SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF ATTENDING OF MORARI BAPU RAMKATHA AT NEW DELHI ON JANUARY 20, 2026.
- by Admin
- 2026-01-20 14:40
‘मोरारी बापू रामकथा’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 20.01.2026, मंगलवार समयः दोपहर 12:30 बजे स्थानः भारत मंडपम, नई दिल्ली
जय श्रीराम!
आज भारत मण्डपम, प्रगति मैदान, नई दिल्ली में 17 से 25 जनवरी 2026 तक आयोजित पूज्य मोरारी बापू जी की रामकथा के इस विराट, पावन और ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य, भावविभोरता और आत्मिक आनंद का विषय है।
सर्वप्रथम मैं व्यासपीठ पर विराजमान परम पूज्य मोरारी बापू जी को सादर नमन करता हूँ, जिनकी वाणी वर्षों से रामकथा की परंपरा को विश्व-स्तर पर करुणा, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का जीवंत माध्यम बनाती रही है। साथ ही, इस आयोजन के प्रेरक और आयोजक अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक, पूज्य जैनाचार्य श्री लोकेशजी को हार्दिक साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने “विश्व-शांति” के संकल्प को जन-जन के हृदय तक पहुँचाने के लिए इस रामकथा का आयोजन किया है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
श्रीराम कथा समाज में नैतिकता, भाईचारा और मानवता के संदेश को फैलाने का सशक्त माध्यम है। यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा भी है। पूज्य मोरारी बापूजी लंबे काल से देश विदेश में रामकथा के माध्यम से समाज में मानवता का संदेश फैला रहे हैं। यह जानकर मैं रोमांचित हूँ कि यह उनकी 971वीं कथा है।
मुझे आचार्य लोकेश जी ने रामकथा आयोजन समिति के संरक्षक का दायित्व संभालने के लिए जब निवेदन किया, तो मैंने इस महान आयोजन का हिस्सा बनना अपना सौभाग्य समझा।
विश्व शांति केंद्र के उद्घाटन के अवसर पर पूज्य मोरारी बापू ने यह कहते हुए कि विश्व शांति केंद्र के मिशन के लिए मैं दिल्ली में नौ दिन की कथा करूंगा। यह इस बात का संकेत है कि पूज्य बापू की कथाएं समाज, राष्ट्र और विश्व के हितों के लिए विशेष उद्देश्यों से होती रही हैं। निश्चित ही विश्व शांति केंद्र मिशन के लिए बापू का आह्वान देश दुनिया मैं फैले उनके श्रद्धालुओं को प्रेरणा देगा और एक दिन विश्व शांति का सपना भी साकार होगा।
पूज्य बापूजी का करुणा एवं अनुकंपा से भरा हृदय युद्ध, हिंसा और संघर्ष से मुक्त विश्व को देखना चाहता है। उसके लिए उन्होंने पूज्य आचार्य लोकेश जी को सभी वर्गों का एक ऐसा प्रभावी मंच खड़ा करने का निर्देश दिया था, जो विश्व में कहीं भी युद्ध हिंसा और संघर्ष की स्थिति को टालने में अपनी भूमिका निभाए। मुझे लगता है अब वो समय आ गया है कि हम सबको मिलकर उसके लिए तीव्र प्रयत्न करने होंगे, उसी में मानव जाति एवं पूरे विश्व की भलाई है।
आदरणीय आचार्य लोकेश मुनि जी आज के युग के उन विरल संतों में से हैं, जिन्होंने आध्यात्मिक साधना को वैश्विक उत्तरदायित्व से जोड़ा है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा साधु वह है जो मौन में नहीं, बल्कि समाज के संकटों के बीच अपनी करुणा और विवेक के साथ खड़ा होता है।
