SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF SEMINAR ON INTEGRAL HUMANISM AT PUNJAB LOK BHAVAN ON 26.04.2026.
- by Admin
- 2026-04-26 19:10
‘‘एकात्म मानवतावाद’’ कार्यक्रम के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 26.04.2026, रविवार समयः शाम 4:00 बजे स्थानः लोक भवन
नमस्कार!
आज ‘‘एकात्म मानववाद’’ (Integral Humanism) जैसे अत्यंत गंभीर, प्रासंगिक और युग-प्रवर्तक विषय पर आयोजित इस वैचारिक और दार्शनिक कार्यक्रम में उपस्थित होकर मुझे असीम शांति और गौरव की अनुभूति हो रही है। यह विषय केवल एक बौद्धिक चर्चा का बिंदु नहीं है, बल्कि यह वह जीवन-दर्शन है जिसकी आज के संघर्षरत और खंडित विश्व को सबसे अधिक आवश्यकता है।
मैं आयोजकों को इस बात के लिए साधुवाद देता हूँ कि उन्होंने भारतीय चिंतन की इस शाश्वत धारा को पुनर्जीवित करने और उस पर विमर्श करने का यह उत्कृष्ट मंच प्रदान किया है।
देवियों और सज्जनों,
जब हम ‘एकात्म मानववाद’ की बात करते हैं, तो अनायास ही महान भारतीय विचारक और दार्शनिक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का स्मरण हो आता है। उन्होंने 1960 के दशक में इस दर्शन को आधुनिक विश्व के सामने एक स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया था।
आज जब हम ‘एकात्म मानववाद’ जैसे महान दर्शन पर विचार कर रहे हैं, तो इसके प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। 25 सितंबर 1916 को मथुरा के एक छोटे से गाँव नगला चंद्रभान में जन्मे दीनदयाल जी का प्रारंभिक जीवन घोर संघर्षों और आंसुओं से भरा रहा। बहुत छोटी सी उम्र में ही उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया था। लेकिन अभावों और विपत्तियों की भट्टी में तपकर वे कुंदन बने। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि व्यक्ति के भीतर दृढ़ संकल्प हो, तो वह अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त कर सकता है।
वे असाधारण मेधा के धनी थे। अपनी स्कूली शिक्षा से लेकर कॉलेज तक, उन्होंने सदैव प्रथम स्थान प्राप्त किया और कई स्वर्ण पदक जीते। उनके पास एक शानदार प्रशासनिक करियर बनाने और सुख-सुविधाओं से भरा जीवन जीने के अनगिनत अवसर थे। लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत सुख और विलासिता को ठुकरा कर ‘राष्ट्र सेवा’ का वह अत्यंत कठिन और कंटीला मार्ग चुना। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन माँ भारती के चरणों में बिना किसी शर्त के समर्पित कर दिया।
दीनदयाल जी का जीवन सादगी, शुचिता और निस्वार्थ सेवा का सर्वाेच्च उदाहरण है। वे राजनीति के प्रांगण में होते हुए भी वास्तव में एक ‘संत’ थे। उन्होंने सत्ता, पद और प्रतिष्ठा की कभी लालसा नहीं की। वे अक्सर कहते थे कि हमारी राजनीति का उद्देश्य सत्ता की कुर्सी पाना नहीं, बल्कि राष्ट्र का सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्निर्माण है। उनका स्वयं का पहनावा और रहन-सहन इतना साधारण था कि वे आम जनमानस के बीच बिल्कुल उन्हीं के जैसे बनकर रहते थे।
उनका ‘एकात्म मानववाद’ का विचार किसी वातानुकूलित कमरे में बैठकर नहीं, बल्कि जमीन की धूल फांक कर और आम आदमी के दुख-दर्द को अपने भीतर जीकर निकला था।
आज दीनदयाल जी हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन एक आधुनिक ऋषि के रूप में उनका त्यागमय जीवन और उनका दर्शन, युगों-युगों तक हमारे राष्ट्र का पथ-प्रदर्शन करता रहेगा।
देवियो और सज्जनो,
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा प्रतिपादित ‘‘एकात्म मानववाद’’ कोई नया आविष्कार नहीं था। यह वास्तव में हमारी वेदों, उपनिषदों और गीता की शिक्षाओं का ही आधुनिक और व्यावहारिक रूप है। पश्चिमी दुनिया ने मनुष्य को या तो केवल एक ‘आर्थिक इकाई’ माना, या फिर एक ‘सामाजिक प्राणी’। पश्चिम के दो प्रमुख दर्शन, पूंजीवाद और साम्यवाद मनुष्य के केवल भौतिक सुखों के इर्द-गिर्द घूमते रहे।
