SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF ACHARYA DR. LOKESH MUNI JI’S BIRTH ANNIVERSARY AT GURUGRAM ON 19.04.2026.

‘विश्व शांति सद्भावना सम्मेलन’ के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 19.04.2026, रविवारसमयः सुबह 11:00 बजेस्थानः गुरूग्राम

         

नमस्कार!

आज ‘अहिंसा विश्व भारती’, नई दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित इस भव्य ‘विश्व शांति सद्भावना सम्मेलन’ में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गौरव की अनुभूति हो रही है। यह अवसर हमारे लिए और भी अधिक पावन और विशेष हो गया है क्योंकि आज हम सब यहाँ परम पूज्य आचार्य डॉ. लोकेश मुनि जी के पावन अवतरण दिवस के शुभ अवसर पर एकत्रित हुए हैं।

पंजाब के राज्यपाल के रूप में, और अपनी व्यक्तिगत ओर से, मैं आचार्य जी को उनके जन्मदिवस की हृदय की गहराइयों से हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि वे दीर्घायु हों, स्वस्थ रहें और उनका स्नेहपूर्ण आशीर्वाद हम सभी पर यूँ ही अनवरत बरसता रहे।

मेरा आचार्यश्री से पिछले कई वर्षों से संपर्क है। मैंने उन्हें देश विदेश में भगवान महावीर की शिक्षाओं और प्राचीन भारतीय दर्शन के प्रचार के माध्यम से शांति और सद्भाव की स्थापना और समाज कल्याण के लिए निरंतर काम करते देखा है। 

मैं आचार्यश्री के नेतृत्व में गुरूग्राम, दिल्ली एनसीआर में भारत का पहला विश्व शांति केंद्र स्थापित करने के अवसर पर भी उपस्थित था जहां विश्व के कोने कोने से आए आचार्यजी के अनुयायी और शांति के उपासक अति उत्साहित थे। मुझे उम्मीद है कि विश्व स्तरीय शांति केंद्र की स्थापना के साथ आचार्य जी का विश्व शांति और सद्भाव का दृष्टिकोण बहुत बड़े पैमाने पर जीवंत होगा।

मैं समझता हूं कि इस प्रकार के संगठित प्रयास की वर्तमान में आवश्यकता है, क्योंकि विश्व जिस प्रकार की अस्थिरता, तनाव और असंतुलन से गुजर रहा है, उसमें ऐसे संस्थानों की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

देवियो और सज्जनो,

आचार्य लोकेश मुनि जी का जीवन केवल एक व्यक्ति का जीवन नहीं है, बल्कि यह विश्व शांति, सांप्रदायिक सौहार्द और मानव कल्याण के लिए समर्पित एक निरंतर चलता हुआ महायज्ञ है। पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से उन्होंने न केवल भारत की भूमि पर, बल्कि संयुक्त राष्ट्र, विश्व धर्म संसद और ब्रिटिश संसद जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘शांति शिक्षा’ और भारतीय संस्कृति का परचम लहराया है।

वर्ष 2005 में स्थापित ‘अहिंसा विश्व भारती’ के माध्यम से उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, नशा मुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों के खिलाफ जो अलख जगाई है, वह वंदनीय है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि धर्म केवल एकांत में की जाने वाली साधना नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसू पोंछने का सबसे सशक्त माध्यम है। यह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रांति का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित करना और समाज में सद्भावना व शांति स्थापित करना है।

आचार्य लोकेश जी का यह दृढ़ विश्वास है कि धर्म केवल उपासना तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे समाज सेवा और नैतिक उत्थान का माध्यम भी बनाया जाना चाहिए। उन्होंने आध्यात्म व सामाजिक कल्याण को एक नई दिशा देने का संकल्प लिया, ताकि धार्मिक सिद्धांतों का उपयोग केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की सेवा और उत्थान के लिए किया जा सके।

आज के समय में, जब विश्व अशांति, हिंसा, असहिष्णुता और स्वार्थ की प्रवृत्तियों से जूझ रहा है, आचार्य लोकेश जी के कार्य हमें एक नई दिशा प्रदान करते हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं कि हम लोभ, द्वेष और अहंकार से ऊपर उठकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें, जो न्यायपूर्ण, दयालु और समरस हो।

देवियो और सज्जनो,

जैन धर्म भारत की प्राचीन और महान धर्म परंपराओं में से एक है। यह धर्म ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’’ यानी अहिंसा को सर्वोच्च धर्म मानता है। जैन धर्म के संस्थापक भगवान ऋषभदेव को माना जाता है, लेकिन इसकी मुख्य परंपरा 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के माध्यम से प्रसिद्ध हुई।

