SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF CONVOCATION OF DAV COLLEGE CHANDIGARH ON APRIL 22, 2026.
- by Admin
- 2026-04-22 18:30
सेक्टर-10 स्थित डीएवी कॉलेज के 63वें दीक्षांत समारोह पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 22.04.2026, बुधवार समयः शाम 4:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज, डी.ए.वी. कॉलेज, सेक्टर-10, चंडीगढ़ के इस ऐतिहासिक और भव्य परिसर में, 63वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही है।
सबसे पहले, मैं आज उपाधि प्राप्त कर रहे सभी 942 छात्र-छात्राओं को अपनी ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ। इनमें 647 ग्रेजुएट तथा 295 पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थी शामिल हैं। संकायवार देखें तो मानविकी के 448, विज्ञान के 227, वाणिज्य के 235 और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के 32 विद्यार्थी आज सम्मानित किए जा रहे हैं। यह उपलब्धि न केवल इन विद्यार्थियों की मेहनत और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि हमारे शिक्षकों के मार्गदर्शन और इस संस्थान की उत्कृष्ट शैक्षणिक परंपरा का भी प्रमाण है।
मैं विद्यार्थियों के माता-पिता और समस्त शिक्षकगणों और अभिभावकों और परिवारजनों को भी हार्दिक बधाई देता हूँ। आपका अटूट सहयोग, त्याग और प्रोत्साहन उनकी सफलता की नींव रहा है।
देवियो और सज्जनो,
डी.ए.वी. कॉलेज, सेक्टर-10, चंडीगढ़ की स्थापना और विकास शिक्षा तथा राष्ट्रवाद के अनूठे संगम की प्रेरक कहानी है। वर्ष 1958 में स्थापित यह कॉलेज, दयानंद एंग्लो-वैदिक परंपरा से प्रेरित है, जिसकी नींव महात्मा हंसराज और स्वामी दयानंद सरस्वती के आदर्शों पर रखी गई। पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध यह महाविद्यालय गुणवत्ता और मूल्य आधारित शिक्षा के लिए प्रसिद्ध है।
यह महाविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि वीरता, राष्ट्रभक्ति और उत्कृष्टता का प्रतीक भी है। हमें गर्व है कि कारगिल युद्ध के नायक कैप्टन विक्रम बत्रा (परम वीर चक्र), कैप्टन विजयंत थापर और मेजर संदीप सागर जैसे वीर सपूत इसी संस्थान के विद्यार्थी रहे हैं, जिन्होंने राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया और इस कॉलेज का नाम सदैव के लिए गौरवान्वित किया।
शैक्षणिक दृष्टि से भी यह संस्थान उच्च मानकों पर खरा उतरता है। NAAC द्वारा उत्कृष्ट ग्रेड प्राप्त करने के साथ-साथ NIRF 2025 में यह देश के शीर्ष कॉलेजों (151-200 रैंक बैंड) में स्थान प्राप्त कर चुका है। इस संस्थान ने न केवल शिक्षाविद्, बल्कि नीरज चोपड़ा (भाला फेंक) और अंजुम मौदगिल, मनु भाखड़, सरबजीत सिंह (निशानेबाज) जैसे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तथा आयुष्मान खुराना जैसे प्रसिद्ध कलाकार भी देश को दिए हैं। साथ ही, केरल उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति श्री अमित रावल भी इसी संस्था की देन हैं।
लगभग 17 एकड़ में फैला यह हरा-भरा परिसर 8 हजार से अधिक विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करता है। यहाँ 15 से अधिक ग्रेजुएट, 15 से अधिक पोस्टग्रेजुएट तथा पीएचडी कार्यक्रम संचालित हैं, जिन्हें 160 से अधिक अनुभवी और उच्च शिक्षित संकाय सदस्यों द्वारा संचालित किया जाता है।
इस प्रकार, डी.ए.वी. कॉलेज शिक्षा, संस्कार, प्रतिभा और राष्ट्र सेवा का एक सशक्त केंद्र बनकर निरंतर नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर रहा है।
देवियो और सज्जनो,
आज जब हम इस प्रतिष्ठित संस्थान के प्रांगण में दीक्षांत समारोह के पावन अवसर पर एकत्रित हुए हैं, तो यह केवल विद्यार्थियों की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि उन सभी के योगदान को नमन करने का भी क्षण है, जिन्होंने इन्हें यहाँ तक पहुँचाया है।
मैं विशेष रूप से हमारे समर्पित शिक्षकगणों को हृदय से प्रणाम करता हूँ, जो केवल ज्ञान के संवाहक ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला को सुदृढ़ करने वाले सच्चे मार्गदर्शक हैं। आपने अपने धैर्य, परिश्रम और प्रतिबद्धता से विद्यार्थियों में न केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता, बल्कि नैतिकता, अनुशासन और जीवन मूल्यों के संस्कार भी विकसित किए हैं। एक कुम्हार जिस प्रकार मिट्टी को आकार देकर उसे एक सुंदर बर्तन बनाता है, उसी प्रकार आप इन युवाओं के चरित्र और भविष्य का निर्माण करते हैं।
