SPEECH OF HON’BLE GOVERNOR PUNJAB AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF SRI GURU RAVIDAS PRAKASH UTSAV CELEBRATION AT CHANDIGARH ON FEBRUARY 1, 2026.

श्री गुरू रविदास जी के 649वें प्रकाश पर्व के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 01.02.2026,  रविवारसमयः सुबह 10:00 बजेस्थानः चंडीगढ़

 

पूज्य संत-महात्माओं, विद्वानजनों, एवं उपस्थित श्रद्धालुजनों,

आज श्री गुरु रविदास जी के 649वें प्रकाश पर्व के इस पावन अवसर पर श्री गुरु रविदास गुरुद्वारा, सेक्टर-30ए, चंडीगढ़ में उपस्थित होकर मैं अत्यंत सौभाग्य एवं आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ। इस महापर्व पर मैं सबको हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और गुरु जी की अपार कृपा से आप सभी को शुभ, शांत और समृद्ध जीवन की कामना करता हूँ।

श्री गुरु रविदास जी का जन्म काशी में 1377 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के गांव सीरगोवर्धन काशी में पिता संतोष दास तथा माता कलसा देवी के घर पर हुआ था। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी था। उनका जन्म चमार जाति में हुआ था, जिसे परंपरागत रूप से निम्न और अछूत जाति माना जाता था। 

श्री गुरु रविदास जी भारत में 15वीं शताब्दी के एक महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाजसुधारक और ईश्वर के अनुयायी थे। वे निर्गुण सम्प्रदाय अर्थात् संत परम्परा में एक चमकते नेतृत्वकर्ता और प्रसिद्ध व्यक्ति थे। वे जूते बनाने का काम करते थे। उस समय जातिवाद चरम पर था। भारतीय समाज में एक धारणा थी कि निम्न जातियों को शैक्षिक, आर्थिक और धार्मिक रूप से खुद को विकसित करने का कोई अधिकार नहीं था। उनका जीवन उच्च जातियों की दया पर निर्भर था। 

श्री गुरु रविदास जी ने मानवता में समानता की स्थापना के लिए संघर्ष किया। उन्होंने गरीबों, दलितों और निचली जातियों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया। उन्होंने जीवन भर सामाजिक समानता के लिए काम किया। उनकी रची वाणी तथा भजन पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं। उन्होंने जात-पात का घोर खंडन किया और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। रविदास जी ने कहा था-

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,

नर कूं नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।

रैदास मनुष न जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

श्री गुरु रविदास जी कहते हैं कि इंसान को जातियों में बांट दिया गया और इन जातियों के विभाजन से इंसान अलग अलग बंट जाता है। इंसान खत्म हो जाते हैं लेकिन यह जाति खत्म नहीं होती है। इसलिए गुरु रविदास जी कहते हैं जब तक ये जाति खत्म नहीं होगी तब तक इंसान एक दूसरे से जुड़ नहीं सकते। ऊंच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।

उन्होंने हाथों से काम करने पर जोर दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे। उन्होंने हर धर्म में व्याप्त कुरीतियों और अज्ञानता के लिए आम जनमानस को धार्मिक अंधविश्वास और आडंबर से दूर रहने का संदेश दिया और कहा “मन चंगा तो कठौती में गंगा” यानी अगर मन पवित्र है तो गंगा में स्नान की आवश्यकता नहीं है। मतलब कि नियत अच्छी हो तो वह कार्य गंगा की तरह पवित्र है। 

मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत सज्जन रहते थे। प्रारंभ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे। दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव था। रविदास जी ने अपनी शांत और प्रेमपूर्ण वाणी के जरिए जीवन के सभी मसलों का समाधान प्रस्तुत किया। उन्होंने धर्म और जीवन के बीच संघर्ष करने वालों को समझाया कि जीवन का उद्देश्य धर्मानुसार जीना नहीं होता, बल्कि इस जगत में जीवन का उद्देश्य सभी का कल्याण होता है। उन्होंने जाति-व्यवस्था के खिलाफ अपने भक्तों को उत्तम शिक्षा और अवसरों का उपयोग करने का संदेश दिया।

उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ विनम्रता तथा शिष्टता का व्यवहार करने पर बल दिया। अभिमान त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है। गुरु रविदास जी की वाणी में भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम की शिक्षा मिलती है।

रविदास जी कहते थे-

ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न।

छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।

वे समाज सुधारक, संत एवं गुरु थे। इन्हें संत शिरोमणि गुरु की उपाधि दी गई है। आज भी गुरु रविदास जी के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इनकी रची वाणी प्रमाणित करती है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। 

साथियों,

भारत का इतिहास ऐसा रहा है कि जब भी देश को जरूरत महसूस हुई है, तब कोई न कोई संत, ऋषि या महान विभूति अपने अद्वितीय उपदेशों और कर्मों से हमारे समाज को दिशा प्रदान करते हैं।

रविदास जी भी उन संतों में से एक थे, जिन्होंने भक्ति आंदोलन के माध्यम से कमजोर और विभाजित हो चुके भारत को नई ऊर्जा और आशा दी। उन्होंने समाज को आज़ादी के महत्व के साथ-साथ सामाजिक विभाजन को मिटाने का संदेश दिया, और ऊंच-नीच, छुआछूत, तथा भेदभाव के खिलाफ सशक्त आवाज उठाई।

