speech of hon’ble governor punjab and administrator, ut chandigarh, shri gulab chand kataria on the occasion of jain bhagwati diksha mahotsav at ludhiana on february 22, 2026.

एस.एस. जैन मलेरकोटला के दीक्षा समारोह के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 22.02.2026,  रविवारसमयः सुबह 8:00 बजेस्थानः मलेरकोटला

 

जय जिनेन्द्र!

आज मलेरकोटला की इस पावन भूमि पर आयोजित दीक्षा समारोह में आप सभी के मध्य उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव, श्रद्धा और आत्मिक शांति का विषय है। आज का यह दीक्षा समारोह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है, जहां एक आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।

यह अवसर केवल हमारी दोनों बेटियों, आराध्या जैन और कृतिका जैन के जीवन परिवर्तन का नहीं, बल्कि आत्मा की जागृति, वैराग्य, संयम और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ते एक महान संकल्प का साक्षी बनने का अवसर है।

मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे इस महोत्सव की अनुमोदना हेतु एस.एस. जैन सभा, मलेरकोटला द्वारा यहां पर आमंत्रित किया गया है।

मुझे इस बात की खुशी है कि एस.एस. जैन सभा, मलेरकोटला, जिसकी स्थापना 1901 में हुई, निरंतर समाज सेवा में सक्रिय है। संस्था द्वारा संचालित स्कूल में कमजोर वर्ग के बच्चों को मामूली शुल्क पर शिक्षा दी जाती है, वहीं एक चैरिटेबल डिस्पेंसरी के माध्यम से लोगों को सस्ती दवाइयाँ और चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।

यह हम सभी के लिए गौरव का विषय है कि हमारे प्राचीन जैन ग्रंथों में मलेरकोटला का उल्लेख एक जैन नगरी के रूप में मिलता है। यह तथ्य न केवल इस नगर की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि मलेरकोटला सदियों से जैन दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

यह पावन भूमि तप, त्याग, संयम और अहिंसा जैसे जैन मूल्यों की साक्षी रही है, जहाँ साधु-संतों की तपस्या और श्रावक-श्राविकाओं की श्रद्धा ने इस नगर को आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। आज भी यहाँ की धार्मिक परंपराएँ, तीर्थ, उपासना स्थल और सामाजिक संस्थाएँ उसी गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। 

श्रद्धेय श्रावक-श्राविकाओं,

हमारी प्यारी बेटियां मुमुक्षु आराध्या जैन एवं कृतिका जैन आज जिस पथ का चयन कर रही हैं, वह कोई सामान्य मार्ग नहीं है। यह मार्ग है त्याग, तप, साधना और आत्मशुद्धि का। सांसारिक आकर्षणों, भौतिक सुख-सुविधाओं और सामाजिक बंधनों को त्यागकर दीक्षा ग्रहण करना, वास्तव में अद्भुत साहस, गहन वैराग्य और दृढ़ आत्मबल का परिचायक है।

हमारी प्यारी बेटियां मुमुक्षु आराध्या जैन और कृतिका जैन के शरीर, मन और वचन में आज सेतुवाद और त्याग की अवस्था का आरम्भ हो रहा है। उन्होंने निश्चय कर लिया है कि वे संसारिक सुखों से अलग होकर आध्यात्मिक मार्ग पर पूर्ण समर्पण चाहती हैं। यह निश्चय केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

मुमुक्षु आराध्या जैन एवं कृतिका जैन का यह निर्णय विशेष रूप से इसलिए भी प्रेरणादायी है, क्योंकि आज के युवाओं के समक्ष अनेक विकल्प और आकर्षण हैं। ऐसे समय में संयम और साधना का मार्ग चुनना यह सिद्ध करता है कि युवा पीढ़ी केवल भविष्य की नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना की भी वाहक है।

मैं इस अवसर पर उनके माता-पिता और परिवारजनों को भी नमन करता हूँ, जिन्होंने अपने हृदय की भावनाओं से ऊपर उठकर अपने बच्चों को इस महान पथ पर अग्रसर होने का आशीर्वाद दिया। यह त्याग केवल दीक्षा लेने वालों का नहीं, बल्कि उनके परिवार का भी है। ऐसे माता-पिता समाज के लिए प्रेरणा हैं।

