SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF 1008 KUNDIYA SAMSHTI HANUMAN CHALISHA HAVAN AT AMRITSAR ON MAY 3, 2026.
- by Admin
- 2026-05-03 21:35
‘1008 कुण्डीय समष्टि हनुमान चालीसा हवन’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 03.05.2026, रविवार समयः शाम 6:00 बजे स्थानः अमृतसर
जय श्री राम! नमस्कार!
आज गुरुओं की इस पावन नगरी, अमृतसर में आयोजित इस अलौकिक एवं ऐतिहासिक ‘1008 कुंडीय समष्टि हनुमान चालीसा हवन’ में आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे अत्यंत आत्मिक शांति और अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। इस पवित्र यज्ञ की अग्नि और यहाँ गूंजते हनुमान चालीसा के सिद्ध चौपाइयों ने इस पूरे वातावरण को अत्यंत ऊर्जामयी और दिव्य बना दिया है।
मैं विशेष रूप से चिन्मय मिशन, अमृतसर के इस सराहनीय प्रयास की प्रशंसा करता हूँ, जो समाज में आध्यात्मिक मूल्यों के प्रसार और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। ऐसे आयोजन न केवल हमारी आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी माध्यम बनते हैं। आज के इस भौतिकतावादी युग में, जहाँ मनुष्य तनाव और अशांति से घिरा है, ऐसे समष्टि (सामूहिक) अनुष्ठान समाज में सकारात्मक ऊर्जा, विश्व शांति और मानसिक शुद्धि का संचार करते हैं।
मुझे बताया गया है कि चिन्मय मिशन रूपी आध्यात्मिक आंदोलन की शुरूआत पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी ने वर्ष 1951 में इस उद्देश्य से की थी कि व्यक्ति के भीतर आत्मबोध जागृत हो और वह जीवन के उच्चतम लक्ष्य की ओर अग्रसर हो। "To give maximum happiness to the maximum number for the maximum time" का इसका आदर्श वाक्य इसकी व्यापक सेवा-भावना को दर्शाता है। यह मिशन आत्मविकास के माध्यम से समाज सेवा की प्रेरणा देता है।
पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद जी ने जिस वेदान्त के ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना की ज्योति प्रज्वलित की थी, आज यह मिशन उसी प्रकाश को जन-जन तक पहुँचाने का महान कार्य कर रहा है।
चिन्मय मिशन अमृतसर की बात करें तो, इसकी स्थापना वर्ष 1997 में श्रीमती उमा शेरगिल जी के नेतृत्व में हुई थी। आज श्री अविनाश मोहिन्द्रु जी के मार्गदर्शन में यह चिन्मय मिशन अमृतसर प्रभावशाली ढंग से कार्य कर रहा है। “चिन्मय अमृत” आश्रम का भूमि पूजन 2006 में और शिलान्यास 2008 में पूज्य स्वामी तेजोमयानंद जी द्वारा किया गया।
यह केंद्र केवल आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वानप्रस्थ बैठकें, 'Graceful Aging' शिविर, गायत्री हवन और वेदांत प्रवचनों के माध्यम से समाज को दिशा प्रदान करता है। साथ ही, प्रति माह लगभग 250 विधवाओं को निःशुल्क राशन प्रदान कर यह सेवा और संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
पिछले 29 वर्षों से निरंतर आयोजित भजन संध्याएँ और विभिन्न पर्वों पर विशेष कार्यक्रम इस आश्रम को भक्ति और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त केंद्र बनाते हैं। आज श्रीराम नवमी के पावन अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम हमें भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
निस्संदेह, चिन्मय मिशन अमृतसर आध्यात्मिकता, सेवा और सांस्कृतिक जागरण का एक जीवंत केंद्र है, जो समाज को दिशा और जीवन को सार्थकता प्रदान कर रहा है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज जब हम सभी इस पावन अनुष्ठान का हिस्सा बने हैं तो, मेरा मानना है कि ये 1008 हवन कुंड केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि यह लाखों हृदयों के एक साथ जुड़ने और सामूहिक चेतना के जागरण का सशक्त प्रतीक हैं। यह आयोजन हमें सिखाता है कि जब हम ‘मैं’ और ‘मेरा’ की सीमाओं से ऊपर उठकर ‘हम’ और ‘हमारा’ की भावना से कार्य करते हैं, तब असंभव भी संभव हो जाता है। यह हवन-स्थल वास्तव में सामाजिक समरसता की एक जीवंत पाठशाला है, जहाँ जाति, वर्ग और भेदभाव की दीवारें स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं और हम सब एक ही ईश्वर की संतान के रूप में एकाकार हो जाते हैं।
