SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF PRIZE DISTRIBUTION OF DR MOHINDER SINGH RANDHAWA FESTIVAL 2026 AT CHANDIGARH ON FEBRUARY 2, 2026.
- by Admin
- 2026-02-02 20:20
डॉ. एम एस रंधावा साहित्य एवं कला उत्सव के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 02.02.2026, सोमवार समयः शाम 5:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज मुझे अत्यन्त हर्ष एवं सौभाग्य का अनुभव हो रहा है कि मैं डॉ. मोहिंदर सिंह रंधावा जी की जीवन-यात्रा, उनके विचारों तथा उनकी अमूल्य देन को समर्पित ‘डॉ. महिंदर सिंह रंधावा साहित्य एवं कला उत्सव’ पर आप सभी के बीच उपस्थित हूं। मैं इस अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएँ देता हूँ।
मुझे यह जानकर अत्यंत हर्ष हो रहा है कि पंजाब के कला साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित संस्था पंजाब आर्ट्स काउंसिल, चंडीगढ़ द्वारा यह उत्सव 2 फरवरी से 7 फरवरी 2026 तक मनाया जा रहा है।
देवियो और सज्जनो,
पंजाब गुरुओं, पीरों, भगतों और वीर योद्धाओं की पावन धरती है, जो सिर्फ साहस और अध्यात्म के लिए ही नहीं, बल्कि साहित्य, कला, गीत, संगीत, नृत्य और रंगमंच की समृद्ध परंपरा के लिए भी विश्वभर में जानी जाती है। यहाँ की लोकधुनों में मिट्टी की सुगंध है, कथाओं में इतिहास की गूँज है, और रंगमंच में जनजीवन की सजीव अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि पंजाब की सांस्कृतिक पहचान सीमाओं से परे जाकर वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ती है।
इसी विरासत को सहेजने, संवारने और संस्थागत रूप देने का कार्य जिस दूरदर्शी व्यक्तित्व ने किया, वे थे 2 फ़रवरी 1909 को पंजाब के फिरोज़पुर जिले में पड़ते नगर ज़ीरा में जन्मे डॉ. एम.एस. रंधावा। उन्होंने केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं निभाए, बल्कि पंजाब की लोककलाओं, चित्रकला, संग्रहालयों, बागबानी और सांस्कृतिक संस्थाओं को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया। उनके प्रयासों से कला और संस्कृति केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहे, बल्कि समाज की आत्मा को पोषित करने वाली शक्ति बन गए। इसी दृष्टि के साथ उन्होंने पंजाब आर्ट्स काउंसिल जैसी प्रतिष्ठित संस्था की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने दशकों से कलाकारों, लेखकों और रंगकर्मियों को मंच प्रदान किया है।
डॉ. रंधावा का मानना था कि किसी समाज की पहचान उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों में बसती है। यही कारण है कि उन्होंने पहाड़ी चित्रकला, पंजाब की लोककला, फुलकारी, लोकगीत, और पारंपरिक स्थापत्य को दस्तावेजीकृत करने और संरक्षित करने का कार्य किया। आज जब हम भांगड़ा, गिद्धा, सूफी संगीत, किस्सा-गोई, लोकनाट्य ‘नौटंकी’ और आधुनिक पंजाबी थिएटर की समृद्ध परंपरा को देखते हैं, तो उसमें रंधावा जी जैसे व्यक्तित्वों की दूरदर्शिता की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
डॉ. रंधावा को हम विशेष रूप से उस मनोभूमि के संरक्षक के रूप में जानते हैं जिसने चंडीगढ़ को न केवल योजनाबद्ध शहर के रूप में परिभाषित किया, बल्कि उसे हरे-भरे, वृक्षारोपित और संस्कृति-संचित ‘‘सिटी ब्यूटीफुल’’ के रूप में संवारा।