दीक्षा का अर्थ अधर्म से विमुख होना, अहिंसा का जीवन-प्रधान अनुसरण, अपरिग्रह की साधना और आत्म-निर्माण की यात्रा में अग्रसर होना है। यह वह क्षण है जब सांसारिक पहचान पीछे रह जाती है और आत्मा का स्वरुप स्पष्ट रूप से आत्म-प्रकाशित होता है।

जैन धर्म में दीक्षा का अर्थ है सांसारिक मोह-माया को त्यागकर, साधु जीवन अपनाना और आत्मा की शुद्धि के मार्ग पर चलना। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन है। दीक्षा लेने वाला व्यक्ति अपने सभी सांसारिक सुखों, रिश्तों और संपत्ति का त्याग कर, एक साधु या साध्वी के रूप में जीवन जीने का व्रत लेता है।

दीक्षा का यह पावन कदम केवल बाहर की वेशभूषा या संस्कार नहीं है; यह मन में आक्रमक इच्छाओं, लालसाओं और अहंकार को त्याग कर विरल शान्ति और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है। आज हम यह भी स्वीकार करते हैं कि समाज को सदैव इन महान आदर्शों की आवश्यकता रहती है, विशेषकर अहिंसा तथा सहिष्णुता के संदेश की, जो परिवारों में, शिक्षण संस्थानों में, कामकाजी जीवन में और सार्वजनिक जीवन में शान्ति का आधार बनते हैं।

दीक्षा केवल वस्त्र परिवर्तन नहीं है, यह जीवन दृष्टि का परिवर्तन है। यह वह क्षण है जब व्यक्ति “मैं” और “मेरा” से ऊपर उठकर समस्त जीवों के कल्याण की भावना को आत्मसात करता है। दीक्षा लेने वाला साधक केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और मानवता के लिए प्रकाश-स्तंभ बन जाता है।

इस अवसर पर मैं एक सरल-सी कथा का उल्लेख करना चाहूंगा। एक बार एक साधक ने अपने गुरु से पूछा, ‘‘गुरुजी, मोक्ष तक पहुँचने का सबसे सादा मार्ग क्या है?’’ गुरु ने कहा, ‘‘एक दीपक ले कर अँधेरे में जलाओ। परंतु सबसे पहले उस दीपक के चारों ओर की वायु को शांत करो, तभी उसका प्रकाश दूर तक जायेगा।’’ संदर्भ यही है कि बाहरी कर्मों से पहले मन की अशान्ति को शुद्ध करना आवश्यक है। दीक्षा का यह अर्थ है कि अब मुमुक्षु आराध्या जैन और कृतिका जैन अपने ‘दीपक’ के चारों ओर के ‘विचलित वायु’ से मुक्त होकर अपने प्रकाश को और दूर तक फैलायेंगी।

सम्मानित जनों,

हमारी भारतीय संस्कृति, जो कि दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है, अपने ऋषि-मुनियों और संतों के ज्ञान, तपस्या और विचारों से आलोकित हुई है। इन संतों और ऋषियों ने न केवल हमारे आध्यात्मिक जीवन का मार्गदर्शन किया है, बल्कि हमें नैतिकता, विज्ञान, और समाज के विकास की दिशा भी दिखाई है।

भारत की प्राचीन संस्कृति में ऋषियों और मुनियों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ये वे लोग थे जिन्होंने अपना जीवन तप और ध्यान में व्यतीत किया और वेद, उपनिषद, पुराण जैसे महान ग्रंथों की रचना की। ऋषि वेदव्यास ने महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की, ऋषि वाल्मीकि ने रामायण लिखी, और पतंजलि ने योग के सूत्रों का विकास किया।

हमारे ऋषि-मुनियों ने न केवल धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि विज्ञान और गणित जैसे विषयों में भी अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। आर्यभट्ट, चरक और सुश्रुत जैसे महान विद्वान हमारे ही सांस्कृतिक धरोहर के भाग हैं। उन्होंने खगोल विज्ञान, चिकित्सा शास्त्र और गणित में अद्भुत कार्य किया।