हम सभी जानते हैं कि समाज का निर्माण व्यक्तियों से होता है, और जब व्यक्ति का आचरण सुधरता है, तो समाज भी स्वतः ही सुदृढ़ बनता है। इस महाहवन का एक महत्वपूर्ण संकल्प है, व्यक्तित्व को धर्ममय बनाना। यहाँ धर्म का अर्थ केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि जीवन में सद्गुणों को धारण करना है।
हवन हमें ‘इदम् न मम’, अर्थात ‘यह मेरा नहीं है’, का गूढ़ संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह समाज और लोककल्याण के लिए है। जब हवन की पवित्र ऊष्मा और ऊर्जा हमारे भीतर प्रवेश करती है, तो हमारे अंतर्मन के विकार शांत होकर एक नए, संस्कारवान और जागरूक व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यही सच्चे अर्थों में धर्म का सार है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
हमारे शास्त्रों में ‘समष्टि’ अर्थात सामूहिकता का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। जब 1008 कुंडों में एक साथ आहुतियां दी जाती हैं और हज़ारों कंठों से एक स्वर में ‘‘जय हनुमान ज्ञान गुन सागर’’ का गान होता है, तो वह केवल एक कर्मकांड नहीं रह जाता, बल्कि वह एक विराट आध्यात्मिक ऊर्जा का रूप ले लेता है। यह सामूहिक ऊर्जा न केवल पर्यावरण को शुद्ध करती है, बल्कि हमारे अंतःकरण के विकारों को भी भस्म कर देती है।
प्राचीन काल से ही हवन सनातन धर्म की आत्मा और उसकी जीवन-दृष्टि का अभिन्न अंग रहा है। हवन केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि त्याग, सेवा, अनुशासन और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है, जिसके माध्यम से मानव, प्रकृति और परमात्मा के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में हवन को लोककल्याण, पर्यावरण शुद्धि और आत्मिक उन्नति का सशक्त माध्यम माना गया है।
भारतीय परंपरा में हवन को केवल अग्नि में आहुति देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और चेतना के शुद्धिकरण का मार्ग बताया गया है। ऋग्वेद का वचन, “यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म”, इस बात को स्पष्ट करता है कि यह कर्म सर्वोत्तम और कल्याणकारी है।
जब हजारों श्रद्धालु एक साथ अनेकों पवित्र कुण्डों में वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ आहुतियाँ अर्पित करते हैं, तो वह दृश्य न केवल दिव्यता का अनुभव कराता है, बल्कि सामूहिक आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्वितीय प्रतीक बन जाता है।
ऐसा महाहवन हमें उन प्राचीन वैदिक परंपराओं की याद दिलाता है, जब राष्ट्र की समृद्धि, लोककल्याण और धर्म की स्थापना के लिए विशाल अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता था।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज के आधुनिक युग में, जब विश्व प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब हवन ‘पर्यावरण की सेवा’ का एक अत्यंत प्रभावी और वैज्ञानिक माध्यम बनकर उभरता है। हमारे ऋषियों ने कहा है, “यज्ञात् भवति पर्जन्यः”, अर्थात यह सृष्टि के चक्र को दर्शाता है, जहाँ यज्ञ से वर्षा, वर्षा से अन्न, और अन्न से जीव विकसित होते हैं। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
आज यहाँ 1008 कुण्डों में जो विशिष्ट वनौषधियाँ, शुद्ध गोघृत और समिधाएँ समर्पित की जा रही हैं, उनसे उत्पन्न होने वाला औषधीय धूम्र वातावरण में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं और विषैले तत्वों को नष्ट करने में सहायक होता है। यह हवन न केवल वायुमंडल को शुद्ध करता है, बल्कि हमारी प्राणवायु को भी सशक्त बनाता है और प्रकृति के असंतुलित चक्र को संतुलित करने में योगदान देता है।
वास्तव में, हवन हमें यह सिखाता है कि हम केवल प्रकृति से लें ही नहीं, बल्कि उसे लौटाएँ भी। यह प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता, जिम्मेदारी और संतुलित जीवन दृष्टि का प्रतीक है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज हम उस महाबली की आराधना कर रहे हैं जो भारतीय जनमानस के रोम-रोम में बसे हैं। श्री हनुमान जी केवल एक देवता नहीं हैं, बल्कि वे ‘भक्ति और शक्ति’, ‘ज्ञान और कर्म’ के सबसे उत्तम और अद्वितीय संगम हैं।
