SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF RELEASE OF THE BOOK ON TEJA SINGH SAMUNDARI AT GNDU, AMRITSAR ON MAY 4, 2026.

स. तेजा सिंह समुंद्री के जीवन व योगदान पर आयोजित सेमिनार पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 04.05.2026, सोमवारसमयः सुबह 11:00 बजेस्थानः अमृतसर

नमस्कार!

आज श्री गुरु रामदास जी की बसाई इस पावन और ऐतिहासिक नगरी, अमृतसर में उपस्थित होकर मेरा मन अत्यंत श्रद्धा और शांति से भर गया है। सबसे पहले, मैं ‘गुरु नानक देव विश्वविद्यालय’ को इस बात के लिए हृदय से साधुवाद देता हूँ कि उन्होंने ‘अमर शहीद सरदार तेजा सिंह समुंदरी’ जी जैसी महान और निस्वार्थ विभूति के जीवन पर इस अत्यंत प्रासंगिक सेमिनार का आयोजन किया है।

साथ ही, मैं प्रो. करमजीत सिंह, कुलपति, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय को हार्दिक बधाई देता हूँ कि उनके द्वारा लिखित सरदार तेजा सिंह समुंदरी के जीवन और उनके अमूल्य योगदान को समर्पित "Life and Contributions of S. Teja Singh Samundri" नामक महत्वपूर्ण पुस्तक का भी विमोचन किया गया है। यह कृति न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक के जीवन को व्यापक रूप से प्रस्तुत करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का सशक्त स्रोत भी बनेगी।

देवियों और सज्जनों, 

जब हम इस महान विश्वविद्यालय के प्रांगण में खड़े होते हैं, तो हमें इसके गौरवशाली इतिहास का स्मरण अवश्य करना चाहिए। 1969 में श्री गुरु नानक देव जी के 500वें प्रकाश पर्व के शुभ अवसर पर स्थापित यह विश्वविद्यालय केवल ईंट और पत्थर की इमारत नहीं है। यह गुरु साहिब के ‘समानता, वैज्ञानिक सोच और सार्वभौमिक भाईचारे’ के दर्शन का एक जीवंत केंद्र है।

इस विश्वविद्यालय की स्थापना विशेष रूप से पंजाब के पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार करने, पंजाबी भाषा तथा सिख अध्ययन के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने और आवासीय एवं संबद्ध विश्वविद्यालय के रूप में सुलभ, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य के साथ की गई थी।

अपनी स्थापना से लेकर आज तक, चाहे वह अकादमिक उत्कृष्टता हो, खेलों का मैदान हो, या फिर हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण हो, इस संस्थान ने पूरे देश में अपना परचम लहराया है। और आज, पंजाब के एक महान सपूत के इतिहास को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का आपका यह प्रयास, इस विश्वविद्यालय की उसी महान परंपरा का एक और उज्ज्वल अध्याय है।

देवियो और सज्जनो,

जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विशेषकर पंजाब में ‘गुरुद्वारा सुधार लहर’ (अकाली आंदोलन) का इतिहास पढ़ते हैं, तो एक नाम जो सबसे अधिक चमकता है, वह है, सरदार तेजा सिंह समुंदरी।

दुर्भाग्य से, आज की युवा पीढ़ी शायद इस महान व्यक्तित्व के संघर्षों से पूरी तरह परिचित नहीं है। हम अमृतसर में श्री दरबार साहिब के परिसर में स्थित ‘तेजा सिंह समुंदरी हॉल’ (जो SGPC का मुख्यालय है) का नाम तो रोज़ सुनते हैं, लेकिन उस नाम के पीछे जो त्याग और तपस्या की कहानी है, उसे जानना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सरदार तेजा सिंह समुंद्री जी का जीवन भारतीय इतिहास, विशेषकर सिख पंथ के सामाजिक एवं धार्मिक पुनर्जागरण का एक प्रेरणादायक अध्याय है। उनका जन्म 20 फरवरी, 1882 को अमृतसर जिले के राय का बुर्ज में हुआ। सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद उन्होंने सिख धर्म ग्रंथों और इतिहास का गहन अध्ययन किया और अपने जीवन को समाज सुधार एवं धार्मिक जागरण के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत ब्रिटिश भारतीय सेना में एक दफादार के रूप में की, किंतु शीघ्र ही उन्होंने यह समझ लिया कि उनका वास्तविक कर्तव्य समाज की सेवा में है। सेना से लौटकर उन्होंने शिक्षा, संगठन और सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने खालसा मिडल स्कूल और श्री गुरु गोबिंद सिंह खालसा हाई स्कूल जैसे संस्थानों की स्थापना कर शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सरदार तेजा सिंह समुंद्री जी सिख गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक थे। उन्होने गुरुद्वारों को भ्रष्ट प्रबंधन से मुक्त कराने के लिए जनजागरण किया और अपने साहस एवं नेतृत्व से इस आंदोलन को नई दिशा दी। वे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के संस्थापक सदस्यों में से थे और बाद में इसके उपाध्यक्ष भी बने।