हमारे देश की आत्मज्ञान की गौरवशाली परंपरा में भगवान महावीर का एक प्रमुख स्थान है। अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह के अपने दिव्य उपदेशों के माध्यम से उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक उत्थान का लक्ष्य रखा। 

उस समय के सामाजिक मुद्दों से गहराई से जुड़े भगवान महावीर ने ऐसे समाधान प्रस्तुत किए जिनसे जनसाधारण की समस्याओं को कम करने में मदद मिली।

भगवान महावीर स्वामी ने हमें पंच महाव्रतों का मार्ग दिखाया-

अहिंसाः किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से चोट न पहुंचाना।

सत्यः  सत्य बोलना और सत्य का पालन करना।

अस्तेयः दूसरों की चीज़ों को बिना अनुमति के न लेना।

ब्रह्मचर्यः   अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना।

अपरिग्रहः   आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।

भगवान महावीर के आध्यात्मिक पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, सदियों से समय-समय पर जैन आचार्यों की एक शृंखला सामने आई। उन्होंने मौलिक और अनंत मूल्यों के साथ भारतीय संस्कृति को पोषित करने में मदद की।

जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है। इसके लिए ध्यान, तप, और संयम को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। जैन धर्म न केवल हमें व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता सिखाता है, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति भी हमारी जिम्मेदारियों का बोध कराता है।

आज के समय में जब हिंसा और स्वार्थ चारों ओर व्याप्त है, जैन धर्म की शिक्षाएं हमें शांति और संतुलन की ओर ले जाने में मदद करती हैं। यह धर्म हमें यह सिखाता है कि हमारे कर्म ही हमारे भविष्य को तय करते हैं, इसलिए अच्छे कर्म करें और हर प्राणी के प्रति दया का भाव रखें।

जैन धर्म की शिक्षाएं केवल जैन समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए उपयोगी हैं। अगर लोगों द्वारा इन आदर्शों को अपनाया जाए, तो एक सुखी, शांतिपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण संभव है।

देवियो और सज्जनो,

आज जब हम ‘विश्व शांति’ की बात कर रहे हैं, तो भगवान महावीर का स्मरण अनायास ही हो जाता है। भगवान महावीर ने केवल शारीरिक रूप से किसी को चोट न पहुँचाने को ही अहिंसा नहीं माना, बल्कि मन और वाणी की अहिंसा को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया। आज की इस संघर्षपूर्ण दुनिया में जहाँ युद्ध, आतंकवाद, और वैचारिक वैमनस्य चरम पर है, भगवान महावीर का ‘अनेकांतवाद’ का सिद्धांत सबसे अधिक प्रासंगिक है। अनेकांतवाद हमें सिखाता है कि सत्य के अनेक पहलू हो सकते हैं। दूसरों के दृष्टिकोण और विचारों का सम्मान करना ही सच्चे लोकतंत्र, सहिष्णुता और विश्व शांति की सबसे मजबूत नींव है।

जैन आगम, विशेषतः तत्त्वार्थसूत्र का एक अत्यंत ही सुंदर और वैज्ञानिक सूत्र हैः ‘‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’’ यानी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं, अर्थात् सभी जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यह सूत्र हमें सिखाता है कि इस ब्रह्मांड में कोई भी अकेला नहीं है। हमारा अस्तित्व एक-दूसरे के सहयोग से ही संभव है। शोषण नहीं, पोषण; संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व ही मानव जीवन का सच्चा मार्ग होना चाहिए।

सभी धर्मों का मूल संदेश भी यही है कि सेवा, विनम्रता और निस्वार्थ भाव जीवन के प्रमुख आधार हैं। अहंकार का त्याग कर जब व्यक्ति दूसरों की सेवा करता है, तो वह केवल समाज को ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी आंतरिक शांति और संतोष प्रदान करता है। इस प्रकार धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवन-दर्शन है, जो व्यक्ति को आत्मिक शांति के साथ-साथ वैश्विक सद्भाव और मानव एकता की ओर अग्रसर करता है।

आज पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, युद्ध और हिंसा, पर्यावरण प्रदूषण, सामाजिक असमानता, बीमारियाँ और मानसिक तनाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। इन परिस्थितियों में भारतीय संस्कृति तथा भगवान महावीर के अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत रूपी सिद्धांत मानवता को संतुलित और शांतिपूर्ण दिशा प्रदान कर सकते हैं। यदि हम इन मूल्यों को अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक और नीतिगत स्तर पर अपनाएँ, तो एक अधिक न्यायपूर्ण, समरस और टिकाऊ विश्व का निर्माण संभव है।

