speech of punjab governor and administrator, ut chandigarh, shri gulab chand kataria on the occasion of 1st chandigarh sangeet natak akademy award ceremony at chandigarh on february 26, 2026.
- by Admin
- 2026-02-26 19:20
चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार समारोह के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 26.02.2026, गुरूवार समयः शाम 4:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज ‘प्रथम चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार समारोह’ के इस ऐतिहासिक अवसर पर आप सभी के समक्ष उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है। आज हम यहाँ केवल कुछ कलाकारों को सम्मनित करने के लिए एकत्र नहीं हुए हैं, बल्कि हम अपने समाज की मूल आत्मा का उत्सव मना रहे हैं।
ऐसे अवसर मात्र औपचारिक नहीं होते; ये चिंतन, मान्यता और प्रेरणा के क्षण होते हैं। हम यहाँ अपने-अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन, समर्पण और असाधारण योगदान के लिए व्यक्तियों और संस्थानों को सम्मानित करने हेतु एकत्रित हुए हैं।
आज के इस समारोह में संगीत, नृत्य, रंगमंच, कला-प्रचार और आजीवन उपलब्धि की श्रेणियों में कुल 11 विशिष्ट कलाकारों एवं संस्थाओं को सम्मानित किया जा रहा है। इनमें संगीत, नृत्य और रंगमंच की श्रेणियों में तीन-तीन, जबकि कला-प्रचार और आजीवन उपलब्धि की श्रेणी में एक-एक पुरस्कार शामिल हैं। प्रत्येक पुरस्कार के साथ 51 हजार रूपये की नकद राशि प्रदान की जा रही है, जो उनके योगदान की मान्यता और भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
देवियो और सज्जनो,
जब दुनिया चंडीगढ़ के बारे में सोचती है, तो उनके मन में ली कार्बूज़ियर की शानदार वास्तुकला आती है। लोग हमारे बेहतरीन शहरी नियोजन, कैपिटल कॉम्प्लेक्स, शांत सुखना झील, यहां की हरियाली और हमारी सुव्यवस्थित सड़कों की मिसाल देते हैं। आधुनिक वास्तुकला की विजय के रूप में चंडीगढ़ को वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है।
लेकिन, ईंट, पत्थर और कंक्रीट केवल एक शहर की ‘देह’ (शरीर) का निर्माण करते हैं। यह तो वह संगीत है जो हमारे सभागारों में गूंजता है, नर्तकों के कदम हैं, और रंगमंच के कलाकारों की जीवंत आवाजें हैं, जो किसी शहर को उसकी ‘आत्मा’ प्रदान करते हैं। कला के बिना, एक शहर केवल एक बस्ती है; कला के साथ, यह एक सभ्यता बन जाता है। इस आत्मा को पोषित करने के लिए, चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी हमारी गहरी प्रशंसा की पात्र है।
आज जब हम इस प्रथम संस्थागत पुरस्कार का उत्सव मना रहे हैं, तो चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी (CSNA) की प्रेरक यात्रा पर दृष्टि डालना भी अत्यंत आवश्यक है। वर्ष 1980 में स्थापित यह अकादमी संगीत, नृत्य और नाटक जैसी प्रदर्शनकारी कलाओं के संवर्धन में निरंतर सक्रिय रही है और ट्राइसिटी की सांस्कृतिक धड़कन के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
दशकों से, इस अकादमी ने एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सेतु के रूप में कार्य किया है। इसने संगीत और नृत्य के शास्त्रीय घरानों को आधुनिक और कला-प्रेमी दर्शकों से जोड़ा है। प्रतिष्ठित ‘टैगोर थियेटर’ में जीवंत नाट्य उत्सव आयोजित करने से लेकर, शास्त्रीय उस्तादों की मेजबानी करने और पंजाब व आसपास के क्षेत्रों की स्वदेशी लोक कलाओं को बढ़ावा देने तक, अकादमी ने कला का लोकतंत्रीकरण किया है।
इसने न केवल दिग्गजों को, बल्कि चंडीगढ़ की उभरती स्थानीय प्रतिभाओं को भी एक बेहतरीन मंच प्रदान किया है। आज के ये पुरस्कार उसी ऐतिहासिक यात्रा का एक सुखद परिणाम हैं। यह उत्कृष्टता की वह एक ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित औपचारिक मान्यता है, जिसकी लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी।
