सिखाता है कि किस प्रकार देश के विकास, सामाजिक न्याय, और गरीबों के उत्थान में उनकी भूमिका अहम हो सकती है।
संकल्प केवल एक कोचिंग संस्थान नहीं है, बल्कि यह संकल्प, संस्कार और सेवा की त्रिवेणी है। आज संकल्प से निकलकर अनेक विद्यार्थी भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा और अन्य केंद्रीय सेवाओं में चयनित होकर देश के विभिन्न भागों में जनसेवा कर रहे हैं। यह उपलब्धि संस्थान की दूरदर्शी सोच, समर्पित मार्गदर्शन और अनुशासित वातावरण का परिणाम है।
यह गर्व का विषय है कि अब तक इस शाखा से मार्गदर्शन प्राप्त कर कुल 133 प्रतिभावान उम्मीदवारों ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), पंजाब लोक सेवा आयोग (PPSC), हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) और हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा (HPAS) की कठिन परीक्षाओं को सफलतापूर्वक उत्तीर्ण किया है।
यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि संकल्प, चंडीगढ़ से मार्गदर्शन प्राप्त कर पंजाब सिविल सेवा (पीसीएस) परीक्षा में सम्मिलित हुए 18 अभ्यर्थियों में से 13 छात्रों ने सफलता अर्जित की है। यह उपलब्धि न केवल इन होनहार युवाओं की कठिन परिश्रम, लगन और अनुशासन का परिणाम है, बल्कि संकल्प संस्था की समर्पित मार्गदर्शक परंपरा और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण का भी सशक्त प्रमाण है।
मुझे बताया गया है कि इस वर्ष से संस्थान ने अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाते हुए बारहवीं कक्षा के बाद ही छात्रों को अपने साथ जोड़ लिया है, ताकि उन्हें परीक्षा हेतु तैयारी करवाने और संस्कारित करने का अधिक अवसर मिल सके। यह कार्य वास्तविक अर्थों में समान अवसर और समावेशी विकास की भावना को साकार करता है। ऐसे प्रयास राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव रखते हैं।
आज यहाँ उपस्थित संकल्प के वे पूर्व छात्र, जिन्होंने कठिन परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बल पर सफलता प्राप्त की है, आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। आपकी सफलता यह संदेश देती है कि यदि उद्देश्य स्पष्ट हो और मार्गदर्शन सही हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।
मैं संकल्प से जुड़े सभी शिक्षकों, मार्गदर्शकों, प्रबंधन और सहयोगियों को भी साधुवाद देता हूँ, जिनकी निष्ठा और परिश्रम से यह संस्थान निरंतर नई ऊँचाइयों को छू रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही संस्थान भविष्य के नीति-निर्माताओं और प्रशासकों को गढ़ते हैं।
साथियो,
आज जब हम लोहड़ी और मकर संक्रांति के पर्व के अन्तर्गत पर्व मिलन समारोह में एकत्र हुए हैं तो यह हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है कि हम इन त्यौहारों के महत्व को जानें।
हमारे ये दोनों पर्व न केवल कृषि और ऋतु परिवर्तन से जुड़े हैं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिकता, सांस्कृतिक विविधता और परंपरा के जीवंत प्रतीक भी हैं। लोहड़ी मुख्य रूप से उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में मनाई जाती है, जबकि मकर संक्रांति पूरे भारत में पोंगल, उत्तरायण, माघ बिहू, खिचड़ी, पौष संक्रांति आदि विभिन्न नामों और रूपों में मनाई जाती है।
लोहड़ी की बात करें तो इसका इतिहास भारतीय कृषि संस्कृति और लोक जीवन से गहराई से जुड़ा है। यह पर्व मुख्य रूप से रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, गन्ना और सरसों की कटाई के आरंभ का प्रतीक है।
लोहड़ी की उत्पत्ति के संबंध में कई मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, ‘लोहड़ी’ शब्द ‘ल’ (लकड़ी), ‘ओह’ (उपले) और ‘ड़ी’ (रेवड़ी) से मिलकर बना है, जो इस पर्व की अग्नि, उपले और मिठाइयों की परंपरा को दर्शाता है। कुछ विद्वान इसे ‘तिलोहड़ी’ (तिल$रोड़ी/गुड़) से उत्पन्न मानते हैं, जो समय के साथ ‘लोहड़ी’ बन गया।
इतिहासकारों और लोककथाओं के अनुसार, लोहड़ी का संबंध सूर्य की गति और ऋतु परिवर्तन से भी है। यह पर्व पौष मास की अंतिम रात को, मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है, जब सर्दी अपने चरम पर होती है और दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं। यह समय किसानों के लिए आशा और कृतज्ञता का प्रतीक होता है, क्योंकि महीनों की मेहनत के बाद फसलें तैयार होने लगती हैं।
लोहड़ी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथा दुल्ला भट्टी की है। दुल्ला भट्टी 16वीं शताब्दी के पंजाब के एक वीर नायक थे, जिन्हें ‘पंजाब का रॉबिनहुड’ भी कहा जाता है। उन्होंने मुग़ल काल में अमीरों द्वारा अपहृत लड़कियों को न केवल मुक्त कराया, बल्कि उनकी शादी भी करवाई और उन्हें सम्मानजनक जीवन दिया।
लोहड़ी के गीतों-विशेषकर ‘सुंदर मुंदरिये’ में दुल्ला भट्टी का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है, जो साहस, न्याय और नारी सम्मान का संदेश देता है। यह लोककथा लोहड़ी को केवल कृषि पर्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों का प्रतीक भी बनाती है।
लोहड़ी की सबसे प्रमुख परंपरा है ‘अलाव जलाना’। सूर्यास्त के बाद खुले स्थान पर लकड़ी, उपले और फसल के अवशेषों से अलाव जलाया जाता है। अग्नि, जो लोहड़ी का केंद्रीय तत्व है, वैदिक काल से ही शुद्धि, ऊर्जा और नवसृजन का प्रतीक रही है।
लोहड़ी की अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर परिक्रमा करना और तिल, मूंगफली, रेवड़ी अर्पित करना, कृतज्ञता, सामूहिकता और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।
