SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF HOLISTIC WELLNESS INITIATIVE FOR SCHOOL STUDENTS AT CHANDIGARH ON JANUARY 28, 2026.
- by Admin
- 2026-01-28 12:35
चंडीगढ़ सिटिज़न फाउंडेशन के ‘प्रोजेक्ट साथी’ के शुभारंभ पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 28.01.2026, बुधवार समयः सुबह 10:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज इस अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होना मेरे लिए गहन संवेदनशीलता, दायित्व-बोध और आशा से परिपूर्ण अनुभव है। आज हम मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े ‘प्रोजेक्ट साथी’ जैसे दूरदर्शी सामाजिक प्रकल्प के शुभारंभ के साक्षी बन रहे हैं, जिसका उद्देश्य चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करना तथा आत्महत्या जैसी दुखद प्रवृत्तियों की रोकथाम करना है।
सबसे पहले, मैं इस अत्यंत मानवीय, समयोचित और सराहनीय पहल के लिए चंडीगढ़ सिटिज़न्स फ़ाउंडेशन को हार्दिक बधाई देता हूँ। यह कार्यक्रम केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि हमारे समाज की आत्मा को झकझोरने वाली चुनौती के प्रति एक संवेदनशील, वैज्ञानिक और व्यावहारिक उत्तर है।
हमारे लिए यह अत्यंत गर्व का विषय है कि चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला के जाने-माने निवासियों द्वारा वर्ष 2025 में स्थापित चंडीगढ़ सिटिज़न्स फ़ाउंडेशन एक ऐसा सजीव और गतिशील संस्थागत मंच है, जिसे विचारों और अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए विकसित किया गया है। यह संस्था समावेशिता, शांति, सद्भाव, करुणा, प्रेम, भ्रातृत्व, कला एवं संस्कृति, साहित्य, रचनात्मकता, विरासत संरक्षण तथा सतत जीवन-शैली जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।
सेवानिवृत्त जनरल वी. पी. मलिक के नेतृत्व में यह मंच नागरिकों को ऐसे अवसर प्रदान करता है, जहाँ वे मानव कल्याण और सतत जीवन-शैली को प्रोत्साहित करने वाले विषयों पर आयोजनों, संगोष्ठियों, सम्मेलनों तथा जन-संपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से आपस में सहयोग और सहभागिता कर सकें।
अपनी गतिविधियों को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए फाउंडेशन ने 12 विषय-आधारित फोकस समूहों का गठन किया है। ये समूह स्वास्थ्य एवं कल्याण; राष्ट्रीय सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय विषय; संगीत, साहित्य, दृश्य एवं मंचीय कलाएँ; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; सचेत नेतृत्व एवं व्यवसाय; आर्थिक विकास एवं सतत प्रगति; सतत शहरी विकास; शहरी नियोजन, डिज़ाइन एवं वास्तुकला; पर्यटन; शिक्षा; खेल; तथा महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों को समाहित करते हैं।
यह फाउंडेशन 200 से अधिक प्रेरित एवं अनुभवी पेशेवर स्वयंसेवकों से युक्त है, जो विभिन्न विषयों से संबंधित कार्यक्रमों और गतिविधियों के क्रियान्वयन में सक्रिय रूप से सहभागिता निभा रहे हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ एक “मौन महामारी” का रूप ले चुकी हैं। बाहरी रूप से मुस्कुराते चेहरे, भीतर टूटते मन, यह आज की सबसे बड़ी सामाजिक विडंबना बनती जा रही है। अत्यंत दुःख के साथ कहना पड़ता है कि स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाला हमारा युवा वर्ग भी इस संकट से अछूता नहीं रहा है। कुछ मामलों में तो यह पीड़ा इतनी गहरी हो जाती है कि हमारे बच्चे जीवन से ही हार मान लेते हैं। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।
हाल के वर्षों में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि आज के विद्यार्थी केवल पाठ्य पुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित चुनौतियों का सामना नहीं कर रहे हैं। भावनात्मक उपेक्षा, घरेलू कलह, बुलिंग, स्क्रीन की लत, साथियों का दबाव, शैक्षणिक एवं करियर से जुड़ा तनाव, शरीर की छवि को लेकर चिंताएँ तथा असंतुलित खान-पान जैसी समस्याएँ चुपचाप युवा मनों को प्रभावित कर रही हैं।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएँ अब एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक संकट के रूप में उभर चुकी हैं। यह कठोर सत्य कि हर वर्ष आत्महत्या के कारण हज़ारों युवा जीवन खो जाते हैं, अत्यंत पीड़ादायक है। प्रत्येक ऐसी त्रासदी के पीछे दर्द, अकेलापन, भय और अनसुना किए जाने की हृदयविदारक अनुभूति छिपी होती है।
हम यह स्वीकार किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते कि जब कोई बच्चा आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो वह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि परिवार, स्कूल, समाज और व्यवस्था की सामूहिक विफलता का संकेत होता है।
