SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF PUNJAB HORSE BREED HERITAGE SHOW AT PATIALA ON 09.03.2026.

‘पंजाब हॉर्स ब्रीड हेरिटेज शो’ के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 09.03.2026,  सोमवारसमयः दोपहर 12:00 बजेस्थानः पटियाला

 

नमस्कार!

आज, पटियाला की इस ऐतिहासिक और शाही धरती पर, ‘पंजाब हॉर्स ब्रीड हेरिटेज शो’ के इस भव्य आयोजन में आप सभी के बीच मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता और गर्व की अनुभूति हो रही है। मैं प्रोफेसर सुमेर सिरा को हृदय से धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने मुझे इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के कार्यक्रम का हिस्सा बनने का अवसर दिया।

मैं इस अवसर पर प्रोफेसर सुमेर सिरा के महत्वपूर्ण योगदान का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूँगा, जिन्होंने पंजाबी घोड़ा नस्ल के संरक्षण और संवर्धन के लिए उल्लेखनीय समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य किया है। 

लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व, वर्ष 2011 में, उन्होंने पंजाब में 40 किलोमीटर की प्रथम 'Horse Endurance Race' का आयोजन कर एक अग्रणी पहल की थी। इसी क्रम में वर्ष 2012 में दूसरी 'Horse Endurance Race' का आयोजन किया गया। इस पहल ने हमारे स्वदेशी घोड़ों की सहनशक्ति, दृढ़ता और उत्कृष्टता को प्रदर्शित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

वर्षों से उन्होंने पंजाब नस्ल की करामती लाइन के संरक्षण और संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे इस मूल्यवान वंश परंपरा को सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने में सहायता मिली है। उनके निरंतर प्रयासों ने प्रजनकों, घुड़सवारों और अश्व-प्रेमियों को एक साथ जोड़ने का कार्य किया है, जो इस महत्वपूर्ण विरासत के संरक्षण के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध हैं।

आज आयोजित पंजाब हॉर्स ब्रीड हेरिटेज शो भी उनके दूरदर्शी विचार और सतत प्रयासों का ही परिणाम है, जो पंजाब की समृद्ध अश्व परंपराओं को जीवित रखने और उन्हें नई पीढ़ियों तक पहुँचाने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

साथियों,

मैं समझता हूं कि आज का यह आयोजन केवल एक प्रदर्शनी नहीं है, बल्कि यह हमारी उस विरासत का उत्सव है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। पंजाब के पारंपरिक और स्वदेशी घोड़ा नस्लों, जैसे करामती, माजुखे, नुकरा और चंबा का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। ये नस्लें केवल पशुधन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पंजाब की पहचान, उसकी संस्कृति और उसके इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इन स्वदेशी घोड़ा नस्लों में अद्भुत सहनशक्ति, गति, सौंदर्य और बुद्धिमत्ता देखने को मिलती है। ये नस्लें सदियों से पंजाब के ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग रही हैं। हमारे पूर्वजों ने इन नस्लों को बड़े प्रेम और समर्पण के साथ संरक्षित किया और आज यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम भी इस धरोहर को सुरक्षित रखें।

आज के इस आधुनिक और मशीनी युग में, जहाँ घोड़ों का उपयोग दैनिक जीवन में पहले की तुलना में कम हो गया है, हमारी इन अनमोल स्वदेशी नस्लों के लुप्त होने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में इन नस्लों के संरक्षण, इनके सांस्कृतिक महत्व और हमारी ग्रामीण विरासत में इनके योगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

जब पूरी दुनिया जैव विविधता के संरक्षण पर बल दे रही है, तब हमारे लिए भी यह जरूरी है कि हम अपनी स्वदेशी पशु नस्लों को सुरक्षित रखें। यह प्रयास केवल हमारी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को सहेजने का माध्यम ही नहीं है, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी घोड़ों का विशेष महत्व है। अश्व पालन, प्रशिक्षण, पर्यटन और खेलों के माध्यम से यह क्षेत्र रोजगार के नए अवसर भी प्रदान कर सकता है। यदि हम संगठित प्रयास करें तो अश्व पालन को ग्रामीण उद्यमिता का एक सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है।

