SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF 41ST CONVOCATION OF PUNJABI UNIVERSITY, PATIALA ON APRIL 9, 2026.

पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के 41वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 09.04.2026, गुरूवारसमयः दोपहर 12:00 बजेस्थानः पटियाला

 

नमस्कार!

आज, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के इस ऐतिहासिक और भव्य परिसर में, 41वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही है। 

सबसे पहले, मैं आज उपाधि प्राप्त कर रहे सभी 725 छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों एवं पदक विजेताओं को अपनी ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ। इनमें 457 पीएच.डी. उपाधि प्राप्त करने वाले शोधार्थी, 179 पोस्टग्रेजुएट एवं प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी, 86 ग्रेजुएट विद्यार्थी तथा 3 प्रतिष्ठित पदक प्राप्त करने वाले मेधावी छात्र-छात्राएँ शामिल हैं।

मैं विद्यार्थियों के माता-पिता और समस्त शिक्षकगणों और अभिभावकों और परिवारजनों को भी हार्दिक बधाई देता हूँ। आपका अटूट सहयोग, त्याग और प्रोत्साहन उनकी सफलता की नींव रहा है। 

देवियो और सज्जनो,

पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला का इतिहास अत्यंत समृद्ध और प्रेरणादायक रहा है। इस विश्वविद्यालय की आधारशिला 24 जून 1962 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने रखी थी।

मैं समझता हूं कि पंजाबी विश्वविद्यालय का आदर्श वाक्य, “विद्या विचारी तां परोपकारी”, श्री गुरु नानक देव जी के वे अनमोल और सार्वभौमिक शब्द हैं, जिसमें शिक्षा का वह गहन दर्शन निहित है, जो केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं, बल्कि उसे मानवता की सेवा में समर्पित करने की प्रेरणा देता है। 

यह हमें सिखाता है कि शिक्षा वह बीज है जिसे चिंतन (विचार) की भूमि में बोया जाता है, ताकि उसमें परोपकार (सेवा) का मीठा फल लग सके। जब शिक्षा के साथ विवेक और संवेदनशीलता जुड़ती है, तभी वह समाज के कल्याण का सशक्त माध्यम बनती है।

हम सभी के लिए यह अत्यंत गौरव का विषय है कि यह विश्वविद्यालय, यरूशलेम की ‘हिब्रू यूनिवर्सिटी’ के बाद दुनिया का दूसरा और भारत का पहला ऐसा विश्वविद्यालय है, जिसका नामकरण एक भाषा के नाम पर किया गया है।

पंजाब की इस वीर और पावन धरा पर स्थापित यह ’पंजाबी वश्वविद्यालय’ पंजाब की समृद्ध सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है। इस प्रतिष्ठित संस्थान की स्थापना पंजाबी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संवर्धन के उद्देश्य से की गई थी।

मुझे गर्व है कि इस महत्वपूर्ण उद्देश्य को सुदृढ़ करने हेतु, पंजाबी भाषा विकास के साथ-साथ इस विश्वविद्यालय ने कई अन्य महत्वपूर्ण शोध विभागों और अनुसंधान केंद्रों की भी स्थापना की है। 

इनमें पंजाबी साहित्य अध्ययन विभाग, पंजाब इतिहास विभाग, कोशकारी विभाग, सेंटर फॉर एडवांस मीडिया स्टडीज आदि मुख्य रूप से शामिल हैं।

 तकनीकी युग के साथ कदमताल करते हुए, पंजाबी विश्वविद्यालय ने अपने रिसर्च सेंटर फॉर पंजाबी लैंग्वेज टेक्नोलॉजी के माध्यम से गुरुमुखी लिपि में पंजाबी सीखने के लिए एक विशेष ऑनलाइन कार्यक्रम, ‘‘आओ पंजाबी सीखिए’’ भी आरंभ किया है। 

इसके अतिरिक्त, पंजाबी भाषा जानने वाले जिज्ञासुओं के लिए मातृभाषा में कंप्यूटर सीखने की प्रक्रिया को सुगम बनाने हेतु एक ऑनलाइन ‘पंजाबी कंप्यूटर सहायता केंद्र’ भी स्थापित किया गया है, जो इस दिशा में निरंतर प्रगतिशील है।