देवियो और सज्जनो,
आज हम एक तेज गति वाले, डिजिटल युग में जी रहे हैं। हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी ए.आई., सोशल मीडिया एल्गोरिदम और उन स्क्रीनों से घिरे हुए हैं जो लगातार हमारा ध्यान खींचती हैं। इस आधुनिक युग में, हमारे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है, और मानवीय संपर्क तेजी से आभासी (virtual) होते जा रहे हैं।
यही कारण है कि मानव इतिहास में आज प्रदर्शनकारी कलाओं का महत्व पहले से कहीं अधिक है। जब आप किसी थिएटर में बैठकर कोई नाटक देखते हैं, तो आप वास्तविक समय में अभिनेताओं की हंसी और आंसुओं को साझा करते हैं। यह हमें संवेदनाएं और करुणा सिखाता है, जिसे कोई भी तकनीक या मशीन नहीं दोहरा सकती।
शास्त्रीय संगीत या कथक में महारत हासिल करने के लिए आवश्यक कठोर ‘रियाज़’ हमारे युवाओं को याद दिलाता है कि सच्ची उत्कृष्टता शॉर्टकट से प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके लिए धैर्य, अनुशासन और समर्पण की आवश्यकता होती है।
तनाव और अकेलेपन से जूझ रहे इस दौर में, संगीत और कला एक गहरा चिकित्सीय उपचार प्रदान करते हैं। ये हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और मानसिक शांति देते हैं।
आज सम्मानित होने वाले सभी कलाकारों से मैं कहना चाहूँगा कि मैं आपकी कला और आपके संघर्ष को नमन करता हूँ। प्रदर्शनकारी कला के क्षेत्र में अपना जीवन समर्पित करना आसान नहीं है। यह एक ऐसा मार्ग है जो अक्सर वित्तीय अनिश्चितताओं और भारी संघर्षों से भरा होता है। फिर भी, आपने इस मार्ग को चुना क्योंकि आप अपनी अंतरात्मा की पुकार से प्रेरित थे।
आपने हमारे रागों को संरक्षित किया है, हमारी लोककथाओं को जीवित रखा है, और अपनी नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से समाज को एक आईना दिखाया है। यह पुरस्कार यूटी प्रशासन और चंडीगढ़ के लोगों की ओर से कृतज्ञता का एक प्रतीक है। आप हमारे सच्चे सांस्कृतिक राजदूत हैं।
मेरा मानना है कि संस्कृति केवल प्रदर्शन नहीं; यह हमारी पहचान है। जब किसी समाज की लोक-भाषा, लोक-नृत्य, लोक-गीत और थिएटर अंकुरित होते हैं, तब वे हमें बताते हैं कि हम कौन हैं। हमारी पहचान, हमारे संघर्ष और हमारे आदर्श क्या हैं।
कलाकार वही होते हैं जो जन-जीवन के जज़्बात को शब्द, राग और अभिनय में परिलक्षित करते हैं। इसलिए आज का सम्मान समारोह केवल एक कागज़ी पुरस्कार से अधिक है। यह उन वर्षों का आभार प्रदर्शन है जो कलाकारों ने कला के लिये समर्पित किये। इस सम्मान से हम यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि कला का सम्मान समाज के लिये कितना महत्वपूर्ण है और कलाकारों के योगदान को हम हमेशा स्मरण रखेंगे।
देवियो और सज्जनो,
अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजरने के बाद भी भारत की सभ्यता जीवंत बनी हुई है। इस जीवंतता का एक प्रमुख कारण है भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत। हमारी सांस्कृतिक विरासत में प्रदर्शन कलाओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