वे 1955 के योजना-समितियों से जुड़े रहे और बाद में चंडीगढ़ के पहले चीफ कमिश्नर के रूप में (1966-1968) शहर के सौंदर्यीकरण, पौधारोपण और सार्वजनिक उद्यानों के विकास में अग्रणी रहे, जिनमें सेक्टर-16 का प्रसिद्ध रॉज़ गार्डन आज भी उनका स्थायी स्मारक है। उन्होंने चंडीगढ़ म्यूज़ियम और गवर्नमेंट म्यूज़ियम एवं आर्ट गैलरी जैसी संस्थाओं के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया कि शहरी नियोजन केवल सड़कों और इमारतों का मसला नहीं है, वह संस्कृति, कला, हरियाली और नागरिक जीवन के बीच एक नाज़ुक संतुलन स्थापित करने का कार्य है।
ऐसे महान पंजाबी सपूत की स्मृति में आयोजित डॉ. महेंद्र सिंह रंधावा उत्सव, जो उनके जन्ममाह फरवरी में आयोजित हो रहा है, निस्संदेह पंजाबी कला, साहित्य और संस्कृति की सेवा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा। यह उत्सव केवल स्मरण नहीं, बल्कि उस विचारधारा का पुनर्जागरण है, जो मानती है कि कला समाज को जोड़ती है, संवेदनशील बनाती है और भविष्य के लिए दिशा प्रदान करती है।
इस उत्सव के माध्यम से यदि लोक कलाकारों को मंच मिलेगा, युवा लेखकों को प्रेरणा मिलेगी, पारंपरिक कारीगरों को पहचान मिलेगी, और रंगमंच, संगीत व चित्रकला के क्षेत्र में नए प्रयोगों को प्रोत्साहन मिलेगा, तो यही डॉ. रंधावा को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यह उत्सव पंजाब की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा देगा और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर प्रदान करेगा।
देवियो और सज्जनो,
डॉ. महेंद्र सिंह रंधावा जी ने पंजाब की बंजर होती धरती में आशा के बीज बोए। डॉ. एम.एस. रंधावा जी केवल एक प्रशासक ही नहीं थे, वे एक गहन चिंतक और दार्शनिक भी थे। वे भली-भाँति जानते थे कि यदि किसी समाज का पेट खाली हो तो वह संघर्ष नहीं कर सकता, और यदि उसकी आत्मा खाली हो तो वह जीवित ही नहीं रह सकता।
इसी दूरदर्शी सोच के साथ उन्होंने एक ओर कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना कर किसानों के जीवन को सशक्त किया, तो दूसरी ओर चंडीगढ़ की आर्ट गैलरी और पंजाब के सांस्कृतिक भवनों के माध्यम से समाज की आत्मा को समृद्ध किया।
डॉ. रंधावा को पंजाब में ‘हरित क्रांति’ का जनक माना जाता है। उस ऐतिहासिक दौर में पंजाब ने भारत को भुखमरी से उबारने में निर्णायक भूमिका निभाई। वह हरित क्रांति 1.0 का समय था, जिसका केंद्रबिंदु अन्न और किसान थे। किंतु आज, लगभग आधी सदी बाद, हमें यह स्वीकार करना होगा कि वह मॉडल अपनी सीमाओं तक पहुँच चुका है। आज हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है।
आज की इस विचार-गोष्ठी को मैं हरित क्रांति 2.0 का नाम देना चाहूँगा। यदि 1.0 केवल किसान तक सीमित था, तो 2.0 पूरे ग्रामीण समाज और समूचे पंजाबी समुदाय के लिए है। आज पंजाब धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक “अन्नदाता” की पहचान खो रहा है। ऐसे में हमें “सृजनात्मक पंजाब” के एक नए और व्यापक दृष्टिकोण वाले ब्रांड की आवश्यकता है।
मेरे हाथ में पंजाब आर्ट्स काउंसिल द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘सोंह पंजाब दी’ है। इसे आज की इस विचार-चर्चा का आधार-दस्तावेज कहा जा सकता है, जिसका विषय है, “हरित क्रांति से सृजनात्मक क्रांति की ओर”। मुझे यह पुस्तक पंजाब की नई क्रांति का घोषणापत्र प्रतीत होती है।
दुनिया बदल चुकी है। आज शक्ति मशीनों के शोर में नहीं, बल्कि एक युवा के मोबाइल में कैद सृजनात्मक चमक में निहित है। सृजनात्मक अर्थव्यवस्था (Creative Economy) आज विश्व स्तर पर लगभग 2.25 ट्रिलियन डॉलर का व्यवसाय बन चुकी है। क्या हमने कभी इस पर विचार किया है कि पंजाबी संगीत, जिसे पूरी दुनिया में सुना जाता है, हमारी सबसे बड़ी ‘निर्यात पूंजी’ है?