देवियो और सज्जनो,
यह एक अत्यंत प्रभावशाली तथ्य है कि हर चार में से एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में कभी न कभी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी चुनौती का सामना करता है। अब इस सभागार में चारों ओर दृष्टि डालिए। सांख्यिकीय रूप से संभव है कि आपके निकट बैठा कोई व्यक्ति, या संभवतः आप स्वयं भी, इस संघर्ष से गुजर रहे हों। इसके बावजूद, हम मानसिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय पर बहुत कम खुलकर संवाद करते हैं।
हम अक्सर शरीर की बीमारियों पर तो खुलकर बात करते हैं, लेकिन मन की व्याधियों पर चुप्पी साध लेते हैं। याद रखिये, ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है’, यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि हमारे जीवन का मूल मंत्र होना चाहिए।
आज जब हम 2026 में खड़े हैं, भारत अपनी विकास यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर चुनौतियां बड़ी हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकार आज विश्व स्तर पर दिव्यांगता के प्रमुख कारणों में से एक बन चुके हैं। वर्ष 2021 में किए गए आकलनों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर प्रत्येक 7 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार के साथ जीवनयापन कर रहा है, जो संख्या में 1 अरब 10 करोड़ से भी अधिक लोगों के बराबर है। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है, जहाँ लगभग प्रत्येक 100 में से 11 व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित हैं।
अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि भारत की लगभग 15 प्रतिशत वयस्क आबादी ऐसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही है, जिनमें समय पर हस्तक्षेप और पेशेवर सहायता की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही यह भी एक चिंताजनक तथ्य है कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य विकारों की व्यापकता कहीं अधिक है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा लगभग 6.9 प्रतिशत है, वहीं शहरी क्षेत्रों में यह बढ़कर लगभग 13.5 प्रतिशत तक पहुँच जाता है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, देश ने ‘टेली-मानस’ (Tele MANAS - Tele Mental Health Assistance and Networking Across States) जैसी क्रांतिकारी हेल्पलाइन शुरू की है। यह सुविधा अब 2026 में हर कोने तक पहुँच चुकी है। इसके माध्यम से दूर-दराज के गांवों में बैठा व्यक्ति भी वीडियो कॉल के जरिए विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिकों से जुड़ सकता है। हमारे युवाओं को इस सुविधा का लाभ बिना किसी हिचकिचाहट के उठाना चाहिए।
सबसे बड़ी बाधा चिकित्सा सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक शर्म है। यदि किसी को बुखार हो, तो हम डॉक्टर के पास जाते हैं। यदि मन उदास हो या तनाव हो, तो मनोवैज्ञानिक के पास जाने में शर्म कैसी?
हमें एक ऐसा समाज बनाना है, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा सामान्य, सहज और सम्मानजनक हो। जहाँ परिवार अपने बच्चों की बातों को धैर्य, संवेदनशीलता और खुले मन से सुनें। उन्हें तुरंत ‘कमज़ोर’ करार देने के बजाय उनके भावों को समझें, उन्हें सहारा दें और समय पर सही मार्गदर्शन प्रदान करें। जब घर में संवाद सुरक्षित होगा, तभी बच्चे स्कूल में, समाज में और जीवन में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ पाएँगे।
मैं समझता हूं कि प्रोजेक्ट साथी इस तात्कालिक आवश्यकता का उत्तर संवेदनशीलता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और करुणा के साथ देता है। मैं चंडीगढ़ प्रशासन, स्कूल शिक्षा विभाग और चंडीगढ़ सिटिज़न्स फ़ाउंडेशन की सराहना करता हूँ, जिन्होंने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चंडीगढ़ (GMCH) और पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) के अग्रणी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ-साथ शिक्षकों, परामर्शदाताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से विस्तृत परामर्श के बाद इस पहल की परिकल्पना की और इसे समर्थन दिया।
अक्टूबर 2025 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर, हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही कहा था, “आइए हम सभी मिलकर ऐसे वातावरण का निर्माण करें जहाँ मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाली बातचीत और अधिक मुख्यधारा में आए।”
