speech of hon’ble governor punjab and administrator, ut chandigarh, shri gulab chand kataria on the occasion of 243 hrs akhand mahayagaya at maa baglamukhi dham at ludhiana on february 21, 2026.

माँ बगलामुखी धाम में महायज्ञ के समापन समारोह के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 21.02.2026,  शनिवारसमयः शाम 5:00 बजेस्थानः लुधियाना

 

जय माँ बगलामुखी!

आज मुझे अत्यंत हर्ष और आध्यात्मिक संतोष का अनुभव हो रहा है कि मैं माँ बगलामुखी धाम, पखोवाल रोड, लुधियाना की इस पावन धरती पर आयोजित 243 घंटे के अखण्ड महायज्ञ के शुभ अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित हूँ। यह महायज्ञ 11 फरवरी से 21 फरवरी 2026 तक निरंतर चलने वाला एक अद्वितीय आध्यात्मिक आयोजन है, जिसका मूल उद्देश्य विश्व शांति, जन-कल्याण और आपसी भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करना है।

मैं माँ बगलामुखी धाम ट्रस्ट को इस पुनीत पहल के लिए हृदय से बधाई देता हूँ और कामना करता हूँ कि उनके ऐसे सतत प्रयास समाज और राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्थान में निरंतर सहायक सिद्ध हों।

जानकर अत्यंत हर्ष हुआ कि माँ बगलामुखी धाम ट्रस्ट की स्थापना महंत प्रवीन चौधरी जी एवं मनप्रीत सिंह छतवाल, आई.ए.एस. (सेवानिवृत्त) जी द्वारा वर्ष 2014 में 72 घंटों के एक विशाल अखण्ड महायज्ञ के माध्यम से की गई थी। यह ट्रस्ट केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त मंच बनकर उभरा है।

माँ बगलामुखी परिवार द्वारा समय-समय पर रक्तदान शिविरों का आयोजन, ज़रूरतमंद एवं वंचित बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था, तथा समाज के कमज़ोर वर्ग की बेटियों के विवाह में सहयोग जैसे अनेक जनकल्याणकारी कार्य किए जा रहे हैं। 

अब माँ बगलामुखी परिवार द्वारा भक्तों को अंग दान, नेत्र दान एवं देह दान जैसे महापुण्य कार्यों के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मानव सेवा का यह भाव और अधिक सुदृढ़ हो सके।

हर्ष का विषय है कि धाम द्वारा शीघ्र ही एक संस्कृत पाठशाला आरंभ की जा रही है, जहाँ योग्य अध्यापकों के माध्यम से विद्यार्थियों को हमारी प्राचीन भाषा एवं वैदिक परंपरा का ज्ञान प्रदान किया जाएगा। साथ ही समाज के सभी वर्गों के लिए सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने हेतु एक अस्पताल के निर्माण की योजना भी बनाई गई है।

माँ बगलामुखी धाम, लुधियाना में प्रत्येक बृहस्पतिवार सायंकाल विशेष यज्ञ का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागिता कर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। विशेष हवन-यज्ञ के माध्यम से माँ की आराधना कर वातावरण को पवित्र किया जाता है।

लाखों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा, सेवा कार्यों और आध्यात्मिक गतिविधियों के कारण इस पावन धाम को विकिपीडिया पर भी स्थान प्राप्त हुआ है, जिससे देश-विदेश के भक्त धाम की सेवाओं और गतिविधियों से परिचित हो रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, इस धाम का एक अत्यंत प्रेरणादायी और गौरवपूर्ण पहलू यह है कि यह हिन्दू-सिख समुदाय की एकता, आपसी सौहार्द और भाईचारे का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ धर्म की सीमाएँ सेवा के व्यापक भाव में विलीन हो जाती हैं और मानवता ही सर्वोपरि मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित होती है। यह धाम न केवल आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को भी सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

प्रिय श्रद्धालुजनो,

भारतीय संस्कृति में यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देने का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के परिष्कार, प्रकृति के संतुलन और सामूहिक मंगलकामना का सशक्त माध्यम है। वेदों में कहा गया है, “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म”, अर्थात यज्ञ सर्वोत्तम कर्म है। यह कर्म हमें स्वार्थ से परमार्थ की ओर, व्यक्तिगत सोच से वैश्विक कल्याण की ओर ले जाता है।

यज्ञ हमें देव, मनुष्य और प्रकृति, तीनों के बीच संतुलन का संदेश देता है। यज्ञ की अग्नि शुद्धता, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक है। जब हम यज्ञ करते हैं, तो वातावरण शुद्ध होता है, मन शांत होता है और समाज में सामूहिक चेतना का संचार होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यज्ञ से उत्पन्न धूम्र एवं मंत्रोच्चार वातावरण को शुद्ध करने में सहायक माने गए हैं।