संत रविदास ऐसे संत हैं जिन्हें किसी मत, मजहब, पंथ या विचारधारा की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता। वे सबके हैं, और सब उनके हैं। जगद्गुरु रामानन्द के शिष्य के रूप में उन्हें वैष्णव समाज अपना गुरु मानता है, जबकि सिख भाई-बहन भी उन्हें अत्यंत आदर की दृष्टि से देखते हैं। 

मुझे गर्व है कि आज हमारा देश रविदास जी के विचारों को आगे बढ़ा रहा है। देश में लागू की जा रही विभिन्न योजनाएं सभी वर्गों के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। 

‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ का मंत्र आज 140 करोड़ देशवासियों से जुड़ने का प्रतीक बन चुका है। यह संदेश हमें एकजुट होकर आगे बढ़ने और समाज में समरसता, समानता एवं विकास की नई दिशाओं को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

देवियो और सज्जनो,

हमारे भारत की संस्कृति और परंपरा सदियों से विश्व को प्रेरित करती आई हैं और इसने हमेशा यह सिद्ध किया है कि असली विकास केवल भौतिक साधनों से नहीं, बल्कि आत्मिक जागरूकता और नैतिक मूल्यों के साथ संभव है। 

जब हम विकसित भारत 2047 का सपना देखते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि इस विकास की नींव हमारे आंतरिक मूल्यों में निहित है। आध्यात्मिकता हमें सिखाती है कि प्रेम, सहानुभूति, और एकता के साथ ही हम अपने अंदर की शांति को प्राप्त कर सकते हैं और समाज में समरसता का संचार कर सकते हैं।

इसलिए, मेरा आप सभी से आग्रह है कि अपने जीवन में आध्यात्मिकता को महत्व दें और इसे अपने दैनिक कार्यों में आत्मसात करें। युवाओं से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक, हम सभी को अपने भीतर के प्रकाश को जगाना होगा और एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहाँ नैतिकता, सहिष्णुता और सद्भावना की भावना प्रबल हो। जब हम अपने आंतरिक विकास पर ध्यान देंगे, तभी हम बाहरी दुनिया में भी एक संतुलित और समृद्ध राष्ट्र की संरचना कर पाएंगे।

देवियो और सज्जनो,

आज देश इतने बड़े-बड़े काम इसलिए कर पा रहा है क्योंकि आज दलित, वंचित, पिछड़ा और गरीब के लिए देश की नीयत साफ है। संतों की वाणी हर युग में हमें रास्ता भी दिखाती हैं, और हमें सावधान भी करती हैं।

रविदास जी कहते थे-

जात पात के फेर महि, उरझि रहई सब लोग।

मानुष्ता कुं खात हई, रैदास जात कर रोग।।

अर्थात्, ज़्यादातर लोग जात-पात के भेद में उलझे रहते हैं, उलझाते रहते हैं। जात-पात का यही रोग मानवता का नुकसान करता है। यानी, जात-पात के नाम पर जब कोई किसी के साथ भेदभाव करता है, तो वो मानवता का नुकसान करता है। 

इसलिए, हमें गुरू रविदास जी के उपदेशों को आत्मसात करते हुए एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहाँ जात-पात, भेदभाव और विभाजन का कोई स्थान न हो। गुरू रविदास जी ने हमें यह शिक्षा दी कि हम सभी एक समान हैं और हमारी असली पहचान हमारी मानवता में निहित है। 

हमें यह याद रखना चाहिए कि जब हम जात-पात के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करते हैं, तो हम स्वयं अपने समाज की उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसीलिए, आइए हम गुरू रविदास जी के उपदेशों पर चलकर एक समावेशी, एकजुट और मानवता पर आधारित समाज की ओर अग्रसर हों, जहाँ सभी लोगों में भाईचारे और सह-अस्तित्व की भावना प्रबल हो। 

इसके अलावा गुरू रविदास जी ने कहा हैः

जाति-पाति पूछे नहीं कोई।

हरि को भजे सो हरि का होई।।

यह श्लोक गुरु रविदास जी के उपदेश का सार है, जो स्पष्ट रूप से बताता है कि ईश्वर के दरबार में जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं होता। 

गुरु रविदास जी कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से हरि की भक्ति करता है, तो वह ईश्वर का हो जाता है, चाहे उसकी जाति, पंथ या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो।

उनका यह संदेश हमें यह प्रेरणा देता है कि हमें बाहरी रूप-रंग, जाति या पृष्ठभूमि के आधार पर किसी का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। असली मूल्यांकन उस व्यक्ति के हृदय में बसे प्रेम, भक्ति और नैतिकता से होना चाहिए। 

श्री गुरु रवि दास जी के शिक्षण ने सामाजिक समरसता और सह-अस्तित्व की भावना को और प्रबल किया है। उनका संदेश हमें यह सिखाता है कि हम सभी, चाहे हमारी जाति, धर्म या पृष्ठभूमि कुछ भी हो, एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और सम्मान के साथ जीवन यापन करें। 

श्री गुरु रविदास जी के उपदेशों से हमें यह सीख मिलती है कि कैसे हम अपने भीतर के तनाव और मतभेदों को दूर करके एक सकारात्मक, सहयोगात्मक और समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं।

आज जब हम उनके 649वें जन्मदिवस का उत्सव मना रहे हैं, तो यह समय है कि हम उनके आदर्शों को अपनाकर अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सुधार लाएँ।

मैं, इस शुभ अवसर पर सभी उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ। आइए, हम सब मिलकर श्री गुरु रवि दास जी के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करें और एक ऐसे समाज का निर्माण करें, जहाँ शांति, समानता और भाईचारे की भावना सर्वव्यापी हो।

धन्यवाद,

जय हिन्द!