SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF TIMES OF INDIA SCHOOL LEADERSHIP SUMMIT AT MOHALI ON JANUARY 30, 2026.

टाइम्स ऑफ इंडिया के ‘स्कूल लीडरशिप समिट’ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 30.01.2026, शुक्रवारसमयः सुबह 11:30 बजेस्थानः चंडीगढ़

 

नमस्कार!

द टाइम्स ऑफ इंडिया और नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलांयस के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस ‘स्कूल लीडरशिप समिट’ को संबोधित करना मेरे लिए गौरव का विषय है। यह मंच भारत के भविष्य से सीधे जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय, ‘विद्यालयी शिक्षा’ पर केंद्रित है। 

यह विशेष रूप से उन बजट प्राइवेट स्कूलों की भूमिका पर प्रकाश डालता है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद युवा मनों को गढ़ने, शिक्षा की पहुँच को व्यापक बनाने तथा समाज के हर वर्ग तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाकर एक सशक्त राष्ट्र की नींव को मजबूत करने में सराहनीय योगदान दे रहे हैं।

सबसे पहले, मैं इस दूरदर्शी पहल के लिए द टाइम्स ऑफ इंडिया को हार्दिक बधाई देना चाहता हूँ। 185 वर्षों से अधिक की गौरवशाली विरासत वाला यह समाचार पत्र केवल घटनाओं का दस्तावेज भर नहीं रहा है, बल्कि इसने जनमत को दिशा दी है, विमर्श को प्रोत्साहित किया है और उन विचारों को निरंतर स्वर दिया है, जिन्होंने भारत के सामाजिक और बौद्धिक विकास को आकार दिया है। विद्यालयी शिक्षा और नेतृत्व को राष्ट्रीय संवाद के केंद्र में लाकर द टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक बार फिर राष्ट्र-निर्माण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ किया है।

मैं नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलांयस (निसा) के अग्रणी प्रयासों के लिए भी बधाई देता हूँ। वर्ष 2011 में स्थापित निसा आज देश भर के 3 लाख से अधिक बजट प्राइवेट स्कूलों की सशक्त आवाज बनकर उभरी है। ये विद्यालय अनेक चुनौतियों के बीच कार्य करते हुए भी लाखों परिवारों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं, जो अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखते हैं। विद्यालयों को सहयोग देकर, शिक्षकों को सशक्त बनाकर और नीति संवाद में सक्रिय भागीदारी निभाकर निसा भारत की शिक्षा व्यवस्था की नींव को मजबूत कर रही है।

देवियो और सज्जनो,

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। इतिहास साक्षी है कि शिक्षा परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली माध्यम रही है। यह केवल करियर नहीं, चरित्र का निर्माण करती है; केवल आजीविका नहीं, जीवन को दिशा देती है। विशेष रूप से विद्यालयी शिक्षा वह आधार है जहाँ मूल्यों का विकास होता है, जिज्ञासा जागृत होती है और आत्मविश्वास की नींव पड़ती है। कक्षाओं में ही बच्चे प्रश्न करना, कल्पना करना, सहयोग करना और संवेदना रखना सीखते हैं। इसलिए मजबूता विद्यालय व्यवस्था कोई नीतिगत विकल्प भर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।

इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में हमारे शिक्षकों और विद्यालयों का नेतृत्व है। वे सच्चे राष्ट्र-निर्माता हैं, जिनका प्रभाव पाठ्य पुस्तकों और परीक्षाओं से कहीं आगे तक जाता है। उनकी निष्ठा और समर्पण से ऐसी पीढ़ियाँ आकार लेती हैं जो आत्मनिर्भर, नैतिक और सामाजिक रूप से सजग होती हैं। आज भारतीय प्रतिभा को वैश्विक मंच पर जो पहचान मिल रही है, उसके पीछे देश के विद्यालयों में हो रहा सतत और निस्वार्थ परिश्रम ही आधार है।

किसी भी शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक गुणवत्ता उसके भवनों या पाठ्यक्रमों से नहीं, बल्कि उसके शिक्षकों की दृष्टि, समर्पण और प्रतिबद्धता से निर्धारित होती है। 

