SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF JAIN BHAGWATI DIKSHA ON THE OCCASION OF BASANT PANCHAMI AT PANCHKULA ON 23.01.2026.
- by Admin
- 2026-01-23 14:25
जैन भागवती दीक्षा समारोह के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 23.01.2026, शुक्रवार समयः दोपहर 12:00 बजे स्थानः पंचकूला
जय जिनेन्द्र!
आज इस पवित्र अवसर पर, जब हम जैन भागवती दीक्षा महोत्सव में एकत्र हुए हैं, मेरा हृदय अत्यंत आनंद और गर्व से भर गया है। यह अवसर केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है, जहां एक आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।
आज बहुत ही पावन पर्व है कि पंचकूला की पावन धरा पर मुमुक्षु सिद्धी जैन संयम अंगीकार करने जा रही है। मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे इस महोत्सव की अनुमोदना हेतु पंचकूला श्री संघ द्वारा यहां पर आमंत्रित किया गया है।
हमारी प्रिय बिटिया मुमुक्षु सिद्धि जैन जी के शरीर, मन और वचन में आज सेतुवाद और त्याग की अवस्था का आरम्भ हो रहा है। उन्होंने निश्चय कर लिया है कि वे संसारिक सुखों से अलग होकर आध्यात्मिक मार्ग पर पूर्ण समर्पण चाहती हैं। यह निश्चय केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
दीक्षा का अर्थ अधर्म से विमुख होना, अहिंसा का जीवन-प्रधान अनुसरण, अपरिग्रह की साधना और आत्म-निर्माण की यात्रा में अग्रसर होना है। यह वह क्षण है जब सांसारिक पहचान पीछे रह जाती है और आत्मा का स्वरुप स्पष्ट रूप से आत्म-प्रकाशित होता है।
जैन धर्म में दीक्षा का अर्थ है सांसारिक मोह-माया को त्यागकर, साधु जीवन अपनाना और आत्मा की शुद्धि के मार्ग पर चलना। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन है। दीक्षा लेने वाला व्यक्ति अपने सभी सांसारिक सुखों, रिश्तों और संपत्ति का त्याग कर, एक साधु या साध्वी के रूप में जीवन जीने का व्रत लेता है।
दीक्षा का यह पावन कदम केवल बाहर की वेशभूषा या संस्कार नहीं है; यह मन में आक्रमक इच्छाओं, लालसाओं और अहंकार को त्याग कर विरल शान्ति और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है। आज हम यह भी स्वीकार करते हैं कि समाज को सदैव इन महान आदर्शों की आवश्यकता रहती है, विशेषकर अहिंसा तथा सहिष्णुता के संदेश की, जो परिवारों में, शिक्षण संस्थानों में, कामकाजी जीवन में और सार्वजनिक जीवन में शान्ति का आधार बनते हैं।
आज का यह अवसर हमें याद दिलाता है कि जीवन का असली उद्देश्य केवल सांसारिक सुखों में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष प्राप्ति में है। दीक्षा लेने वाले साधु या साध्वी न केवल अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बनते हैं।
जैन दीक्षा समारोह में चारों ओर धर्म की गूंज, गुरुजनों का आशीर्वाद और श्रद्धालुओं का उत्साह इस बात का प्रतीक है कि यह केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं, बल्कि पूरी समाज की आध्यात्मिक उन्नति का पर्व है।
इस अवसर पर मैं एक सरल-सी कथा का उल्लेख करना चाहूंगा। एक बार एक साधक ने अपने गुरु से पूछा, ‘‘गुरुजी, मोक्ष तक पहुँचने का सबसे सादा मार्ग क्या है?’’ गुरु ने कहा, ‘‘एक दीपक ले कर अँधेरे में जलाओ। परंतु सबसे पहले उस दीपक के चारों ओर की वायु को शांत करो, तभी उसका प्रकाश दूर तक जायेगा।’’ संदर्भ यही है कि बाहरी कर्मों से पहले मन की अशान्ति को शुद्ध करना आवश्यक है। दीक्षा का यह अर्थ है कि अब मुमुक्षु सिद्धि जैन जी अपने ‘दीपक’ के चारों ओर के ‘विचलित वायु’ से मुक्त होकर अपने प्रकाश को और दूर तक फैलायेंगी।
सम्मानित जनों,
हमारी भारतीय संस्कृति, जो कि दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है, अपने ऋषि-मुनियों और संतों के ज्ञान, तपस्या और विचारों से आलोकित हुई है। इन संतों और ऋषियों ने न केवल हमारे आध्यात्मिक जीवन का मार्गदर्शन किया है, बल्कि हमें नैतिकता, विज्ञान, और समाज के विकास की दिशा भी दिखाई है।
भारत की प्राचीन संस्कृति में ऋषियों और मुनियों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ये वे लोग थे जिन्होंने अपना जीवन तप और ध्यान में व्यतीत किया और वेद, उपनिषद, पुराण जैसे महान ग्रंथों की रचना की। ऋषि वेदव्यास ने महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की, ऋषि वाल्मीकि ने रामायण लिखी, और पतंजलि ने योग के सूत्रों का विकास किया।
