SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF SYMPOSIUM ON 350TH SHAHEEDI SHATABDI SAMAROH OF SRI GURU TEG BAHADUR SAHIB JI AT CHANDIGARH ON JANUARY 24, 2026.

श्री गुरू तेग़ बहादुर जी के 350वें शहीदी शताब्दी समागम पर विचार-गोष्ठी के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

 दिनांकः 24.01.2026, शनिवारसमयः दोपहर 12:30 बजेस्थानः चंडीगढ़

    

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह!

आज, नौवें पातशाह, ‘हिंद की चादर’, श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी के 350वें शहीदी शताब्दी के पावन स्मरण में आयोजित इस गरिमामय अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत श्रद्धा, गौरव और आत्मिक संतोष की अनुभूति हो रही है। 

मेरा हृदय उस महान त्याग, अदम्य साहस और निर्भीकता के प्रतीक गुरु साहिब के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता से परिपूर्ण है, जिनका संपूर्ण जीवन बलिदान और धर्म-रक्षा की एक अनुपम गाथा है।

श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को पावन नगरी अमृतसर में, छठे गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी एवं माता नानकी जी के घर में हुआ। बचपन से ही गुरु साहिब सेवा, साधना और सिमरन में लीन रहे। करतारपुर के युद्ध के पश्चात उन्हें “तेग़ बहादुर” की उपाधि प्राप्त हुई, अर्थात अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध सत्य की तीखी धार धारण करने वाले महापुरुष।

हालांकि गुरु साहिब ने वर्ष 1665 में नौवें नानक के रूप में गुरु गद्दी संभाली, लेकिन वर्ष 1675 में दी गई उनकी महान शहादत ने उन्हें न केवल सिख इतिहास, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के इतिहास में साहस, करुणा और बलिदान का शाश्वत प्रतीक बना दिया।

गुरू रूप साध-संगत,

प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक नेतृत्व के क्षेत्र में भारत ‘विश्वगुरु’ रहा है। पंजाब की पावन भूमि भी गुरुओं, संतों और महापुरुषों की भूमि रही है। ऐसे महान आध्यात्मिक गुरुओं की उस दिव्य परंपरा में श्री गुरु तेग़ बहादुर जी एक प्रकाश स्तंभ के रूप में विराजमान हैं, जिनका संदेश युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता आया है और जो हर काल में समान रूप से प्रासंगिक रहा है।

पंजाब का इतिहास महान गुरुओं और शहीदों के निस्वार्थ बलिदानों से परिपूर्ण है, जो सदैव हम सबके लिए प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। सिख गुरुओं ने हमें उस युग में दिशा दी, जो संभवतः हमारे इतिहास का सबसे चुनौतीपूर्ण कालखंड था। 

विभिन्न समुदायों के बीच एकता, सौहार्द और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने में सिख गुरुओं के योगदान और उनके त्याग को कोई भी भुला नहीं सकता। यही कारण है कि सिख गुरु केवल सिखों के ही नहीं, बल्कि विश्वभर के सभी धर्मों के अनुयायियों द्वारा श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किए जाते हैं।

उस समय औरंगज़ेब आम जनता का बलपूर्वक इस्लाम में धर्मांतरण करवा रहा था। इसी अभियान के दौरान उसने लगभग 500 कश्मीरी पंडितों को बंदी बनाकर उनके समक्ष धर्मांतरण या मृत्यु का विकल्प रखा।

इन हालातों से व्यथित होकर पंडित कृपा राम जी के नेतृत्व में कश्मीर के 40 कश्मीरी पंडित श्री आनंदपुर साहिब पहुँचे। पंडित कृपा राम जी ने गुरु तेग़ बहादुर जी से कहा, ‘‘हे सत्गुरु! हमें और हमारे धर्म को बचाइए, अन्यथा हमारी संस्कृति समाप्त हो जाएगी।’’

गुरु तेग़ बहादुर जी यह सुनकर गहन चिंतन में चले गए। तभी उनके पास उनके नौ वर्षीय पुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी उपस्थित हुए।