इन आदर्शों को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा हमें आचार्यश्री के मार्गदर्शन से प्राप्त होती है। उनके विचार न केवल व्यक्तिगत आचरण के लिए, बल्कि नीति-निर्माण के स्तर पर भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। शांति, सद्भाव और सतत विकास के लिए विशेष प्रयासों एवं संसाधनों का प्रावधान समय की आवश्यकता है, और इस दिशा में उनके सुझाव अत्यंत सराहनीय हैं।

मुझे विश्वास है कि आचार्यश्री के साथ यह प्रेरणादायक संवाद और सहयोग भविष्य में भी निरंतर आगे बढ़ेगा, और हम सब मिलकर एक ऐसे समाज के निर्माण में सफल होंगे, जो शांति, सद्भाव और संतुलित विकास के आदर्शों पर आधारित हो।

देवियो और सज्जनो,

आज भौतिक प्रगति और तकनीकी विकास के इस दौर में हम यह भूलते जा रहे हैं कि ‘अध्यात्म’ का हमारे जीवन में क्या महत्व है। अध्यात्म का अर्थ केवल कर्मकांड या पूजा-पाठ नहीं है; अध्यात्म का अर्थ है स्वयं के ‘स्व’ को जानना। श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया हैः ‘‘अशांतस्य कुतः सुखम्’’ यानी जिसका मन शांत नहीं है, उसे सुख कहाँ मिल सकता है? जब तक मनुष्य के भीतर शांति नहीं होगी, तब तक बाहर विश्व शांति की कल्पना करना रेत पर महल बनाने के समान है। 

अध्यात्म हमें हमारे भीतर के क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी विकारों से मुक्त करता है। यह हमारे भीतर की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर मानवीय और ईश्वरीय गुणों को जागृत करता है। आचार्य लोकेश जी इसी ‘आध्यात्मिक क्रांति’ के ध्वजवाहक हैं। वे योग, ध्यान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर युवा पीढ़ी को जो ’पीस एजुकेशन’ दे रहे हैं, वह आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

मैं पंजाब का प्रतिनिधित्व करता हूँ, जो महान गुरुओं, पीरों और शूरवीरों की पवित्र भूमि है। श्री गुरु नानक देव जी ने भी पूरे विश्व को ‘‘सरबत दा भला’’ और मानव मात्र की समानता का संदेश दिया था। आप देखेंगे कि गुरुओं की पावन वाणी और भगवान महावीर के उपदेश, दोनों का गंतव्य एक ही है, मानव मात्र से असीम प्रेम और निस्वार्थ सेवा।

आज जब हम इस ‘सद्भावना सम्मेलन’ में बैठे हैं, तो हमें यह दृढ़ संकल्प लेना चाहिए कि हम नफरत और विभाजन की दीवारों को गिराकर, प्रेम और भाईचारे के पुल बनाएंगे।

परम पूज्य आचार्य डॉ. लोकेश मुनि जी के जन्मदिवस पर मेरी यही मंगलकामना है कि उनका आध्यात्मिक प्रकाश पूरे विश्व का ऐसे ही पथ-प्रदर्शन करता रहे।

आइए, हम सब आचार्य लोकेशजी के मार्गदर्शन में, भगवान महावीर के अहिंसा, शांति व सद्भावना के दर्शन को दुनिया भर में फैलाये। अशांत विश्व को शांति का सन्देश दें। 

आचार्य लोकेश जी के मार्गदर्शन में अहिंसा विश्व भारती संस्था समाज सेवा के क्षेत्र में एक मिसाल है। अहिंसा विश्व भारती संस्था के कार्यकर्ताओं को इस सुंदर आयोजन के लिए व गौरवशाली यशस्वी द्वितीय दशक प्रवेश पर बधाई देता हूँ।

आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे समाज और राष्ट्र का निर्माण करें जो भयमुक्त हो, हिंसामुक्त हो और जहाँ केवल प्रेम, करुणा और सद्भावना का वास हो।

अंत में, मैं परम पूज्य आचार्य लोकेश जी को उनके जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और उनके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना करता हूँ।

मैं वैदिक शांति पाठ के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ-

‘‘ओम द्यौः शांतिरन्तरिक्षम् शांतिः, पृथिवी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः।

वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः, सर्वम् शांतिः, शांतिरेव शांतिः, सा मा शांतिरेधि।।

ओम शांतिः शांतिः शांतिः।।’’

धन्यवाद,

जय हिन्द!