इसी दृष्टि से प्रेरणा लेते हुए, मुझे यह साझा करते हुए गर्व हो रहा है कि स्कूल शिक्षा विभाग ने चंडीगढ़ सिटिज़न्स फ़ाउंडेशन के सहयोग से एक ऐसा मंच विकसित किया है, जो इस विचार को साकार करता है कि “साझा करना ही देखभाल करना है।”
प्रोजेक्ट साथी हमारे बच्चों के मानसिक और भावनात्मक कल्याण की सुरक्षा हेतु एक सामूहिक प्रतिबद्धता की शुरुआत का प्रतीक है।
‘प्रोजेक्ट साथी’ को वास्तव में विशिष्ट बनाने वाली बात इसका समग्र और समन्वित दृष्टिकोण है। यह मानसिक स्वास्थ्य सहायता को केवल काउंसलिंग तक सीमित नहीं रखता, बल्कि एक संवेदनशील, सुरक्षित और सक्षम स्कूल परिवेश विकसित करने का लक्ष्य रखता है।
इसके अंतर्गत प्रधानाचार्यों और शिक्षकों का संवेदनशीलकरण एवं प्रशिक्षण; काउंसलरों के कौशल का उन्नयन; योग, ध्यान, खेल, जीवन-कौशल शिक्षा एवं रचनात्मक गतिविधियों का समावेशन; तथा नियमित वेलनेस सभाओं और सहकर्मी सहभागिता के माध्यम से विद्यार्थियों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को सुदृढ़ किया जाएगा।
मेरा मानना है कि 6 माह का यह पायलट चरण एक समझदारी भरा और उत्तरदायी कदम है। सावधानीपूर्वक मूल्यांकन से इस मॉडल को और बेहतर बनाया जा सकेगा, जिससे इसे न केवल चंडीगढ़ बल्कि अन्य राज्यों, स्कूलों और यहाँ तक कि विश्वविद्यालयों में भी अपनाया जा सके। इसमें विद्यालयी मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक राष्ट्रीय मॉडल बनने की अपार संभावनाएँ हैं।
यह पहल कक्षा 7, 8, 9 और 11 के विद्यार्थियों के लिए लागू की जाएगी। तनाव से निपटने के आनंददायक और स्वस्थ तरीकों के माध्यम से, हमारा उद्देश्य विद्यार्थियों को आत्मविश्वासी, लचीला और हमारे राष्ट्र का उत्पादक नागरिक बनाना है।
देवियो और सज्जनो,
हमारे शिक्षक और काउंसलर अक्सर किसी बच्चे के मौन संघर्ष को सबसे पहले पहचानते हैं, और इस यात्रा में उनकी भूमिका अमूल्य होगी। अभिभावकों को भी अधिक समझदार, धैर्यवान और खुले विचारों वाला होना होगा।
और मेरे प्रिय विद्यार्थियों, कृपया यह बात स्पष्ट रूप से याद रखें कि आप अकेले नहीं हैं। सहायता माँगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस का प्रतीक है।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि शिक्षक और प्रधानाचार्य यदि बच्चों के व्यवहार, भावनात्मक संकेतों और मानसिक संघर्षों को समय रहते पहचान सकें, तो अनेक जीवन संकट में जाने से पहले ही सुरक्षित किए जा सकते हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज आवश्यकता है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को कलंक नहीं, बल्कि करुणा, समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें। जैसे हम शारीरिक रोग के लिए चिकित्सक के पास जाते हैं, वैसे ही मानसिक पीड़ा के लिए परामर्श और उपचार को सहज और स्वीकार्य बनाना होगा।
हमें ऐसे विद्यालयों की आवश्यकता है जहाँ बच्चे केवल परीक्षा के अंक ही नहीं, बल्कि अपने मन की बातें भी सुरक्षित रूप से साझा कर सकें। जहाँ सफलता के साथ-साथ असफलता को भी स्वाभाविक प्रक्रिया माना जाए। जहाँ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग, संवेदना और आत्मसम्मान को भी महत्व मिले।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आज भारत “विकसित भारत 2047” की ओर अग्रसर है। परंतु हमें यह सदैव स्मरण रखना होगा कि विकसित भारत केवल सशक्त अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और आशावादी युवा पीढ़ी से बनेगा। यदि हमारे बच्चे मानसिक रूप से सशक्त होंगे, तभी वे नवाचार करेंगे, नेतृत्व करेंगे और राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक ले जाएंगे।
इसलिए विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य कोई वैकल्पिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का केंद्रीय विषय है। मैं समझता हूं कि प्रोजेक्ट साथी इसी सोच की अभिव्यक्ति है।
अंत में, मैं एक बार पुनः चंडीगढ़ प्रशासन, स्कूल शिक्षा विभाग, चंडीगढ़ सिटिज़न फाउंडेशन, GMCH, PGIMER, सभी विशेषज्ञों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस मानवीय पहल के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
मैं आशा करता हूँ कि यह परियोजना सफलतापूर्वक क्रियान्वित होगी, इसके परिणाम सकारात्मक होंगे और यह कार्यक्रम भविष्य में देशभर के विद्यालयों के लिए एक प्रेरक मॉडल बनेगा।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने बच्चों को केवल पढ़ाएँगे ही नहीं, बल्कि उन्हें समझेंगे भी; केवल प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करेंगे।
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, मैं इस “प्रोजेक्ट साथी” के सफल कार्यान्वयन की कामना करता हूँ।
धन्यवाद,
जय हिन्द!