साथियो,

पंजाब की धरती केवल कृषि की ही नहीं, बल्कि शूरवीरों, गुरुओं और महान योद्धाओं की धरती रही है। हमारे इतिहास के पन्ने पलट कर देखें, तो आप पाएंगे कि पंजाब के वीरों की गाथाएं उनके शानदार घोड़ों के बिना अधूरी हैं। 

चाहे वह दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के घोड़ों की वीरता और स्वामिभक्ति का प्रसंग हो, या फिर शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी के विश्व प्रसिद्ध घोड़े हों, पंजाब के इतिहास, संस्कृति और युद्ध कौशल में घोड़ों का हमेशा एक अत्यंत श्रद्धेय और केंद्रीय स्थान रहा है।

भारत की प्राचीन सभ्यता में भी घोड़े का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ऋग्वेद में अश्व की महिमा का उल्लेख मिलता है और प्राचीन काल में घोड़ा शक्ति, गति और वैभव का प्रतीक माना जाता था। वैदिक काल में आयोजित होने वाला अश्वमेध यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं था, बल्कि वह राज्य की शक्ति, समृद्धि और सामर्थ्य का प्रतीक भी था। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय सभ्यता में घोड़े का महत्व हजारों वर्षों से रहा है।

प्राचीन भारत में घोड़े न केवल युद्ध के लिए बल्कि व्यापार, संदेश-वाहन और लंबी यात्राओं के लिए भी अत्यंत आवश्यक थे। उस समय परिवहन और संचार के साधन सीमित थे, इसलिए घोड़े ही राजाओं, सैनिकों और दूतों के लिए सबसे विश्वसनीय साथी हुआ करते थे।

पंजाब के इतिहास और लोककथाओं में घोड़ों को सदैव वीरता और सम्मान के प्रतीक के रूप में देखा गया है। युद्ध के मैदान से लेकर राजदरबारों तक, कृषि से लेकर परिवहन तक, घोड़े हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और सैन्य जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। पंजाब के योद्धाओं की शौर्यगाथाओं में घोड़े केवल एक वाहन नहीं, बल्कि उनके साहस और आत्मविश्वास के प्रतीक रहे हैं।

आज भी पंजाब के अनेक हिस्सों में एक उत्कृष्ट घोड़े की उपस्थिति को बड़े आदर और प्रशंसा के साथ देखा जाता है। यह हमें मनुष्य और इन अद्भुत पशुओं के बीच पीढ़ियों से चले आ रहे गहरे संबंध की याद दिलाता है।

पंजाबी घोड़ा, जो अपनी गरिमा, सहनशक्ति और श्रेष्ठ स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है, केवल एक नस्ल भर नहीं है। यह हमारे अतीत से जुड़ी एक जीवंत कड़ी का प्रतिनिधित्व करता है। आज इन शानदार घोड़ों में जो सौंदर्य और गरिमा हम देखते हैं, वह सदियों से चली आ रही परंपरा, समर्पण और सांस्कृतिक गौरव को प्रतिबिंबित करता है।

मैं समझता हूं कि पंजाब हॉर्स ब्रीड हेरिटेज शो जैसे आयोजन इस महत्वपूर्ण विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करते हैं। ऐसे कार्यक्रम प्रजनकों, प्रशिक्षकों, अश्व-प्रेमियों और युवाओं को एक साथ लाकर इस गौरवशाली धरोहर के संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करते हैं।

मैं उन सभी प्रजनकों और देखभाल करने वालों के समर्पण की विशेष सराहना करना चाहता हूँ, जिन्होंने अथक परिश्रम और लगन के साथ इस उत्कृष्ट नस्ल की शक्ति और शुद्धता को बनाए रखा है। उनके जुनून और निरंतर प्रयासों ने यह सुनिश्चित किया है कि पंजाबी घोड़ा आज भी प्रशंसा और सम्मान का विषय बना हुआ है।

साथियो, 

अश्व पालन केवल एक शौक या जुनून नहीं है, बल्कि यह कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उद्यम भी है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि सरकार हमारे पशुपालकों और अश्व पालकों के कल्याण तथा उनके आर्थिक सशक्तिकरण के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। इसी दिशा में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं, जिनका उद्देश्य इस क्षेत्र को अधिक संगठित, वैज्ञानिक और लाभकारी बनाना है।

भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय पशुधन मिशन का दायरा बढ़ाते हुए अब इसमें स्वदेशी नस्ल के घोड़ों, गधों और ऊँटों को भी शामिल किया गया है। इस योजना के अंतर्गत यदि कोई उद्यमी, किसान उत्पादक संगठन या स्वयं सहायता समूह स्वदेशी घोड़ों का प्रजनन फार्म स्थापित करना चाहता है, तो उसे परियोजना लागत पर 50 प्रतिशत तक की पूंजीगत सब्सिडी प्रदान की जाती है, जो अधिकतम 50 लाख रुपये तक हो सकती है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक और असंगठित अश्व पालन क्षेत्र को एक संगठित, आधुनिक और लाभदायक व्यवसाय के रूप में विकसित करना है।

इसी प्रकार, अब पशुपालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। खेती की तरह ही पशुपालन और अश्व पालन से जुड़े पशुपालक भी इस योजना के अंतर्गत अपने पशुओं के चारे, देखभाल और पशु-चिकित्सा से संबंधित दैनिक खर्चों के लिए रियायती ब्याज दरों पर अल्पकालिक ऋण प्राप्त कर सकते हैं। इस योजना के अंतर्गत 1.6 लाख रुपये तक का ऋण बिना किसी गारंटी के उपलब्ध कराया जाता है, जिससे पशुपालकों को आर्थिक सहयोग मिलता है।

इसके अतिरिक्त, स्वदेशी घोड़ों की श्रेष्ठ नस्लों के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन को बढ़ावा देने के लिए सीमेन स्टेशन और न्यूक्लियस ब्रीडिंग फार्म जैसी आधुनिक सुविधाओं के विकास हेतु भी सरकार द्वारा प्रोत्साहन और अनुदान प्रदान किया जा रहा है। इससे हमारी पारंपरिक और मूल्यवान नस्लों का संरक्षण अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से सुनिश्चित किया जा सकेगा।

मैं यहाँ उपस्थित सभी युवा उद्यमियों, किसानों और अश्व पालकों से आग्रह करता हूँ कि वे आगे आएँ, पशुपालन विभाग से जुड़ें और इन सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाकर इस क्षेत्र को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में अपना योगदान दें।

साथियो,

मुझे यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि आज की युवा पीढ़ी भी अश्व परंपराओं और घुड़सवारी के प्रति रुचि दिखा रही है। खेलों, पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से अश्व संस्कृति को पुनर्जीवित करने की दिशा में सकारात्मक प्रयास हो रहे हैं।

अश्व खेल, विशेषकर एंड्यूरेंस रेस, पोलो, टेंट पेगिंग और शो जंपिंग, न केवल खेल के रूप में बल्कि कौशल, अनुशासन और साहस के प्रतीक के रूप में भी महत्वपूर्ण हैं। यदि हम इन खेलों को बढ़ावा दें, तो इससे युवाओं को भी नए अवसर मिल सकते हैं और हमारी पारंपरिक अश्व संस्कृति को भी नई ऊर्जा प्राप्त होगी।

इस अवसर पर मैं उन सभी प्रजनकों, प्रशिक्षकों और अश्व प्रेमियों के प्रयासों की सराहना करना चाहूँगा, जो वर्षों से इस क्षेत्र में समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। उनका योगदान हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि घोड़ा केवल हमारे इतिहास का हिस्सा नहीं है; यह हमारी पहचान, हमारी परंपरा और हमारी विरासत का भी प्रतीक है।

आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम स्वदेशी घोड़ा नस्लों अपनी इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण करेंगे, उन्हें प्रोत्साहित करेंगे और आने वाली पीढ़ियों तक गर्व के साथ पहुँचाएंगे।

इसी आशा और विश्वास के साथ मैं इस आयोजन की सफलता के लिए सभी आयोजकों, प्रतिभागियों और अश्व प्रेमियों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।                           

धन्यवाद, 

जय हिंद!