महात्मा गांधी जी कहा करते थे, “एक अच्छे शिक्षक की छाप बच्चे के मन पर जीवनभर रहती है।”

मैं समझता हूं कि शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देते, वे जीवन जीने की कला सिखाते हैं, सोचने का तरीका गढ़ते हैं, और व्यक्तित्व को आकार देते हैं।

वे बच्चों में छिपी क्षमताओं को पहचानने वाले प्रथम मार्गदर्शक होते हैं। वे वह शक्ति हैं जो एक साधारण बच्चे के अंदर छिपे असाधारण को बाहर लाती है। वे वह प्रकाश हैं जो अनिश्चितताओं के अंधकार में रास्ता दिखाता है। शिक्षक ही बच्चे को सही और गलत का विवेक देना सिखाते हैं; वे उसे सपने देखने और उन सपनों को पूरे साहस और आत्मविश्वास के साथ पूरा करने का साहस देते हैं।

एक पुस्तक ज्ञान देती है, परंतु एक शिक्षक उस ज्ञान का अर्थ, अनुभव, और उपयोग समझाता है। वे हर बच्चे को यह विश्वास दिलाते हैं कि “तुम कर सकते हो”, और यह छोटा-सा वाक्य जीवन की दिशा बदल देता है।

शिक्षक ही बच्चों में अनुशासन, संवेदनशीलता, कर्तव्यभाव, धैर्य, और चरित्र की नींव रखते हैं। उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को न केवल सफल बनाती है, बल्कि अच्छा इंसान भी बनाती है।

सच कहा जाए तो, शिक्षक कक्षाओं में नहीं, हृदयों में अपना प्रभाव छोड़ते हैं। और जहाँ शिक्षक का प्रभाव होता है, वहाँ भविष्य उज्ज्वल होना तय है।

देवियो और सज्जनो,

विद्यालय वह पवित्र स्थान है जहाँ बच्चों के सपनों की पहली नींव रखी जाती है और जहाँ से उनकी उड़ान आरंभ होती है। विद्यालय केवल ईंट और पत्थरों का भवन नहीं, यह हमारे भविष्य का आधार है।

प्राचीन भारत की गुरुकुल प्रथा अपनी विशिष्टता में अद्वितीय थी, ऐसी शिक्षा व्यवस्था दुनिया के किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिलती। गुरुकुल में विद्यार्थी एक गुरु के मार्गदर्शन में शिक्षा ग्रहण करते थे। 

वे केवल सैद्धांतिक या नैतिक शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहते थे, बल्कि खेती, पशुपालन, हथकरघा, युद्धकला, धनुर्विद्या, और कला जैसे व्यावहारिक ज्ञान का भी अध्ययन करते थे। इसका उद्देश्य था कि विद्यार्थी हर प्रकार से जीवन के लिए तैयार हो सकें।

इससे यह पता चलता है कि हमारी गुरूकुल प्रथा, जो अंग्रेज़ी शासन के प्रभाव से धीरे-धीरे समाप्त हो गई, कैसे बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान भी प्रदान करती थी।

आज के समय में जब शिक्षा आधुनिक तकनीक पर आधारित है, गुरुकुल पद्धति का महत्व और भी अधिक हो गया है। आने वाले समय में छात्रों की कौशल क्षमता ही हमारे बच्चों की मदद करने वाली है और यही उनका विकास सुनिश्चित करेगी।

इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे दूरदर्शी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने देश के भविष्य को गढ़ने में विद्यालयी शिक्षा की केंद्रीय भूमिका को भली-भांति पहचानते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू की गई है। इस नीति के माध्यम से विद्यार्थियों को कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार, उद्यमिता और तकनीकी समझ जैसे क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जा रहा है।

यह नीति रटंत विद्या से आगे बढ़कर वैचारिक समझ, आलोचनात्मक चिंतन और रचनात्मकता पर बल देती है। आधारभूत साक्षरता, समग्र विकास, बहुभाषिकता, अनुभवात्मक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को इसमें विशेष महत्व दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह नीति विद्यालयों को भविष्य के नागरिक निर्माण की सबसे निर्णायक भूमिका के रूप में स्वीकार करती है।

