SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF CLOSING CEREMONY OF SELF DEFENCE TRAINING WORKSHOP AT PUNJAB UNIVERSITY, CHANDIGARH ON FEBRUARY 3, 2026.
- by Admin
- 2026-02-03 13:40
‘आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यशाला’ के समापन समारोह के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 03.02.2026, मंगलवार समयः सुबह 11:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज डॉ. हरवंश सिंह जज इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज़ एंड हॉस्पिटल, पंजाब विश्वविद्यालय के इस ‘आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यशाला’ के समापन समारोह में आप सबके बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व की बात है।
विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही सदैव सपनों, आकांक्षाओं और नई संभावनाओं से भरी एक विशेष ऊर्जा का अनुभव होता है। लेकिन आज का अवसर और भी विशेष है, क्योंकि हम केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन नहीं कर रहे, बल्कि आप सभी के भीतर आत्मविश्वास और साहस के एक नए अध्याय की शुरुआत का उत्सव मना रहे हैं।
मुझे ज्ञात हुआ है कि 12 सितंबर 2025 से 1 अक्टूबर 2025 तक आयोजित इस 3 सप्ताह के आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यशाला में डॉ. हरवंश सिंह जज इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज़ एंड हॉस्पिटल के बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (बी.डी.एस.) के लगभग 60 विद्यार्थियों सहित 5 संकाय सदस्यों ने भाग लिया है।
यह हमारे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि पंजाब विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार इस प्रकार के आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो न केवल एक अभिनव पहल सिद्ध हुआ, बल्कि अत्यंत सफल भी रहा।
मैं समझता हूं कि तीन सप्ताह के इस अनुशासित प्रशिक्षण ने आप सभी को आत्मरक्षा की व्यावहारिक तकनीकों के साथ-साथ मानसिक सजगता, त्वरित निर्णय क्षमता और संकट की परिस्थितियों में संतुलित व्यवहार का महत्त्व भी सिखाया है।
मुझे विश्वास है कि यहाँ अर्जित ये कौशल आपके दैनिक जीवन, शैक्षणिक वातावरण और भविष्य के पेशेवर दायित्वों में आपके आत्मविश्वास को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।
साथियो,
हम अक्सर शिक्षा को केवल पुस्तकों, पाठ्यक्रम और परीक्षाओं तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि सच्ची शिक्षा वह है जो हमें जीवन की हर परिस्थिति के लिए तैयार करे। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास, आत्मविश्वास की वृद्धि और जीवन-कौशलों का निर्माण है।
इसी संदर्भ में आत्मरक्षा का प्रशिक्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह हमें सजग रहना, परिस्थिति को समझना, त्वरित निर्णय लेना और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं की सुरक्षा करना सिखाता है। आत्मरक्षा केवल शारीरिक तकनीकों का अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता, साहस और आत्मसम्मान की भावना को भी विकसित करती है।
जब शिक्षा में ऐसे जीवन उपयोगी कौशल सम्मिलित होते हैं, तब विद्यार्थी न केवल अकादमिक रूप से सक्षम बनते हैं, बल्कि आत्मनिर्भर, सतर्क और आत्मविश्वासी नागरिक के रूप में समाज में अपनी भूमिका निभाने के लिए भी पूर्णतः तैयार होते हैं।
आज के समय में आत्मरक्षा केवल एक कौशल नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है। आत्मरक्षा का अर्थ लड़ना नहीं है, यह स्वयं पर विश्वास रखना है, सजग रहना है, और निर्भय होकर जीवन जीना है।
जब किसी व्यक्ति के अंदर यह विश्वास आ जाता है कि “मैं सक्षम हूँ”, तो उसकी चाल, उसकी सोच और उसका व्यक्तित्व यह सब बदल जाता है।
मैं प्राचार्य डॉ. दीपक गुप्ता जी को बधाई देना चाहूँगा, जिन्होंने विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए इस प्रकार की पहल की। साथ ही कुलपति प्रोफेसर रेनू विग जी का भी अभिनंदन करता हूँ, जो विश्वविद्यालय में शिक्षा के साथ-साथ सुरक्षा और सशक्तिकरण को भी समान महत्व देती हैं।
