SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF 188TH DIKSHA JAYANTI OF SH. ROOP CHAND JI MAHARAJ AT JAGRAON ON MARCH 8, 2026.
- by Admin
- 2026-03-08 13:45
श्री रूप चंद महाराज जी की 188वीं दीक्षा जयंती के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 08.03.2026, रविवार समयः सुबह 11:30 बजे स्थानः जगराओं, पंजाब
परम श्रद्धेय संत समाज, मंच पर आसीन सभी गणमान्य अतिथिगण, श्री रूप चंद एस.एस. जैन बिरादरी (जगराओं) के कर्मठ पदाधिकारीगण, और यहाँ विशाल संख्या में पधारे मेरे सभी धर्मप्रेमी भाइयो, बहनो और प्यारे बच्चो!
आज इस अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत आयोजन में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे असीम शांति, गौरव और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति हो रही है। आज का यह दिन कोई साधारण दिन नहीं है।
आज हम सब यहाँ 1812 में लुधियाना में जन्में एक महान विभूति, त्याग और तपस्या के शिखर पुरुष, परम पूज्य श्री रूप चंद जी महाराज की 188वीं दीक्षा जयंती मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं। मैं उस महान आत्मा के श्रीचरणों में अपना कोटि-कोटि वंदन और नमन अर्पित करता हूँ।
साथ ही, मैं श्री रूप चंद एस.एस. जैन बिरादरी, जगराओं को भी हृदय से साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने इतने भव्य और सुव्यवस्थित आयोजन के माध्यम से हमें एक मंच पर लाकर इस पुण्य का भागीदार बनने का अवसर प्रदान किया है।
यह जानकर अत्यंत हर्ष हुआ कि श्री रूप चंद एस.एस. जैन बिरादरी, जगराओं द्वारा समाज सेवा के विविध और अत्यंत उपयोगी प्रकल्प संचालित किए जा रहे हैं। विशेष रूप से जगराओं नगर में लगभग 2 हजार विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाला ‘स्वामी रूप चंद जैन सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल’ शिक्षा के क्षेत्र में एक सशक्त योगदान दे रहा है। इसके साथ ही समस्त सुविधा के साथ ‘श्री रूप चंद जैन चैरिटेबल अस्पताल’ के माध्यम से मामूली दरों पर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान कर जन-कल्याण का सराहनीय कार्य किया जा रहा है।
यह अत्यंत गर्व का विषय है कि इस अस्पताल के माध्यम से बिरादरी जीव दया और करुणा की अपनी पावन भावना को साकार करते हुए पक्षियों सहित अन्य निराश्रित जीवों की सेवा और संरक्षण का सराहनीय कार्य कर रही है।
वहीं ‘श्री रूप चंद जैन जंज घर’ सामाजिक और सामुदायिक गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में समाज को जोड़ने का कार्य कर रहा है। ये सभी पहलें इस बात का प्रमाण हैं कि संस्था न केवल आध्यात्मिक मूल्यों को संजोए हुए है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सहयोग के माध्यम से लोकमंगल की भावना को भी साकार कर रही है।
भाइयो और बहनो,
श्रमण संस्कृति को अलंकृत करने वाली दिव्य विभूति, चमत्कारी महापुरुष और महान तपस्वी स्वामी श्री रूप चंद जी महाराज का तपोमय जीवन वास्तव में इतिहास की एक स्वर्णिम कड़ी है। उनका जीवन केवल एक संत का जीवन नहीं था, बल्कि वह मानवता के लिए प्रकाश-पुंज के समान था। ऐसे महामुनि कर्मयोगी का अवतरण उस समय हुआ जब समाज को दिशा, संयम और आध्यात्मिक जागरण की आवश्यकता थी। उनका पावन स्मरण ही श्रद्धा, विश्वास और आत्मिक शांति का अनुभव कराता है।
