SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF CONVOCATION OF SD COLLEGE CHANDIGARH ON FEBRUARY 28, 2026.
- by Admin
- 2026-02-28 14:35
जी.जी.डी.एस.डी. कॉलेज के 48वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 28.02.2026, शनिवार समयः दोपहर 12:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
गोस्वामी गणेश दत्त सनातन धर्म कॉलेज (जी.जी.डी.एस.डी. कॉलेज), चंडीगढ़ के 48वें वार्षिक दीक्षांत समारोह के अवसर पर आज उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत हर्ष एवं सौभाग्य का विषय है। यह कॉलेज दशकों से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान रखते हुए अपनी एक अमिट पहचान बनाता आया है।
मुझे बताया गया है कि ‘‘सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा’’ के तत्वावधान में 1973 में स्थापित इस कॉलेज की स्थापना गोस्वामी गणेश दत्त जी की स्मृति में की गई थी, जो एक श्रद्धेय संत और समाज सुधारक थे और शिक्षा की परिवर्तनशील शक्ति में दृढ़ता से विश्वास करते थे।
इस कॉलेज की स्थापना में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में ‘पंडित मोहन लाल जी’ का नाम अग्रणी है, जिन्होंने पंजाब के पूर्व गृह, वित्त और शिक्षा मंत्री के पदों पर रहते हुए अपनी दूरदर्शिता और महान परोपकारिता का परिचय दिया है। शिक्षा के प्रति उनके अथक प्रयासों और प्रतिबद्धता ने इस संस्थान की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह कॉलेज निरन्तर अकादमिक उत्कृष्टता में सबसे आगे रहा है। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) द्वारा इसका 'A+' ग्रेड प्रत्यायन तथा राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) में अखिल भारतीय रैंक 70, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने के प्रति इसकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतिबिंब है।
कॉलेज का प्रेरक आदर्श वाक्य, “आस्था में दृढ़ और विचारों में उदार”, परंपरा और आधुनिकता के संतुलन का सजीव प्रतीक है। यह केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता का नहीं, बल्कि नैतिक, संवेदनशील और सामाजिक रूप से उत्तरदायी नागरिक तैयार करने की प्रतिबद्धता का भी परिचायक है।
‘‘विद्या ददाति विनयम्’’ यानी ज्ञान विनम्रता प्रदान करता है, के शाश्वत भारतीय आदर्श से प्रेरित होकर, इस संस्थान ने न केवल अकादमिक शिक्षा प्रदान की है, अपितु बौद्धिक मूल्यों के साथ-साथ जीवन मूल्यों, अनुशासन और सामाजिक चेतना को भी संपोषित किया है।
आज जी.जी.डी.एस.डी समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं इस कॉलेज के साथ-साथ अन्य कॉलेजों को भी शिक्षा के क्षेत्र में उन्नयन की ओर ले जाने वाले स्वर्गीय श्री उपकार कृष्ण शर्मा के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर कॉलेज में गरीब विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति योजना, ओपन-एयर-थियेटर इत्यादि योजनाओं का शुभारंभ, इस कॉलेज के प्रति मेरी शुभाशंसाओं में और भी अधिक वृद्धि कर रही हैं।
मैं आज इस छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले सभी 5 विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई देता हूँ। मुझे विश्वास है कि यह सहयोग आपके लिए केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और प्रोत्साहन का स्रोत सिद्ध होगा।
मैं प्रबंधन समिति, संकाय, कर्मचारियों और विद्यार्थियों को अकादमिक-उत्कृष्टता, चरित्र-निर्माण और सामाजिक-कर्त्तव्यनिष्ठा की इस विरासत को बनाए रखने के लिए बधाई देता हूं।
देवियो और सज्जनों,
आज जब मैं आप सभी के बीच इस गरिमामय दीक्षांत समारोह में उपस्थित हूँ, तो सर्वप्रथम मैं आज अपनी उपाधि प्राप्त करने वाले सभी 32 विद्यार्थियों को हृदय से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ।
यह उपलब्धि केवल आपकी नहीं है; यह आपके माता-पिता, अभिभावकों और शिक्षकों की भी है, जिनके सतत मार्गदर्शन, त्याग और प्रोत्साहन ने आपकी शैक्षणिक यात्रा को दिशा और आधार प्रदान किया।
दीक्षांत समारोह किसी भी संस्थान की शैक्षणिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होता है, क्योंकि यह उस संस्था की शिक्षण परंपरा, मूल्यों और उपलब्धियों का उत्सव है। परंतु इससे भी अधिक, यह छात्रों के जीवन का एक निर्णायक मोड़ होता है। यह वह क्षण है जब शिक्षा की औपचारिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर आप जीवन के व्यापक विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं, जहाँ आपके ज्ञान की परीक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि परिस्थितियों, चुनौतियों और जिम्मेदारियों से होगी।