मैं चंडीगढ़ पुलिस और विशेष रूप से इसकी ‘स्वयम’ (आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम) टीम का हृदय से धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने इस आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यशाला को अत्यंत पेशेवर, संवेदनशील और प्रभावी ढंग से संचालित किया। आप केवल कानून व्यवस्था ही नहीं संभालते, बल्कि समाज में विश्वास और सुरक्षा की भावना भी पैदा करते हैं। युवाओं को आत्मरक्षा सिखाना वास्तव में एक प्रेरणादायक सेवा है।
साथियो,
स्वरक्षा का अर्थ आक्रामकता नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में स्वयं को सुरक्षित रखने की क्षमता है। यह क्षमता व्यक्ति को भय से मुक्त करती है और उसे मानसिक रूप से सशक्त बनाती है। जब विद्यार्थी, विशेषकर हमारी बेटियाँ, स्वरक्षा में दक्ष होती हैं, तो समाज में सुरक्षा की संस्कृति और आत्मनिर्भरता का भाव स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
महात्मा गांधी जी ने कहा था, “शक्ति शारीरिक क्षमता से नहीं, अडिग संकल्प से आती है।” यही संकल्प इस कार्यशाला की आत्मा है। यहाँ आपने केवल तकनीकें नहीं सीखी हैं, बल्कि यह भी समझा है कि संकट की स्थिति में घबराहट के स्थान पर सजगता, भ्रम के स्थान पर त्वरित निर्णय, और असुरक्षा के स्थान पर आत्मविश्वास कितना महत्त्वपूर्ण होता है।
आपने जाना कि शरीर की भाषा, आसपास के वातावरण के प्रति जागरूकता, परिस्थिति का सही आकलन और समय पर प्रतिक्रिया, ये सभी तत्व मिलकर सुरक्षा का एक सशक्त कवच बनाते हैं। यही सीख आपको जीवन के हर क्षेत्र में अधिक सजग, सक्षम और निर्भीक बनाएगी।
प्रिय विद्यार्थियो,
आप स्वास्थ्य-सेवा के क्षेत्र से जुड़े हैं, जहाँ करुणा, धैर्य, संवेदनशीलता और सेवा-भाव आपके व्यक्तित्व की पहचान बनते हैं। रोगियों की पीड़ा को समझना, कठिन परिस्थितियों में शांत रहना और मानवता की सेवा करना आपके पेशे का मूल है।
किन्तु सेवा के इस पथ पर चलते हुए व्यक्तिगत सुरक्षा का महत्व भी उतना ही आवश्यक है। अस्पतालों, क्लिनिकों, फील्ड विज़िट्स या आपात स्थितियों में अक्सर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जहाँ त्वरित निर्णय, मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में आपकी सजगता और आत्मरक्षा की समझ आपको न केवल सुरक्षित रखती है, बल्कि आपको अपने कर्तव्य का निर्वहन अधिक आत्मविश्वास और स्थिरता के साथ करने में भी सक्षम बनाती है।
जब स्वास्थ्यकर्मी स्वयं को सुरक्षित और सशक्त महसूस करते हैं, तब वे अपने दायित्वों को और अधिक प्रभावी ढंग से निभा पाते हैं। इस प्रकार व्यक्तिगत सुरक्षा और पेशेवर सेवा-भाव एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी का कथन है, “उत्कृष्टता एक निरंतर प्रक्रिया है।” स्वरक्षा का यह प्रशिक्षण भी निरंतर अभ्यास से ही प्रभावी बनेगा। आज प्राप्त कौशल को आप नियमित अभ्यास, अनुशासन और जागरूकता से जीवन का हिस्सा बनाइए।
देवियो और सज्जनो,
मेरा मानना है कि कम उम्र से ही आत्मरक्षा कौशल सीखना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी अवस्था में सीखने की क्षमता, अनुशासन और आत्मविश्वास की मजबूत नींव रखी जाती है। बचपन और किशोर अवस्था के दौरान मस्तिष्क की न्यूरो-प्लास्टिसिटी अपने उच्चतम स्तर पर होती है, जिससे जटिल कौशलों को तेजी से सीखना और उन्हें लंबे समय तक स्मृति व व्यवहार का हिस्सा बनाना संभव होता है।
इसी कारण यदि इस आयु में स्वरक्षा, शारीरिक प्रशिक्षण और खेल-कौशल को जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए, तो यह व्यक्तित्व विकास में अत्यंत प्रभावी सिद्ध होता है।
इसलिए मैं समझता हूँ कि हमारे शिक्षण संस्थानों को शारीरिक गतिविधि वाले खेलों और आत्मरक्षा प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम तथा सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का नियमित और अनिवार्य अंग बनाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ शारीरिक रूप से सुदृढ़, मानसिक रूप से सजग और आत्मविश्वासी बन सकें।
