SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF RELEASE THE COFFEE TABLE BOOK SUKHNA LAKE AT DAWN AT PUNJAB LOK BHAVAN, CHANDIGARH ON MARCH 10, 2026.
- by Admin
- 2026-03-10 18:45
“Sukhna Lake at Dawn” नामक पुस्तक के अनावरण पर
माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन
दिनांकः 10.03.2026, मंगलवार
समयः शाम 4:50 बजे
स्थानः पंजाब लोक भवन
नमस्कार!
आज का दिन ‘सिटी ब्यूटीफुल’चंडीगढ़ की आत्मा और उसकी प्राकृतिक विरासत को समर्पित एक अत्यंत विशेष दिन है। आज मुझे श्री हरप्रीत संधू जी द्वारा संकलित इस “Sukhna Lake at Dawn” नामक अद्भुत और दुर्लभ कलाकृति पर अपने विचार साझा करते हुए अत्यंत गर्व और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति हो रही है। यह चित्र केवल एक कैनवास नहीं है, बल्कि यह चंडीगढ़ के हृदय कहे जाने वाली सुखना झील की धड़कन को दर्शाता है।
जब मैं इस उत्कृष्ट कलाकृति को देखता हूँ, तो यह मुझे उस शांत और पवित्र भोर के दर्शन कराती है, जहाँ सूर्य की सुनहरी किरणें सुखना झील के शांत जल पर पड़कर एक जादुई आभा बिखेर रही हैं।
श्री संधू जी ने अपनी कला के माध्यम से उस ‘आध्यात्मिक शांति’ और प्राकृतिक छटा को जीवंत कर दिया है, जिसे हम अक्सर सुबह-सुबह सुखना झील के किनारे महसूस करते हैं।
यह कृति केवल एक परिदृश्य का चित्रण नहीं है, बल्कि यह प्रकृति द्वारा हमें दिए गए इस अमूल्य उपहार के प्रति एक सच्ची और भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। मैं इस उत्कृष्ट कार्य के लिए श्री हरप्रीत संधू जी की प्रशंसा करता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
इस चित्रात्मक प्रस्तुति के माध्यम से श्री हरप्रीत संधू ने केवल सुखना झील की मनोहारी प्राकृतिक भव्यता को ही अभिव्यक्त नहीं किया है, बल्कि इसके गहरे और बहुआयामी महत्व को भी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।
यह कृति हमें यह अनुभव कराती है कि सुखना झील केवल एक सुंदर प्राकृतिक स्थल भर नहीं है, बल्कि यह चंडीगढ़ के नागरिकों के लिए शांति, सामंजस्य, आत्मचिंतन और प्रेरणा का एक जीवंत केंद्र भी है।
प्रातःकाल की शांत और निर्मल वेला में झील का वातावरण लोगों को प्रकृति के साथ जुड़ने, अपने मन को स्थिर करने और जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार यह कलाकृति सुखना झील को केवल एक भौगोलिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि चंडीगढ़ के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में ऊर्जा, संतुलन और प्रेरणा प्रदान करने वाले एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत करती है।
साथियो,
हम चंडीगढ़ की शान सुखना झील की बात करें तो ‘सुखना’ शब्द का अर्थ ही है, ‘एक इच्छा का पूरा होना’। शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित यह मानव निर्मित झील, चंडीगढ़ में रहने वाले और यहाँ घूमने आने वाले हर प्रकृति प्रेमी की इच्छा को सचमुच पूरा करती है। यह मनमोहक झील इस शहर के महान वास्तुकार, ली कार्बूज़ियर का हमें दिया गया सबसे बड़ा और अनमोल तोहफ़ा है।
उनकी दूरदृष्टि देखिए; उन्होंने उस समय ही जोर दिया था कि सुखना की यह प्राकृतिक शांति हमेशा बनी रहनी चाहिए, और इसीलिए यहाँ मोटर गाड़ियों का आना-जाना पूरी तरह प्रतिबंधित रखा गया। सुखना इस शहर का एक ऐसा हिस्सा है जिसे इससे कभी अलग नहीं किया जा सकता। वे पहले ही देख चुके थे कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में, शहर के लोग अपने ‘शरीर और आत्मा की देखभाल’ के लिए इसी शांत तट की ओर खिंचे चले आएंगे।
जब हम श्री हरप्रीत संधू जी की इस चित्रमय पुस्तक और कलाकृतियों को देखते हैं, तो पाते हैं कि सुखना लेक पर सूर्योदय केवल देखने लायक एक दृश्य नहीं है; बल्कि यह कुदरती शांति, परछाई और हमेशा रहने वाली सुंदरता का एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव है। लेखक ने अपनी कला के जरिए प्रकृति और चंडीगढ़ शहर के बीच होने वाली उस ‘खामोश बातचीत’ को बेहद खूबसूरती से दिखाया है।
जब भोर की सुनहरी किरणें शिवालिक की पहाड़ियों को धीरे से रोशन करती हैं और शांत पानी पर अपनी चमक बिखेरती हैं, तो इस पुस्तक का हर एक फ्रेम उम्मीद, नई शुरुआत और तालमेल की कहानी कहता है। यहाँ रंग सांस लेते हुए महसूस होते हैं और परछाइयाँ हमसे बोलती हैं।
सुबह के समय झील की यह अपार शांति, पानी में तैरते हंसों की लयबद्ध हरकतें, और सुबह-सुबह टहलने वालों की परछाइयाँ... यह सब मिलकर उस शहर की आत्मा को दर्शाते हैं जिसे ली कार्बूज़ियर ने ‘मॉडर्न इंडिया’ के एक प्रतीक के रूप में देखा था।
उनके लिए यह शहर केवल कंक्रीट और ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं था, बल्कि एक ‘जीती-जागती सोच’थी। सुखना झील पर उगता सूरज उनकी इसी सोच को खूबसूरती से पूरा करता है। यह नई शुरुआत, तरक्की और आधुनिक भारत की एक नई सुबह का प्रतीक है, जो वास्तुकला, कुदरत और इंसानी उम्मीदों के बीच एक बेहतरीन तालमेल स्थापित करता है।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि तस्वीरों का यह अद्भुत संग्रह कोई एक दिन का काम नहीं है, बल्कि यह सुखना झील के किनारे लेखक के डेढ़ साल से ज़्यादा लंबे और धैर्यपूर्ण सफ़र का परिणाम है। इस किताब के ज़रिए, संधू जी ने सुखना झील पर सुबह की शांत शान को सामने लाने की जो कोशिश की है, उसने इन खूबसूरत पलों को झील की कुदरती सुंदरता के हमेशा रहने वाले जश्न में बदल दिया है।