आज आप केवल डिग्री ही ग्रहण नहीं कर रहे बल्कि आपको अपने जीवन, समाज तथा राष्ट्र के प्रति गहन जिम्मेदारी भी सौंपी जा रही है। जैसा कि हमारी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा सिखाती है, ‘कर्त्तव्यं योगं उदाहृतम्’ यानी समर्पणपूर्वक निष्पादित कर्त्तव्य ही सच्चा योग है। आज से ही समाज के प्रति आपका दायित्व गंभीरतापूर्वक प्रारंभ होता है।
औपचारिक शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात आप सभी जीवन की नई दिशाओं में आगे बढ़ेंगे। कुछ विद्यार्थी प्रशासनिक या निजी क्षेत्र में अपनी सेवाएँ देंगे, कुछ उच्च शिक्षा और शोध के पथ पर अग्रसर होंगे, कई उद्यमिता का मार्ग चुनेंगे और कुछ शिक्षण के क्षेत्र में योगदान देंगे। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट अपेक्षाएँ और कौशल होते हैं, किंतु कुछ मूल गुण ऐसे हैं जो हर क्षेत्र में सफलता का आधार बनते हैं।
वे हैं, सदैव सीखते रहने की इच्छा; विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी नैतिक मूल्यों, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का दृढ़ता से पालन; परिवर्तन को स्वीकार करने का साहस; असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ने का संकल्प; टीमवर्क और सहयोग की भावना; समय और संसाधनों का अनुशासित उपयोग; तथा ज्ञान और क्षमता का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के व्यापक हित में करना। ये सभी गुण आपको केवल एक अच्छा पेशेवर ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक भी बनाएंगे।
प्रिय छात्रों, शिक्षा केवल आजीविका अर्जित करने का माध्यम नहीं है; यह समाज और राष्ट्र की सेवा का भी सशक्त साधन है। आपकी शिक्षा में समाज का प्रत्यक्ष और परोक्ष योगदान रहा है, जो एक प्रकार से आप पर नैतिक दायित्व है। इस दायित्व का निर्वहन आप किस प्रकार करेंगे, यह आपके विवेक पर निर्भर है। विकास की इस यात्रा में आपसे पीछे छूट गए लोगों को साथ लेकर चलना, उन्हें अवसर और मार्गदर्शन देना, इस ऋण को चुकाने का सर्वोत्तम मार्ग हो सकता है।
इस कॉलेज में बिताए वर्षों ने आपकी बुद्धिमत्ता को आकार दिया है, कौशल को निखारा है तथा दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है। जीवन में आपकी अनुकूलनशीलता, पुरानी अवधारणाओं का परित्याग तथा नई शिक्षा का ग्रहण किसी एक योग्यता से कहीं अधिक सफलता का आधार बनेगी। “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”, यानी इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। इसी भावना से जीवन में आपकी कर्तव्यनिष्ठा का सफर निर्देशित होता रहे।
साथियो,
आज भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। हम एक युवा राष्ट्र हैं, जिसकी जनसंख्या-शक्ति अपार है। हमारे लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सद्भाव का भविष्य आप जैसे शिक्षित, नैतिक और सशक्त युवाओं के कंधों पर टिका है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप पेशेवर दक्षता को नैतिक निष्ठा के साथ और महत्वाकांक्षा को सहानुभूति के साथ जोड़ें। जैसे स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”।
इस राष्ट्र के युवाओं के लिए मेरी परिकल्पना ऐसे व्यक्तियों की है जो कुशल होने के साथ-साथ संवेदनशील भी हों, आत्मविश्वासी होने के साथ-साथ करुणामय भी हों, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ भारतीय जीवनमूल्यों में दृढ़ विश्वास भी रखते हों।
स्नातक के रूप में, आपके सामने ऐसे विकल्प होंगे जो न केवल आपकी बुद्धिमत्ता बल्कि आपके जीवनमूल्यों की भी परीक्षा लेंगे। ईमानदारी, अनुशासन और विविधता के प्रति सम्मान को अपने निर्णयों का मार्गदर्शक बनने दें। याद रखें कि सच्ची सफलता केवल धन या पद से नहीं मापी जाती, बल्कि दूसरों के जीवन पर आपके द्वारा किए गए सकारात्मक प्रभाव से मापी जाती है। हमारे शास्त्रों में ठीक ही कहा गया है, ‘‘परोपकाराय सतां विभूतयः’’ यानी श्रेष्ठ व्यक्ति की समृद्धि दूसरों के कल्याण के लिए होती है। इस सिद्धांत को अपनी सफलता का आधार बनाएं।
देवियो और सज्जनो,
विश्वविद्यालय केवल उपाधि प्रदान करने के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे समाज-निर्माण के केंद्र भी होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब सहित चंडीगढ़ में नशाखोरी की समस्या एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ रहा है। यह समस्या स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और नैतिक ताने-बाने को भी प्रभावित कर रही है। इसका स्थायी समाधान एक स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है। इस संदर्भ में हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका अहम है। इस महाविद्यालय के सभी भागीदारों को भटके हुए युवाओं को सही दिशा दिखाने के यथासंभव प्रयास करने चाहिए।