इसके साथ ही, यह संस्थान धार्मिक शिक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इसने ‘श्री गुरु गोबिंद सिंह डिपार्टमेंट ऑफ रिलिजियस स्टडीज’ (धर्म अध्ययन विभाग) की स्थापना की है, जिसमें पोस्ट ग्रेजुएट और एम.फिल. स्तर पर हिंदू, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम, जैन और सिख धर्म से संबंधित उच्च स्तरीय शिक्षा एवं शोध कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं, जो हमारी सर्वधर्म समभाव की दृष्टि को परिलक्षित करते हैं।

यह अत्यंत गर्व और संतोष का विषय है कि इस प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा श्री गुरू ग्रंथ साहिब अध्ययन विभाग का भी संचालन किया जा रहा है। इस विभाग द्वारा 150 से 300 साल पुरानी सोने और नीलम स्याही से रचित 62 अनमोल और दुर्लभ हस्तलिखित बीड़ों (श्री गुरू ग्रंथ साहिब) को सम्मान के साथ एक विशेष भवन में सुशोभित किया गया है।

यह विभाग सिख धर्म के गहन चिंतन और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में निहित धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक सरोकारों को अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने हेतु निरंतर प्रयत्नशील है। 

वर्ष 2010 में इस विभाग ने कई अत्यंत महत्वपूर्ण पाठ्यक्रमों की शुरुआत की, जिनमें ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब अध्ययन में सर्टिफिकेट कोर्स’, ‘पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन सिख थियोलॉजी’, एम.फिल. और पी.एच.डी. जैसे उच्च स्तरीय शोध पाठ्यक्रम प्रमुख रूप से शामिल हैं।

इसके अलावा, इसके ‘गुरमति संगीत विभाग’ का लक्ष्य गुरमति संगीत (गुरबाणी कीर्तन) को एक सुदृढ़ वैज्ञानिक और अकादमिक आधार प्रदान करते हुए इसे उच्च शिक्षा के एक प्रमुख विषय के रूप में स्थापित करना है। यह विभाग श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की राग-आधारित संगीत संरचना के अध्ययन पर विशेष बल देता है।

अपने इस विस्तृत अकादमिक ढांचे के अंतर्गत, यह विभाग एम.ए. (गुरमति संगीत) का चार सेमेस्टर वाला पोस्ट ग्रेजुएट कार्यक्रम, पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स, तथा अनुसंधान आधारित ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट ऑनर्स कार्यक्रम भी संचालित करता है।

साथियो,

इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का पंजाबी भाषा के संवर्धन और संरक्षण का जो उद्देश्य है, वह निस्संदेह अत्यंत प्रशंसनीय और प्रेरणादायक है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह हमारी पहचान, हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास और हमारी सामूहिक चेतना की वाहक होती है। 

यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि हम अपनी मातृभाषा पंजाबी सहित अन्य मातृभाषाओं के प्रति पर्याप्त सजग और प्रतिबद्ध नहीं रहे, तो आने वाले 40-50 वर्षों में इनके अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। ऐसी स्थिति केवल भाषाओं के लुप्त होने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हमारी समृद्ध संस्कृति, परंपराएँ, लोकज्ञान और सामाजिक पहचान भी धीरे-धीरे क्षीण हो सकती हैं। 

इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आधुनिक विज्ञान, तकनीक और व्यावसायिक शिक्षा भी हमारी क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध हो, ताकि हमारी नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और वैश्विक स्तर पर भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सके। 

यहाँ मैं एक महत्वपूर्ण बात और कहना चाहूँगा कि पंजाबी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को लुप्त होने से बचाने के लिए हमें इन्हें रोज़गार और व्यावसायिक अवसरों की भाषा बनाना होगा। जब इन भाषाओं में शिक्षा, तकनीक, प्रशासन और व्यवसाय के अवसर बढ़ेंगे, तभी युवा पीढ़ी स्वाभाविक रूप से इन्हें अपनाएगी और इनके संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा मिलेगी। 

