SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF MAHARANA PRATAP JAYANTI AT BALACHAUR ON MAY 9, 2026.

‘महाराणा प्रताप जयंती’ के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 09.05.2026, शनिवार

समयः सुबह 11:00 बजे

स्थानः बलाचौर

नमस्कार!

आज वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक महाराणा प्रताप जी की जयंती के इस पावन अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत गौरव और आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है। मैं राजपूत सभा बलाचौर को हृदय से बधाई देता हूँ कि उन्होंने हमारी युवा पीढ़ी को अपने महान इतिहास और जड़ों से जोड़े रखने के लिए इस शानदार और प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया है।

मुझे बताया गया है कि राजपूत सभा बलाचौर की स्थापना वर्ष 2009 में स्वर्गीय मास्टर दिलावर सिंह जी द्वारा की गई थी, जो इस सभा के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। इस संस्था की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के राजपूत समाज को एकजुट करना, सामाजिक समरसता को मजबूत बनाना तथा समाज सेवा और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाना था।

मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई है कि सभा द्वारा समय-समय पर निःशुल्क चिकित्सा शिविरों और रक्तदान शिविरों का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यह संस्था समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों को शिक्षा में सहयोग प्रदान करने तथा जरूरतमंद परिवारों की बेटियों के विवाह में सहायता करने जैसे सराहनीय कार्य भी निरंतर कर रही है।

यह अत्यंत गर्व और प्रसन्नता का विषय है कि क्षेत्र के राजपूत समाज ने युवाओं को सुलभ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से निःशुल्क भूमि प्रदान की, जिस पर आज पंजाब यूनिवर्सिटी द्वारा सफलतापूर्वक एक डिग्री कॉलेज संचालित किया जा रहा है। यह समाज की दूरदर्शिता और शिक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

इसके अतिरिक्त, समाज द्वारा बाबा बलराज बी.ए.वी. सीनियर सेकेंडरी स्कूल का संचालन भी किया जा रहा है, जो क्षेत्र के विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार और नैतिक मूल्यों से भी समृद्ध कर रहा है।

वर्तमान में राजपूत सभा बलाचौर के प्रधान श्री भूमिंदर राणा जी के नेतृत्व में यह संस्था सामाजिक सेवा, युवा जागरूकता, सांस्कृतिक संरक्षण और समाज में भाईचारे की भावना को मजबूत करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही है।

साथियो, 

हमारी यह भारत भूमि कोई साधारण मिट्टी का टुकड़ा नहीं है; यह एक जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है। यह वह भूमि है जहाँ की धूल को भी माथे से लगाया जाए, तो उसमें से शूरवीरों के रक्त की सुगन्ध आती है। हमारे देश का कोना-कोना बलिदानों की गाथाओं से भरा पड़ा है।

दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज की भवानी तलवार हो, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई का रणनाद हो, या फिर पंजाब की यह महान और पवित्र धरती हो, जहाँ श्री गुरु नानक देव जी की रूहानियत और दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का वह अतुलनीय शौर्य गूंजता है, जिन्होंने कहा था, ‘‘सवा लाख से एक लड़ाऊं, तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।’’ इसी पंजाब ने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, करतार सिंह सराभा, लाला लाजपत राय और उधम सिंह जैसे शूरवीर इस मातृभूमि पर न्योछावर किए हैं।

पंजाब और राजस्थान की माटी का स्वभाव एक जैसा है, दोनों ने कभी अन्याय और परतंत्रता (गुलामी) के सामने सिर नहीं झुकाया। और जब परतंत्रता के विरुद्ध संघर्ष की बात आती है, तो महाराणा प्रताप का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में चमकता है।

महाराणा प्रताप जी का जन्म 9 मई 1540 को मेवाड़ की पवित्र धरती पर हुआ। उनके पिता उदय सिंह और माता जयवंता बाई थीं। बचपन से ही उनमें वीरता, नेतृत्व क्षमता और देशभक्ति के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे। उन्हें युद्धकला के साथ-साथ अपने धर्म, संस्कृति और मातृभूमि के प्रति समर्पण की शिक्षा दी गई।

महाराणा प्रताप केवल एक राजा नहीं थे, वे स्वतंत्रता की एक धधकती हुई ज्वाला थे। उस कालखंड की कल्पना कीजिए, जब दिल्ली के तख्त पर अकबर का साम्राज्य अपनी पूरी ताकत पर था। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली थी, लेकिन मेवाड़ की उस पथरीली भूमि पर एक शेर खड़ा था, जिसने कहा कि ‘‘मैं अपने प्राण त्याग दूंगा, जंगलों में भटक लूंगा, लेकिन अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और अपने स्वाभिमान का सौदा नहीं करूंगा।’’ उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि एक सच्चा योद्धा कभी भी अपनी मातृभूमि और सम्मान से समझौता नहीं करता।

