SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF HIGHER EDUCATION POLICY CONFERENCE AT KHALSA UNIVERSITY AMRITSAR ON APRIL 24, 2026.
- by Admin
- 2026-04-24 14:05
खालसा विश्वविद्यालय अमृतसर के ‘‘राष्ट्रीय सम्मेलन’’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 24.04.2026, शुक्रवार समयः सुबह 11:00 बजे स्थानः अमृतसर
नमस्कार!
आज अमृतसर की इस पवित्र, ऐतिहासिक और शूरवीरों की धरती पर उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही है। अमृतसर केवल एक शहर नहीं है, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक चेतना और ऐतिहासिक विरासत का धड़कता हुआ हृदय है। ऐसे पावन स्थान पर, और वह भी शिक्षा के क्षेत्र में एक सदी से अधिक का गौरवशाली इतिहास समेटे ‘खालसा कॉलेज चैरिटेबल सोसायटी’ द्वारा संचालित इस प्रतिष्ठित ‘खालसा विश्वविद्यालय’ के प्रांगण में आकर, मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।
आज का यह राष्ट्रीय सम्मेलन, ‘‘उच्च शिक्षा नीतिः वैश्विक चुनौतियों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का मार्गदर्शन’’ (Higher Education Policy: Navigating Global Challenges and National Priorities) न केवल समय की सबसे बड़ी मांग है, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण बौद्धिक मंथन भी है। इस अत्यंत प्रासंगिक विषय को चुनने के लिए मैं विश्वविद्यालय प्रबंधन और आयोजकों को हृदय से बधाई देता हूँ।
हम सभी जानते हैं कि ‘खालसा कॉलेज चैरिटेबल सोसायटी’ न केवल अपने गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि भविष्य के प्रति अपनी दूरदर्शी सोच के लिए भी जानी जाती है। वर्ष 1890 में सिंह सभा आंदोलन के नेताओं द्वारा स्थापित यह गैर-लाभकारी संस्था महान गुरुओं के उच्च आदर्शों से प्रेरणा लेती है, जिन्होंने सदैव प्रगतिशील सोच, तर्क और विवेक को महत्व देने का संदेश दिया। अपनी स्थापना के बाद से ही इस संस्था ने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि दूरदर्शी शैक्षणिक पहल किस प्रकार किसी क्षेत्र के बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वरूप को परिवर्तित कर सकती है।
सामाजिक सुधार और जागरण के दौर में स्थापित खालसा कॉलेज चैरिटेबल सोसायटी केवल एक संस्थागत प्रयास नहीं थी, बल्कि यह पंजाब में ज्ञान की परिभाषा को पुनर्जीवित और पुनः परिभाषित करने का एक मिशन था। समय के साथ इस सोसायटी ने क्षेत्र में उच्च शिक्षा के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और लगभग 20 प्रतिष्ठित संस्थानों की स्थापना कर शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ चरित्र निर्माण के लिए भी सशक्त मंच तैयार किए हैं।
सोसायटी द्वारा स्थापित इस प्रतिष्ठित खालसा विश्वविद्यालय की बात करें तो इसकी स्थापना वर्ष 2016 में हुई थी, किंतु कुछ कारणों से यह वर्ष 2025 में पूर्ण रूप से कार्यशील हो सका। आज यह विश्वविद्यालय 19 स्कूलों और 144 पाठ्यक्रमों के साथ एक सुदृढ़ एवं दूरदर्शी दृष्टिकोण के तहत अपना प्रभावी संचालन कर रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को बढ़ावा देना है।
यह अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि खालसा कॉलेज चैरिटेबल सोसाइटी के 12 में से 7 कॉलेज राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद ¼NAAC½से मान्यता प्राप्त हैं। इनमें से 5 कॉलेजों को ^A’ ग्रेड, 1 कॉलेज को ^A$*ग्रेड और 1 कॉलेज को ^A$$* ग्रेड प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि न केवल इन संस्थानों की उत्कृष्ट शैक्षणिक गुणवत्ता, सुदृढ़ अधोसंरचना और समर्पित संकाय का प्रमाण है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में उनकी निरंतर प्रतिबद्धता और उच्च मानकों को बनाए रखने के संकल्प को भी दर्शाती है।
मेरा विश्वास है कि यह संस्थान निश्चय ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की उत्कृष्ट उच्च शिक्षा का एक नया युग स्थापित करेगा, जो न केवल क्षेत्र के ज्ञान परिदृश्य को परिवर्तित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते हुए उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश पर भी गहरा और सकारात्मक प्रभाव डालेगा।
देवियो और सज्जनो,