जब हम गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, तो उसकी एक-एक पंक्ति हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। एक पंक्ति है, ‘‘विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।’’ अर्थात, हनुमान जी अपार विद्या के धनी हैं, गुणवान हैं, चतुर (कुशल) हैं, लेकिन इन सबके बावजूद वे सदैव प्रभु के कार्य, यानी समाज और धर्म के कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं। आज हमारे युवाओं को इसी विद्या, इसी गुण और इसी तत्परता की आवश्यकता है।
एक प्रशासक, एक नागरिक और एक युवा के रूप में हम हनुमान जी के जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। उनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो आज के समय में हमारे लिए सबसे बड़े ‘प्रबंधन और प्रेरणा’ के उदाहरण हैं।
जब हनुमान जी माता सीता की खोज में समुद्र लांघ रहे थे, तो रास्ते में मैनाक पर्वत ने उन्हें विश्राम करने का आग्रह किया। तब हनुमान जी का उत्तर था, ‘‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।’’
यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जब तक हमारा लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, जब तक हम अपने संकल्प को सिद्ध न कर लें, तब तक हमें रुकना नहीं चाहिए। आज भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने का जो हमारा लक्ष्य है, उसके लिए हम सभी को इसी भावना के साथ निरंतर कार्य करना होगा।
हनुमान जी के पास अथाह बल था। वे अष्ट सिद्धि और नौ निधि के दाता हैं। वे चाहते तो लंका पर स्वयं विजय प्राप्त कर सकते थे। लेकिन उनमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। उन्होंने हमेशा स्वयं को केवल ‘राम दूत’ (एक सेवक) माना। यह हमें सिखाता है कि मनुष्य के पास चाहे कितना भी ज्ञान, पद, धन या शक्ति क्यों न आ जाए, उसकी सबसे बड़ी शोभा उसकी ‘विनम्रता’ में ही है। अहंकार पतन का कारण बनता है, जबकि विनम्रता व्यक्ति को पूजनीय बनाती है।
हनुमान जी को ‘संकट मोचन’ कहा जाता है। रामायण में जब भी कोई विषम परिस्थिति आई, चाहे वह समुद्र लांघना हो, संजीवनी बूटी लाना हो, या अहिरावण का वध करना हो, हनुमान जी ने आगे बढ़कर उसका समाधान निकाला।
हनुमान चालीसा कहती है, ‘‘दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।’’ अर्थात संसार के जितने भी कठिन कार्य हैं, वे आपकी कृपा से आसान हो जाते हैं। यह हमें संदेश देता है कि जीवन में या समाज में कितनी भी बड़ी चुनौती क्यों न आए, यदि हमारे भीतर आत्मविश्वास है और ईश्वर पर श्रद्धा है, तो हर बाधा को पार किया जा सकता है।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज पंजाब की पावन धरती से मैं विशेषकर अपने युवा वर्ग को एक संदेश देना चाहता हूँ। आज हमारे कुछ युवा नशे जैसी सामाजिक बुराइयों और भटकाव के शिकार हो रहे हैं। हनुमान जी बल, बुद्धि और विद्या के दाता हैं। हमारी प्रार्थना है, ‘‘बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।’’
मैं युवाओं से आह्वान करता हूँ कि वे हनुमान जी को अपना आदर्श बनाएं। अपने शरीर को अखाड़ों और खेल के मैदानों में लोहे की तरह मजबूत बनाएं, अपनी बुद्धि को विद्या से निखारें और अपने मन से सभी विकारों यानी बुराइयों को हर लें। जो युवा अपने मन और शरीर से मजबूत होता है, उसे कोई भी नशा या गलत आदत छू भी नहीं सकती।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
हनुमान चालीसा की हर एक चौपाई एक मंत्र है। आज इस समष्टि हवन में दी गई हर आहुति हमारे राष्ट्र की उन्नति, समाज में प्रेम, सद्भावना और विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त करेगी।
मैं एक बार फिर चिन्मय मिशन को इस भव्य, आध्यात्मिक और अनुशासित आयोजन के लिए साधुवाद देता हूँ। आप इसी प्रकार समाज में धर्म, ज्ञान और सेवा की अलख जगाते रहें। मैं बजरंगबली से प्रार्थना करता हूँ कि वे हमारे पंजाब प्रदेश और पूरे देश पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। सभी निरोगी हों, सभी सुखी हों, यही मेरी मंगलकामना है।
अपनी वाणी को विराम देते हुए मैं चाहूँगा कि आप सभी मेरे साथ पूरी ऊर्जा से उद्घोष करें,
बोलो सियावर रामचंद्र की जय!
पवनसुत हनुमान की जय!
धन्यवाद,
जय हिंद!