SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF FOUNDATION DAY OF BIHAR AT PUNJAB LOK BHAVAN ON MARCH 22, 2026.

‘बिहार दिवस’ के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 22.03.2026, रविवारसमयःशाम 5:00 बजेस्थानः पंजाब लोकभवन

         

नमस्कार!

आज, 22 मार्च 2026 को, हम सब यहाँ बिहार दिवस के अवसर पर एकत्रित हुए हैं। यह दिन न केवल बिहार के ऐतिहासिक अस्तित्व की स्मृति है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक, बौद्धिक और सामाजिक विरासत का उत्सव भी है। मैं इस गौरवशाली अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और बिहार की प्रगति, एकता और समृद्धि के लिए अपनी शुभेच्छाएँ प्रकट करता हूँ।

आज जब हम बिहार राज्य का स्थापना दिवस मना रहे हैं तो हम सभी इस तथ्य से भलिभांति परिचित हैं कि हम एक ऐसे देश के वासी हैं जो विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, परंपराओं और मान्यताओं का एक अद्भुत सुमेल है और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम के अन्तर्गत इस अनूठे सुमेल का उत्सव पिछले एक वर्ष से अधिक समय से विभिन्न राज्यों के स्थापना दिवस के रूप में मानाया जा रहा है।

इस प्रकार के आयोजनों से सांस्कृतिक विविधता को न केवल संरक्षित किया जा रहा है, बल्कि इसे नए रूप में आगे भी बढ़ाया जा रहा है। यह हमारे समाज में सहयोग, समरसता और आपसी सम्मान को बढ़ावा देता है, जिससे भारत की ‘‘अनेकता में एकता’’  की भावना और मजबूत होती है।

देश की एकता और अखंडता की भावना की मजबूती के लिए हर प्रदेश में इस तरह का ‘‘राज्य दिवस’’ मनाना, अपने आप में महत्वपूर्ण है। मुझे विश्वास है कि इस प्रकार के कार्यक्रम से देश के सभी राज्यों के बीच पारस्परिक सद्भाव और बंधुत्व की भावना और अधिक सुदृढ़ होगी।

हमारा भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता वाला देश है। यही कारण है कि संपूर्ण विश्व ने हमें ज्ञान एवं संसाधन की भूमि के रूप में देखा है। इसलिए, इस महान देश का नागरिक होना बहुत ही गर्व व सौभाग्य की बात है।

देवियो और सज्जनो,

आज का यह राज्योत्सव केवल एक राज्य का स्थापना दिवस नहीं, बल्कि बिहार की गौरवशाली परंपराओं, इसकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, और इसकी अपार ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने का दिन भी है।

बिहार दिवस प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है। वर्ष 1912 में इसी दिन ब्रिटिश शासन के दौरान बिहार को बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग कर एक स्वतंत्र प्रांत का दर्जा प्रदान किया गया था। आगे चलकर, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के साथ बिहार को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ, जिससे इसके लोकतांत्रिक, प्रशासनिक और विकासात्मक स्वरूप को नई दिशा मिली।

बिहार दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस भूमि का उत्सव है जिसने सदियों तक विश्व को ज्ञान, धर्म, दर्शन और सामाजिक चेतना का प्रकाश दिया। आज, जब बिहार अपनी 114वीं वर्षगांठ मना रहा है, यह अवसर हमें अपने अतीत पर गर्व करने, वर्तमान की उपलब्धियों को सराहने और भविष्य के लिए नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

‘बिहार’ नाम संस्कृत के ‘विहार’से लिया गया है, जिसका अर्थ बौद्ध मठ या निवास स्थान है। यह नामकरण इस भूमि के प्राचीन बौद्धिक और आध्यात्मिक इतिहास का प्रमाण है।

बिहार का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन और विविध इतिहासों में से एक है। यहाँ की भूमि पर मानव सभ्यता के प्रमाण नवपाषाण युग (c.2500-1345 ई.पू.) से मिलते हैं। मगध, मिथिला और भोजपुर-इन तीन ऐतिहासिक क्षेत्रों ने भारतीय संस्कृति, राजनीति और धर्म को गहराई से प्रभावित किया है।

मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) प्राचीन भारत का राजनीतिक, आर्थिक और बौद्धिक केंद्र रही है। यहीं से मौर्य, गुप्त, पाल जैसे महान राजवंशों ने शासन किया। सम्राट अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म का प्रसार भारत से लेकर श्रीलंका, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, अफगानिस्तान, मिस्र और यूनान तक हुआ।

बिहार की बौद्धिक विरासत का सबसे गौरवशाली प्रतीक नालंदा विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। यह विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ एक समय 10,000 से अधिक विद्यार्थी और 2,000 आचार्य अध्ययन-अध्यापन करते थे। नालंदा के विशाल पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ में लाखों हस्तलिखित ग्रंथ थे, जिनकी आग में जलने की कथा आज भी विश्व के लिए एक चेतावनी है। 2016 में इस स्थान को यूनेस्को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल किया गया।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय, पाल वंश के संरक्षण में, बौद्ध अध्ययन और तर्कशास्त्र का दूसरा बड़ा केंद्र था। इन विश्वविद्यालयों ने भारत सहित पूरे एशिया में शिक्षा, शोध व सांस्कृतिक संवाद को नई दिशा दी।

बिहार भारत की उस पावन धरा के रूप में प्रतिष्ठित है, जहाँ बौद्ध, जैन, सिख और हिन्दू चार महान धर्मों का अद्वितीय संगम दिखाई देता है। बोधगया में भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई, वैशाली भगवान महावीर की जन्मस्थली है, और पटना साहिब सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्मस्थान है। वहीं मिथिला की भूमि माता सीता की जन्मभूमि के रूप में रामायण की अमर गाथा का केंद्र रही है।

बिहार के नालंदा, बोधगया, राजगीर, वैशाली, पावापुरी, पटना साहिब, गया तथा वाल्मीकि टाइगर रिजर्व जैसे धार्मिक, ऐतिहासिक व प्राकृतिक पर्यटन स्थल भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विविधता और प्राकृतिक धरोहर के उदाहरण हैं।

बिहार की सांस्कृतिक विविधता उसकी लोक कलाओं, संगीत, नृत्य और साहित्य में झलकती है। मिथिला की मधुबनी पेंटिंग, अंगिका की मंजूषा कला, सिक्की घास शिल्प, और भागलपुरी सिल्क-ये सब बिहार की सांस्कृतिक पहचान हैं। छठ पूजा, झिझिया, जट-जटिन, बिदेसिया, सोहर, कजरी, चइती जैसे लोकगीत और नृत्य बिहार की आत्मा हैं।

इस महान धरती ने भारत को प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक अनेक महान विभूतियाँ प्रदान की हैं। प्राचीन युग में सम्राट अशोक जैसे महानायक हुए, जिन्होंने कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म को अपनाकर अहिंसा, धर्म और लोककल्याण की नीति को आगे बढ़ाया और अपने शिलालेखों के माध्यम से मानवता का संदेश पूरे एशिया में प्रसारित किया। 

इसी धरती ने चाणक्य जैसे महान कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री को जन्म दिया, जिन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य के मार्गदर्शक के रूप में भारतीय राजनीति, प्रशासन और अर्थव्यवस्था को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया। महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने ‘शून्य’की अवधारणा, पाई का मान और पृथ्वी की गति के सिद्धांतों के माध्यम से विश्व को नई दिशा दी, जो आज भी वैज्ञानिक जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम के काल में भी बिहार की धरती ने अद्वितीय साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। वीर कुंवर सिंह ने 80 वर्ष की आयु में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध वीरतापूर्वक नेतृत्व किया। 

डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जो भारत के प्रथम राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष रहे, ने राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ के माध्यम से समाज में परिवर्तन और नैतिक राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया। 

बिहार की धरती ने साहित्य, संस्कृति और मानवता के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया है। हिंदी साहित्य में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनकी रचनाएँ ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘हुंकार’ और ‘संस्कृति के चार अध्याय’राष्ट्रवाद, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं और आज भी समाज को प्रेरित करती हैं। 