उन्होंने पिता से पूछा, “पिताजी, आप किस विषय में इतने विचारमग्न हैं?” गुरु तेग बहादुर जी ने उत्तर दिया, “धर्म पर संकट आया है। कोई ऐसा चाहिए जो धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दे।”

गुरु गोबिंद सिंह ने तुरंत कहा, ‘‘इससे बड़ा पुण्य का कार्य और क्या हो सकता है? इस कार्य के लिए आपसे श्रेष्ठ और कौन हो सकता है?’’ यह सुनकर गुरु तेग़ बहादुर जी ने निश्चय कर लिया कि वे धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देंगे। 

यहीं से “सरबत दा भला”, अर्थात सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का वह सार्वभौमिक और कालजयी संकल्प प्रकट हुआ, जब गुरू जी ने कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए पांच सिखों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। यह वह क्षण था जब गुरु जी ने धर्म, तिलक और जनेऊ के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का संकल्प लिया।

दिल्ली जाते समय गुरु जी को रास्ते में ही गिरफ़्तार कर लिया गया और एक क़िले में बंद कर दिया गया। उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए अनेक प्रलोभन दिए गए, परंतु गुरु तेग़ बहादुर जी उस धातु के बने थे, जो न झुकती है, न टूटती है। 

जब गुरु साहिब से पूछा गया कि क्या वे अपना मत छोड़ देंगे, तो उनका उत्तर स्पष्ट, साहसी और अमर था, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता, मैं किसी को नहीं डराता। हमारा पंथ ऐसा ही है, न डरता है, न डराता है।’’

उन पर अमानवीय अत्याचार किए गए। उन्हें तपती रेत में तपाया गया, लोहे के पिंजरे में बंद किया गया, शरीर पर पिघला हुआ सीसा डाला गया, लेकिन गुरु साहिब अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए और जल्लाद की तलवार के सम्मुख भी धर्म-परिवर्तन से स्पष्ट इनकार कर दिया और अत्याचार व अन्याय के सम्मुख न झुकते हुए मृत्यु को स्वीकार करने का संकल्प लिया। 

वे श्री आनंदपुर साहिब से दिल्ली तक इस उद्देश्य से गए थे कि औरंगज़ेब को धार्मिक दमन से रोका जाए, परंतु अंततः मुग़ल सम्राट के आदेश पर उनका शीश काट दिया गया। दिल्ली के चांदनी चौक स्थित गुरुद्वारा शीश गंज साहिब आज भी उनकी शहादत का पवित्र साक्षी है।

उनकी यह महान शहादत केवल कश्मीरी पंडितों की रक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के लिए धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की रक्षा का ऐतिहासिक उद्घोष थी। श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता, सहिष्णुता और मानव गरिमा की एक अमर विरासत स्थापित की।

उनके साथ गए तीन महान सिख भाई मोती दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी ने भी धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, पर अपनी आस्था से एक क्षण के लिए भी पीछे नहीं हटे।

गुरू रूप साध-संगत,

इस प्रकार श्री गुरु तेग़ बहादुर जी मुग़ल अत्याचार के शिकार होने वाले दूसरे सिख गुरु बने। उनसे लगभग सत्तर वर्ष पूर्व पाँचवें गुरु, श्री गुरु अर्जन देव जी को भी लाहौर क़िले के सामने रावी नदी के तट पर तत्कालीन मुग़ल सम्राट जहाँगीर द्वारा शहीद किया गया था। इन दोनों महान शहादतों ने भारतीय इतिहास की धारा को निर्णायक रूप से परिवर्तित किया।

मैं भारत के महानतम आध्यात्मिक गुरुओं में से एक, ‘हिंद की चादर’, श्री गुरु तेग बहादुर जी को कोटि-कोटि नमन करता हूँ, जो विनम्रता की साकार प्रतिमूर्ति थे और जिन्होंने जाति, पंथ, नस्ल, धर्म और लिंग के सभी भेदों से ऊपर उठकर मानवता का संदेश दिया। 

गुरु साहिब एक महान कवि और चिंतक भी थे। उदाहरण के लिए, उनके एक श्लोक में वे कहते हैं, 

“भै काहू कउ देत नहि, नहि भै मानत आन।

कहु नानक सुनु रे मना, ग्यानी ताहि बखान।।”