हमारे ऋषि-मुनियों ने न केवल धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि विज्ञान और गणित जैसे विषयों में भी अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। आर्यभट्ट, चरक और सुश्रुत जैसे महान विद्वान हमारे ही सांस्कृतिक धरोहर के भाग हैं। उन्होंने खगोल विज्ञान, चिकित्सा शास्त्र और गणित में अद्भुत कार्य किया।
मध्यकालीन भारत में संतों ने समाज सुधार का कार्य भी किया। संत कबीर, गुरु नानक, संत तुलसीदास और मीराबाई ने जातिवाद, अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने भक्ति आंदोलन के माध्यम से लोगों को प्रेम, एकता और मानवता का संदेश दिया।
आज, जब समाज में तनाव और संघर्ष बढ़ रहा है, तो हमारे ऋषि-मुनियों और संतों की शिक्षाएं और भी प्रासंगिक हो गई हैं। उनकी शिक्षाएं हमें शांति, अहिंसा, और संतुलित जीवन का मार्ग दिखाती हैं।
देवियों और सज्जनों,
जैन धर्म भारत की प्राचीन और महान धर्म परंपराओं में से एक है। यह धर्म ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’’ यानी अहिंसा को सर्वोच्च धर्म मानता है। जैन धर्म के संस्थापक भगवान ऋषभदेव को माना जाता है, लेकिन इसकी मुख्य परंपरा 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के माध्यम से प्रसिद्ध हुई।
हमारे देश की आत्मज्ञान की गौरवशाली परंपरा में भगवान महावीर का एक प्रमुख स्थान है। अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह के अपने दिव्य उपदेशों के माध्यम से उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक उत्थान का लक्ष्य रखा।
उस समय के सामाजिक मुद्दों से गहराई से जुड़े भगवान महावीर ने ऐसे समाधान प्रस्तुत किए जिनसे जनसाधारण की समस्याओं को कम करने में मदद मिली।
भगवान महावीर स्वामी ने हमें पंच महाव्रतों का मार्ग दिखाया-
अहिंसाः किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से चोट न पहुंचाना।
सत्यः सत्य बोलना और सत्य का पालन करना।
अस्तेयः दूसरों की चीज़ों को बिना अनुमति के न लेना।
ब्रह्मचर्यः अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना।
अपरिग्रहः आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।
भगवान महावीर के आध्यात्मिक पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, सदियों से समय-समय पर जैन आचार्यों की एक श्रृंखला सामने आई। उन्होंने मौलिक और अनंत मूल्यों के साथ भारतीय संस्कृति को पोषित करने में मदद की।
जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है। इसके लिए ध्यान, तप, और संयम को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। जैन धर्म न केवल हमें व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता सिखाता है, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति भी हमारी जिम्मेदारियों का बोध कराता है।
आज के समय में जब हिंसा और स्वार्थ चारों ओर व्याप्त है, जैन धर्म की शिक्षाएं हमें शांति और संतुलन की ओर ले जाने में मदद करती हैं।
यह धर्म हमें यह सिखाता है कि हमारे कर्म ही हमारे भविष्य को तय करते हैं, इसलिए अच्छे कर्म करें और हर प्राणी के प्रति दया का भाव रखें।
जैन धर्म की शिक्षाएं केवल जैन समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए उपयोगी हैं। अगर हम सभी जैन धर्म के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं, तो एक सुखी, शांतिपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण संभव है।
देवियों और सज्जनों,
कुछ समय पहले सहपत्नी पर्युषण महापर्व में दिनांक 26 अगस्त 2025 को भी मेरा यहां आना हुआ और गुरूदेव श्री जी, साध्वी श्री जी के दर्शन लाभ एवं जिनवाणी सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ क्योंकि मैं खुद जैन अनुयायी हूँ और गुरू भगवंतो के प्रति श्रद्धा एवं आदर की भावना मेरे मन में सदैव विद्यमान रहती है।
इसलिए, मैं वैरागन बिटिया सिद्धी जैन के लिए जिनशासन प्रभु के चरणों में यही मंगलकामना करता हूं कि यह बच्ची जिस संयमी जीवन को अंगीकार करने जा रही है उस पथ पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ती रहे और अपनी गुरूणी जी की आज्ञा का पालन करते हुए जैन धर्म की प्रभावना करती रहे।
मैं प्रार्थना करता हूं कि उनका यह आध्यात्मिक मार्ग उन्हें मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर करे। साथ ही, हम सभी को यह प्रेरणा मिले कि हम भी अपने जीवन में जैन धर्म के सिद्धांतों को अपनाकर, अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
धन्यवाद,
जय हिन्द!