SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASIO NOF INTERNATIONAL OLDER PERSONS’S DAY AT CHANDIGARH ON JANUARY 29,2026.

‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस’ के अवसर पर
राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 29.01.2026, गुरूवार समयः सुबह 11:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज हम सभी यहाँ “अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस” के इस पावन अवसर को मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं। यह दिन उन अनमोल व्यक्तियों के अपार समर्पण, अथक परिश्रम और अतुलनीय योगदान के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परिवार की सेवा, समाज के निर्माण और राष्ट्र की प्रगति में समर्पित कर दिया।
मैं आज इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए चंडीगढ़ सीनियर सिटिजन एसोसिएशन के प्रति अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। वर्ष 1996 में पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव स्वर्गीय श्री पी.एन. वैष्णव के नेतृत्व में स्थापित इस संस्था ने 4 हजार 500 से अधिक सदस्यों के साथ देश का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर गौरव बढ़ाया है। यह संस्था फिजियोथेरेपी, योग, वृद्धजन स्वास्थ्य परीक्षण जैसी निःशुल्क सेवाएं प्रदान कर हमारे बुजुर्गों के जीवन को बेहतर बना रही है, जो वास्तव में सराहनीय है।
इसके अलावा, एसोसिएशन ने पंजाब के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को आर्थिक सहायता भी प्रदान की और चंडीगढ़ रेड क्रॉस सोसायटी के सहयोग से गरीब लड़कियों व महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक गतिविधियाँ शुरू की हैं।
देवियो और सज्जनो,
इस दिन का उद्देश्य न केवल हमारे बुजुर्गों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि उन्हें वो सम्मान और सुरक्षा मिले जिसके वे हकदार हैं। हमें यह समझना होगा कि बुजुर्गों की देखभाल सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य है।
मैं समझता हूं कि हमारे वरिष्ठ नागरिक हमारी सभ्यता की जीवंत धरोहर और हमारे समाज की मजबूत आधारशिला हैं। आपके अनुभव का भंडार और जीवन से मिले पाठ वह मार्गदर्शक प्रकाश हैं, जो नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाते हैं।
वरिष्ठ नागरिक किसी भी समाज की जड़ें होते हैं। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ें अदृश्य होकर भी पूरे वृक्ष को जीवन देती हैं, उसी प्रकार हमारे बुजुर्ग अपने त्याग, तपस्या, परिश्रम और अनुभव के माध्यम से समाज को स्थायित्व, संस्कार और संतुलन प्रदान करते हैं।
भारत की संस्कृति में वृद्धजनों को केवल आयु के आधार पर नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा और विवेक के प्रतीक के रूप में देखा गया है। भारत एक ऐसा देश है, जिसकी सभ्यता प्राचीन है और आदिकाल से ही हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया है कि माता-पिता का आदर करना चाहिए। “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा है। ये सामाजिक मूल्य हमारी सभ्यता में निहित हैं। 
भारत के संविधान के अनुच्छेद 41 में अन्य बातों के साथ-साथ यह प्रावधान है कि राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास के अनुसार वृद्धजनों के सहयोग की विशेष व्यवस्था करे। इसी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए, केंद्र व राज्य सरकारें वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए ठोस नीतियों पर निरंतर कार्य कर रही हैं।
तथापि यह विडंबना है कि आर्थिक विकास, आधुनिकीकरण और हमारे युवाओं के रोजगार के लिए शहरी इलाकों में प्रवास से ऐसे हालात पैदा हो गए हैं, हमारी पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली का स्थान एकल परिवार ढांचा लेता जा रहा है जहां बुजुर्ग अपेक्षित सम्मान, प्रेम और देखभाल से वंचित हो रहे हैं। 
हमें अपने बुजुर्गों के आत्मविश्वास को मजबूत बनाना चाहिए। उनकी पीढ़ी ने ही आधुनिक जीवंत भारत का निर्माण किया है जिनका हम आनंद उठा रहे हैं और अपने भविष्य की ओर पूरी आशा के साथ आगे बढ़ रहे हैं। हमारे बुजुर्गों को निश्चित रूप से यह अहसास होना चाहिए कि वे अपनी मेहनत और हमारी समृद्धि में अपने योगदान का आनंद उठा रहे हैं।