इसी प्रकार, मैथिली के महान कवि विद्यापति, भोजपुरी के ‘शेक्सपियर’ कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर, तथा फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ जैसे साहित्यकारों ने अपनी सृजनशीलता से क्षेत्रीय भाषाओं और लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया। वहीं, दशरथ मांझी, जिन्हें ‘माउंटेन मैन’के नाम से जाना जाता है, ने अपने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प से पहाड़ काटकर सड़क बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि इच्छाशक्ति के सामने कोई भी बाधा असंभव नहीं होती।

बिहार ने देश को प्रथम राष्ट्रपति (डॉ. राजेंद्र प्रसाद), प्रथम उपमुख्यमंत्री (डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा), और कई प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, और केंद्रीय मंत्री दिए हैं। जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति ने भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा दी।

बिहार की भाषाई विविधता उसकी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है। हिंदी के साथ-साथ मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका, वज्जिका, और उर्दू यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हैं। 

यहां की मधुबनी पेंटिंग (मिथिला कला) विश्व प्रसिद्ध है, जिसे यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है। झिझिया, जट-जटिन, बिदेसिया, जुमर जैसे नृत्य बिहार की ग्रामीण संस्कृति की आत्मा हैं।

आज बिहार हर क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, उद्योग और स्टार्टअप के क्षेत्र में बिहार की जनता अपनी मेहनत, संकल्प और लगन से नई ऊंचाइयों को छू रही है। बिहार के लोग जहां भी जाते हैं, अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अपनी पहचान बनाते हैं। 

बिहार के बारे में ऐसा कहा जाता है - मैं चाणक्य की नीति हूं, मैं आर्यभट्ट का आविष्कार हूं, मैं महावीर की तपस्या हूं, मैं बुद्ध का अवतार हूं, मैं बिहार हूं।

आज के इस गौरवपूर्ण अवसर पर, मैं यह कहना चाहूँगा कि बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि ज्ञान, साहस और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इस पावन भूमि ने सदियों से राष्ट्र को दिशा देने वाले विचार, मूल्य और आदर्श प्रदान किए हैं। यहाँ की परंपरा हमें यह सिखाती है कि सच्ची शक्ति केवल सामथ्र्य में नहीं, बल्कि संयम, धैर्य और नैतिकता में निहित होती है।

बिहार स्थापना दिवस हमें यह सिखाता है कि कोई भी राज्य या समाज तभी उन्नति करता है, जब वहां के नागरिक परिश्रमी, ईमानदार और समर्पित होते हैं। इस दिन, हम संकल्प लें कि हम अपने-अपने क्षेत्रों में कड़ी मेहनत करेंगे, सामाजिक समरसता को बनाए रखेंगे और भारत को एक विकसित एवं सशक्त राष्ट्र बनाने में अपना योगदान देंगे।

भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और अध्यात्म का प्रतीक है। हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना चाहिए और इस महान विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कर्तव्यनिष्ठ होकर कार्य करना चाहिए।

भारत का नागरिक होना न केवल गर्व और सम्मान की बात है, बल्कि यह हमें एक ऐतिहासिक दायित्व भी देता है कि हम अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों को संजोकर रखें और भारत को विश्वगुरु के पद पर पुनः स्थापित करें।

आज, जब भारत वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, बिहार की सफलता और योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य की विशाल युवा जनसंख्या, शिक्षा, कौशल और नवाचार के माध्यम से न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

आइए, हम सब मिलकर बिहार की गौरवशाली विरासत, सांस्कृतिक विविधता, और आधुनिक उपलब्धियों का उत्सव मनाएँ। क्षेत्रीय गौरव और राष्ट्रीय एकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। बिहार दिवस इस संदेश को सशक्त करता है कि “जहाँ एकता है, वहीं प्रगति है।”

अंत में, मैं पुनः आप सभी को बिहार स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं कामना करता हूँ कि बिहार निरंतर प्रगति करे, वहां के नागरिक खुशहाल रहें, और राज्य का गौरव दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहे। पंजाब और बिहार के बीच का यह अटूट रिश्ता आगे भी बना रहे और हम मिलकर देश को एक नई ऊँचाई तक ले जाएँ।

धन्यवाद,

जय हिंद!