आचार्य चाणक्य ने कहा था, ‘‘शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, शिक्षा सबसे अच्छी मित्र होती है और शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है।’’
आप केवल विषय का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाते हैं। आपकी तपस्या और निरंतर मार्गदर्शन के बिना कोई भी विद्यार्थी आज इस मुकाम तक नहीं पहुँच सकता था। मैं आपसे यही आह्वान करता हूँ कि अपनी इस पवित्र जिम्मेदारी को इसी ऊर्जा और समर्पण के साथ निभाते रहें। आप केवल छात्रों को नहीं पढ़ा रहे हैं, बल्कि आप कल के भारत का निर्माण कर रहे हैं।
आज के इस तीव्र परिवर्तनशील युग में, शिक्षा का स्वरूप भी निरंतर बदल रहा है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षकगण स्वयं को समय के अनुरूप अपडेट करते रहें। नई तकनीकों, डिजिटल माध्यमों और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों को अपनाकर आप विद्यार्थियों के सीखने के अनुभव को और अधिक प्रभावी बना सकते हैं। एक शिक्षक का सीखना कभी समाप्त नहीं होता; जितना अधिक आप स्वयं सीखेंगे, उतना ही अधिक आप अपने विद्यार्थियों को सशक्त बना पाएंगे।
इस सभागार में बैठे माता-पिता की आँखों में आज जो चमक है, मैं उसे देख और महसूस कर सकता हूँ। आपकी अनगिनत रातों की नींद, आपके त्याग और आपके द्वारा किए गए संघर्षों का ही परिणाम है कि आज आपके बच्चे इस इस मुकाम पर पहुंचे हैं। आज जब आपके बच्चों के नाम मंच से पुकारे जा रहे हैं, तो वास्तव में वह आपकी तपस्या का सम्मान है। विद्यार्थियों, आज घर जाकर अपने माता-पिता के चरण अवश्य स्पर्श करना, क्योंकि उनके बिना यह सफलता संभव नहीं थी।
मेरे युवा साथियों,
आज जब आप इस सुरक्षित प्रांगण से निकलकर वास्तविक दुनिया में कदम रख रहे हैं, तो आपके सामने असीम संभावनाओं के साथ-साथ कई चुनौतियाँ भी होंगी। मैं आपको जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र देना चाहता हूँ।
आज आपको जो उपाधि मिल रही है, वह आपकी शिक्षा का अंत नहीं है। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) और तकनीक के इस युग में आपको हमेशा एक ‘विद्यार्थी’ बने रहना होगा। जो सीखना छोड़ देता है, वह रुक जाता है।
आप जीवन में कितने भी सफल हो जाएं, कितने भी ऊंचे पदों पर पहुँच जाएं, लेकिन अपनी जड़ों और अपने नैतिक मूल्यों को कभी न भूलें। सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और अनुशासन ही वह पूंजी है जो संकट के समय आपका साथ देगी।
जीवन में सफलता और असफलता धूप-छाँव की तरह हैं। जब भी आप निराश हों, तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की ये पंक्तियाँ हमेशा याद रखें, ‘‘है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके आदमी के मग में? खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़, मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।’’
ये पंक्तियां हमें सिखाती हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी विपत्ति या बाधा क्यों न आए, इंसान अगर धीरज न खोए और निरंतर संघर्ष करे, तो वह हर मुश्किल को हराकर जीत हासिल कर सकता है। और चुनौतियों को अवसर में बदलना ही डी.ए.वी. के विद्यार्थी की असली पहचान है।
मैं इस अवसर पर आप सभी से एक किस्सा साझा करना चाहता हूं। आप सभी ने कालीदास के बारे में तो सुना ही होगा। संस्कृत के महानतम कवि और नाटककार महाकवि कालिदास का प्रारंभिक जीवन अज्ञानता और संघर्षों से भरा था। मात्र छह माह की उम्र में अनाथ होने के कारण उनका पालन-पोषण एक चरवाहे ने किया और वे किसी भी प्रकार की शिक्षा से वंचित रह गए। इस कारण उन्हें जीवन भर आलोचनाओं और घोर अपमान का सामना करना पड़ा।