इसके अलावा, मकर संक्रांति की बात करें तो यह वह शुभ अवसर है जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण होते हैं। यह केवल एक खगोलीय परिवर्तन नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर और शीत से उष्मा की ओर अग्रसर होने का प्रतीक है।
भारतीय परंपरा में उत्तरायण को अत्यंत पुण्यकाल माना गया है। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा कर देह त्याग करना इस काल के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करता है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मकर संक्रांति भारत की कृषि-सभ्यता से गहराई से जुड़ा पर्व है। यह वह समय है जब खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं, किसान अपने परिश्रम के प्रथम फल के लिए प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
पंजाब में इसे माघी, असम में बिहू, तमिलनाडु में पोंगल, गुजरात में उत्तरायण, महाराष्ट्र में तिलगुल और उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। नाम भले ही भिन्न हों, परंतु भाव एक ही है, कृतज्ञता, समरसता और नवचेतना।
पंजाब की धरती पर मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। माघी के रूप में यह पर्व हमें सिख इतिहास के उस गौरवपूर्ण अध्याय की स्मृति कराता है, जब चालीस मुक्तों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में धर्म और सत्य की रक्षा हेतु सर्वोच्च बलिदान दिया। इस दिन श्री मुक्तसर साहिब में आयोजित माघी मेले के माध्यम से साहस, बलिदान और राष्ट्रधर्म की अमर परंपरा का स्मरण किया जाता है।
समकालीन संदर्भ में मकर संक्रांति हमें प्रकृति के साथ संतुलन, परिश्रम के सम्मान और सकारात्मक जीवन दृष्टि का संदेश देती है। यह पर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि जैसे सूर्य उत्तरायण होकर पूरे जगत को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करता है, वैसे ही हम भी अपने जीवन में सकारात्मकता, करुणा और कर्तव्यबोध को अपनाएँ।
साथियो,
आज के आधुनिक संदर्भ में भी लोहड़ी और मकर संक्रांति का संदेश उतना ही प्रासंगिक है। ये पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने, प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने, श्रम का सम्मान करने और सामूहिक प्रयासों से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
लोहड़ी और मकर संक्रांति जैसे उत्सव केवल परंपरागत पर्व नहीं हैं, बल्कि वे भारत की आत्मा, उसकी कृषि-संस्कृति और उसके जीवन-दर्शन के जीवंत प्रतीक हैं। ये पर्व हमें प्रकृति के साथ हमारे शाश्वत संबंध, परिश्रम के सम्मान और सामूहिक जीवन मूल्यों का बोध कराते हैं।
हमारा महान भारत विविध संस्कृतियों, परंपराओं और उत्सवों का देश है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कामरूप से कच्छ तक फैली हमारी सभ्यता का सौंदर्य इसी विविधता में निहित है। हमारे उत्सव केवल उल्लास और मनोरंजन के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सामूहिक चेतना, सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय एकता के सशक्त माध्यम हैं।
यही हमारे उत्सव हैं, जिन्होंने युगों-युगों से भाषा, जाति, क्षेत्र और मत के भेदों से ऊपर उठकर समाज को जोड़ने का कार्य किया है। उन्होंने हमें यह सिखाया है कि विविधता में ही हमारी वास्तविक एकता निहित है, और परंपरा व प्रगति एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। ये पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं, हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कारों के हस्तांतरण का कार्य करते हुए राष्ट्रीय एकात्मता को निरंतर सशक्त बनाते हैं।
विकसित भारत 2047 के संकल्प की ओर बढ़ते हुए, यह आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन परंपराओं से प्रेरणा लेकर आधुनिक भारत का निर्माण करें, जहाँ प्रगति के साथ-साथ संस्कृति और संवेदना भी समान रूप से पुष्पित-पल्लवित हों।
साथियो,
आज इस पर्व मिलन समारोह में उपस्थित आप सभी से, विशेष तौर पर संकल्प चंडीगढ़ के पूर्व छात्र तथा वर्तमान में देश के विभिन्न भागों में प्रशासनिक अधिकारियों के रूप में कार्यरत आप सभी से मैं विशेष रूप से यह आशा करता हूँ कि आप जहाँ भी तैनात हों, जिस भी दायित्व का निर्वहन कर रहे हों, वहाँ अपने आचरण, निर्णय और कार्यशैली के माध्यम से सुशासन, संवेदनशील प्रशासन और जनसेवा के सर्वोच्च आदर्श स्थापित करें।
आप केवल अधिकारी नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी, संविधान के वाहक और जन-आकांक्षाओं के सेतु हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप अपनी कार्यकुशलता, नैतिकता और मानवीय दृष्टिकोण के बल पर प्रशासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और करुणामय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे तथा ‘सेवा ही सर्वोच्च साधना है’ के भाव को आत्मसात कर एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान देते रहेंगे।
इस पर्व मिलन के अवसर पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे सभी गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि जब शिक्षा, संस्कृति और सेवा एक साथ आती हैं, तो समाज सशक्त बनता है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि संकल्प आने वाले वर्षों में भी इसी प्रतिबद्धता के साथ देश को सक्षम, संवेदनशील और मूल्यनिष्ठ अधिकारी प्रदान करता रहेगा।
अंत में, मैं आप सभी को भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
धन्यवाद,
जय हिन्द!