हालाँकि, नीतियाँ तभी सार्थक होती हैं जब वे व्यवहार में उतरती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सफलता ढाँचों से अधिक उन शिक्षकों पर निर्भर है, जो इसकी भावना को कक्षा में जीवंत बनाते हैं। सहयोग, श्रेष्ठ अभ्यासों का आदान-प्रदान, निरंतर शिक्षक प्रशिक्षण और विद्यालय स्तर पर नवाचार इस नीति को काग़ज़ से आगे ले जाकर प्रत्येक बच्चे का जीवंत अनुभव बनाने में सहायक होंगे।

देवियो और सज्जनो,

हाल ही में शिक्षा मंत्रालय ने भारत में स्कूली शिक्षा Unified District Information System for Education Plus (UDISE+) 2024-25 पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी जारी की है जिसने भारत के विद्यालयी शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक प्रगति को उजागर किया है। पहली बार कुल शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ से अधिक पहुँच गई है, जिससे छात्र-शिक्षक अनुपात राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुशंसित मान के भीतर सुधरते हुए Foundational स्तर पर 10, Preparatory पर 13, Middle पर 17 और Secondary स्तर पर 21 पर आया है।

रिपोर्ट में ड्रॉपआउट दरों में भी उल्लेखनीय कमी पाई गई है, जहां Preparatory पर 3.7 प्रतिशत से 2.3 प्रतिशत, Middle पर 5.2 प्रतिशत से 3.5 प्रतिशत तथा Secondary स्तर पर 10.9 प्रतिशत से 8.2 प्रतिशत तक की कमी आई है, जो शिक्षा में निरंतरता के सुधार का संकेत है। 

इसी तरह Retention Rateभी हर स्तर पर बेहतर हुआ है जो अब  Foundational स्तर पर 98.0 प्रतिशत से 98.9 प्रतिशत, Preparatory पर 85.4 प्रतिशत से 92.4 प्रतिशत, Middle पर 78.0 प्रतिशत से 82.8 प्रतिशत और Secondary पर 45.6 प्रतिशत से बढ़कर 47.2 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो बेहतर शिक्षा-प्रणाली और सकारात्मक सीखने-जोड़ प्रदर्शित करती हैं।

इसके अलावा, शिक्षा की पहुंच और समावेशन के संकेत के रूप में Gross Enrolment Ratio (GER) में भी वृद्धि देखी गई है, जो अब मिडल स्तर पर 89.5 प्रतिशत से 90.3 प्रतिशत और सेकेंडरी स्तर पर 66.5 प्रतिशत से 68.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इस प्रगति से स्पष्ट होता है कि अधिक विद्यार्थी उच्च कक्षाओं तक पहुँच रहे हैं और शिक्षा में उनकी सहभागिता सुदृढ़ हो रही है।

साथ ही, डिजिटल और भौतिक बुनियादी ढांचे में हमने उल्लेखनीय प्रगति की है। तकनीक-समर्थित शिक्षण का विस्तार करते हुए, कंप्यूटर तक पहुँच वाले विद्यालय 57.2 प्रतिशत से बढ़कर 64.7 प्रतिशत और इंटरनेट सुविधा वाले विद्यालय 53.9 प्रतिशत से बढ़कर 63.5 प्रतिशत हो गए हैं। यह आधुनिक और भविष्योन्मुखी शिक्षा की दिशा में हमारे बढ़ते कदमों का प्रमाण है।

लैंगिक समानता के मोर्चे पर भी सुखद परिणाम सामने आए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में महिला सशक्तीकरण बढ़ा है, जहाँ महिला शिक्षकों का अनुपात अब 54.2 प्रतिशत हो गया है। साथ ही, छात्राओं का नामांकन बढ़कर 48.3 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जो एक न्यायसंगत और शिक्षित समाज के निर्माण की दिशा में मील का पत्थर है।

ये सभी आँकड़े शिक्षण-बल की मजबूती, संसाधन विस्तार, डिजिटल पहुँच और समावेशी नीतियों की दिशा में ठोस प्रगति को उजागर करते हैं तथा विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक संकेत देते हैं।