पूज्य मोरारी बापू जी का उनके सद्प्रयासों को गंभीरता से समझना और इसके लिए अपने जीवन और उद्देश्यपरक रामकथा प्रवाह से नौ दिन सौंपना एक गरिमामयी संदेश प्रस्तुत करता है। बापूजी आप भारत के जनमानस के आदर्श श्रीराम को कण-कण में स्थापित करने वाले महापुरूष हैं। आपने जो किया है वो अब इतिहास में दर्ज होगा और यह कथा जिस विश्व शांति मिशन हेतु हो रही है, वो एक उदाहरण बनकर सदियों तक याद की जाएगी।
विश्व शांति केंद्र, जिसे उन्होंने अपने दूरदर्शी नेतृत्व से स्थापित किया है, केवल एक संस्था नहीं है; यह भारत की उस चिरंतन परंपरा का आधुनिक रूप है, जिसमें शांति को शक्ति माना गया है और संवाद को समाधान। आज जब पूरी दुनिया संघर्ष, ध्रुवीकरण और हिंसा के दौर से गुजर रही है, तब आचार्य लोकेश मुनि जी का यह प्रयास यह सिद्ध करता है कि भारत की आत्मा आज भी विश्व को शांति का मार्ग दिखा सकती है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
पूज्य मोरारी बापूजी केवल रामकथा नहीं कहते, वे राम जी को जीते हैं। उनकी वाणी में वह दुर्लभ सामर्थ्य है, जो मनुष्य को उसके भीतर की श्रेष्ठता से जोड़ देती है। उन्होंने रामकथा को मानवता के हृदय तक पहुँचाया है। उनकी कथा में भक्ति भी है, विचार भी है, और वह मानवीय करुणा भी है, जिसकी आज के समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।
रामकथा केवल अतीत की गाथा नहीं है; वह भविष्य का पथप्रदर्शक है। श्रीराम जी का जीवन हमें बताता है कि सत्ता सेवा के लिए होती है, त्याग कमजोरी नहीं बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है, और धर्म केवल कर्मकांड नहीं बल्कि नैतिक साहस का नाम है। आज जब वैश्विक समाज विश्वास के संकट से गुजर रहा है, तब राम जी का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि नेतृत्व का अर्थ है - चरित्र।
रामकथा केवल अतीत का आख्यान नहीं है, यह वर्तमान का मार्गदर्शन और भविष्य का संकल्प है। श्रीराम का जीवन ‘मर्यादा’ का अनुशासन है, ‘करुणा’ की संवेदना है, ‘कर्तव्य’ की निष्ठा है और ‘सत्य’ की प्रतिष्ठा है। रामराज्य की कल्पना सत्ता का नहीं, बल्कि नीति, न्याय और लोक-कल्याण का आदर्श है, जहाँ कमजोर सुरक्षित हो, वंचित समर्थ हो, और समाज अपने भीतर से मजबूत हो।
गोस्वामी तुलसीदास जी का यह वचन हमें बार-बार स्मरण कराता है, “परहित सरिस धरम नहीं भाई।” अर्थात् दूसरों के कल्याण से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यह पंक्ति भारतीय जीवन-दर्शन का सार है। यह हमें सिखाती है कि जब हम किसी पीड़ित का दुःख बाँटते हैं, किसी निराश को आशा देते हैं और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करते हैं, तभी हम वास्तविक अर्थों में धर्म का आचरण करते हैं। यही संदेश रामकथा की आत्मा है और यही हमारे जीवन को सार्थक बनाता है।
आज के समय में जब व्यक्ति-केंद्रितता बढ़ रही है, तब रामकथा हमें फिर से समाज-केंद्रित बनाती है; अपने लाभ से ऊपर उठकर दूसरों के कल्याण को धर्म मानने की प्रेरणा देती है।
आज की इस रामकथा की एक विशेषता यह भी है कि यह सनातन परंपरा के आध्यात्मिक प्रकाश को जैन दर्शन की अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत की उदात्त चेतना के साथ जोड़ती है। यह संगम अपने आप में भारत की उस संस्कृति का प्रतीक है, जो “विविधता में एकता” को केवल नारा नहीं, जीवन-दर्शन मानती है।
