SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF OPENING SESSION OF THE LITERARY FESTIVAL OF THE CENTRAL UNIVERSITY OF PUNJAB AT LOK BHAVAN PUNJAB ON MARCH 24, 2026.

पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय के ‘साहित्य उत्सव’ के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 24.03.2026, मंगलवारसमयः सुबह 10:30 बजेस्थानः पंजाब लोकभवन

नमस्कार!

आज पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के चौथे वार्षिक अंग्रेजी साहित्य उत्सव के इस अवसर पर ऑनलाईन माध्यम से आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। 

मुझे बताया गया है कि पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रयास से यह साहित्य उत्सव मैजिक रियलिज्म यानी जादुई यथार्थवाद के विषय पर आयोजित किया जा रहा है। 

मैं बधाई देता हूं विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य राघवेंद्र प्रसाद तिवारी जी को जिनके सानिध्य में यह संस्थान प्रगति पथ पर आगे बढ़ता जा रहा है। मैं बधाई देता हूं अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष आचार्य विपिन पाल सिंह को जिनके मार्गदर्शन में अंग्रेजी विभाग शोध एवं अध्यापन के क्षेत्र में श्रेष्ठ कार्यों से प्रफुल्लित हो रहा है। इस लिटरेरी फेस्टिवल को कुशलता पूर्वक आयोजित करने के लिए संयोजक की भूमिका निभा रहे डॉक्टर दिनेश बाबू को भी मैं बधाई देता हूं। 

लिटरेरी फेस्टिवल में सहभागिता निभाने के लिए बाबा फरीद ग्रुप ऑफ़ इंस्टीचुशन्स, गुरु काशी यूनिवर्सिटी, तथा महाराजा रंजीत सिंह पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी के अधिकारीयों को भी मैं साधुवाद देता हूँ।

हमारे लिए यह अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय पंजाब ने अपने स्थापना काल से ही शैक्षणिक उत्कृष्टता, अनुसंधान, नवाचार और समग्र विकास को अपनी पहचान बनाया है। वर्ष 2009 में स्थापित यह विश्वविद्यालय अपेक्षाकृत कम समय में ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक सशक्त और प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में उभरा है।

एक छोटे से अस्थायी परिसर से शुरू होकर, आज बठिंडा जिले के गांव घुद्दा में अपने विशाल और अत्याधुनिक स्थायी परिसर तक की इस विश्वविद्यालय की यात्रा अत्यंत प्रेरणादायक रही है। ‘राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद’ (NAAC) द्वारा 'A+' ग्रेड प्राप्त करना और देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों की रैंकिंग (NIRF) में निरंतर अपनी जगह बनाए रखना, इस संस्थान की शैक्षणिक उत्कृष्टता और इसके शिक्षकों व विद्यार्थियों के दृढ़ संकल्प का जीता-जागता प्रमाण है।

हर्ष का विषय है कि यह विश्वविद्यालय नवस्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसंधान परियोजनाओं और प्रकाशनों के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के सशक्तिकरण हेतु विश्वविद्यालय ने वर्ष 2015 से ‘अर्न-व्हाइल-यू-लर्न’ (Earn While You Learn) योजना को प्रभावी रूप से लागू किया है।

स्थानगत चुनौतियों के बावजूद, यह विश्वविद्यालय वास्तव में एक बहु-सांस्कृतिक ‘लघु भारत’ का स्वरूप प्रस्तुत करता है, जहाँ देश के विभिन्न राज्यों से विद्यार्थी, संकाय सदस्य तथा गैर-शिक्षण कर्मचारी जुड़े हुए हैं। साथ ही, यहाँ के अधिकांश संकाय सदस्य देश और विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से प्रशिक्षित हैं, जो इसकी शैक्षणिक गुणवत्ता और वैश्विक दृष्टिकोण को और सुदृढ़ करते हैं।

अपने सुनियोजित और लक्ष्य-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ यह विश्वविद्यालय निस्संदेह भारत के शैक्षणिक परिदृश्य में एक नया अध्याय लिखने की ओर अग्रसर है।