कबड्डी, ताइक्वांडो, कराटे जैसे खेलों के साथ-साथ भारतीय पारंपरिक मार्शल आर्ट्स जैसे कलारीपयट्टू और गत्का, न केवल शारीरिक शक्ति, लचीलापन और संतुलन प्रदान करते हैं, बल्कि मानसिक दृढ़ता, सजगता और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करते हैं।
ये विधाएँ बच्चों और युवाओं को धैर्य, अनुशासन, आत्मनियंत्रण और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाती हैं। परिणामस्वरूप, वे न केवल संभावित खतरों से स्वयं की रक्षा करने में सक्षम होते हैं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे, संतुलित और साहसी व्यक्तित्व के रूप में समाज में अपनी सकारात्मक भूमिका भी निभा पाते हैं।
आज जब हम हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा निर्धारित विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम विकास को केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित न रखें, बल्कि मानव संसाधन के समग्र सशक्तिकरण पर भी समान रूप से ध्यान दें। विकसित भारत की परिकल्पना ऐसे नागरिकों पर आधारित है, जो शिक्षित होने के साथ-साथ आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी, अनुशासित और सजग भी हों।
इसी संदर्भ में स्वरक्षा, शारीरिक प्रशिक्षण, मानसिक दृढ़ता और जीवन-कौशलों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। जब हमारे युवा शारीरिक रूप से सक्षम, मानसिक रूप से सजग और नैतिक रूप से मजबूत होंगे, तभी वे राष्ट्र निर्माण की इस महायात्रा में प्रभावी योगदान दे पाएँगे। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब हर विद्यार्थी ज्ञान के साथ-साथ आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना से भी सशक्त होगा।
मैं विशेष रूप से इस पहल के लिए संस्थान प्रबंधन और प्रशिक्षकों को बधाई देता हूँ। शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक उत्कृष्टता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास है, जहाँ आत्मरक्षा, मानसिक दृढ़ता, टीमवर्क और नेतृत्व भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
यह कार्यशाला हमें यह भी सिखाती है कि सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है। परिसर की सुरक्षित संस्कृति, मित्रवत सहयोग, समय पर सहायता, और संवेदनशील व्यवहार, ये सब मिलकर एक सुरक्षित वातावरण बनाते हैं। "See Something, Say Something" अर्थात् “कुछ संदिग्ध दिखाई दे, तो तुरंत सूचित करें” एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा संदेश है, जो नागरिकों को सतर्क रहकर संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी अधिकारियों या पुलिस तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करता है। यह जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना प्रत्येक विद्यार्थी में विकसित होना अत्यंत आवश्यक है।
मेरे प्रिय विद्यार्थियो,
आज आप सभी ने केवल कुछ तकनीकें नहीं सीखी हैं, बल्कि आपने अपने भीतर साहस, आत्मबल और आत्मसम्मान को मजबूत किया है। यही आपके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बनेगी।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” आत्मरक्षा का लक्ष्य है, निर्भीकता। जब मन निर्भीक होता है, तो व्यक्तित्व में आत्मविश्वास झलकता है और वही आत्मविश्वास जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का आधार बनता है।
आप भविष्य के स्वास्थ्य सेवक हैं। आप लोगों के दर्द को दूर करेंगे, उनकी मुस्कान लौटाएंगे। लेकिन इसके साथ यह भी ज़रूरी है कि आप स्वयं सुरक्षित, मजबूत और आत्मविश्वासी रहें।
मुझे आशा है कि आज सीखी गई बातें केवल इस प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि आपके जीवन का हिस्सा बनेंगी, ताकि आप न केवल स्वयं की रक्षा कर सकें, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन सकें।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा समाज बनाएं जहाँ हर व्यक्ति, विशेषकर हमारी बेटियाँ और बहनें, सुरक्षित और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
इस सफल आयोजन के लिए मैं संस्थान, पुलिस विभाग और सभी प्रतिभागियों को हार्दिक बधाई देता हूँ।
आप सभी का भविष्य उज्ज्वल, सुरक्षित और सफल हो, यही मेरी शुभकामनाएँ हैं।
धन्यवाद,
जय हिन्द!