उन्होंने पंचमहाव्रतों का कठोरता से पालन करते हुए अहिंसा, अभय और अपरिग्रह के सिद्धांतों को अपने जीवन में पूर्णतः उतारा। नगर-नगर और ग्राम-ग्राम भ्रमण कर उन्होंने प्राणी मात्र के कल्याण का संदेश दिया। उनका निष्काम तप, त्याग और संयम जैन धर्म की मर्यादा और गौरव को नई ऊँचाइयों तक ले गया। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि सच्चा धर्म उपदेशों से नहीं, बल्कि जीवन के आदर्शों से स्थापित होता है।
परम श्रद्धेय स्वामी श्री रूप चंद जी महाराज एक सच्चे संत, निस्पृह योगी और दृढ़ संकल्प के प्रतीक थे। उनका जीवन सादगी, संयम और आत्मबल का अद्भुत उदाहरण है। उनके चिंतन और स्मरण से मन में श्रद्धा, शांति और समाधान का भाव जागृत होता है। जो भी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके पावन चरणों में समर्पित हुआ, उसका जीवन धन्य हो गया।
उनकी दिव्य प्रेरणा आज भी समाज को आलोकित कर रही है। उनका तप और त्याग केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक है। ऐसे महान संत की गौरवगाथा हमें यह संदेश देती है कि आत्मसंयम, सेवा और करुणा के माध्यम से ही जीवन को सार्थक और राष्ट्र को सशक्त बनाया जा सकता है।
जब हम परम पूज्य श्री रूप चंद जी महाराज के जीवन पर दृष्टि डालते हैं, तो हमें यह समझ आता है कि सच्चा जीवन वह नहीं है जो भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगने में बीत जाए, बल्कि सच्चा जीवन वह है जो आत्म-कल्याण और जनकल्याण के लिए समर्पित हो।
वर्ष 1838 में, आज से 188 वर्ष पूर्व, जब उन्होंने दीक्षा ग्रहण की थी, तब उन्होंने केवल अपने घर-परिवार का ही त्याग नहीं किया था, बल्कि उन्होंने अपने भीतर के मोह, माया, लोभ और अहंकार का भी पूर्ण रूप से त्याग कर दिया था।
जैन धर्म में दीक्षा का मार्ग, जिसे ‘संयम का मार्ग’ कहा जाता है, फूलों की सेज नहीं है; यह तो नंगी तलवार की धार पर चलने के समान है। नंगे पाँव पदयात्रा करना, कठोर तपस्या करना, एक ही वस्त्र में सर्दी-गर्मी सहना और अपने शरीर को कष्ट देकर आत्मा को निर्मल बनाना, ये सब श्री रूप चंद जी महाराज ने अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखाया।
उनका जीवन भगवान महावीर के संदेशों का जीवंत स्वरूप था। उन्होंने अपने उपदेशों से भटके हुए लोगों को सत्य, अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाया। उनका हर कदम जीव-कल्याण के लिए उठता था और उनकी वाणी से हमेशा प्रेम और शांति की गंगा बहती थी।
महाराज श्री का जगराओं नगरी से विशेष और आत्मीय संबंध रहा है। अपने तपस्वी जीवन के अंतिम चरण उन्होंने यहीं व्यतीत किए और यहीं पर वर्ष 1880 में उनका स्वर्गवास हुआ। इस पावन भूमि ने उनके तप, त्याग और साधना को साक्षात अनुभव किया है। इसलिए जगराओं केवल एक नगर नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक विरासत का जीवंत साक्षी है।
उनकी पवित्र स्मृति में जगराओं में स्थापित विभिन्न संस्थाएँ आज भी उनके आदर्शों को आगे बढ़ा रही हैं और देशभर में विशेष महत्व रखती हैं। नगर में प्रवेश करते ही ‘स्वामी रूप चंद जैन स्मारक’, जिसे श्रद्धापूर्वक ‘समाधि स्थल’ कहा जाता है, एक पावन तीर्थ के रूप में श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति प्रदान करता है। वहीं डल्ला रोड पर स्थित ‘स्वामी रूप चंद जैन स्वातं आश्रम’ एक सच्चे अर्थों में ‘शांति स्थल’ है, जहाँ महाराज श्री के स्वर्गवास के पश्चात उनका अंतिम संस्कार किया गया था।