जैन परंपरा का उद्घोष, “अहिंसा परमो धर्मः” और श्रीराम जी के जीवन का संदेश, “करुणा, मर्यादा और लोकमंगल”, जब एक साथ मंच से प्रवाहित होते हैं, तो यह समूचे समाज के लिए एक नैतिक पुनर्जागरण का क्षण बन जाता है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज दुनिया तनाव, संघर्ष, असहिष्णुता और विभाजन की अनेक चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे में विश्व-शांति केवल राजनयिक प्रयासों से नहीं, बल्कि मन की शांति, विचार की शुद्धता और व्यवहार की करुणा से जन्म लेती है। रामकथा हमें यही सिखाती है कि शांति बाहर नहीं, पहले भीतर स्थापित होती है। और जब भीतर शांति होती है, तब समाज में समरसता अपने आप बढ़ती है।
रामकथा भारत की सभ्यतागत परंपरा में गहराई से निहित नैतिकता, करुणा, बंधुत्व और मानवता के शाश्वत मूल्यों की केवल कथा नहीं, बल्कि उनका जीवंत संचार है। यह हमें सत्य, कर्तव्य, सह-अस्तित्व और सेवा का मार्ग दिखाती है तथा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली संवेदना को जागृत करती है। रामकथा व्यक्ति के चरित्र को गढ़ने, समाज में समरसता बढ़ाने और जीवन को उच्चतर आदर्शों की ओर उन्मुख करने का एक सशक्त माध्यम है।
प्रभु श्रीराम जी का जीवन और उनके आदर्श हमारे लिए धर्म का व्यावहारिक मार्गदर्शक हैं जो हमें सत्य, कर्तव्य, संयम, त्याग और लोककल्याण के आधार पर जीवन जीने का सही मार्ग दिखाते हैं।
प्रभु श्रीराम का जीवन और उनके आदर्श वाल्मीकि की संस्कृत रामायण से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस, कंबन की तमिल रामायणम् तथा भारत और विश्व की अनेक भाषाओं में रचित विविध रूपांतरणों तक व्यापक रूप से अभिव्यक्त होते हैं। भाषाएँ और शैलियाँ भले भिन्न हों, पर धर्म का सार एक ही रहता है, जो साझा मूल्यों के माध्यम से विविध परंपराओं, संस्कृतियों और समाजों को एक सूत्र में बाँधता है।
भारत के प्राचीन धर्मग्रंथ विश्व-शांति, सह-अस्तित्व, सद्भाव और संतुलन पर विशेष बल देते हुए इन्हें शाश्वत और सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। रामचरितमानस, भगवद्गीता, आदि पुराण तथा जैन आगम जैसे महान ग्रंथ केवल धार्मिक आस्था के स्रोत नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक चेतना के प्रकाशस्तंभ हैं, जो मानवता को नैतिकता, करुणा और आत्मबोध के मार्ग पर निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
अयोध्या धाम में श्रीराम जन्मभूमि पर दिनांक 22 जनवसरी 2024 को भव्य राम मंदिर का उद्घाटन हमारे समय का एक ऐतिहासिक और भावविभोर करने वाला क्षण रहा। यह केवल एक मंदिर का उद्घाटन नहीं, बल्कि सदियों की आस्था, तपस्या और विश्वास की पूर्णता का प्रतीक है और भारत की सांस्कृतिक चेतना व आध्यात्मिक आत्मविश्वास का उत्सव है।
राम मंदिर का निर्माण और उद्घाटन यह दर्शाता है कि हमारी परंपराएँ आज भी राष्ट्र की ऊर्जा और दिशा हैं। रामलला का विराजमान होना करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आत्मिक संतोष और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक बना है।
इसी क्रम में अयोध्या में 25 नवंबर 2025 को सम्पन्न ध्वजारोहण समारोह सत्य, मर्यादा और लोकमंगल के ध्वज का प्रतिष्ठापन था, जो हमें निरंतर स्मरण कराता है कि श्रीराम केवल मंदिर में नहीं, बल्कि हमारे आचरण और कर्तव्यों में भी प्रतिष्ठित होने चाहिए।