यज्ञ का सामाजिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। प्राचीन काल में यज्ञ सामूहिक रूप से संपन्न होते थे, जहाँ राजा से लेकर सामान्य जन तक सभी सहभागिता करते थे। इससे समाज में एकता, सहयोग और समर्पण की भावना प्रबल होती थी। यज्ञ हमें सिखाता है कि केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समष्टि के लिए जीना ही सच्चा जीवन है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञ आत्मशुद्धि का माध्यम है। यज्ञ हमें संयम, अनुशासन और कर्तव्यबोध का पाठ पढ़ाता है। यह हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक धर्म सेवा, त्याग और लोककल्याण है।

आज के भौतिकवादी और तनावपूर्ण युग में यज्ञ की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। जब समाज में असंतुलन, वैमनस्य और पर्यावरण संकट बढ़ रहे हैं, तब यज्ञ जैसे संस्कार हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य और मानवीय मूल्यों की ओर लौटने की प्रेरणा देते हैं।

यदि हम यज्ञ के मूल भाव यानी त्याग, सेवा और कल्याण को अपने दैनिक जीवन में उतार लें, तो निश्चय ही एक समरस, शांत और सशक्त समाज का निर्माण संभव है।

प्रिय श्रद्धालुजनों,

माँ बगलामुखी, जो दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा की प्रतीक हैं, उनके सान्निध्य में आयोजित यह अखण्ड महायज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का विराट स्रोत है। यह आयोजन हमें हमारी जप, तप, ध्यान और साधना रूपी प्राचीन सनातन परंपराओं की ओर पुनः उन्मुख करता है। सदियों से हमारे ऋषि-मुनियों ने इन्हीं साधनाओं के माध्यम से मानव जीवन को उच्चतम आदर्शों तक पहुँचाया है।

आज के वैज्ञानिक और तकनीकी युग में, जहाँ जीवन की गति अत्यंत तीव्र हो चुकी है, वहीं मनुष्य का मन अस्थिर और चिंताग्रस्त भी होता जा रहा है। ऐसे समय में यह महायज्ञ हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता के साथ आध्यात्मिकता का संतुलन ही जीवन की सच्ची समृद्धि है। विज्ञान हमें सुविधा देता है, पर अध्यात्म हमें शांति देता है। विज्ञान हमारे बाहर के संसार को विकसित करता है, जबकि अध्यात्म हमारे भीतर के संसार को प्रकाशित करता है।

विशेष रूप से हमारे युवा वर्ग के लिए यह आयोजन अत्यंत प्रेरणादायक है। आज का युवा ऊर्जा से भरपूर है, प्रतिभाशाली है, परंतु उसे सही दिशा और आंतरिक स्थिरता की आवश्यकता है। जब युवा जप, ध्यान, योग और साधना से जुड़ता है, तो उसमें धैर्य, अनुशासन, सकारात्मकता और राष्ट्र निर्माण की भावना स्वतः विकसित होती है।

आज आवश्यकता है कि हम अपनी युवा शक्ति को यह समझाएं कि हमारी परम्पराएं अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक गहरा विज्ञान हैं। 

आज का यह आयोजन ‘वैज्ञानिक सोच’ और ‘अध्यात्म’ के बीच एक सेतु का काम करेगा। हम युवाओं में यह चेतना जागृत करना चाहते हैं कि विज्ञान जीवन को आरामदायक बना सकता है, लेकिन जीवन में शांति और संतुलन केवल अध्यात्म से ही आता है। जब ‘विज्ञान की तर्कशक्ति’ और ‘अध्यात्म का समर्पण’ मिलते हैं, तभी एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है।

प्रिय श्रद्धालुजनों,

हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय सांस्कृतिक आत्मबोध और आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरूकता का एक व्यापक पुनर्जागरण देखने को मिल रहा है। यह पुनरुत्थान केवल परंपराओं के स्मरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें हमारे मूल स्वरूप, हमारी सभ्यतागत जड़ों और उन जीवन मूल्यों से पुनः जोड़ता है, जिन्होंने हजारों वर्षों से भारतीय समाज को दिशा प्रदान की है।

भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ केवल आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन जीने की समग्र पद्धति हैं। इन परंपराओं ने सदियों से समाज को धर्म, सेवा, वसुधैव कुटुम्बकम् और प्रकृति के प्रति श्रद्धा जैसे उच्च मूल्यों के माध्यम से सुदृढ़ और संगठित बनाए रखा है। 

यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ किसी संकीर्ण मान्यता से नहीं, बल्कि कर्तव्य, नैतिकता और मानवता के पालन से है; ‘सेवा’ का भाव परोपकार और करुणा का संदेश देता है; ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की महान सोच प्रदान करता है; और प्रकृति के प्रति श्रद्धा हमें पर्यावरण संरक्षण एवं संतुलित जीवन शैली की प्रेरणा देती है।

इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज ने विविधताओं के बीच भी एकता, सहिष्णुता और समरसता को बनाए रखा है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि विकास केवल भौतिक उन्नति तक सीमित न होकर मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान से जुड़ा होना चाहिए। भारत का यह सांस्कृतिक दर्शन समावेशी व सतत विकास के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के समान है।

भारतीय चिंतन हमें बताता है कि मनुष्य, समाज और प्रकृति एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। इसलिए यहाँ विकास का अर्थ है, ऐसा संतुलन, जिसमें प्रगति के साथ करुणा हो, समृद्धि के साथ संवेदनशीलता हो, और आधुनिकता के साथ आध्यात्मिकता का सामंजस्य हो। यही भारत की सांस्कृतिक विरासत का सार है, जो आज भी विश्व को एक बेहतर, शांतिपूर्ण और सतत भविष्य की दिशा दिखा रही है।

प्रिय श्रद्धालुजनों, 

अक्सर हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को भूलने लगते हैं। लेकिन हमें यह स्मरण रखना होगा कि जड़ों से कटकर कोई भी वृक्ष आंधी में खड़ा नहीं रह सकता। ठीक उसी तरह, इतिहास गवाह है कि अपनी सभ्यता में दृढ़ विश्वास रखने वाला राष्ट्र ही आधुनिक विश्व में अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी और समावेशी होता है।

जब हम अपनी सनातन परंपरा, अपने वेदों और अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं, तो हम दुनिया के सामने सर झुकाकर नहीं, बल्कि सीना तानकर और आँखों में आत्मविश्वास भरकर खड़े होते हैं। हमारी सभ्यता तो वह है जिसने कभी किसी को हराया नहीं, बल्कि सबको अपनाया है; यही हमारी ‘समावेशी’ शक्ति है।

आज का यह महायज्ञ उसी आत्मविश्वास का उद्घोष है। यह सिद्ध करता है कि हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं, लेकिन हमारी आत्मा सनातन है। जब एक हाथ में तकनीक हो और दूसरे हाथ में माला या वेद, तभी एक ‘सशक्त’ और संतुलित समाज का निर्माण होता है।

प्रिय श्रद्धालुजनों,

भारत सदैव से विश्वगुरु रहा है। हमारी भूमि ने दुनिया को योग, आयुर्वेद, ध्यान, वेदांत और अहिंसा का संदेश दिया है। आज जब पूरी दुनिया मानसिक तनाव, पर्यावरण संकट और सामाजिक विघटन से जूझ रही है, तब भारत का आध्यात्मिक दर्शन विश्व को नई दिशा दे सकता है। ऐसे महायज्ञ इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन काल में थी।

यह महायज्ञ सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी संदेश देता है। यहाँ जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं, और सभी एक ही भावना से जुड़ते हैं, “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” यही भारत की आत्मा है, यही हमारी पहचान है।

हम इस यज्ञ के माध्यम से ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि पूरी दुनिया में शांति स्थापित हो, मानवता का कल्याण हो और समाज में आपसी प्रेम और सौहार्द की भावना और प्रबल हो। यह यज्ञ ‘स्व’ से ऊपर उठकर ‘सर्व’ के कल्याण की भावना का प्रतीक है।

मैं इस पावन अवसर पर आयोजकों को हृदय से बधाई देता हूँ जिन्होंने इतने विशाल और दिव्य आयोजन का संकल्प लिया। देश-विदेश से पधारे संत-महात्मा, राष्ट्रचिंतक, समाजसेवी और श्रद्धालुजन इस महायज्ञ की महिमा को और अधिक बढ़ा रहे हैं।

आइए, हम सभी संकल्प लें कि इस महायज्ञ से प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा को अपने जीवन में उतारें। हम अपने घर-परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति, प्रेम, सेवा और सद्भाव का दीप प्रज्वलित करें। हम अपने युवाओं को अध्यात्म से जोड़ें, ताकि वे न केवल सफल नागरिक बनें, बल्कि संस्कारित और संवेदनशील मानव भी बनें।

माँ बगलामुखी से प्रार्थना है कि वे हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें, हमारे जीवन से नकारात्मकता को दूर करें और हमें धर्म, सत्य और करुणा के मार्ग पर अग्रसर करें।

इसी मंगलकामना के साथ, आप सभी को इस महान आध्यात्मिक आयोजन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

धन्यवाद,

जय हिन्द!

जय माँ बगलामुखी!