आज हमारे पास कच्चा माल मिट्टी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पूंजी है। हमारी भाषा, हमारी लोकधुनें, वारिस शाह की ‘हीर’, शिव कुमार बटालवी की ‘लूना’, ये सभी ऐसे अमूल्य खजाने हैं, जिन्हें हमने अब तक आर्थिक दृष्टि से देखने का गंभीर प्रयास नहीं किया।
साथियो,
अक्सर कहा जाता है कि पंजाब का युवा बेरोज़गार है। मैं कहना चाहूँगा कि पंजाब की युवा शक्ति बेरोज़गार नहीं है, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था कल्पनाशून्य हो गई है।
आज हमारा युवा स्मार्टफोन के माध्यम से फ़िल्में बना रहा है, संगीत की रचना कर रहा है और डिजिटल स्टोरीटेलिंग में अपनी पहचान बना रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उन्हें केवल सरकारी नौकरियों की कतार में खड़ा करने के बजाय “रचनात्मक उद्यमी” बनने के लिए प्रेरित करें। जब किसी युवा का कैमरा एक फैक्ट्री बन जाएगा और उसकी कविता एक उद्योग का रूप ले लेगी, तब पंजाब को किसी भी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
मैं चाहता हूँ कि पंजाब आर्ट्स काउंसिल शीघ्र ही एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करे, जो “सृजनात्मक क्रांति” के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार करे। इस समिति का उद्देश्य केवल विचार-विमर्श तक सीमित न रहकर, सांस्कृतिक ऊर्जा को संरचित रूप में आर्थिक और सामाजिक शक्ति में परिवर्तित करना होना चाहिए।
सबसे पहले, समिति सृजनात्मक क्लस्टरों (Creative Clusters)की स्थापना पर कार्य करे। जिस प्रकार औद्योगिक पार्क विकसित किए जाते हैं, उसी प्रकार सांस्कृतिक पार्कों की अवधारणा को साकार किया जाए। अमृतसर में परफॉर्मिंग आर्ट्स डिस्ट्रिक्ट, लुधियाना में फैशन एवं डिज़ाइन हब, और मोहाली में डिजिटल कंटेंट वैली स्थापित कर सृजनात्मक गतिविधियों के लिए समर्पित पारिस्थितिकी तंत्र बनाया जा सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) की सुरक्षा होना चाहिए। कलाकारों, लेखकों और रचनाकारों को यह शिक्षित किया जाए कि वे अपनी कला, डिज़ाइन और सृजन का कॉपीराइट तथा ट्रेडमार्क कैसे सुनिश्चित करें। जब तक उनकी बौद्धिक संपदा सुरक्षित नहीं होगी, तब तक उनकी प्रतिभा का पूर्ण आर्थिक लाभ उन्हें नहीं मिल पाएगा।
तीसरा, यह कि समिति प्रवासी पंजाबी समुदाय के साथ सशक्त साझेदारी का ढाँचा विकसित करे। विश्वभर में फैले लाखों पंजाबी, सांस्कृतिक परियोजनाओं, जैसे फिल्मों, संग्रहालयों, आर्ट स्कूलों और सांस्कृतिक केंद्रों में निवेश कर सकते हैं। इस दिशा में संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता है।
चौथा, यह कि शिक्षा में परिवर्तन पर विशेष ध्यान दिया जाए। विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में क्रिएटिव राइटिंग, गेम डिज़ाइन, फिल्म निर्माण और कल्चरल मैनेजमेंट जैसे नए कोर्स आरंभ किए जाएँ, ताकि शिक्षा केवल पुस्तकीय न रहकर कौशल-आधारित और रोजगारोन्मुख बने।
अंतिम और पांचवां उद्देश्य यह कि एक क्रिएटिव स्टार्टअप फंड की व्यवस्था की जाए, जिसके माध्यम से युवा कलाकारों और रचनात्मक उद्यमियों को अपना स्टूडियो, मंच या व्यवसाय शुरू करने के लिए आवश्यक बीज पूंजी (Seed Capital) उपलब्ध कराई जा सके। यही पहल सृजनात्मक ऊर्जा को आत्मनिर्भरता में बदलने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