ये पावन स्थल केवल स्मारक नहीं हैं, बल्कि वे आध्यात्मिक चेतना, संयम और सेवा की उस परंपरा के प्रतीक हैं, जिसे महाराज श्री ने अपने जीवन से स्थापित किया। आज भी यहाँ आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु उनके तप और त्याग से प्रेरणा प्राप्त करता है और आत्मिक शांति का अनुभव करता है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
हमारे देश और विशेषकर पंजाब की यह पावन धरती हमेशा से गुरुओं, पीरों, फकीरों और संतों की धरती रही है। हमारे समाज में साधु-संतों का स्थान राजाओं और सम्राटों से भी ऊपर माना गया है। राजा केवल एक राज्य पर शासन करता है, लेकिन एक संत लोगों के दिलों पर राज करता है।
संत उस प्रकाश-स्तंभ के समान होते हैं, जो संसार रूपी भवसागर में डूबते हुए लोगों को सही दिशा दिखाते हैं। आज के इस भौतिकवादी युग में, जहाँ इंसान पैसे, पद और प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में भाग रहा है, तनाव और अवसाद से घिर रहा है, वहाँ हमारे साधु-संत ही हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची खुशी बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे भीतर की शांति में है।
संत समाज रूपी वृक्ष की जड़ें होते हैं। जैसे जड़ें मिट्टी को थामे रखती हैं, वैसे ही संत समाज को नैतिकता, संस्कारों और मानवीय मूल्यों से जोड़े रखते हैं। परम पूज्य श्री रूप चंद जी महाराज जैसे संत जब इस धरती पर अवतरित होते हैं, तो वे अपने तप के तेज से पूरे समाज के पापों और बुराइयों को भस्म कर देते हैं।
प्रिय श्रद्धालुजनो,
जब हम आज अपने आस-पास की दुनिया पर नज़र डालते हैं, तो हृदय पीड़ा से भर उठता है। आज पूरी दुनिया युद्ध की विभीषिका, बढ़ती हिंसा, भयानक पर्यावरण संकट और असहिष्णुता जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। भौतिक प्रगति के इस दौर में मनुष्य ने सुख के साधन तो जुटा लिए हैं, लेकिन उसके मन की शांति छिन गई है।
ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में, भगवान महावीर और परम पूज्य श्री रूप चंद जी महाराज द्वारा दिखाया गया जैन दर्शन का मार्ग पूरी मानवता के लिए एकमात्र संजीवनी है। महाराज जी ने अपने आचरण से हमें सिखाया कि समाज और विश्व का कल्याण केवल अहिंसा, अनेकांतवाद, और अपरिग्रह के तीन मजबूत स्तंभों पर टिक सकता है।
अगर हम ‘अहिंसा’ को सच्चे अर्थों में अपना लें, तो विश्व में कोई युद्ध नहीं होगा। लेकिन हमें यह समझना होगा कि अहिंसा केवल हथियारों से किसी को चोट न पहुँचाना नहीं है। महाराज जी ने ‘मन, वचन और कर्म’ की अहिंसा पर बल दिया। आज के इस डिजिटल और सोशल मीडिया के युग में, जहाँ शब्दों के बाणों से लोगों को गहरे घाव दिए जाते हैं, वहाँ वैचारिक अहिंसा की सबसे अधिक आवश्यकता है। किसी का दिल दुखाना भी एक प्रकार की हिंसा है। अहिंसा हमें हर जीव के प्रति प्रेम और करुणा का भाव सिखाती है।
आज समाज में जो भी वैचारिक मतभेद, तनाव या दंगे हैं, उनका मूल कारण अहंकार है। यह अहंकार कि ‘केवल मैं ही सही हूँ।’ अगर हम ‘अनेकांतवाद’ को समझ लें, तो हम जान पाएंगे कि सत्य के कई पहलू हो सकते हैं और दूसरों के विचार भी उतने ही सही हो सकते हैं जितने कि हमारे।
पंजाब की यह पावन धरती, जिसने हमेशा गुरुओं के सर्वधर्म समभाव और भाईचारे के संदेश को अपनाया है, वहाँ अनेकांतवाद का यह सिद्धांत लोकतंत्र और सांप्रदायिक सौहार्द की सबसे मजबूत नींव है। यह हमें सिखाता है कि हम दूसरों की मान्यताओं का भी हृदय से सम्मान करें।