जब हम भविष्य की शिक्षा नीति की बात करते हैं, तो हमें अपनी जड़ों की ओर अवश्य देखना चाहिए। एक समय था जब हमारा देश भारत ‘विश्व गुरु’ कहलाता था। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे हमारे प्राचीन विश्वविद्यालय ज्ञान के वो सूर्य थे, जिनकी रोशनी से पूरी दुनिया आलोकित होती थी।
हमारी प्राचीन ‘गुरुकुल’ शिक्षा प्रणाली केवल अक्षर ज्ञान या आजीविका कमाने का साधन नहीं थी। उसका मूल मंत्र था, ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात विद्या वही है जो मुक्ति दिलाए, अज्ञान से, संकीर्णता से और हर प्रकार के अंधकार से।
उस समय शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण था। गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और कला के क्षेत्र में हमारे पूर्वजों ने जो कीर्तिमान स्थापित किए, वे आज भी आधुनिक विज्ञान के लिए शोध का विषय हैं।
सिख गुरुओं ने भी हमें यही सिखाया है। श्री गुरु नानक देव जी ने कहा है, ‘‘विद्या वीचारी तां परोपकारी’’ अर्थात, सच्ची विद्या वही है जो मनुष्य को परोपकार और मानवता की सेवा के लिए प्रेरित करे। ज्ञान का वास्तविक अर्थ समाज का कल्याण करना है। इसी महान सोच को आगे बढ़ाते हुए खालसा कॉलेज की स्थापना की गई थी, जिसने पंजाब ही नहीं, बल्कि पूरे देश को अनगिनत विद्वान, वैज्ञानिक, सैन्य अधिकारी और राष्ट्र-निर्माता दिए हैं।
यह अत्यंत सराहनीय है कि इस गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाते हुए खालसा विश्वविद्यालय, अमृतसर ने ऐसे समय में इस सम्मेलन का आयोजन किया है, जब विश्व तीव्र और कभी-कभी अस्थिर परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है। वैश्विक चुनौतियों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का यह संगम आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, और इसी संदर्भ में हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली को अपनी दिशा और उद्देश्य निर्धारित करना होगा।
आज हम एक ऐसे परिवर्तन काल से गुजर रहे हैं, जहाँ वैश्विक व्यवस्था तेजी से बदल रही है। तकनीकी प्रगति, आर्थिक केंद्रों में बदलाव, जलवायु संबंधी अनिश्चितताएँ और सामाजिक अपेक्षाओं में परिवर्तन हमारे सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। ज्ञान अब स्थिर नहीं रहा, बल्कि निरंतर विकसित हो रहा है और बहुविषयक स्वरूप धारण कर चुका है।
ऐसे समय में उच्च शिक्षा को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर अधिक उत्तरदायी और लचीला बनना होगा, ताकि वह ऐसे नागरिक तैयार कर सके जो आलोचनात्मक सोच, नैतिक दृष्टिकोण और रचनात्मक समाधान की क्षमता रखते हों।
साथ ही, हमें यह भी समझना होगा कि उच्च शिक्षा केवल वैश्विक संदर्भ में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय आवश्यकताओं से भी गहराई से जुड़ी होती है। भारत जैसे देश और पंजाब जैसे राज्य के लिए समावेशी विकास, सामाजिक न्याय, रोजगार सृजन और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए हमारी शिक्षा प्रणाली को वैश्विक परिवर्तनों के साथ तालमेल बैठाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को भी सुदृढ़ करना होगा।
इन वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें ऐसी युवा पीढ़ी की आवश्यकता है जो न केवल तकनीकी रूप से दक्ष हो, बल्कि भावनात्मक रूप से भी मजबूत हो। हमारी उच्च शिक्षा को केवल डिग्रियां बांटने वाले कारखाने नहीं बनना है, बल्कि इसे ऐसे ‘वैश्विक नागरिक’ तैयार करने होंगे जो विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें, लेकिन जिनकी आत्मा और मूल्य पूरी तरह से भारतीय हों।
इन वैश्विक चुनौतियों का सामना हम तभी कर सकते हैं जब हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताएं स्पष्ट हों। भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यह ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ हमारे लिए एक अवसर भी है और एक चुनौती भी।
सरकार द्वारा लाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 इसी दिशा में एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कदम है। यह नीति रटने की प्रवृत्ति को खत्म करके आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और नवाचार पर जोर देती है। यह बहु-विषयक दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है, ताकि एक विज्ञान का छात्र संगीत भी सीख सके और अर्थशास्त्र का छात्र दर्शनशास्त्र का भी अध्ययन कर सके।