यहीं पर भारतीय चिंतन अपनी विशिष्टता सिद्ध करता है। ‘एकात्म मानववाद’ यह मानता है कि मनुष्य केवल हाड़-मांस का पुतला या पेट नहीं है। मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा, इन चारों का एक समन्वित रूप है। जब तक इन चारों का संतुलित विकास और तुष्टिकरण नहीं होता, तब तक मनुष्य को सच्चा सुख और शांति नहीं मिल सकती।
देवियो और सज्जनो,
भारतीय चिंतन कभी भी मनुष्य को समाज या प्रकृति से अलग करके नहीं देखता। हमारी परंपरा में जीवन को एक अखंड, निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा के रूप में समझा गया है, जिसमें विभिन्न आयाम आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। “एकात्म मानववाद” इसी समग्र दृष्टि को स्पष्ट करता है और हमें यह सिखाता है कि मानव जीवन केवल व्यक्तिगत अस्तित्व तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक, प्राकृतिक और आध्यात्मिक संदर्भों में निहित है।
इस दर्शन के अनुसार, सबसे पहला आयाम है, व्यष्टि (Individual)। इसका अर्थ है व्यक्ति का सर्वांगीण विकास, जिसमें केवल शारीरिक उन्नति ही नहीं, बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास भी सम्मिलित है। एक सशक्त और संतुलित व्यक्ति ही समाज के निर्माण की आधारशिला बनता है।
दूसरा आयाम है, समष्टि (Society)। व्यक्ति अकेला नहीं है; वह समाज का अभिन्न अंग है। समाज के प्रति उसके दायित्व और कर्तव्य होते हैं। एकात्म मानववाद यह स्पष्ट करता है कि व्यक्ति और समाज के बीच कोई विरोध नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग और पूरकता का संबंध है। जब व्यक्ति अपने दायित्वों का निर्वहन करता है, तभी समाज सशक्त और समरस बनता है।
तीसरा आयाम है, सृष्टि (Nature)। मानव और समाज का अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है। इसलिए प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय चिंतन हमें यह सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि हमारा नैतिक दायित्व भी है। प्रकृति के साथ सामंजस्य ही स्थायी विकास का आधार है।
चौथा और अंतिम आयाम है, परमेष्ठी (Divine/Cosmos)। यह उस परम सत्य या ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है, जिसके साथ अंततः सबका संबंध है। एकात्म मानववाद हमें यह बोध कराता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य इस परम सत्ता के साथ एकाकार होना है, जिससे हमें आंतरिक शांति, संतुलन और उद्देश्य की अनुभूति होती है।
इस प्रकार, यह दर्शन हमें समझाता है कि व्यक्ति और समाज के बीच कोई संघर्ष नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग मिलकर एक स्वस्थ और संपूर्ण जीवन का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति मिलकर एक सशक्त राष्ट्र और समृद्ध विश्व की रचना करता है।
देवियो और सज्जनो,
आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रही है। इसका मूल कारण क्या है? इसका कारण पश्चिम की वह सोच है जो प्रकृति को केवल ‘उपभोग की वस्तु’ मानती है। लेकिन एकात्म मानववाद और हमारा सनातन चिंतन कहता है, ‘‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’’ यानी भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
प्रकृति के साथ हमारा संबंध ‘शोषण’ का नहीं, बल्कि ‘दोहन’ का होना चाहिए। जिस प्रकार एक बछड़ा अपनी माँ का दूध पीता है, लेकिन उसे लहूलुहान नहीं करता, उसी प्रकार हमें प्रकृति से केवल उतना ही लेना चाहिए जितनी हमारी आवश्यकता है, हमारे लालच के लिए नहीं। हमें समझना होगा कि यह धरती केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं है, बल्कि सभी जीव-जंतुओं का इस पर समान अधिकार है, और उनकी देखभाल करना हमारा नैतिक दायित्व है। एकात्म मानववाद प्रकृति और मानव के बीच के इसी सामंजस्य की वकालत करता है।
इस दर्शन का एक सबसे सशक्त स्तंभ है, ‘अन्त्योदय’। इसका अर्थ है समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति का उदय।