पिछले एक दशक में भारत ने तकनीकी विकास और उद्यमिता संस्कृति के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज कृषि से एआई तक और रक्षा से अंतरिक्ष तक उद्यम के अनेक अवसर युवाओं के लिए उपलब्ध हो रहे हैं। शोध को बढ़ावा देकर, उद्योग-शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करके तथा सामाजिक रूप से प्रासंगिक नवाचारों को प्रोत्साहित करके हमारे उच्च शिक्षण संस्थान इस प्रगति को और गति प्रदान कर सकते हैं।
हम सभी जानते हैं कि अगले दो दशक, वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। एक ऐसा भारत जो पूर्ण रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर हो। आज के युवा अगले दो दशकों में विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे होंगे, नेतृत्व कर रहे होंगे। युवा शक्ति की ऊर्जा को देश के विकास में लगाने के लिए हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।
राजनीतिक स्वतंत्रता हमें 1947 में प्राप्त हुई, परंतु उसकी सार्थकता तभी पूर्ण होती है जब हम विचार, प्रौद्योगिकी, ज्ञान, उत्पादन और नवाचार के स्तर पर भी आत्मनिर्भर बनें। आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं है, बल्कि अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखते हुए वैश्विक मंच पर सम्मानजनक और सशक्त सहभागिता करना है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, "Every nation has a message to deliver, a mission to fulfill, a destiny to reach." प्रत्येक राष्ट्र का एक संदेश होता है, एक मिशन होता है और एक नियति होती है, जिसे उसे प्राप्त करना होता है। भारत का भी एक विशिष्ट वैश्विक संदेश है। मानवता, शांति, सह-अस्तित्व और ज्ञान का संदेश। किंतु यदि हम आत्मनिर्भर नहीं होंगे, यदि हम अपने संसाधनों, अपनी प्रतिभा और अपनी नवाचार-शक्ति का पूर्ण उपयोग नहीं करेंगे, तो हम अपने इस राष्ट्रीय मिशन को कैसे पूरा करेंगे? हम अपनी नियति तक कैसे पहुँचेंगे?
इस दीक्षांत समारोह के अवसर पर मैं आपसे यही आग्रह करता हूँ कि आप आत्मनिर्भरता को केवल नारे के रूप में न देखें, बल्कि इसे अपने जीवन का संकल्प बनाएं। अपने ज्ञान और प्रतिभा का उपयोग इस प्रकार करें कि भारत न केवल आत्मनिर्भर बने, बल्कि विश्व को मार्गदर्शन देने वाला, नवाचार और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण एक अग्रणी राष्ट्र भी बने।
देवियो और सज्जनो,
जी.जी.डी.एस.डी. कॉलेज, चण्डीगढ़ जैसे संस्थान जिम्मेदार छात्रों का पोषण करके राष्ट्र-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मैं उन शिक्षकों की सराहना करता हूँ जिन्होंने अक्सर कर्त्तव्य की सीमा से परे जाकर युवा-मस्तिष्कों को एक आकार देने के लिए स्वयं को समर्पित किया है। शिक्षक समाज के मूक निर्माता हैं और उनका योगदान हमारे गहरे सम्मान के योग्य है। हमारी परंपरा के शब्दों में, ‘‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः’’, अर्थात शिक्षक सर्वोच्च आदर का स्थान रखते हैं।
मैं आज यहां उपस्थित सभी अभिभावकों और संरक्षकों को भी धन्यवाद देना चाहता हूं। आपके बलिदान, प्रोत्साहन और अटूट विश्वास ने इन युवा स्नातकों को इस गौरवपूर्ण क्षण तक पहुंचाया है। यह उपलब्धि जितनी छात्रों की है, उतनी ही आपकी भी है। आपकी भूमिका ‘‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’’ के शाश्वत मूल्य को दर्शाती है।
प्रिय स्नातकों,
जब आप इस व्यापक जगत में कदम रखें, तो अपने साथ एक उद्देश्य की भावना लेकर चलें। नवप्रवर्तक बनें, नेता बनें, लेकिन सबसे बढ़कर, अच्छे मनुष्य बनें। निष्ठा से राष्ट्र की सेवा करें, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों को कायम रखें और सार्थक परिवर्तन लाने की अपनी क्षमता पर कभी विश्वास न खोएं। आपका आचरण व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन दोनों में “सत्यमेव जयते” के आदर्श को प्रतिबिंबित करता रहे।
मुझे विश्वास है कि आप इस महान संस्थान के मूल्यों और परंपराओं को कायम रखेंगे और जीवन आपको जहाँ भी ले जाए, समाज में रचनात्मक योगदान देंगे। आपके कार्यों से राष्ट्र को मजबूती मिलती रहे और आपके आसपास के लोगों को प्रेरणा मिलती रहे।
एक बार फिर, मैं सभी स्नातक छात्रों को बधाई देता हूँ और जी.जी.डी.एस.डी. कॉलेज, चंडीगढ़ के लिए शैक्षिक उत्कृष्टता के मिशन में निरंतर सफलता की कामना करता हूँ।
धन्यवाद, जय हिंद!