प्राचीन काल से ही कला-विधाओं को भारतीय संस्कृति में उच्च स्थान दिया गया है। भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र को वेदों के समकक्ष रखते हुए उसे पंचम वेद कहा गया है। उनके नाट्य-शास्त्र में कला-विधा की जो व्यापकता एवं समग्रता मिलती है वह संसार के किसी अन्य ग्रंथ में दुर्लभ है।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कला के बारे में लिखा है कि कला में मनुष्य स्वयं को अभिव्यक्त करता है। मैं इस धारणा में विश्वास रखता हूँ कि कला केवल कला के लिए नहीं होती है। कला के सामाजिक उद्देश्य भी होते हैं। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब कलाकारों ने समाज कल्याण के लिए अपनी कला का प्रयोग किया। कलाकार अपनी कला के माध्यम से रुढ़ियों और पूर्वाग्रहों को चुनौती देते रहे हैं। वे अपनी कला से समाज को जगाते रहे हैं। हमारी कलाएं भारत की सॉफ्ट-पावर का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। इसलिए भारतीय कलाएं हमारी विदेश नीति का भी अभिन्न अंग हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज के परिवेश में तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अनेक कारण हैं। हम आध्यात्मिकता को छोड़ कर भौतिक सुख पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। भौतिक सुख एवं धन के पीछे भागने से जीवन एकांगी हो जाता है।
कला से जुड़ाव हमें सृजनशील बनाता है। कला, सत्य की खोज का मार्ग प्रदान करती है। कला के सानिध्य में हम अध्यात्म और अपने मूल से जुडते हैं। कला, जीवन को सार्थकता प्रदान करती है। भारतीय परंपरा में कला एवं साहित्य विहीन व्यक्ति को मानवता से विहीन माना जाता रहा है। इस प्रकार, कला मानवता की पहचान है।
देवियों और सज्जनो,
कला एवं कलाकारों ने भारत की विविधता को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। यह कार्य करके हमारे कलाकारों ने संविधान में निहित मूल कर्तव्यों का पालन भी किया है। भारतीय संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह हमारी गौरवशाली सामासिक संस्कृति का महत्व समझे एवं उसका संरक्षण करे।
साथ ही लोगों में समरसता एवं भाईचारे की भावना का निर्माण करना, हर प्रकार के भेदभाव को दूर करना तथा महिलाओं की गरिमा पर आघात करने वाली कुप्रथाओं को समाप्त करना भी नागरिकों के मूल कर्तव्य हैं। इस प्रकार संगीत नाटक अकादमी की गतिविधियां देशवासियों के संवैधानिक कर्तव्यों से भी जुड़ी हुई हैं।
देवियो और सज्जनो,
इस खूबसूरत केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक के रूप में, मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि चंडीगढ़ प्रशासन हमारे कला समुदाय के साथ मजबूती से खड़ा है।
हमें यह ध्यान रखना होगा कि आज के युवा कलाकारों के सामने अवसर और चुनौतियाँ दोनों हैं। आधुनिक तकनीक ने सृजन के आयाम बढ़ाए हैं, परंतु ध्यान और परंपरा के अनुरक्षण की आवश्यकता भी उतनी ही प्रबल है। अकादमियाँ और प्रशासन मिलकर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि युवा कलाकारों को प्रशिक्षित करने के लिए पारंपरिक गुरु-शिष्य पद्धति, आधुनिक शिक्षा और मंच के प्रयोग सभी उपलब्ध हों।
आज के पुरस्कार विजेताओं को मेरा संदेश यही है कि आप अपनी परंपरा से जुड़े रहिए, प्रयोग करते रहिए, और दूसरों को भी प्रेरित कीजिए। प्रशासन इस दिशा में सहायक रहेगा।
हमें प्रदर्शनकारी कलाओं को अपने शैक्षिक पाठ्यक्रम में और गहराई से शामिल करना चाहिए। मैं अकादमी से आग्रह करता हूँ कि वह हमारे सरकारी स्कूलों में कार्यशालाएं आयोजित करे, ताकि युवा दिमागों को शुरुआत में ही संवारा जा सके।
अंत में, मैं अपनी बात यह कहकर समाप्त करना चाहूँगा कि किसी भी समाज को उसके द्वारा जमा की गई भौतिक संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके द्वारा रची गई कला और संरक्षित की गई संस्कृति से याद किया जाता है।
मैं इस शानदार कार्यक्रम के आयोजन के लिए चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। सभी पुरस्कार विजेताओं को एक बार फिर से मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। माँ सरस्वती आपकी आवाज़, आपकी अभिव्यक्तियों और आपके वाद्ययंत्रों पर अपनी कृपा सदैव बनाए रखें।
धन्यवाद,
जय हिन्द!