आज के आर्थिक मॉडल्स में अक्सर अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ जाती है। लेकिन एकात्म मानववाद का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र की प्रगति का पैमाना बड़े-बड़े महल या जीडीपी के आंकड़े नहीं हैं; असली पैमाना यह है कि क्या समाज के सबसे वंचित, शोषित और गरीब व्यक्ति के जीवन में रोशनी पहुँची या नहीं? जब तक अंतिम व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार नहीं मिल जाता, तब तक विकास की कोई भी कहानी अधूरी है।
आप भली-भांति जानते हैं कि स्वतंत्र भारत का संविधान हमारे समाज के समावेशी और न्यायपूर्ण विकास का एक महान दस्तावेज है।
संविधान सभा में नए संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने उस समय समाज के सामने उपस्थित संभावित विरोधाभासों पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि 26 जनवरी 1950 को हम एक ऐसे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ राजनीतिक क्षेत्र में हमें समानता प्राप्त होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। यदि इस विरोधाभास को शीघ्र समाप्त नहीं किया गया, तो जो लोग इस असमानता से पीड़ित हैं, वे उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को ही चुनौती दे सकते हैं, जिसे इस सभा ने बड़े परिश्रम से निर्मित किया है।
अतः यह समूचे समाज का पावन और संवैधानिक दायित्व है कि हम विकास को समावेशी, न्यायसंगत और सर्वस्पर्शी बनाएं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की “अंत्योदय” की परिकल्पना इसी उच्च आदर्श से प्रेरित रही है।
देवियो और सज्जनो,
मैं पंजाब का प्रतिनिधित्व करता हूँ, और जब मैं एकात्म मानववाद को देखता हूँ, तो मुझे इसमें हमारे महान सिख गुरुओं की वाणी की स्पष्ट गूंज सुनाई देती है।
श्री गुरु नानक देव जी ने पूरे विश्व को ‘‘सरबत दा भला’’ का संदेश दिया। उन्होंने लंगर की जो महान परंपरा शुरू की, वह क्या है? वह समाज के हर वर्ग को एक समान मानकर, बिना किसी भेदभाव के सेवा करने का ‘एकात्म’ स्वरूप ही तो है।
गुरुबाणी का महान संदेश, ‘‘पवन गुरू पानी पिता माता धरत महत’’ अर्थात पवन गुरु है, पानी पिता है और धरती हमारी महान माता है। यह स्पष्ट रूप से मनुष्य और प्रकृति के उसी अखंड संबंध को दर्शाता है, जिसकी बात एकात्म मानववाद करता है।
आज के समय में जब दुनिया युद्धों, मानसिक तनाव, और अंधी दौड़ से थक चुकी है, तब भारत का यह ‘एकात्म मानववाद’ संपूर्ण विश्व के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश बन सकता है।
मेरा आप सभी विचारकों, शोधकर्ताओं और विशेषकर युवा पीढ़ी से यह आह्वान है कि वे इस दर्शन को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखें। इसे अपने जीवन, अपनी नीतियो और अपने दैनिक व्यवहार में उतारें। हमें एक ऐसा ‘विकसित भारत’ बनाना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, लेकिन जिसकी आत्मा और जड़ें अपनी संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से गहराई से जुड़ी हों।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम एकात्म मानववाद के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारेंगे। हम व्यक्ति के साथ-साथ समाज के हित को भी प्राथमिकता देंगे। हम विकास के साथ नैतिकता और मानवीय मूल्यों को जोड़ेंगे। हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखेंगे और हम भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए आगे बढ़ेंगे।
मैं भारतीय दर्शन के उस परम शांति मंत्र के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ, जो वास्तव में एकात्म मानववाद का ही अंतिम लक्ष्य हैः
’’सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।’’
सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि एकात्म मानववाद केवल एक दर्शन नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति हैकृऐसी जीवन-पद्धति जो हमें संतुलन, समरसता और स्थायी विकास की ओर ले जाती है।
आप सभी ने मुझे इतने धैर्य और शांति से सुना, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
धन्यवाद,
जय हिंद!