हम भारतीयों को अपने वरिष्ठ नागरिकों के प्रति अधिक संवेदनशील बनने को अपना कर्तव्य बना लेना चाहिए। हमें प्रयास करना चाहिए कि वे अपना जीवन स्वस्थ, सम्मानजनक तथा सार्थक ढंग से जिएं। उन्हें समाज की आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
देवियो और सज्जनो,
आज जब विश्व तीव्र गति से तकनीक, उपभोग और प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहा है, तब वृद्धजन हमें ठहराव, संतुलन और संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन केवल उपलब्धियों का नहीं, बल्कि मूल्यों का भी उत्सव है।
आज की पीढ़ी डिजिटल युग में जन्मी है, पर हमारे बुजुर्ग उस युग के साक्षी हैं जिसने स्वतंत्रता संग्राम देखा, राष्ट्र निर्माण की नींव रखी, सामाजिक परिवर्तन का नेतृत्व किया और कठिनाइयों के बीच भी आशा का दीप जलाए रखा। उनके अनुभव इतिहास की जीवित पाठशालाएँ हैं।
आज वृद्धजन दिवस पर हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या हम अपने वरिष्ठ नागरिकों को केवल सम्मान दे रहे हैं या उन्हें सुरक्षा, सहभागिता और गरिमा भी प्रदान कर रहे हैं।
आज वरिष्ठ नागरिकों से जुड़ी चुनौतियाँ बहुआयामी होती जा रही हैं। बढ़ती आयु के साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक एकाकीपन, डिजिटल तकनीक से दूरी तथा कभी-कभी पारिवारिक उपेक्षा जैसी परिस्थितियाँ उनके जीवन को जटिल बना देती हैं। 
ये चुनौतियाँ केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हमारे पूरे समाज के लिए गंभीर चिंतन का विषय हैं। एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज होने के नाते यह हमारा सामूहिक दायित्व है कि हम इन समस्याओं को समझें, स्वीकार करें और मिलकर उनके समाधान की दिशा में सार्थक प्रयास करें।
मुझे संतोष है कि केंद्र और राज्य सरकारें वृद्धजनों के कल्याण हेतु अनेक योजनाएँ चला रही हैं, जैसे वृद्धावस्था पेंशन, आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय वृद्ध स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम, अटल वयो अभ्युदय योजना, राष्ट्रीय वयोश्री योजना, वृद्धाश्रमों का आधुनिकीकरण, हेल्पलाइन सेवाएँ और डिजिटल स्वास्थ्य सुविधाएँ। 
वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े विषयों के लिए भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को नोडल मंत्रालय बनाया गया है, जो उनके कल्याण हेतु विभिन्न अधिनियमों, नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण एवं क्रियान्वयन करता है। 
वर्ष 2007 में लागू तथा वर्ष 2019 में संशोधित ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम’ के अंतर्गत संतानों एवं उत्तराधिकारियों को अपने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी प्रदान की गई है, जो हमारे सामाजिक दायित्वों को विधिक आधार भी देता है।
परंतु सरकार अकेले यह दायित्व नहीं निभा सकती। इसके लिए समाज, परिवार, संस्थान, स्वयंसेवी संगठन और युवा पीढ़ी, सभी को संवेदनशील भागीदारी निभानी होगी।
हमें ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहाँ बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि संपदा माने जाएँ। जहाँ वृद्धावस्था अकेलेपन की नहीं, सम्मान और सक्रियता की अवस्था बने। जहाँ रिटायरमेंट का अर्थ समाज से अलगाव नहीं, बल्कि अनुभव का नया विस्तार हो।
देवियो और सज्जनो,
आंकड़े बताते हैं कि भारत तेजी से एक वृद्ध होती जनसंख्या वाले राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2036 तक देश में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगभग 23 करोड़ तक पहुँच जाएगी, जो उस समय देश की कुल जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत होगी। 
यह परिवर्तन केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से देश के दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश और पंजाब में वृद्धजन आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्रीय असमानता और अधिक स्पष्ट होने की संभावना है, जिससे इन राज्यों पर स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, देखभाल व्यवस्थाओं और वृद्धजन-अनुकूल बुनियादी ढांचे की मांग और भी बढ़ जाएगी। 
ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि हम आज से ही दीर्घकालिक, संवेदनशील और समावेशी नीतियों की दिशा में ठोस कदम उठाएँ, ताकि वरिष्ठ नागरिकों को न केवल सुरक्षा, बल्कि गरिमा, सहभागिता और सम्मानपूर्ण जीवन भी सुनिश्चित किया जा सके। 
देवियो और सज्जनो,
वरिष्ठ नागरिक केवल सेवा के पात्र नहीं, वे राष्ट्र निर्माण के सहभागी भी हैं। आज आवश्यकता है कि हम उनकी विशेषज्ञता, जीवन-अनुभव और नैतिक दृष्टि को शिक्षा, सामाजिक कार्य, परामर्श, कौशल विकास और सामुदायिक नेतृत्व से जोड़ें।
समाज में अक्सर यह धारणा बन जाती है कि वृद्धजन ‘आश्रित’ हैं। मैं इस विचार को पूरी तरह नकारता हूँ। हमारे बुजुर्ग हमारे ‘जीवंत पुस्तकालय’ (Living Libraries) हैं। आपके पास वह अनुभव है जो दुनिया की किसी भी यूनिवर्सिटी की डिग्री से नहीं खरीदा जा सकता।
मैं विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहता हूँ कि आपका भविष्य उन हाथों से बना है जिनमें आज झुर्रियाँ हैं। उन आँखों में इतिहास है, उन शब्दों में अनुभव है, और उन आशीर्वादों में आपकी सफलता की सबसे मजबूत नींव।
आप तकनीक में माहिर हो सकते हैं, लेकिन जीवन की समझ आपके दादा-दादी और नाना-नानी के पास है। अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताइए, उनकी बातें सुनिए, उनके अनुभवों को डिजिटल युग की गति से जोड़िए। यही सच्चा अंतर-पीढ़ी संवाद है।
साथ ही, मैं सभी वरिष्ठ नागरिकों से भी आग्रह करूंगा कि आप सक्रिय और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाएं। समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों में अपनी सहभागिता बनाए रखें। आपका योगदान और सलाह हमारे लिए अमूल्य है।
हमारे देश में अनेक ऐसे प्रेरक उदाहरण हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि आयु कभी भी सक्रियता और सृजनशीलता की बाधा नहीं बन सकती। योग गुरु बी.के.एस. अयंगर ने 90 वर्ष की आयु तक योग के माध्यम से विश्व को मार्गदर्शन दिया, प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन ने जीवन के अंतिम वर्षों तक कला-सृजन जारी रखा, और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम अपने अंतिम क्षणों तक युवाओं को प्रेरित करते रहे। 
इसी प्रकार, “फ्लाइंग सिख” मिल्खा सिंह ने न केवल अपने खेल जीवन में बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर फिटनेस और अनुशासन का संदेश दिया। वहीं, विश्वविख्यात मैराथन धावक फौजा सिंह ने 100 वर्ष की आयु के बाद भी मैराथन दौड़कर यह सिद्ध कर दिया कि सकारात्मक सोच और निरंतर अभ्यास से उम्र की सीमाओं को भी चुनौती दी जा सकती है।
ऐसे अनेक वरिष्ठ नागरिक आज भी शिक्षा, समाजसेवा, कृषि, उद्यमिता और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहकर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। आपका अनुभव, आपका मार्गदर्शन और आपकी सकारात्मक ऊर्जा समाज के लिए अमूल्य धरोहर है।
आज जब भारत विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब वृद्धजन हमारी नैतिक कम्पास हैं। विकास केवल इमारतों और अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि उस समाज से मापा जाएगा जो अपने सबसे अनुभवी नागरिकों को कितना सम्मान, सुरक्षा और सहभागिता देता है।
अंत में, मैं सभी वरिष्ठ नागरिकों के चरणों में नमन करता हूँ। आपने जो बोया है, उसी की छाया में हम खड़े हैं। आपका जीवन हमारे लिए प्रेरणा है, आपकी मुस्कान हमारे लिए आशीर्वाद है, और आपका मार्गदर्शन हमारे लिए दीपस्तंभ है।
आइए, इस अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर हम संकल्प लें कि हम अपने बुजुर्गों को केवल याद नहीं करेंगे, उन्हें रोज़ सम्मान देंगे, केवल सुविधा नहीं देंगे, उन्हें सहभागिता देंगे, और केवल सहानुभूति नहीं, उन्हें गरिमा के साथ जीवन देंगे।
मैं समस्त वरिष्ठ नागरिक बंधुओं के उज्ज्वल, स्वस्थ एवं सुखमय भविष्य की कामना करता हूँ। आप सभी दीर्घायु हों, यही ईश्वर से प्रार्थना है।
हमारे वरिष्ठों का सम्मान, राष्ट्र का सम्मान है।
धन्यवाद, 
जय हिन्द!