देवियो और सज्जनो,

आज जब हम सभी इस साहित्य उत्सव का हिस्सा बने हैं, तो हमें इस आयोजन के विषय ‘मैजिक रियलिज्म’ अथवा जादुई यथार्थवाद के गहन अर्थ, महत्व और व्यापक परिप्रेक्ष्य को भी समझना चाहिए।

मैजिक रियलिज्म अथवा जादुई यथार्थवाद की अवधारणा का जन्म जर्मन कला समीक्षक फ्रेंज रोह के द्वारा चित्रकला की एक रहस्यवादी शैली के संदर्भ में 1925 में किया गया था। लेकिन साहित्य में इसकी चर्चा 1955 में शुरू हुई। 1940 में दो लैटिन अमरीकी लेखक मिगुल एंजेल आस्त्रियास और एलीजो कार्पेटियर के उपन्यासों में मैजिक रियलिज्म को एक शैली की तरह अपनाया गया। 

लेकिन मैजिक रियलिज्म की विश्वव्यापी चर्चा की शुरुआत स्पेनी भाषा के प्रख्यात लेखक गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज के उपन्यास ‘द हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ (1967) के प्रकाशन से हुई। इसके बाद दुनिया भर के बहुत से लेखकों ने अपने लेखन में इस शैली का इस्तेमाल किया।

मैजिक रियलिज्म एक ऐसी साहित्यिक शैली है, जो यथार्थ से परे जाकर उसके गहरे निहितार्थों को समझने का प्रयास करती है। इस प्रयास के लिए लेखक यथार्थ की वस्तुपरकता तक अपने को सीमित न रखकर उसे स्वप्न की तरह देखने का प्रयत्न करता है। 

इसका अर्थ यह नहीं है कि लेखक यथार्थवाद से अपना नाता तोड़ लेता है, बल्कि यथार्थ को देखने की अब तक की पद्धतियों और शैलियों को नाकाफी पाते हुए ऐसी पद्धति और शैली का उपयोग करता है जिससे वह यथार्थ को उसकी आंतरिक और बाहरी समग्रता में देख सके। 

लैटिन अमेरिका में मैजिक रियलिज्म की अवधारणा इतिहास और परंपरा के साथ गहराई से जुड़ी रही है। वहां के देशों में साम्राज्यवादी घोषणा से मुक्ति के संघर्ष में वहाँ की जनता ने नये यथार्थ का साक्षात्कार किया और अपनी अस्मिता की रचना भी इसी संघर्ष के साथ-साथ की। पूँजीवाद से पूर्व के अनेक विश्वास, विचार और मान्यताएँ उनके सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहीं। 

समाज व्यवस्था की एक लंबी छलांग सचमुच जादुई थी, वहाँ का विकासक्रम यूरोप के विकासक्रम से एकदम भिन्न था, मगर फिर भी उनसे आगे जाने की प्रबल इच्छा उनमें थी। इस इच्छा से ही आगे जाकर मैजिक रियलिज्म की पद्धति वहाँ के कथा साहित्य में अस्तित्व में आई।

यदि हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो प्राचीन शास्त्रीय साहित्य में भी जादुई यथार्थवाद के अनेक उदाहरण मिलते हैं। यहाँ आध्यात्मिक और अलौकिक तत्वों का सांसारिक यथार्थ के साथ सहज समन्वय देखने को मिलता है। महाकाव्यों, लोककथाओं और पुराणों में दैवीय हस्तक्षेप, रूपांतरण और अलौकिक घटनाएँ एक स्वाभाविक यथार्थ के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। 

महाभारत और रामायण में देवताओं, राक्षसों और दिव्य शक्तियों को मानव जीवन के साथ सहज रूप से जुड़ा हुआ दिखाया गया है, जहाँ पात्र इन्हें सामान्य घटनाओं की तरह स्वीकार करते हैं। गंधर्वों, यक्षों और अन्य अलौकिक प्राणियों की कथाएँ सांसारिक और काल्पनिक जगत के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देती हैं। ऋषियों द्वारा सिद्धियों की प्राप्ति, रूपांतरण और श्रापों के माध्यम से होने वाले परिवर्तन एक ऐसी व्यापक वास्तविकता का संकेत देते हैं, जिसमें भौतिक जगत भी आध्यात्मिक एवं जादुई शक्तियों से प्रभावित होता है।