उनका जीवन केवल संगठनात्मक नेतृत्व तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने हर संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में रहकर भाग लिया। चाहे वह गुरुद्वारा रिकाबगंज की दीवार का मुद्दा हो, ननकाना साहिब की त्रासदी के बाद प्रबंधन हो, या स्वर्ण मंदिर की चाबियों के आंदोलन का संघर्ष, हर मोर्चे पर उन्होंने अदम्य साहस और समर्पण का परिचय दिया।

सरदार तेजा सिंह समुंदरी जी का सबसे बड़ा गुण उनकी ‘निस्वार्थता’ थी। उन्होंने कभी किसी पद, कुर्सी या प्रसिद्धि की लालसा नहीं की। वे केवल एक सेवक बनकर काम करते रहे।

अंग्रेज़ सरकार ने 13 अक्तूबर, 1923 में जैतो मोर्चा के दौरान उन्हें राजद्रोह और आंदोलन के आरोप में गिरफ्तार कर लाहौर के किले (और बाद में सेंट्रल जेल) में अमानवीय यातनाएं दीं। ब्रिटिश हुकूमत ने प्रस्ताव रखा कि यदि वे शर्तें मान लें तो उन्हें रिहा किया जा सकता है। लेकिन उस शेर-ए-पंजाब ने स्पष्ट कह दिया कि ‘‘मेरे सिद्धांत और मेरा राष्ट्रप्रेम बिकाऊ नहीं हैं।’’

अंततः, 17 जुलाई 1926 को, मात्र 45 वर्ष की अल्पायु में, जेल की काल कोठरी में इस महान योद्धा ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके। उनका निधन, उनके बलिदान और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि न्याय, समानता और धर्म के लिए निस्वार्थ संघर्ष ही सच्चा नेतृत्व है।

सरदार तेजा सिंह समुंद्री जी का व्यक्तित्व संगठन कौशल, समर्पण और त्याग की अद्वितीय मिसाल था। आज अमृतसर में स्थित तेजा सिंह समुंद्री हॉल उनके योगदान की स्मृति को जीवंत बनाए हुए है। उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि हम भी समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें और न्याय तथा सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहें।

आज के इस सेमिनार के माध्यम से हम न केवल उनके जीवन को स्मरण कर रहे हैं, बल्कि उनकी शिक्षाओं और मूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प भी ले रहे हैं। विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए उनका जीवन एक मार्गदर्शक दीपस्तंभ है।

एक महान कवि ने कहा है,

‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मिटने वालों का यही बाक़ी निशां होगा।’’

आज इस संगोष्ठी के माध्यम से हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना है कि सरदार तेजा सिंह समुंदरी जी का जीवन आज के इस आधुनिक युग में हमें क्या सिखाता है?

मेरा मानना है कि वास्तविक रूप में नेतृत्व का अर्थ ‘त्याग’ है। आज के समय में हर कोई नेता बनना चाहता है, सत्ता चाहता है। लेकिन समुंदरी जी का जीवन सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व कुर्सी में नहीं, बल्कि त्याग और निःस्वार्थ सेवा में छिपा है।

उन्होंने भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाई। आज के युवाओं को भी समाज में व्याप्त बुराइयों, विशेषकर नशे और भ्रष्टाचार, के खिलाफ उसी अदम्य साहस के साथ खड़ा होना होगा। जो युवा शरीर और चरित्र से मजबूत होता है, वही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। श्री गुरू ग्रंथ साहिब में दर्ज एक पंक्ति है, ‘‘सूरा सो पहिचानिये, जो लरै दीन के हेत। पुरजा-पुरजा कट मरै, कबहू ना छाडे खेत’’। समुंदरी जी इसी परिभाषा के सच्चे ‘सूरमे’ थे।

देवियो और सज्जनो,

हम सभी जानते हैं कि पंजाब का इतिहास ऐसे अनेक शूरवीरों, महान गुरुओं, और देशभक्तों की अमर गाथाओं से स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है, जिन्होंने धर्म, मानवता और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह केवल पाँच नदियों की धरती नहीं है, बल्कि यह अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान की एक जीवंत प्रयोगशाला रही है।

जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो यह वही पावन माटी है जहाँ श्री गुरु नानक देव जी ने समानता और सार्वभौमिक भाईचारे का महान संदेश दिया। इसी माटी ने ‘हिंद की चादर’ श्री गुरु तेग़ बहादुर जी के उस अद्वितीय बलिदान को देखा है, जिन्होंने मानवीय अधिकारों और दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश हंसते-हंसते न्योछावर कर दिया। यह वही शूरवीरों की धरती है जहाँ दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ ‘खालसा’ की स्थापना कर एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक एवं सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया।

और हम उन चार साहिबज़ादों के उस सर्वोच्च और अकल्पनीय बलिदान को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने इतनी छोटी सी उम्र में धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते हुए नीवों में चिनवाए जाने (छोटे साहिबज़ादे साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी-9 वर्ष और साहिबज़ादा फ़तेह सिंह जी-6 वर्ष) और जंग के मैदान में शहीद होने (बड़े साहिबज़ादे साहिबज़ादा अजीत सिंह जी-18 वर्ष और साहिबज़ादा जुझार सिंह जी-14 वर्ष) का विकल्प चुना, लेकिन ज़ुल्म के आगे कभी अपना सिर नहीं झुकाया। वास्तव में, पंजाब की यह धरती त्याग और शौर्य का एक ऐसा तीर्थ है, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलती।

जब बात राष्ट्र की स्वतंत्रता की आई, तो पंजाब का कोई भी गाँव ऐसा नहीं था जिसने भारत माता की बेड़ियाँ काटने के लिए अपने सपूतों की आहुति न दी हो। चाहे वह जलियांवाला बाग की रक्त-रंजित मिट्टी हो, शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की वह फाँसी की डोरी हो जिसे उन्होंने हंसते-हंसते चूम लिया था, सरदार ऊधम सिंह का वह अटूट संकल्प हो जिसने सात समंदर पार जाकर अपने देश के अपमान का बदला लिया, या फिर लाला लाजपत राय और करतार सिंह सराभा जैसे अनगिनत नायकों का सर्वोच्च बलिदान हो, पंजाब ने हमेशा राष्ट्र के नेतृत्व की मशाल को अपने हाथों में थामे रखा है। 

युद्ध का मैदान हो या खेती का खलिहान, इस प्रदेश ने हमेशा भारत का मस्तक ऊंचा किया है। ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा अगर कहीं सबसे अधिक चरितार्थ होता है, तो वह इसी पंजाब की धरती पर होता है। 

मेरे युवा साथियों, 

मैं आपसे कहना चाहूँगा कि इतिहास केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर भविष्य बनाने के लिए होता है। इतिहास केवल किताबों में दर्ज कुछ पुरानी तारीखों, घटनाओं या बीते हुए कल की मृत कहानियों का संग्रह मात्र नहीं है। यह एक ‘जीवंत मार्गदर्शक’ है। जब हम अपने महापुरुषों, गुरुओं और स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में पढ़ते हैं, तो हमें उसे केवल एक परीक्षा पास करने के ज्ञान तक सीमित नहीं रखना चाहिए। हमें उनके संघर्षों से यह सीखना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने उसूलों पर कैसे अडिग रहा जाता है।

एक पेड़ जितना गहराई से अपनी जड़ों (इतिहास) से जुड़ा होता है, वह उतना ही ऊंचा आसमान (भविष्य) छू सकता है। आज आपके सामने कोई विदेशी हुकूमत नहीं है जिससे आपको लड़ना है, बल्कि आज आपकी लड़ाई अज्ञानता, भ्रष्टाचार, नशे और सामाजिक कुरीतियों से है। इसलिए, जब आप इतिहास पढ़ें, तो केवल उसके ‘पाठक’ न बनें, बल्कि अपने उत्कृष्ट चरित्र, अनुशासन और राष्ट्र-प्रेम से एक नया और स्वर्णिम इतिहास रचने वाले ‘निर्माता’ बनें। कल जब आपके इस दौर का इतिहास लिखा जाए, तो वह आपके गौरवशाली योगदान से भरा होना चाहिए।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज के इस सेमिनार में जो शोध पत्र पढ़े जाएंगे और जो विचार-विमर्श होगा, वह केवल अकादमिक फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा। यह विश्वविद्यालय से निकलकर पंजाब के हर गाँव, हर युवा के हृदय तक पहुँचेगा।

अंत में, मैं गुरु नानक देव विश्वविद्यालय को इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूं और आशा करता हूं कि यह सेमिनार सरदार तेजा सिंह समुंद्री जी के आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सफल सिद्ध होगा।

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद ।

जय हिंद! 

जय भारत!