देवियो और सज्जनो,

आज का विद्यालय केवल ब्लैकबोर्ड और पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्लेटफॉर्म, वर्चुअल कक्षाएँ और डेटा-संचालित शिक्षण ने सीखने की परिभाषा ही बदल दी है। 

तकनीक ने अवसर तो खोले हैं, पर साथ ही इसने डिजिटल विभाजन, मानसिक स्वास्थ्य, मूल्य-संकट और मानवीय संवेदनाओं का क्षरण जैसी चुनौतियाँ भी दी हैं।

आज हमें केवल साक्षर युवा नहीं, बल्कि ऐसे नवाचारी नागरिक चाहिए जो आलोचनात्मक चिंतन कर सकें, समस्याओं का समाधान खोज सकें और तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल सकें। 

भविष्य के विद्यालय वे होंगे जहाँ ए.आई. और डिजिटल लर्निंग जैसी आधुनिक तकनीकों का संतुलित उपयोग मानवीय मूल्यों के साथ किया जाए; जहाँ कौशल विकास को किताबी ज्ञान के समान ही महत्व दिया जाए; और जहाँ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक सशक्तिकरण तथा सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाए। ऐसे ही विद्यालय आने वाले भारत की दिशा और दशा निर्धारित करेंगे।

ऐसे समय में विद्यालय नेतृत्व की भूमिका केवल प्रशासक की नहीं, बल्कि दूरदर्शी पथ-प्रदर्शक की है। हमें ऐसे शिक्षण परिवेश बनाने होंगे जहाँ तकनीक साधन बने, साध्य नहीं; जहाँ नवाचार हो, पर मानवीय संवेदना के साथ; जहाँ प्रतिस्पर्धा हो, पर करुणा के साथ; और जहाँ उत्कृष्टता हो, पर नैतिकता के आधार पर।

स्कूल लीडरशिप समिट इसी उद्देश्य को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो नीति और व्यवहार के बीच सेतु का निर्माण करता है, श्रेष्ठ अनुभवों और नवाचारों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है तथा भविष्य के लिए तैयार, सशक्त और संवेदनशील शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण की आधारशिला रखता है।

देवियो और सज्जनो,

भारत आज न केवल एक प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक धरोहर वाला देश है, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टि से भी विश्व के अग्रणी देशों में अपना स्थान बना चुका है। 

हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हमारे योगदान की पहचान हो रही है, और वैश्विक मंच पर भारत की आवाज़ और प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। 

हम शिक्षा, नवाचार, स्टार्टअप्स, हरित ऊर्जा और डिजिटल क्षेत्रों में नए मानक स्थापित कर रहे हैं। यही कारण है कि आज भारत विश्व के शीर्ष देशों में अपनी शक्ति, प्रतिभा और नेतृत्व के लिए सम्मानित है।

आज जब भारत विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब विद्यालय उस यात्रा की सबसे मजबूत नींव हैं। सशक्त संस्थान, प्रबुद्ध नेतृत्व और नैतिक शिक्षा, यही विकसित भारत की पहचान होगी। यह तभी संभव है जब हमारे विद्यालय परिवर्तन के केंद्र बनें और हमारे स्कूल लीडर्स परिवर्तन के अग्रदूत।

विद्यालयी नेतृत्व और शैक्षिक सुधारों पर विचार करते हुए हमें यह संकल्प दोहराना होगा कि हम केवल अकादमिक रूप से सक्षम नहीं, बल्कि नैतिक रूप से मज़बूत और सामाजिक रूप से जागरूक नागरिक तैयार करें। जब हम विद्यालयी शिक्षा को सशक्त बनाते हैं, तो हम राष्ट्र की जड़ों को मजबूत करते हैं। विद्यालयों में किया गया निवेश वास्तव में भारत के भविष्य यानी उसकी अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और आत्मा में किया गया निवेश है।

अंत में, इस महत्वपूर्ण संवाद को मंच देने के लिए मैं एक बार फिर से द टाइम्स ऑफ इंडिया और नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलांयस को बधाई देता हूँ तथा इस समिट की सफलता की कामना करता हूँ। 

आपके प्रयास एक आत्मविश्वासी, करुणामय और दूरदर्शी भारत के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

धन्यवाद,

जय हिन्द!