मैं मानता हूँ कि यह किताब शहर के लोगों और चंडीगढ़ से प्यार करने वाले हर उस व्यक्ति के लिए एक नायाब तोहफ़ा है, जो सुखना की इस शांत आत्मा को महसूस करना चाहता है। यह हम सभी को यह न्यौता देती है कि हम अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में थोड़ा रुकें, सोचें, और सुबह की इस शांत खूबसूरती के साथ फिर से अपना नाता जोड़ें।
देवियो और सज्जनो,
कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह शब्दों से परे जाकर भी गहरी भावनाओं को व्यक्त कर देती है। यह चित्र भी उसी का एक सुंदर उदाहरण है। यह केवल सुखना झील के प्राकृतिक सौंदर्य को दर्शाता ही नहीं, बल्कि हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने का संदेश भी देता है।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब प्रकृति के संरक्षण का विषय पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बढ़ता हुआ तापमान, घटते हुए जल स्रोत, प्रदूषण और जैव विविधता का संकट हमें यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि हमने समय रहते प्रकृति की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
ऐसे समय में सुखना झील जैसे प्राकृतिक स्थलों का संरक्षण और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यह झील न केवल चंडीगढ़ के पर्यावरणीय संतुलन के लिए आवश्यक है, बल्कि यह हजारों लोगों के लिए मानसिक शांति, स्वास्थ्य और प्रेरणा का भी महत्वपूर्ण स्रोत है।
इसके साथ ही चंडीगढ़ को पार्कों और बगीचों का सुंदर शहर भी कहा जाता है, जहाँ लगभग 1900 छोटे-बड़े पार्क और उद्यान हैं। जाकिर हुसैन रोज़ गार्डन, जापानी गार्डन, लेज़र वैली, बटरफ्लाई पार्क और बर्ड पार्क जैसे हरित स्थल न केवल शहर की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं, बल्कि इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट और स्वच्छ पहचान भी प्रदान करते हैं।
मैं समझता हूँ कि इन सभी प्राकृतिक स्थलों का संरक्षण और उनकी समुचित देखभाल केवल प्रशासन की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सभी नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। यदि हम मिलकर इन हरित धरोहरों को संरक्षित करने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी इस प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय संतुलन का आनंद ले सकेंगी।
महात्मा गांधी जी ने कहा था, “पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन हर मनुष्य के लालच को नहीं।”यह कथन हमें याद दिलाता है कि हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जितना हमारी आवश्यकता हो, और उसके संरक्षण के लिए अपनी जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।
आज की युवा पीढ़ी के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संदेश है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। लेकिन हमें यह समझना होगा कि सतत विकास तभी संभव है जब हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखें।
मैं युवाओं से विशेष रूप से यह आग्रह करना चाहता हूँ कि वे पर्यावरण संरक्षण को केवल एक नारा न समझें, बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।
पेड़ लगाना, जल का संरक्षण करना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना और प्राकृतिक स्थलों की स्वच्छता बनाए रखना, ये छोटे-छोटे कदम भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।
सुखना झील स्वयं इस बात का प्रतीक है कि यदि मनुष्य प्रकृति के साथ सहयोग और संवेदनशीलता के साथ कार्य करे, तो वह एक ऐसा वातावरण बना सकता है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बने।
आज प्रस्तुत यह कलाकृति हमें न केवल सुखना झील की सुंदरता का अनुभव कराती है, बल्कि हमें यह भी प्रेरित करती है कि हम अपनी प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा के लिए अधिक जागरूक और प्रतिबद्ध बनें।
मैं एक बार फिर श्री हरप्रीत संधू जी को इस अद्भुत चित्रात्मक कृति के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। उनकी यह रचना निश्चित रूप से कला प्रेमियों, प्रकृति प्रेमियों और आम नागरिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है शांति, संतुलन, ऊर्जा और जीवन। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे संजोए रखें और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें।
आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपनी प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा करेंगे, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहेंगे और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की संस्कृति को आगे बढ़ाएंगे।
इसी आशा और विश्वास के साथ, मैं इस सुंदर कलाकृति के लिए श्री हरप्रीत संधू को हार्दिक बधाई देता हूँ।
धन्यवाद,
जय हिंद!