हल्दीघाटी का युद्ध उनके साहस और पराक्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का अद्वितीय प्रदर्शन किया। उनका प्रिय घोड़ा चेतक भी इतिहास में अमर हो गया, जिसने अपने स्वामी की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। 

यह ऐतिहासिक युद्ध कोई साधारण युद्ध नहीं था। एक तरफ अकबर की विशालकाय सेना थी और दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के साथ उनके वफादार राजपूत, भील जनजाति के वीर योद्धा और मातृभूमि के दीवाने। यह युद्ध साम्राज्य और स्वाभिमान के बीच का युद्ध था।

कवि श्याम नारायण पांडेय जी ने प्रताप और उनके स्वामीभक्त घोड़े चेतक की वीरता का वर्णन करते हुए क्या खूब लिखा हैः

‘‘रण बीच चौकड़ी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था।

राणाप्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था।’’

हमें याद रखना चाहिए कि प्रताप ने जंगलों में घास की रोटियां खाना स्वीकार किया, लेकिन गुलामी के पकवानों को ठोकर मार दी। उनका वह संघर्ष हमें सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाएं जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकतीं; चरित्र, स्वाभिमान और देशप्रेम सबसे ऊपर है।

प्रिय साथियो,

महाराणा प्रताप जी का जीवन हमें यह अमूल्य संदेश देता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपने सिद्धांतों, स्वाभिमान और कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में असीम संघर्ष, अभाव और कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन मातृभूमि की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया। 

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही होता है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी साहस, धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखे। महाराणा प्रताप ने यह सिद्ध किया कि भौतिक संसाधनों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का चरित्र, उसका संकल्प और राष्ट्र के प्रति उसकी निष्ठा होती है।

मैं समझता हूं कि आज के युवाओं के लिए उनका जीवन विशेष रूप से प्रेरणादायी है। जब जीवन में चुनौतियाँ आएँ, असफलताएँ मिलें या परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों, तब हमें निराश होने के बजाय महाराणा प्रताप के संघर्ष और अदम्य इच्छाशक्ति को स्मरण करना चाहिए। उनका जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि जो व्यक्ति सत्य, स्वाभिमान और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहता है, अंततः विजय उसी की होती है।

मेरे युवा साथियो, 

आज हम एक स्वतंत्र और संप्रभु भारत में खुली सांस ले रहे हैं। आज हमें तलवारें या भाले उठाकर किसी हल्दीघाटी के युद्ध के मैदान में नहीं जाना है, और न ही जंगलों में भटककर घास की रोटियां खानी हैं। लेकिन मेरे साथियो, याद रखिए कि युद्ध का स्वरूप भले ही बदल गया हो, किंतु हमारी चुनौतियाँ आज भी कम नहीं हुई हैं।

महाराणा प्रताप के समय दुश्मन सामने खड़ा था, जिसे पहचाना जा सकता था। लेकिन आज के ‘शत्रु’ कोई विदेशी आक्रांता नहीं हैं; आज के शत्रु हमारे समाज और हमारे अपने भीतर छिपे बैठे हैं। 

आज का सबसे बड़ा दुश्मन हमारी वह ‘कमजोरी’ है जो हमें गलत का विरोध करने से रोकती है। आज का शत्रु वह ‘निराशा’ है जो हमारे युवाओं को उनके लक्ष्य से भटका कर नशे और डिप्रेशन के अंधेरे कुएं में धकेल रही है। आज की सबसे बड़ी चुनौती वह ‘भ्रष्टाचार, जातिवाद और स्वार्थ’ है, जो हमें आपस में बांट रहा है।

और सबसे बड़ा दुश्मन है, ‘राष्ट्र के प्रति हमारी उदासीनता’। जब हम सड़क पर कचरा फेंकते हैं, जब हम पानी या बिजली की बर्बादी करते हैं, जब हम ट्रैफिक नियमों को तोड़ते हैं, या जब हम समाज में कुछ गलत होता देखकर भी आँखें मूंद लेते हैं और सोचते हैं कि ‘‘मेरा क्या जाता है?’’, तो हम वास्तव में अपनी मातृभूमि के प्रति गद्दारी कर रहे होते हैं।