साथियो,

मुझे ज्ञात हुआ है कि लगभग 600 एकड़ में फैले इस विशाल परिसर में 1500 से अधिक शिक्षक लगभग 14 हजार विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। राज्य का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय होने के साथ यह NAAC द्वारा ‘A+’ ग्रेड से मान्यता प्राप्त है। 

गर्व का विषय है कि यह विश्वविद्यालय खेलों में भी अग्रणी रहा है और 10 बार मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ट्रॉफी (MAKA) जीत चुका है। यह बदलते समय के अनुरूप नए पाठ्यक्रमों, उद्यमिता, स्टार्टअप और रोजगारोन्मुख पहलों पर विशेष ध्यान देता है। शोध के क्षेत्र में अब तक 22 पेटेंट प्राप्त हो चुके हैं और अनेक प्रक्रिया में हैं।

इसका व्यापक नेटवर्क 270 से अधिक संबद्ध महाविद्यालयों, 9 नेबरहुड कैंपस, 12 संवैधानिक महाविद्यालयों और 6 क्षेत्रीय केंद्रों तक फैला हुआ है। साथ ही, 14 अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ सहयोग के चलते इसने राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

मेरे प्रिय युवा साथियो,

भारत की शिक्षा परंपरा अत्यंत गौरवशाली रही है। हमारी प्राचीन गुरुकुल प्रणाली ने विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें जीवन के प्रत्येक आयाम के लिए तैयार किया। इस शिक्षण प्रक्रिया में श्रवण, मनन और निदिध्यासन के तीन महत्वपूर्ण चरण थे। श्रवण अर्थात ज्ञान का ग्रहण, मनन अर्थात उस ज्ञान पर चिंतन, और निदिध्यासन अर्थात उस ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात करना। 

जब विद्यार्थी दीक्षांत के इस पवित्र चरण में पहुँचते थे, तब गुरु उन्हें यह संदेश देते थे कि “सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः”, अर्थात् सत्य का पालन करें, धर्म के मार्ग पर चलें और अध्ययन में कभी शिथिलता न आने दें। गुरुवाणी में भी कहा गया है, “सत्य सबसे ऊपर है, और यदि उससे भी ऊपर कुछ है, तो वह है सत्य का आचरण।”

भारतीय शिक्षा का मूल उद्देश्य सदैव से चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास रहा है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे महान व्यक्तित्वों ने भी इस आदर्श को अपने जीवन और विचारों में विशेष महत्व दिया। 

आज के समय में, जब विश्व एक गहरे चरित्र संकट, नैतिक मूल्यों के क्षरण और बढ़ती भौतिकता की चुनौती का सामना कर रहा है, यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम शिक्षा के मूल उद्देश्य की ओर पुनः लौटें।

यह प्रसन्नता का विषय है कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से न केवल ज्ञान और कौशल विकास पर बल दिया गया है, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, मातृभाषा में शिक्षा और समग्र व्यक्तित्व निर्माण को भी शिक्षा प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। यह नीति युवाओं को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ उन्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखने का भी महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

प्रिय विद्यार्थियों, 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था, “मनुष्य का अंतिम लक्ष्य मस्तिष्क का विकास है।” और यह विकास तभी संभव है जब आपके भीतर आत्मविश्वास हो, जैसा कि श्री गुरु नानक देव जी ने कहा, “जो अपने ऊपर विश्वास नहीं करता, वह ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता।” इन महान विचारों में लक्ष्य, विकास और विश्वास, तीनों का समन्वय निहित है, जो जीवन को सार्थक दिशा प्रदान करता है।

साथियो, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्द हमें याद दिलाते हैं कि “शिक्षा केवल किसी पात्र को भरने का नाम नहीं है, बल्कि भीतर एक अग्नि प्रज्वलित करने का कार्य है।” इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल विशेषज्ञता प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन, सही निर्णय क्षमता और संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करना भी है।