देवियो और सज्जनो,

साहित्य मानव सभ्यता की आत्मा है। यह केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि भावनाओं, अनुभवों, विचारों और मूल्यों का वह जीवंत माध्यम है। जैसा कि महान लेखक मुंशी प्रेमचंद ने कहा था, “साहित्य समाज का दर्पण होता है।” यह दर्पण हमें केवल वर्तमान ही नहीं दिखाता, बल्कि अतीत की गहराइयों और भविष्य की संभावनाओं का भी बोध कराता है।

साहित्य समाज का दर्पण और मार्गदर्शक है, जो मानवीय संवेदनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना को जीवित रखता है। यह लोगों में नैतिक मूल्यों, सत्य, करुणा, भाईचारा की स्थापना करता है और समाज को कुरीतियों के प्रति जागरूक कर एक बेहतर, संवेदनशील और सुसंस्कृत समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

साहित्य मानवीय भावनाओं को समझकर पाठकों में करुणा, दया और प्रेम विकसित करता है, जिससे समाज में आत्मीयता बढ़ती है। सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करने में साहित्य विशेष भूमिका निभाता है। साहित्य के माध्यम से ही हमें अपनी संस्कृति, परंपराओं और इतिहास का ज्ञान होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है। यह समाज में व्याप्त कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है, जिससे समाज सुधार की राह प्रशस्त होती है। साहित्य उत्तम चरित्र और उच्च मानवीय मूल्यों की शिक्षा देकर युवाओं को सही दिशा दिखाता है। साहित्य पाठकों को जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सोचने और विश्लेषण करने की क्षमता देता है। 

मेरा मानना है कि इस प्रकार के साहित्यक उत्सव समाज में एकता, भाईचारा और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखते हैं। ये लोगों को एक साथ लाकर रिश्ते मजबूत करते हैं और खुशी फैलाते हैं। साहित्यक उत्सव सामाजिक मूल्यों, नैतिक शिक्षा और सामुदायिक विकास को प्रेरित करते हैं। इसलिए साहित्य के माध्यम से समाज को धर्म के मार्ग पर ले जाने का प्रयास शिक्षा संस्थानों को लगातार करते रहना चाहिए।

देवियो और सज्जनो,

भारत की साहित्यिक परंपरा अत्यंत समृद्ध और प्राचीन रही है। वेदों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत से लेकर कालिदास, भास, तुलसीदास और कबीर तक, हमारी साहित्यिक धारा ने मानवता को ज्ञान, नैतिकता और जीवन-दर्शन का अमूल्य मार्गदर्शन दिया है। अंग्रेज़ी साहित्य के क्षेत्र में भी शेक्सपियर, जॉन मिल्टन, विलियम वर्ड्सवर्थ और टॉलस्टॉय जैसे महान रचनाकारों ने विश्व साहित्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं।

हमें गर्व है कि भारत को सदैव गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, हरिवंश राय बच्चन, सुभद्रा कुमारी चौहान, जयशंकर प्रसाद और सुब्रमण्यम भारती जैसे उत्कृष्ट लेखकों, कवियों, विचारकों और बुद्धिजीवियों की एक अत्यंत समृद्ध साहित्यिक परंपरा का आशीर्वाद प्राप्त रहा है। 

आप जिस भूमि पर आज बैठे हैं, यह केवल वीरों और किसानों की भूमि नहीं है, बल्कि यह वह पवित्र भूमि है जहाँ मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन ग्रंथ, ‘ऋग्वेद’ की ऋचाएं रची गईं। सिंधु और सरस्वती नदियों के तटों पर हमारे ऋषियों ने जो ज्ञान का अमृत मंथन किया, वह आज भी विश्व साहित्य और दर्शन का मूल आधार है।