एक दिन, घोर निराशा और हताशा में डूबे हुए, जब वे नदी के किनारे अपना जीवन समाप्त करने का विचार कर रहे थे, तभी उनकी दृष्टि कपड़े धोती हुई कुछ महिलाओं पर पड़ी। उन्होंने देखा कि निरंतर कपड़े पटकने से वे कठोर पत्थर बिल्कुल चिकने और गोल हो गए थे, जबकि आसपास के अन्य पत्थर अभी भी खुरदरे थे। इस दृश्य ने उनके भीतर एक बिजली सी दौड़ा दी। उन्हें यह बोध हुआ कि यदि कोमल कपड़ों की निरंतर चोट से एक कठोर पत्थर अपना आकार बदल सकता है, तो ज्ञान के निरंतर अभ्यास से उनकी बुद्धि का विकास क्यों नहीं हो सकता? उनके इसी दृढ़ निश्चय का परिणाम है कि वे देश के सबसे बड़े विद्वान बने और आज पूरी दुनिया उन्हें जानती है।
विद्यार्थियों, यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में कुछ भी हासिल करने के लिए स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन का होना नितांत आवश्यक है। एक प्रशिक्षित, अनुशासित और एकाग्र मस्तिष्क ही आपको सफलता के सर्वोच्च शिखर तक ले जा सकता है। इसलिए, भविष्य में अपने करियर और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल होने के लिए, आपको अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट रखना होगा और अपनी बुद्धि को निरंतर प्रखर बनाते रहना होगा।
प्रिय युवाजनों,
हम आज उस दौर में हैं जहाँ भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है। ‘विकसित भारत’ का सपना केवल सरकारों के प्रयासों से पूरा नहीं हो सकता; यह आप जैसे ऊर्जावान युवाओं की रचनात्मकता, नवाचार और देशभक्ति से साकार होगा।
आप चाहे जिस भी क्षेत्र में जाएं। चाहे आप डॉक्टर बनें, इंजीनियर बनें, सिविल सेवक बनें, उद्यमी बनें या कला के क्षेत्र में जाएं, हमेशा यह विचार करें कि आपके काम से समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का क्या लाभ हो रहा है।
हमारा संविधान हमें न केवल हमारे अधिकार प्रदान करता है, बल्कि हमारे कर्तव्यों का भी बोध कराता है। यह हमें हमारे जिस एक प्रमुख कर्तव्य का स्मरण कराता है, वह है, ‘‘व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना, ताकि हमारा राष्ट्र निरंतर प्रगति करते हुए नित्य नए प्रयासों और उपलब्धियों की सर्वोच्च ऊंचाइयों को छू सके।’’
जब स्वामी विवेकानंद जी ने यह ओजस्वी आह्वान किया था कि, ‘‘उठो, जागो, क्योंकि तुम्हारे देश को तुम्हारे महान बलिदान की आवश्यकता है,’’ तो उन्होंने इसके साथ यह भी जोड़ा था कि, ‘‘यह कार्य हमारे युवा ही करेंगे। जो युवा हैं, ऊर्जावान हैं, सशक्त हैं और बौद्धिक रूप से संपन्न हैं और यह दायित्व उन्हीं का है।’’
इसी भावना को आत्मसात करते हुए, आज के युवा वर्ग के सामने यह दायित्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे अपने ज्ञान, कौशल और ऊर्जा का उपयोग केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित न रखें, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण की दिशा में समर्पित करें।
और सबसे महत्वपूर्ण यह कि नशे जैसी समाज की जहरीली विभीषिका और इस जानलेवा दीमक से स्वयं को दूर रखें और अपने संगी-साथियों को भी इसके प्रति जागरूक कर इस दलदल में फँसने से बचाएं। यदि हमारा युवा नशों से दूर रहेगा, तभी उसकी असीमित ऊर्जा और मेधा का सही दिशा में उपयोग हो सकेगा।
याद रखिए, नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके भविष्य, परिवार और पूरे राष्ट्र की नींव को खोखला कर देता है। जब आप नशे जैसी बुराइयों को त्याग कर स्वस्थ जीवनशैली अपनाएंगे, तभी हम ‘विकसित भारत’ के सपने को हकीकत में बदल पाएंगे। आपकी सफलता तभी सार्थक है, जब आप शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त होकर समाज के लिए एक आदर्श बनें।
इस अवसर पर पूरे डी.ए.वी. कॉलेज परिवार को पुनः शुभकामनाएं देता हूँ। ऐसी उम्मीद करता हूं कि आप सभी शिक्षक और विद्यार्थीगण निरंतर उत्कृष्टता हासिल करें, उच्च मूल्यों और गुणवत्ता को प्रेरित करने का संकल्प लें। डीएवी ज्ञान, शांति तथा प्रगति पर आधारित राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करने में सहायक बने।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि डी.ए.वी. कॉलेज की इस महान विरासत का स्वाभिमान हमेशा अपने हृदय में सँजो कर रखें। आपका सिर हमेशा गर्व से ऊँचा रहे। ईश्वर आपको आपके सभी सपनों और महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की शक्ति प्रदान करे। मेरी शुभकामनाएँ हमेशा आपके साथ हैं।
आप सफलता के नए शिखर छुएं, अपने माता-पिता, अपने कॉलेज और इस देश का नाम रोशन करें।
धन्यवाद,
जय हिन्द!