SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF ANNUAL PRIZE DISTRIBUTION FUNCTION OF DAV COLLEGE JALANDHAR ON APRIL 14, 2026.

डीएवी कॉलेज जालंधर के वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 14.04.2026, मंगलवारसमयः सुबह 10:00 बजे  स्थानः जालंधर

नमस्कार!

आज ज्ञान और संस्कारों की इस पवित्र भूमि, डीएवी कॉलेज, जालंधर के प्रांगण में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही है। वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह किसी भी शैक्षणिक संस्थान के कैलेंडर का सबसे प्रतीक्षित और ऊर्जावान दिन होता है। यह दिन केवल पदकों और प्रमाणपत्रों के वितरण का नहीं है, बल्कि यह आपके साल भर के कठोर परिश्रम, अनुशासन और उत्कृष्ट उपलब्धियों का उत्सव है।

सबसे पहले, मैं आज सम्मानित किए गये सभी 26 प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को, उनके अभिभावकों और गुरुजनों को अपनी ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ। 

यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है कि इन सम्मानित विद्यार्थियों में 6 गोल्ड मेडल विजेता, विश्वविद्यालय परीक्षाओं में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले 8 विद्यार्थी, एनसीसी एवं एनएसएस के राष्ट्रीय शिविरों में भाग लेने वाले 4 विद्यार्थी, राष्ट्रीय युवा संसद में सहभागिता करने वाले 4 विद्यार्थी, इंटर-यूनिवर्सिटी स्टेट ट्रॉफी में 1 प्रतिभागी, राष्ट्रीय फुटबॉल चौम्पियनशिप में 1 प्रतिभागी, नॉर्थ ज़ोन हॉकी चौम्पियनशिप में 1 प्रतिभागी तथा 38वीं राष्ट्रीय हॉकी चौम्पियनशिप में 1 प्रतिभागी शामिल हैं। 

इन सभी उपलब्धियों ने न केवल इस संस्थान का मान बढ़ाया है, बल्कि युवा प्रतिभा, अनुशासन और उत्कृष्टता का प्रेरणादायी उदाहरण भी प्रस्तुत किया है।

देवियो और सज्जनो,

जब हम डीएवी की बात करते हैं, तो हम केवल एक स्कूल या कॉलेज की बात नहीं करते, बल्कि हम एक महान शैक्षिक और सांस्कृतिक आंदोलन की बात कर रहे होते हैं। ‘दयानंद एंग्लो-वैदिक’ (DAV) शिक्षा प्रणाली अपने आप में एक अनूठा संगम है। यह महर्षि दयानंद सरस्वती जी के वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान (Anglo) का एक ऐसा अद्भुत मिश्रण है, जिसने भारत की पीढ़ियों को गढ़ा है।

उन्नीसवीं सदी के अंत में, जब हमारा देश अपनी पहचान और आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था, तब महात्मा हंसराज जी, लाला लाजपत राय जी और पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी जैसी महान विभूतियों ने भारतीय संस्कारों पर आधारित शिक्षा की नींव रखी।

दयानंद एंग्लो वैदिक ट्रस्ट एवं मैनेजमेंट सोसाइटी की स्थापना वर्ष 1886 में महर्षि दयानंद सरस्वती जी के दूरदर्शी विचारों को साकार करने के उद्देश्य से की गई थी। उसी वर्ष लाहौर में पहला डी.ए.वी. स्कूल स्थापित हुआ, जिसके प्रथम मानद प्रधानाध्यापक महात्मा हंसराज जी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन बिना किसी वेतन के इस संस्था को समर्पित कर दिया। उनका त्याग हमें सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पण की आवश्यकता होती है। 

आज डी.ए.वी. देश के सबसे बड़े गैर-सरकारी शैक्षणिक संगठनों में से एक है, जो भारत और विदेशों में 1 हजार से अधिक विद्यालयों, महाविद्यालयों और एक विश्वविद्यालय का संचालन करता है। यह संस्था कला, वाणिज्य, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और शोध सहित अनेक क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्रदान करती है।

डी.ए.वी. समूह में 50 हजार से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और हर वर्ष 20 लाख से अधिक विद्यार्थी इससे शिक्षा प्राप्त करते हैं। वर्ष 2013 में । ASSOCHAM-एसोचैम (The Associated Chambers of Commerce and Industry of India) द्वारा डी.ए.वी. कॉलेज मैनेजिंग कमेटी को ‘भारत की सर्वश्रेष्ठ स्कूल श्रृंखला’ के सम्मान से नवाज़ा गया। यह संस्था ए.सी.सी., टाटा, रिलायंस, अडानी तथा भेल, गेल, एस.ई.सी.एल. जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के लिए 100 से अधिक प्रोजेक्ट स्कूल भी संचालित करती है।

सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में भी डी.ए.वी. संस्था अग्रणी है, जो वंचित बच्चों और महिलाओं के लिए आश्रमों एवं अनाथालयों का संचालन कर मानव सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