महाराणा प्रताप ने हमें सिर्फ तलवार चलाना नहीं सिखाया था, उन्होंने हमें ‘चरित्र की दृढ़ता’ और ‘स्वाभिमान’ का पाठ पढ़ाया था। आज का सच्चा शूरवीर वह नहीं है जो हथियार उठाता है, बल्कि आज का शूरवीर वह है जो अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करता है। 

आप चाहे एक छात्र हों, कर्मचारी हों, व्यापारी हों या अधिकारी, अगर आप अपना काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रहे हैं, तो आप भी इस देश के एक सच्चे योद्धा हैं।

आज के युवा को महाराणा प्रताप से ‘अडिग संकल्प’ सीखना चाहिए। जब दुनिया आपसे कहे कि तुम हार जाओगे, तब प्रताप की तरह खड़े होकर कहो कि मैं अंतिम सांस तक लड़ूंगा।

‘सभी वर्गों को साथ लेकर चलना’ की उनकी सीख को अपने जीवन में उतारिए। प्रताप ने केवल राजपूतों की सेना नहीं बनाई; उन्होंने समाज के सबसे शोषित वर्ग, वनवासी और भीलों को गले लगाया और उन्हें अपना सेनापति बनाया। यही हमारे ‘अखंड भारत’ और ‘समरसता’ का सबसे बड़ा उदाहरण है।

मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ:

‘‘द्वंद्व कहाँ तक पाला जाए, युद्ध कहाँ तक टाला जाए।

तू भी है राणा का वंशज, फेंक जहाँ तक भाला जाए!’’

परंतु साथियो, 

पंजाब के राज्यपाल के रूप में, जब मैं आज की स्थिति देखता हूँ, तो मेरा हृदय अत्यंत पीड़ा से भर उठता है। आज पंजाब एक नए और बहुत ही भयानक दुश्मन से लड़ रहा है, और वह दुश्मन है ‘नशा’।

जिस पंजाब के युवाओं की चौड़ी छाती और फौलादी बाजुओं की मिसालें पूरी दुनिया में दी जाती थीं, जिन युवाओं ने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए हमेशा सीना ताना है, आज साजिश के तहत उन युवाओं की नसों में ड्रग्स और चिट्टे का जहर घोला जा रहा है। सीमा पार से बैठे हमारे दुश्मन गोलियों से नहीं, बल्कि इस नशे की पुड़ियों से हमारे पंजाब की जवानी को खोखला करने की साजिश रच रहे हैं।

मेरे पंजाब के युवा बेटो! जरा सोचो, जिस खून में दशम पिता गुरु गोबिंद सिंह जी का तेज होना चाहिए, जिस खून में शहीद भगत सिंह की इंकलाबी आग होनी चाहिए, जिस मिट्टी के कण-कण में महाराणा प्रताप और हरि सिंह नलवा जैसी वीरता बसती है, उस खून में नशे का यह कायरतापूर्ण जहर कैसे मिल सकता है?

नशा कोई शौक नहीं है, यह एक मानसिक गुलामी है। महाराणा प्रताप ने मुग़लों की शारीरिक गुलामी स्वीकार नहीं की, तो तुम इस केमिकल की मानसिक गुलामी कैसे स्वीकार कर सकते हो?

आज महाराणा प्रताप जयंती के इस पवित्र मंच से, मैं पंजाब के हर एक युवा से आह्वान करता हूँ कि आज एक संकल्प लें। यह हमारी नई हल्दीघाटी है, और हमें इस नशे रूपी दुश्मन को जड़ से उखाड़ फेंकना है। जो युवा इस दलदल में फंस गए हैं, समाज उनका हाथ पकड़े, उन्हें बाहर निकाले। खेल के मैदानों को फिर से आबाद करो। पसीना बहाओ, अपनी ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण में लगाओ।

आइए, आज हम सब मिलकर यह शपथ लें कि हम महाराणा प्रताप के दिखाए हुए स्वाभिमान और स्वतंत्रता के मार्ग पर चलेंगे। हम एक ऐसे भारत और ऐसे पंजाब का निर्माण करेंगे, जो शारीरिक रूप से बलवान हो, मानसिक रूप से सशक्त हो, और चारित्रिक रूप से महान हो।

राजपूत सभा बलोचौर को इस भव्य और ऊर्जावान आयोजन के लिए एक बार फिर से बहुत-बहुत साधुवाद। आपकी यह ज्योति यूं ही जलती रहे और समाज को रोशन करती रहे।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

जय हिंद! 

जय भारत!