SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF RAM KATHA AND BHOOMI PUJAN OF LORD NARAYAN’S GARUDA SATHAMBH AT MOHALI ON MARCH 25, 2026.
- by Admin
- 2026-03-25 20:40
श्री बाँके बिहारी धाम द्वारा ‘श्री राम कथा’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 25.03.2026, बुधवार समयः शाम 6:00 बजे स्थानः मोहाली
आप सभी को मेरा सप्रेम नमस्कार, जय श्रीराम और चैत्र नवरात्रि तथा रामनवमी के इस परम पुनीत पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!
आज मोहाली के इस पवित्र ‘श्रीवेंकटेश मन्दिर, बांके बिहारी धाम’ के प्रांगण में आकर मुझे असीम शांति और दिव्यता की अनुभूति हो रही है। जब किसी एक ही स्थान पर श्रीवेंकटेश (भगवान विष्णु), बांके बिहारी (श्रीकृष्ण) और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की कृपा बरस रही हो, तो वह स्थान साक्षात वैकुंठ बन जाता है।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि दिनांक 19 मार्च 2026 से 27 मार्च 2026 तक, चैत्र नवरात्रि के इस अत्यंत शुभ अवसर पर आप सभी ने ‘श्रीराम कथा’ के इस भव्य आयोजन का संकल्प लिया है। इसके साथ ही, रामनवमी के इस पावन अवसर पर प्रभु श्रीराम को ‘छत्र अर्पण’ का यह ऐतिहासिक अनुष्ठान, पंजाब की इस महान और शूरवीर धरती पर आध्यात्मिक ऊर्जा का एक नया संचार करेगा।
मुझे ज्ञात हुआ है कि ‘श्रीवेंकटेश मन्दिर, बांके बिहारी धाम’ की स्थापना वर्ष 2020 में इस पावन श्रीराम कथा का वाचन कर रहे पूज्य स्वामी श्री निवासाचार्य जी के प्रेरणादायी मार्गदर्शन में हुई। इस पावन धाम के निर्माण हेतु टीडीआई सिटी के अध्यक्ष श्री रविंद्र तनेजा जी ने निःशुल्क भूमि प्रदान कर उदार सहयोग दिया है, साथ ही इसके निर्माण कार्य में भी सक्रिय योगदान देकर सेवा और समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है।
यह धाम, पंचकुला स्थित माता मनसा देवी परिसर में स्थापित ‘श्री मुक्तिनाथ वेद विद्या आश्रम संस्कृत गुरूकुल’ की गौरवशाली परंपरा से संचालित है। इस गुरूकुल में वेदों और पुराणों की निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है, जहाँ वर्तमान में लगभग 80 छात्र अध्ययनरत हैं और 500 से अधिक छात्र अध्ययन कर देश समाज की सेवा कर रहे हैं। यह अत्यंत सराहनीय है कि उसी आदर्श और संकल्प को आगे बढ़ाते हुए, इस धाम में भी इस वर्ष से गुरूकुल के माध्यम से वैदिक शिक्षा का शुभारंभ किया गया है, जिससे हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त प्रयास हो रहा है।
इसके साथ ही, यह धाम केवल आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यहाँ एक होम्योपैथी डिस्पेंसरी के माध्यम से जरूरतमंदों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्रदान की जा रही है। समय-समय पर रक्तदान शिविरों का आयोजन कर समाज में सेवा और मानवता की भावना को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की बेटियों के विवाह का आयोजन कर यह धाम सामाजिक उत्तरदायित्व का एक अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणादायी निर्वहन कर रहा है।
मैं समझता हूँ कि यह धाम केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, सेवा और संस्कार का एक समन्वित केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ अध्यात्म के साथ-साथ समाज कल्याण की भावना भी समान रूप से पोषित हो रही है।
देवियो और सज्जनो,
जब हम ‘श्रीराम कथा’ का श्रवण करते हैं, तो हम केवल एक राजा या एक देवता की जीवन गाथा नहीं सुन रहे होते; हम वास्तव में मानवता के सर्वाेच्च और कालजयी आदर्शों का पाठ पढ़ रहे होते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने भगवान राम के विषय में सटीक ही कहा है, ‘‘रामो विग्रहवान् धर्मः’’ अर्थात् श्रीराम साक्षात धर्म के मूर्त रूप हैं।
भगवान राम का जीवन हमें सिखाता है कि जीवन के हर रूप में ‘मर्यादा’ और ‘कर्तव्य’ क्या होता है।
वे एक आदर्श पुत्र हैं, जिन्होंने पिता के एक वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन को तिनके के समान त्याग कर 14 वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया।