आज जो जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का संकट हमारे सामने खड़ा है, वह मनुष्य के असीमित लालच का परिणाम है। यदि हम ‘अपरिग्रह’ (आवश्यकता से अधिक संचय न करना) का पालन करते हुए अपनी जरूरतों को सीमित कर लें, तो धरती पर कोई भूखा नहीं सोएगा और हमारी प्रकृति का यह अंधाधुंध दोहन रुक जाएगा।
महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘‘प्रकृति के पास हमारी ज़रूरत पूरी करने के लिए सब कुछ है, लेकिन हमारे लालच को पूरा करने के लिए नहीं।’’ अपरिग्रह हमें सादगी और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना सिखाता है।
इन सबके साथ, मैं जैन दर्शन के एक और महान सूत्र का उल्लेख करना चाहूँगा, जिसे महाराज जी ने अपने जीवन में जिया, वह है ‘क्षमा’। ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ का संदेश दुनिया का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक उपचार है। जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं और अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हैं, तो हम अपने भीतर की घृणा और द्वेष को खत्म कर देते हैं। एक क्षमाशील समाज ही एक मजबूत और सुखी समाज बन सकता है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
परम पूज्य श्री रूप चंद जी महाराज का पूरा जीवन केवल कोरे उपदेशों का नहीं, बल्कि आचरण का जीवन था। उन्होंने जीवन भर इन्हीं सिद्धांतों का स्वयं पालन किया और फिर उनका प्रचार-प्रसार किया। आज उनकी 188वीं दीक्षा जयंती पर, हमारे लिए सबसे बड़ी सीख यही है कि हम इन सिद्धांतों को केवल ग्रंथों तक सीमित न रखें, बल्कि इन्हें अपने दैनिक जीवन, अपने व्यापार, अपने परिवार और अपने समाज में उतारें।
मैं जगराओं के इस ऐतिहासिक शहर के लोगों और विशेष रूप से श्री रूप चंद एस.एस. जैन बिरादरी की पूरी टीम की प्रशंसा करता हूँ। आप केवल एक आयोजन नहीं कर रहे हैं, बल्कि आप अपनी आने वाली पीढ़ियों, अपने युवाओं और बच्चों को अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कारों से परिचित करा रहे हैं। एक ऐसे समय में जब हमारी युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में अपनी जड़ों से दूर हो रही है, ऐसे धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन उन्हें संस्कारवान बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।
मेरा आप सभी से, विशेषकर युवाओं से, आह्वान है कि महाराज जी की इस 188वीं दीक्षा जयंती पर केवल उनके चित्र पर माल्यार्पण करना ही पर्याप्त नहीं है। सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि हम उनके चरित्र को अपने जीवन में उतारें। हम संकल्प लें कि हम अपने जीवन में सत्य बोलेंगे, किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुँचाएंगे, समाज में भाईचारा बनाए रखेंगे और नशे जैसी बुराइयों से दूर रहेंगे।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि पंजाब की यह धरती, जिसने हमेशा देश को अन्न और शूरवीर दिए हैं, वह संतों के आशीर्वाद से हमेशा फलती-फूलती रहे। पंजाब में हमेशा आपसी प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द और शांति का वातावरण बना रहे, यही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है।
एक बार फिर, इस परम पावन अवसर पर मुझे आमंत्रित करने और इतना सम्मान देने के लिए मैं आयोजकों और आप सभी श्रोताओं का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। परम पूज्य श्री रूप चंद जी महाराज की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे।
धन्यवाद!
जय हिंद!
जय महावीर!