मध्यकालीन भारत में संतों ने समाज सुधार का कार्य भी किया। संत कबीर, गुरु नानक, संत तुलसीदास और मीराबाई ने जातिवाद, अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने भक्ति आंदोलन के माध्यम से लोगों को प्रेम, एकता और मानवता का संदेश दिया।

आज, जब समाज में तनाव और संघर्ष बढ़ रहा है, तो हमारे ऋषि-मुनियों और संतों की शिक्षाएं और भी प्रासंगिक हो गई हैं। उनकी शिक्षाएं हमें शांति, अहिंसा, और संतुलित जीवन का मार्ग दिखाती हैं।

देवियों और सज्जनों,

जैन धर्म भारत की प्राचीन और महान धर्म परंपराओं में से एक है। यह धर्म ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’’ यानी अहिंसा को सर्वोच्च धर्म मानता है। जैन धर्म के संस्थापक भगवान ऋषभदेव को माना जाता है, लेकिन इसकी मुख्य परंपरा 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी जी के माध्यम से प्रसिद्ध हुई।

हमारे देश की आत्मज्ञान की गौरवशाली परंपरा में भगवान महावीर का एक प्रमुख स्थान है। अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह के अपने दिव्य उपदेशों के माध्यम से उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक उत्थान का लक्ष्य रखा। 

उस समय के सामाजिक मुद्दों से गहराई से जुड़े भगवान महावीर ने ऐसे समाधान प्रस्तुत किए जिनसे जनसाधारण की समस्याओं को कम करने में मदद मिली।

भगवान महावीर स्वामी ने हमें पंच महाव्रतों का मार्ग दिखाया-

अहिंसाः किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से चोट न पहुंचाना।

सत्यः सत्य बोलना और सत्य का पालन करना।

अस्तेयः दूसरों की चीज़ों को बिना अनुमति के न लेना।

ब्रह्मचर्यः अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना।

अपरिग्रहः आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।

भगवान महावीर के आध्यात्मिक पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, सदियों से समय-समय पर जैन आचार्यों की एक श्रृंखला सामने आई। उन्होंने मौलिक और अनंत मूल्यों के साथ भारतीय संस्कृति को पोषित करने में मदद की।

जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है। इसके लिए ध्यान, तप, और संयम को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। जैन धर्म न केवल हमें व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता सिखाता है, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति भी हमारी जिम्मेदारियों का बोध कराता है।

आज के समय में जब हिंसा और स्वार्थ चारों ओर व्याप्त है, जैन धर्म की शिक्षाएं हमें शांति और संतुलन की ओर ले जाने में मदद करती हैं। 

यह धर्म हमें यह सिखाता है कि हमारे कर्म ही हमारे भविष्य को तय करते हैं, इसलिए अच्छे कर्म करें और हर प्राणी के प्रति दया का भाव रखें।

जैन धर्म की शिक्षाएं केवल जैन समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए उपयोगी हैं। अगर हम सभी जैन धर्म के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं, तो एक सुखी, शांतिपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण संभव है।

देवियों और सज्जनों,

मैं खुद जैन अनुयायी हूँ और गुरू भगवंतो के प्रति श्रद्धा एवं आदर की भावना मेरे मन में सदैव विद्यमान रहती है। 

इसलिए, मैं वैरागन बिटिया आराध्या जैन और कृतिका जैन के लिए जिनशासन प्रभु के चरणों में यही मंगलकामना करता हूं कि ये दोनों बच्चियां जिस संयमी जीवन को अंगीकार करने जा रही हैं, उस पथ पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ती रहें और जैन धर्म की प्रभावना करती रहें।

मैं प्रार्थना करता हूं कि उनका यह आध्यात्मिक मार्ग उन्हें मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर करे। साथ ही, हम सभी को यह प्रेरणा मिले कि हम भी अपने जीवन में जैन धर्म के सिद्धांतों को अपनाकर, अपने जीवन को सार्थक बनाएं। 

धन्यवाद,

जय हिन्द!