मैं समझता हूं कि जालंधर का यह डीएवी कॉलेज उसी महान विरासत का ध्वजवाहक है, जिसने देश को अनगिनत शिक्षाविद, वैज्ञानिक, राजनेता, प्रशासक और खेल जगत के चमकते सितारे दिए हैं।

सन् 1918 में जब इस संस्था की नींव रखी गई, तब उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि ‘स्वत्व’ का बोध कराना था। महर्षि दयानंद सरस्वती के क्रांतिकारी चिंतन और महात्मा हंसराज के अभूतपूर्व त्याग ने इस वटवृक्ष को सींचा है। ‘अविद्योनाशस्तथा विद्योदयः’ के मंत्र के साथ शुरू हुई यह यात्रा आज आधुनिक भारत के निर्माण की सबसे सशक्त प्रयोगशाला बन चुकी है।

समय के साथ कदम मिलाना ही डी.ए.वी. की विशेषता रही है। मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि यह महाविद्यालय ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ को पूर्णतः आत्मसात कर चुका है। 

आज के युग की मांग को देखते हुए, यहाँ अब कौशल-आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को उन व्यावहारिक कौशलों से लैस करना है जो उन्हें वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए ‘सक्षम’ और ‘प्रतिस्पर्धी’ बनाएं। यहाँ के 14 पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों और अंडरग्रेजुएट स्तर पर बायो-टेक्नोलॉजी, बेसिक साइंसेज, फूड साइंस, और कंप्यूटर एप्लीकेशन जैसे विषयों का तालमेल विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार कर रहा है।

डी.ए.वी. जालंधर की विशेषता यह है कि यहाँ विकास केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास (भ्वसपेजपब ळतवूजी) के लिए कॉलेज में गतिविधियों का एक विशाल ताना-बाना बुना गया है। खेलकूद, एन.सी.सी., एन.एस.एस., और सांस्कृतिक मंच छात्र के व्यक्तित्व को हर कोण से निखारते हैं। यह कॉलेज वह वातावरण प्रदान करता है जहाँ विद्यार्थी अनुशासन, नेतृत्व और टीम वर्क जैसे जीवन के बड़े सबक सीखता है।

इस महाविद्यालय की गरिमा का वर्णन करते हुए पंजाब के पूर्व राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर राय जी ने एक बार बहुत ही सार्थक बात कही थी, ​"Anybody who is somebody in Punjab, is from DAV College Jalandhar."

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह कथन अक्षरशः सत्य प्रतीत होता है। इस संस्थान ने संगीत के आकाश में जगजीत सिंह, हंस राज हंस और सुखविंदर सिंह जैसे नक्षत्र दिए हैं। समाज को आइना दिखाने वाले जसपाल भट्टी जी, पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एम. पुंछी, पंजाब के मुख्य सचिव सर्वेश कौशल, चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू, और चिकित्सा जगत के दिग्गज डॉ. के.के. तलवार जैसे नाम हमारी वैश्विक उपस्थिति के गवाह हैं। इसके पूर्व छात्र आज पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और इस संस्था की यशोगाथा सुना रहे हैं।

मेरे प्रिय विद्यार्थियों, 

आज जब आप पुरस्कार ग्रहण कर रहे हैं, तो मुझे एक प्रसंग याद आता है, एक प्रसिद्ध मूर्तिकार एक पत्थर को छेनी और हथौड़े से तराश रहा था। पत्थर से दर्द की आवाज़ आई, ‘‘मुझे छोड़ दो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है।’’ मूर्तिकार ने उसे छोड़ दिया और दूसरे पत्थर को तराशने लगा। उस दूसरे पत्थर ने हर चोट को सहा और अंततः एक सुंदर प्रतिमा बन गया।

कुछ समय बाद वहाँ एक मंदिर बना। वह पत्थर जिसने दर्द सहा था, वह ‘गर्भगृह की मूर्ति’ बना जिसकी पूजा होती है, और वह पत्थर जिसने चोट सहने से मना कर दिया था, वह ‘मंदिर की सीढ़ी’ बना जिस पर लोग पैर रखकर चढ़ते हैं।

आज जो छात्र यहाँ पुरस्कार पा रहे हैं, उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग कर अनुशासन की उस चोट को सहा है। याद रखिए, आज का संघर्ष ही कल की श्रेष्ठता का आधार है।

पंखों को खोल दो कि अब ये आसमाँ तुम्हारा है, जहाँ तक दृष्टि जाए, वह सारा जहाँ तुम्हारा है। अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखें और निरंतर सीखते रहें। कौशल वह शस्त्र है जो आपको कभी पराजित नहीं होने देगा।

याद रखें कि हमारा देश भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है और आप वही युवा शक्ति हैं जो आने वाले समय में देश की दिशा और दशा दोनों तय करेगी। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि हमारा राष्ट्र “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की सफलता आपके सपनों, आपकी मेहनत और आपके संकल्प पर निर्भर करती है।