वे एक आदर्श भ्राता हैं, जिनका भरत और लक्ष्मण के साथ प्रेम आज के भौतिकवादी युग में भाईचारे की सबसे बड़ी मिसाल है।
वे एक आदर्श मित्र हैं, जिन्होंने निषादराज गुह और सुग्रीव को गले लगाकर समाज से ऊंच-नीच का भेद मिटाया और सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण पेश किया। और सबसे बढ़कर, वे एक आदर्श शासक हैं, जिन्होंने ‘रामराज्य’ की स्थापना की।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज के आधुनिक युग में, जहाँ समाज अनेक प्रकार के नैतिक, सामाजिक और मानसिक संकटों से जूझ रहा है, भगवान राम का जीवन-दर्शन हमारे लिए एक अचूक मार्गदर्शक है। हम अक्सर ‘रामराज्य’ की बात करते हैं।
रामराज्य का अर्थ केवल किसी विशेष धर्म का राज्य नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी लोक-कल्याणकारी शासन व्यवस्था है, जहाँ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (चाहे वह शबरी हो या केवट) को भी समान सम्मान और न्याय मिले।
यह एक ऐसा राज्य है जहाँ सत्य, करुणा, अनुशासन और त्याग का शासन हो। आज के प्रत्येक नागरिक, विशेषकर हमारे युवाओं और प्रशासकों को श्रीराम के जीवन से यह सीखना चाहिए कि अधिकार से बड़ा ‘कर्तव्य’ होता है।
श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, संयम और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। चाहे वह वनवास का कठिन समय हो, या रावण जैसे अत्याचारी से संघर्ष, उन्होंने हर परिस्थिति में धर्म का साथ दिया।
जैसा कि रामचरितमानस में कहा गया है, ‘‘धर्म तें बिरति, जोग तें ज्ञाना। ज्ञान मोच्छ-प्रद बेद बखाना।।’’ यह पंक्ति हमें यह संदेश देती है कि धर्म का पालन ही जीवन के उच्चतम उद्देश्यों की ओर ले जाता है।
श्रीराम का जीवन हमें यह सिखाता है कि परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारियाँ सर्वाेपरि हैं। सत्य और ईमानदारी से बढ़कर कोई मूल्य नहीं है। नेतृत्व का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि सेवा और त्याग है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा हैः
‘‘मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी।’’ प्रभु राम हमारे सभी अमंगलों को दूर करने वाले हैं। लेकिन उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए हमें उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारना होगा। मैं आज यहाँ उपस्थित सभी नागरिकों से यह आह्वान करता हूँ कि श्रीराम के जीवन से धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा सीखें।
हम हमेशा अपने अधिकारों की मांग करते हैं, लेकिन यदि हम सब अपने-अपने कर्तव्यों का पालन पूरी ईमानदारी से करें, फिर चाहे वह घर-परिवार में हो, हमारे कार्यस्थल पर हो, या समाज और देश के प्रति हो, तो हमारा पंजाब और हमारा भारत स्वतः ही रामराज्य के उस महान सपने को फिर से साकार कर लेगा।
आज जब हम ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं, तब हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा विकास केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक भी हो। श्रीराम के आदर्श हमें एक ऐसे समाज के निर्माण की प्रेरणा देते हैं, जहाँ न्याय, समानता और करुणा का वास हो।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
सनातन धर्म को केवल एक पूजा-पद्धति या संकीर्ण मजहब के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। यह वास्तव में एक अनादि और अनंत जीवन पद्धति है; एक ऐसा गहन दर्शन है जो ब्रह्मांड के सत्य, प्रकृति के नियमों और मानव जीवन के सर्वाेच्च उद्देश्यों को उद्घाटित करता है। यह वह धुरी है जिस पर नैतिकता, करुणा और सह-अस्तित्व का पूरा ढांचा टिका हुआ है।
सनातन धर्म की सबसे बड़ी और सुंदर देन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना है। आज जब विश्व सीमाओं, भाषाओं और वैचारिक मतभेदों के कारण बंटा हुआ है, तब सनातन दर्शन हमें याद दिलाता है कि हमारे भीतर चेतना का जो प्रकाश है, वही हर जीव में विद्यमान है। यह हमें सिखाता है कि समस्त मानवता एक ही वृहद परिवार का हिस्सा है। इसी भावना के कारण सनातन धर्म ने कभी किसी विचार को नकारा नहीं, बल्कि सभी जीवों के प्रति करुणा, प्रेम और सम्मान का भाव रखने को ही ‘सच्चा धर्म’ माना है।