आज भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राष्ट्र है और यहाँ होने वाला हर परिवर्तन वैश्विक प्रभाव रखता है। लंबे औपनिवेशिक काल के बाद, हमारा देश अब तेजी से विकास के मार्ग पर अग्रसर है।

ऐसे समय में आप जैसे शिक्षित युवाओं से अपेक्षा है कि आप राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएँ। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य तभी साकार होगा, जब आप जैसे युवा अपने ज्ञान, कौशल और संकल्प के साथ इस दिशा में सक्रिय योगदान देंगे।

आदरणीय शिक्षकों,

आज के इस दीक्षांत समारोह में जो उपलब्धियाँ हम देख रहे हैं, उनके पीछे आपकी वर्षों की मेहनत, धैर्य और समर्पण निहित है। मैं आपसे अपेक्षा करता हूँ कि आप इसी प्रकार नवाचार, अनुसंधान और नैतिक शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

आज के इस तेजी से बदलते युग में यह अत्यंत आवश्यक है कि हम सभी स्वयं को शिक्षा के नवीनतम रुझानों, तकनीकों और वैश्विक मानकों के अनुरूप निरंतर विकसित करते रहें। डिजिटल लर्निंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कौशल-आधारित शिक्षा और बहु-विषयक दृष्टिकोण जैसे नए आयाम शिक्षा के स्वरूप को निरंतर परिवर्तित कर रहे हैं। 

ऐसे में एक शिक्षक के रूप में आपकी भूमिका केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि आपको आजीवन शिक्षार्थी बनकर स्वयं भी निरंतर सीखते रहना होगा। जब शिक्षक स्वयं सीखने की इस प्रक्रिया को अपनाते हैं, तभी वे विद्यार्थियों को भविष्य के लिए सही दिशा और प्रेरणा दे सकते हैं। 

प्रिय विद्यार्थियो,

नवाचार, अनुसंधान और विकास समाज की प्रगति के प्रमुख आधार हैं। ये हमें गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी और भूख जैसी चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम बनाते हैं।

शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। विश्वभर में डिजिटल तकनीकें शिक्षण और अधिगम के तरीकों को नया रूप दे रही हैं।

आज के इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों के युग में, वर्चुअल और मिश्रित शिक्षण वातावरण आवश्यक बन चुके हैं। ये परिवर्तन शिक्षा को अधिक सुलभ, किफायती और व्यापक बनाने की क्षमता रखते हैं।

साथ ही, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों को भी गतिशील और वैश्विक स्तर के अनुरूप होना चाहिए। उनमें उद्योगोन्मुख दृष्टिकोण होना आवश्यक है ताकि वे प्रतिस्पर्धी विश्व में प्रासंगिक बने रहें। उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने से नवाचार, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी।

भारत सरकार की ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ पहल उद्यमिता और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि आप इस नवाचार की भावना को अपनाएं।

केवल नौकरी खोजने वाले न बनें, बल्कि नौकरी देने वाले बनें। भारत को एक वैश्विक शक्ति बनाने के लिए हमें हर क्षेत्र में विचारशील नेता, नवप्रवर्तक और नेतृत्वकर्ता तैयार करने होंगे।

जब आप इस संस्थान से विदा लें, तो अपनी समृद्ध संस्कृति और विरासत पर गर्व अवश्य करें। समय आ गया है कि आप अपने चरित्र, नवाचार और समाज सेवा के माध्यम से देश की गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करें।

अब जब आप इस संस्थान से बाहर निकलकर पेशेवर जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, तो आपको अधिक स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का सामना करना होगा। भले ही आपके शिक्षक और मार्गदर्शक अब आपके साथ प्रत्यक्ष रूप से न हों, लेकिन उनके संस्कार और शिक्षाएँ सदैव आपके साथ रहेंगी।

मैं विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति और सफलता की कामना करता हूँ। एक बार फिर आप सभी को इस दीक्षांत समारोह की हार्दिक बधाई और आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ।

धन्यवाद,

जय हिंद!