अर्थात,  हे नानक! जो न किसी को भय देता है और न किसी से भय मानता है, वही सच्चा ज्ञानी कहलाने योग्य है।

गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने पंद्रह रागों में गुरु-बाणी की रचना की, साथ ही 57 श्लोकों की अमूल्य रचनाएँ कीं, जिन्हें दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित एवं प्रतिष्ठित किया।

एक कवि, विचारक और योद्धा के रूप में श्री गुरु तेग़ बहादुर जी ने समस्त सिख गुरुओं की पवित्र और दिव्य परंपरा को आगे बढ़ाया। उनकी महान शहादत तथा शांति और एकता के सार्वभौमिक उपदेश हम सभी को संपूर्ण मानवता के प्रति करुणा और समर्पण की प्रेरणा देते हैं।

गुरू रूप साध-संगत,

आज जब हम 21वीं सदी में खड़े हैं, जब विश्व वैचारिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता और हिंसा के दौर से गुजर रहा है, तब गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी का जीवन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनका संदेश हमें बताता है कि विविधता में एकता, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान ही मानवता का स्थायी मार्ग है।

श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी की शहादत ने इस धरती को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व भी प्रदान किया। यह वही विरासत है जिसने आगे चलकर गुरु गोबिंद सिंह जी के माध्यम से साहिबज़ादों की अद्वितीय शहादत, खालसा पंथ की स्थापना और अत्याचार के विरुद्ध संगठित चेतना को जन्म दिया।

गुरू रूप साध-संगत,

आज की युवा पीढ़ी के लिए श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी का जीवन एक जीवंत विश्वविद्यालय है। वे हमें सिखाते हैं कि सत्य के लिए खड़ा होना सुविधाजनक नहीं होता, अन्याय के विरुद्ध बोलना जोखिम भरा होता है, और दूसरों के अधिकारों की रक्षा में त्याग सबसे कठिन होता है, परंतु यही मार्ग इतिहास को दिशा देता है।

आज आवश्यकता है कि हम केवल शहादत को स्मरण न करें, बल्कि उसके मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। सहिष्णुता को अपनी शक्ति बनाएं, करुणा को अपनी संस्कृति बनाएं और सत्य को अपनी नीति।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि “गुरु परंपरा ने भारत को वह नैतिक आधार दिया है, जिसने हमें हर कालखंड में संकटों से उबरने की शक्ति दी”, और श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी उसी गुरु परंपरा के ऐसे स्तंभ हैं, जिनकी छाया में भारत की आत्मा सुरक्षित रही।

गुरू रूप साध-संगत,

गुरु साहिब की शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। “ऐसा नाम निरंजन होए” हमें स्मरण कराती है कि सच्ची मुक्ति अहंकार के त्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण में निहित है। और “मन जीते जग जीत” यह सिखाती है कि मन पर विजय प्राप्त कर लेने वाला व्यक्ति ही वास्तव में संसार को जीत सकता है।

ये वाणी-पंक्तियाँ केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ, संतुलित और सार्थक जीवन के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शिका हैं।

वास्तव में, गुरु साहिब जी के दिव्य जीवन को कुछ शब्दों में समेट पाना संभव नहीं है। उनका जीवन आज भी संघर्षों से ग्रस्त विश्व को यह संदेश देता है कि विविधताओं के बीच एकता, घृणा के स्थान पर करुणा और भय के स्थान पर निर्भीकता ही मानवता का स्थायी मार्ग है।

अतः, मैं आप सभी से आह्वान करता हूँ कि हम श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी के उपदेशों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि सेवा, त्याग, लंगर, तथा निर्भय और निरवैर जीवन-मूल्यों के माध्यम से “सरबत दा भला” के महान संकल्प को अपने आचरण में साकार करें।

अंत में, मेरी प्रार्थना है कि श्री गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी के चरण कमल हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें और हमें सत्य, साहस तथा मानवता के मार्ग पर निरंतर अग्रसर होने की शक्ति प्रदान करें।

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह!

जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल!

धन्यवाद,जय हिन्द!