रामकथा के माध्यम से श्रीराम के जीवन-मूल्यों का श्रवण करते हुए यह ऐतिहासिक प्रसंग हमें प्रेरित करता है कि हम भक्ति को चरित्र निर्माण में रूपांतरित करें और श्रीराम जी के आदर्शों को अपने जीवन का आधार बनाएं।
देवियो और सज्जनो,
आज का भारत “विकसित भारत 2047” के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। किंतु विकसित भारत का अर्थ केवल ऊँची इमारतें, तेज़ अर्थव्यवस्था या तकनीकी प्रगति भर नहीं है। विकसित भारत वही है, जिसका चरित्र विकसित हो; जिसकी चेतना करुणामय हो; जिसकी सामाजिक एकता मजबूत हो।
रामकथा हमें बताती है कि राष्ट्र का विकास तभी टिकाऊ होता है जब नागरिकों में कर्तव्यबोध हो, परिवारों में संस्कार हों, और समाज में समरसता हो।
यदि हम श्रीराम जी के आदर्शों को अपनाएँ, तो विकसित भारत की यात्रा केवल तेज़ नहीं, संतुलित और मानवीय भी होगी।
मैं इस विशाल जनसमूह, विशेषकर युवाओं से एक विशेष आग्रह करना चाहता हूँ। आज आपके सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। रामकथा आपको यह संबल देती है कि जीवन में सफलता का अर्थ केवल उपलब्धि नहीं, चरित्र की दृढ़ता है।
आप अपनी ऊर्जा को शिक्षा, कौशल, नवाचार, खेल, सेवा और उद्यमिता में लगाएँ। नकारात्मकता, हिंसा, और किसी भी प्रकार के व्यसन, ये सब जीवन की संभावनाओं को क्षीण करते हैं। रामकथा का संदेश है, भीतर की शक्ति जगाइए, और समाज के लिए उपयोगी बनिए।
विश्व शांति केंद्र के लिए होने वाली इस रामकथा का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता और शांति-निर्माण एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। यह मंच यह दिखाता है कि कथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि समाज को बदलने का माध्यम हो सकती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस रामकथा के उद्घाटन अवसर पर देश के माननीय उपराष्ट्रपति जी ने भी सहभागिता कर रामकथा परंपरा के वैश्विक योगदान और इसके नैतिक-करुणामय संदेश की सराहना की। यह इस बात का संकेत है कि आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय जीवन एक-दूसरे के पूरक हैं।
मैं विशेष रूप से यह कहना चाहूँगा कि आचार्य लोकेश मुनि जी ने जैन अहिंसा और श्रीराम जी के करुणा दर्शन को एक साथ जोड़कर भारत की समावेशी आत्मा को जीवंत कर दिया है। यह आयोजन केवल एक धर्म का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का उत्सव है।
मोरारी बापूजी की रामकथा और विश्व शांति केंद्र की दृष्टि मिलकर यह स्पष्ट संदेश दे रही है कि भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं है, बल्कि वह एक नैतिक सभ्यता है, एक ऐसी सभ्यता जो युद्ध में भी मर्यादा खोजती है और शक्ति में भी करुणा। मैं विश्व शांति केंद्र, अहिंसा विश्व भारती, और पूज्य मोरारी बापू को इस ऐतिहासिक पहल के लिए हार्दिक साधुवाद देता हूँ।
यह रामकथा भारत की आत्मा को विश्व के मंच पर और अधिक उज्ज्वल बनाए। इन नौ दिनों में जो भी अर्थ हम सुनेंगे और बटोरेंगे वो आने वाले पीढ़ियों के लिए आदर्श बनेगा, ऐसा मेरा मानना है।
ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि यह आध्यात्मिक प्रकाश दिल्ली से निकलकर पूरे विश्व को आलोकित करे, और मानवता को पुनः करुणा, संयम और संवाद के मार्ग पर ले आए।
जय सियाराम!
धन्यवाद!