हमारी यह धरती बाबा फरीद, बुल्ले शाह और श्री गुरु नानक देव जी जैसे महान संतों और सूफियों की धरती रही है। उनके द्वारा रचित साहित्य में जो जीवन दर्शन, समानता और मानवता का संदेश है, वह कालजयी है। 

पंजाब की माटी से जुड़ी महान साहित्यिक विभूतियों की चर्चा करें, तो मुल्क राज आनंद और खुशवंत सिंह जैसे रचनाकारों का नाम बड़े फख्र और सम्मान से लिया जाता है, जिन्होंने अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भारतीय अंग्रेजी साहित्य को एक नई वैश्विक पहचान दिलाई। इसी तरह, अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी जैसे पंजाब के गौरवशाली हस्ताक्षर भले ही मुख्य रूप से अपनी मातृभाषा में लिखते रहे हों, किंतु उनके विचारों की गहराई और सार्वभौमिकता ने भाषा की सभी सीमाओं को पार कर पूरे विश्व के साहित्य-प्रेमियों को प्रभावित किया है।

देवियो और सज्जनो,

आज के समय में साहित्य की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सूचना की प्रचुरता है, परंतु विवेकपूर्ण चिंतन की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। साहित्य हमें केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि हमें सोचने, प्रश्न करने और समाज के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है।

यह महत्वपूर्ण है कि विश्वविद्यालयों में इस प्रकार के साहित्यिक महोत्सव आयोजित किए जाएँ, क्योंकि ये न केवल पुस्तकों और लेखन का उत्सव होते हैं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का भी एक सशक्त मंच प्रदान करते हैं। ऐसे आयोजन लेखकों और पाठकों के बीच संवाद स्थापित करते हैं, जिससे साहित्य जीवंत और प्रासंगिक बना रहता है।

प्रिय विद्यार्थियों, आप सभी इस आयोजन के केंद्र में हैं। आप केवल प्रतिभागी नहीं, बल्कि भविष्य के लेखक, चिंतक और समाज के निर्माणकर्ता हैं। साहित्य आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और साथ ही जिम्मेदारी का भी बोध कराता है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह संदेश साहित्य और जीवन दोनों में समान रूप से लागू होता है। यदि आप पढ़ने, लिखने और सोचने की आदत विकसित करते हैं, तो आप न केवल अपने व्यक्तित्व को समृद्ध करेंगे, बल्कि समाज को भी नई दिशा देंगे।

आज के डिजिटल युग में, जहाँ तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, वहाँ यह आवश्यक है कि हम पढ़ने और लेखन की परंपरा को बनाए रखें। तकनीक एक साधन है, परंतु साहित्य वह शक्ति है जो हमारे भीतर संवेदनशीलता, नैतिकता और मानवीय दृष्टिकोण का विकास करती है।

मेरा मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देता है और व्यक्ति को परिपक्व बनाता है। इसलिए, साहित्य को अपनाना केवल एक शौक नहीं, बल्कि आत्म-विकास की एक अनिवार्य प्रक्रिया है।

प्रिय विद्यार्थियों, मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप पढ़ने की आदत को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। प्रतिदिन कुछ समय पुस्तकें पढ़ने में अवश्य लगाएं। पुस्तकें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे जीवन की सबसे विश्वसनीय साथी होती हैं।

याद रखिए, “पुस्तकें केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभवों का खजाना होती हैं।” और “जो पढ़ता है, वही आगे बढ़ता है।”

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि साहित्य हमें जोड़ता है, संवेदनशील बनाता है और हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है।

आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम साहित्य, भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे और एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जो ज्ञान, संवेदना और रचनात्मकता से परिपूर्ण हो।

मैं एक बार फिर से इस सुंदर और सार्थक आयोजन के लिए विश्वविद्यालय परिवार को हार्दिक बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि इस प्रकार के साहित्यिक प्रयास भविष्य में भी ज्ञान, सृजनात्मकता और संवेदनशीलता के नए आयाम स्थापित करते रहेंगे।

इन्हीं मंगलकामनाओं और इस दृढ़ विश्वास के साथ, मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

धन्यवाद, 

जय हिंद!