आप वही पीढ़ी हैं, जो भारत को केवल विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि एक विश्वगुरु के रूप में स्थापित कर सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि आप ज्ञान, कौशल, नवाचार और नैतिक मूल्यों को अपना आधार बनाएं। नई तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप, अनुसंधान और सामाजिक उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में आपकी भागीदारी भारत को वैश्विक मंच पर नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है।

लेकिन याद रखें, एक सच्चा “विश्वगुरु” वही बन सकता है जो विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ मानवीय मूल्यों, जैसे करुणा, ईमानदारी, सेवा और सह-अस्तित्व को भी समान महत्व दे। आपमें वह क्षमता है कि आप अपने परिश्रम, अपने चरित्र और अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाएं जो केवल आर्थिक रूप से समृद्ध न हो, बल्कि नैतिकता, ज्ञान और मानवता में भी दुनिया का नेतृत्व करे।

इस अवसर पर मैं आप सभी का ध्यान पंजाब के सामने खड़ी नशे की गंभीर चुनौती की ओर भी आकर्षित करना चाहता हूँ। नशा केवल स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि युवाओं की ऊर्जा, प्रतिभा और सपनों को भी नष्ट कर देता है। यह परिवारों को तोड़ता है, समाज की नींव को कमजोर करता है और भविष्य की संभावनाओं को अंधकार में धकेल देता है। 

आप सभी से मेरा आग्रह है कि स्वयं नशे से दूर रहें और अपने साथियों व समाज को भी जागरूक करें। खेल, शिक्षा, योग और सकारात्मक गतिविधियों को अपनाकर हम इस समस्या का सामना कर सकते हैं। हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम केवल नशा-मुक्त जीवन ही नहीं जीएँगे, बल्कि “नशा-मुक्त पंजाब” के निर्माण में भी सक्रिय भागीदारी निभाएँगे।

आदरणीय शिक्षकों,

आज इस अवसर पर मैं विशेष रूप से आप सभी का अभिनंदन करना चाहता हूँ, क्योंकि किसी भी विद्यार्थी की सफलता के पीछे सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति उसके शिक्षक ही होते हैं। आप केवल विषय पढ़ाने वाले अध्यापक नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करने वाले शिल्पकार हैं। आपकी मेहनत, आपका धैर्य और आपका मार्गदर्शन ही विद्यार्थियों को सही दिशा देता है और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास प्रदान करता है।

एक शिक्षक का कार्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर जिज्ञासा, नैतिकता और जीवन मूल्यों का संचार करना भी है। आप विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करते, बल्कि उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाते हैं। यही वह भूमिका है जो समाज में शिक्षकों को सबसे ऊँचा स्थान प्रदान करती है।

जैसा कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, “शिक्षक वह नहीं जो केवल किताब पढ़ाए, बल्कि वह है जो विद्यार्थियों के जीवन में सपने जगाए।” आपका हर शब्द, हर प्रेरणा और हर मार्गदर्शन किसी विद्यार्थी के जीवन को नई दिशा दे सकता है।

आज के समय में, जब दुनिया तेजी से बदल रही है और नई तकनीकें, नई चुनौतियाँ और नई संभावनाएँ सामने आ रही हैं, तब शिक्षकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। आपको न केवल विद्यार्थियों को नए कौशलों के लिए तैयार करना है, बल्कि उन्हें एक संवेदनशील, जिम्मेदार और जागरूक नागरिक के रूप में भी विकसित करना है।

जैसा कि महात्मा गांधी जी ने कहा था, “भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज क्या करते हैं।” आपके प्रयास ही वह आधार हैं, जिन पर आने वाले भारत की नई पीढ़ी तैयार होगी।

मुझे विश्वास है कि आप अपने ज्ञान, अनुभव और समर्पण से आने वाली पीढ़ियों को ऐसा मार्गदर्शन देंगे, जो उन्हें न केवल सफल पेशेवर बनाएगा, बल्कि एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक भी बनाएगा। आपका योगदान ही वह आधार है जिस पर “विकसित भारत 2047” का सपना साकार होगा।

अंत में, मैं सभी पुरस्कार प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई देता हूँ। आपकी सफलता आपके परिवार, आपके शिक्षकों और इस संस्थान के लिए गर्व का विषय है।

मैं डी.ए.वी. कॉलेज, जालंधर के प्रबंधन और संकाय को भी उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए बधाई देता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह संस्थान भविष्य में भी ऐसे ही प्रतिभाशाली, संस्कारित और जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण करता रहेगा।

जाते-जाते बस यही कहूँगाः

“हवाएँ खुद करेंगी फैसला रौशनी का,

जिस दिए में जान होगी, वही दीया रह जाएगा।”

बहुत-बहुत धन्यवाद,

जय हिंद! 

जय डी.ए.वी.!