साथियो,
सृजनात्मक अर्थव्यवस्था केवल आय अर्जन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह चेतना की एक व्यापक क्रांति है। यह हमें उपभोग से सृजन की ओर, और निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर ले जाती है। जब कला, साहित्य, संगीत, डिज़ाइन, फिल्म, डिजिटल अभिव्यक्ति और लोकपरंपराएँ आर्थिक गतिविधि का आधार बनती हैं, तो समाज केवल कमाई नहीं करता, वह अपनी पहचान, अपनी संवेदनशीलता और अपनी बौद्धिक संपदा को भी सुदृढ़ करता है।
इस व्यवस्था में संसाधन खेत, कारखाने या मशीनें भर नहीं होते; सबसे बड़ा संसाधन मनुष्य की कल्पनाशक्ति, रचनात्मकता और सांस्कृतिक स्मृति होती है। जब कोई कलाकार चित्र बनाता है, जब कोई युवा मोबाइल से फिल्म रचता है, जब कोई महिला फुलकारी काढ़ती है, या जब कोई लोकगायक अपनी परंपरा को स्वर देता है, तब वह केवल कला नहीं रच रहा होता, बल्कि समाज की चेतना को जागृत कर रहा होता है।
सृजनात्मक अर्थव्यवस्था समाज को यह विश्वास दिलाती है कि विकास केवल भौतिक प्रगति से नहीं, बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक समृद्धि से भी होता है। यही कारण है कि यह अर्थव्यवस्था आय के साथ-साथ आत्मगौरव, सामाजिक जुड़ाव और सांस्कृतिक निरंतरता को भी जन्म देती है।
यह एक लो-कार्बन अर्थव्यवस्था है, जो पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सृजनात्मक गतिविधियाँ, जैसे हस्तशिल्प, लोककला, डिज़ाइन, संगीत, लेखन, रंगमंच, डिजिटल कंटेंट निर्माण, ये सभी भारी उद्योगों की तरह प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन नहीं करतीं और न ही बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलाती हैं। इनमें ऊर्जा की खपत कम होती है, कच्चे माल की आवश्यकता सीमित होती है, और उत्पादन की प्रक्रिया प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलती है।
इस प्रकार सृजनात्मक अर्थव्यवस्था न केवल सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से समृद्धि लाती है, बल्कि सतत विकास और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में भी एक सशक्त कदम सिद्ध हो सकती है।
अंत में मैं यह कहना चाहूँगा कि डॉ. एम.एस. रंधावा जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सेवा, अनुसंधान, सौंदर्य और संस्कृति, ये सभी मिलकर समाज को संगठित और संवेदनशील बनाते हैं। यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि असली विरासत वह है जो सक्रिय रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित की जाए, न कि केवल स्मारक बनकर रह जाए।
मैं आज इस अवसर पर उच्च शिक्षा, साहित्य, फोटोग्राफी, रंगमंच, संगीत और फिल्म कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए ‘पंजाब रत्न’ और ‘पंजाब गौरव’ सम्मान के लिए चुने गये सभी 6 विभूतियों को हार्दिक बधाई देता हूँ, जिन्हें 7 फरवरी को इस अयोजन के समापन समारोह दौरान सम्मानित किया जाएगा। आपकी सृजनात्मकता ही पंजाब की वास्तविक जी.डी.पी. है।
आइए, हम सब मिलकर डॉ. रंधावा के उस सपने को साकार करें, जिसमें पंजाब के खेत भी हरियाली से लहलहाते हों और पंजाबी मन भी सृजनात्मक रंगों से सराबोर हो।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज की यह विचार-गोष्ठी पंजाब के स्वर्णिम भविष्य का एक नया द्वार खोलेगी।
धन्यवाद,जय हिन्द!