हमारे पवित्र वेद जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन, प्रामाणिक और वैज्ञानिक ज्ञान स्रोत हैं। ये केवल कर्मकांडों के ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन के हर आयाम का विश्वकोश हैं।
ऋग्वेद हमें प्रकृति और ईश्वर की शक्तियों का ज्ञान देता है। यजुर्वेद हमें जीवन में कर्म और यज्ञ (समर्पण) की महत्ता सिखाता है। सामवेद उपासना, संगीत और मानसिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। अथर्ववेद आयुर्वेद (चिकित्सा), विज्ञान, समाजशास्त्र और दैनिक जीवन के व्यावहारिक ज्ञान का अद्भुत संग्रह है।
वेद हमें न केवल पारलौकिक (आध्यात्मिक) ज्ञान देते हैं, बल्कि जीवन के हर भौतिक क्षेत्र, चाहे वह शासन व्यवस्था हो, शिक्षा नीति हो, अर्थशास्त्र हो या पर्यावरण संरक्षण हो, का अचूक मार्गदर्शन भी करते हैं। वेदों का उद्घोष ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (यह धरती मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ) पर्यावरण के प्रति हमारे कर्तव्य का सबसे प्राचीन और सशक्त संदेश है।
सनातन धर्म हमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह सिखाता है कि प्रगति के साथ-साथ संस्कृति और नैतिकता का संतुलन बनाए रखना नितांत आवश्यक है। आज का मानव तकनीकी और भौतिक विकास के चरम पर पहुँच रहा है; हम अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का निर्माण कर रहे हैं। परंतु, यदि इस चकाचौंध वाली ‘भौतिक प्रगति’ के साथ ‘आध्यात्मिक चेतना’ और ‘नैतिक मूल्यों’ का संतुलन न हो, तो यह विकास ही विनाश का कारण बन जाता है।
तनाव, अवसाद, पर्यावरण संकट और सामाजिक विघटन जैसी आधुनिक समस्याएं इसी असंतुलन का परिणाम हैं। सनातन धर्म हमें सिखाता है कि हम आधुनिकता और विज्ञान का खुले दिल से स्वागत करें, लेकिन अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से कभी न कटें। हमारी जड़ें जितनी गहरी होंगी, हमारी प्रगति का वृक्ष उतना ही ऊंचा और हरा-भरा होगा।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
चैत्र नवरात्र का यह पावन पर्व शक्ति, श्रद्धा और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। यह समय है आत्ममंथन का, अपने भीतर की नकारात्मकताओं को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को अपनाने का।
रामनवमी, जो भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, हमें यह स्मरण कराती है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब धर्म की स्थापना के लिए दिव्य शक्ति अवतरित होती है।
जीवन में सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि हमारे आचरण और मूल्यों से निर्धारित होती है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम सत्य, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को अपने जीवन का आधार बनाएँगे। समाज में प्रेम, सद्भाव और एकता को बढ़ावा देंगे। अपने राष्ट्र को सशक्त और समृद्ध बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएँगे।
ऐसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन केवल आस्था के केंद्र नहीं होते, बल्कि ये समाज को जोड़ने, नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने और हमारी सांस्कृतिक विरासत को संजोने का कार्य भी करते हैं।
मैं इस पावन आयोजन के सफल संचालन हेतु मंदिर समिति, आयोजकों एवं सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ। आपने इस आयोजन के माध्यम से समाज में आध्यात्मिक जागरूकता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया है।
अंत में, मैं भगवान श्रीराम से प्रार्थना करता हूँ कि वे हम सभी को सत्य, धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। हमारे जीवन में शांति, समृद्धि और सद्भाव बना रहे, और हमारा राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे।
आप सभी को चैत्र नवरात्र एवं रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
धन्यवाद,
जय हिंद!
जय श्रीराम!