हमें ‘नौकरी मांगने वाले’ की बजाय ‘नौकरी देने वाले’ युवा तैयार करने हैं। हमें अपने विश्वविद्यालयों को उद्योगों और समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना होगा। जब तक हमारी प्रयोगशालाओं में होने वाला शोध खेतों में किसान की, और कारखानों में मजदूर की जिंदगी को आसान नहीं बनाता, तब तक वह शोध अधूरा है।
आज की चुनौतियाँ, जैसे पर्यावरणीय स्थिरता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और तकनीकी नैतिकता के समाधान के लिए बहुविषयक दृष्टिकोण आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी इसी पर बल दिया गया है। लेकिन इसे लागू करने के लिए संस्थागत संरचना, शिक्षकों के प्रशिक्षण और शैक्षणिक संस्कृति में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि लचीलापन गुणवत्ता और शैक्षणिक कठोरता को प्रभावित न करे।
तकनीक की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन शिक्षा ने उच्च शिक्षा के स्वरूप को बदल दिया है। जहाँ एक ओर ये अवसर प्रदान करते हैं, वहीं डिजिटल विभाजन, गुणवत्ता और समानता से जुड़े प्रश्न भी उठाते हैं। विशेषकर पंजाब जैसे राज्यों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इस अंतर को कम करना अत्यंत आवश्यक है।
अनुसंधान और नवाचार उच्च शिक्षा की रीढ़ हैं। अनुसंधान को समाज की आवश्यकताओं से जोड़ना आवश्यक है। पंजाब के संदर्भ में सतत कृषि, जल प्रबंधन, ग्रामीण विकास और कौशल आधारित उद्योगों पर विशेष ध्यान देना होगा।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह स्पष्ट उद्देश्य के साथ होना चाहिए। हमें केवल वैश्विक ज्ञान को अपनाना ही नहीं, बल्कि अपनी बौद्धिक परंपराओं के आधार पर उसमें योगदान भी देना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा मूल्यों से जुड़ी होनी चाहिए। ज्ञान के साथ नैतिकता, सामाजिक जिम्मेदारी और संवैधानिक प्रतिबद्धता का समावेश आवश्यक है। बिना मूल्यों के ज्ञान असंतुलन पैदा कर सकता है।
पंजाब के संदर्भ में, ये चुनौतियां और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं। हमारे युवा अत्यंत प्रतिभाशाली और ऊर्जावान हैं, जिनकी अपनी ऊँची आकांक्षाएं हैं; दुनिया भर में फैला हमारा मजबूत प्रवासी पंजाबी समुदाय हमें सीधे तौर पर वैश्विक पटल से जोड़ता है; और हमारा सामाजिक-आर्थिक परिवेश हमारे सामने चुनौतियां और अवसर, दोनों ही प्रस्तुत करता है।
इस निर्णायक समय में, यह अत्यंत आवश्यक है कि राज्य के उच्च शिक्षण संस्थान ‘उत्कृष्टता, नवाचार और समावेशिता’ के प्रमुख केंद्र बनकर उभरें और समय की इस मांग को पूरा करने के लिए मजबूती से आगे आएं।
इस सभागार में उपस्थित युवा विद्यार्थियों से मैं कहना चाहूँगा कि आप एक स्वतंत्र और सशक्त भारत का भविष्य हैं। आपके पास असीमित ऊर्जा और संभावनाएं हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का निर्माण हो, मानसिक शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।’’
महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी का भी मानना था कि ‘‘सपने वो नहीं होते जो आप सोते हुए देखते हैं, सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते।’’ इसलिए, बड़े सपने देखिए, कड़ी मेहनत कीजिए और असफलता से कभी मत घबराइए।
मैं यहां उपस्थित सभी प्राध्यापकों और शिक्षाविदों से भी यह अनुरोध करूँगा कि आप केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्र के निर्माता हैं। एक अच्छा शिक्षक केवल पढ़ाता नहीं है, वह प्रेरित करता है। छात्रों के अंदर छिपी हुई प्रतिभा को पहचानने और उसे तराशने का महान कार्य आपके कंधों पर है।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि हम एक निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। यदि हम वैश्विक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के बीच संतुलन स्थापित कर पाते हैं, तो हम तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी और विक्रमशिला जैसे प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालयों की गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
आइए, यह सम्मेलन सार्थक संवाद, गहन चिंतन और सामूहिक प्रतिबद्धता का मंच बने, ताकि हम एक ऐसी उच्च शिक्षा प्रणाली का निर्माण कर सकें जो सुदृढ़, प्रासंगिक और परिवर्तनकारी हो।
धन्यवाद,
जय हिंद!