SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF BUDDHA JAYANTI AT KHUDA ALISHER ON MAY 1, 2026.
- by Admin
- 2026-05-01 14:30
‘बुद्ध पूर्णिमा’ के अवसर पर राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 01.05.2026, शुक्रवार समयः दोपहर 12:00 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज बुद्ध पूर्णिमा के इस अत्यंत पावन और मांगलिक अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे असीम शांति और अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। मैं इस शुभ अवसर पर पूरे पंजाब प्रदेश और देशवासियों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
मैं इस पवित्र अवसर पर आज के इस आयोजन की रूपरेखा तैयार करने वाली संस्था ‘बुद्धिस्ट एसोसिएशन चंडीगढ़’ के सराहनीय प्रयासों की भी विशेष रूप से प्रशंसा करना चाहूँगा।
वर्ष 1984 में खुडा अली शेर गाँव की शांत प्राकृतिक छटा के बीच स्थापित ‘अशोका बुद्ध विहार’ आज आध्यात्म और शांति का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। इसके संस्थापक स्वर्गीय श्री प्रियांन्द्र लाल बरुआ जी और थाईलैंड के श्रद्धेय भिक्षु डॉ. देच साला जी ने जो बीज बोया था, उसे आज संस्था की कार्यकारिणी समिति जन-सहयोग और समर्पण के साथ सींच रही है।
इस विहार के प्रांगण में स्थापित भगवान बुद्ध की ध्यानमग्न विशाल प्रतिमा, हर दर्शनार्थी को असीम शांति और ध्यान का संदेश देती है। मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता है कि यह संस्था न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन कर रही है, बल्कि बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के समाज में आध्यात्मिक जागरूकता, शांति और सद्भावना का प्रसार भी कर रही है।
संस्था का यह आगामी विज़न अत्यंत प्रेरणादायक है कि वे इस विहार में उत्तर भारत का एक उत्कृष्ट ‘बौद्ध अध्ययन केंद्र’ और एक ‘विपश्यना ध्यान केंद्र’ स्थापित करना चाहते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अष्टांगिक मार्ग की शिक्षाओं और विपश्यना के अभ्यास से लोगों के मन की हर निराशा और अवसाद दूर होंगे, और पूरे समाज में करुणा तथा परम शांति का संचार होगा। समाज के उत्थान के लिए आपके द्वारा किए जा रहे ये प्रयास वास्तव में वंदनीय हैं।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज का यह दिन केवल एक सामान्य पर्व नहीं है, बल्कि यह मानवता के इतिहास का एक अत्यंत पवित्र और दुर्लभ अध्याय है। वैशाख मास की यह पूर्णिमा एक अद्भुत ‘त्रिवेणी’ है, क्योंकि इसी एक पावन तिथि पर तथागत गौतम बुद्ध जी के जीवन की तीन सबसे महान घटनाएँ घटी थीं। इसी दिन लुंबिनी में उनका जन्म हुआ, इसी दिन बोधगया में उन्हें संबोधि (ज्ञान) की प्राप्ति हुई, और इसी दिन कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।
राजकुमार सिद्धार्थ से ‘तथागत बुद्ध’ बनने की यात्रा केवल एक व्यक्ति के जीवन का बदलाव नहीं था, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए एक नई सुबह का उदय था। जब सिद्धार्थ ने नगर भ्रमण के दौरान एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी और अंत में एक शांत संन्यासी रूपी जीवन के चार कटु सत्यों को देखा, तो उनके भीतर वैराग्य का बीज अंकुरित हो गया।
राजमहल के असीमित ऐश्वर्य, सुख-विलासिता और अपने परिवार का मोह त्यागकर, सत्य की खोज में मध्यरात्रि को उनका वह प्रस्थान इतिहास में ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहलाया।
वर्षों की अत्यंत कठोर तपस्या के बाद उन्हें यह बोध हुआ कि सत्य न तो अति-भोग में है और न ही शरीर को कष्ट देने में। अंततः, बिहार के बोधगया में एक वटवृक्ष के नीचे गहन ध्यान में लीन होकर, वैशाख पूर्णिमा की उसी पावन रात्रि को उन्होंने ‘संबोधि’ (परम ज्ञान) की प्राप्ति की। उसी क्षण, सिद्धार्थ के भीतर का अज्ञान सदा के लिए मिट गया और वे दुनिया के दुखों का निवारण करने वाले ‘बुद्ध’ अर्थात एक जागृत और प्रकाशवान पुरुष बन गए।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
राजकुमार सिद्धार्थ का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची शांति भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान और करुणा में है। राजमहल के ऐश्वर्य, राजपाट और समस्त सांसारिक सुखों का त्याग करके, मानव जाति को दुखों से मुक्त करने का जो मार्ग उन्होंने खोजा, वह आज भी पूरी दुनिया को आलोकित कर रहा है।
उन्होंने किसी बाहरी चमत्कार का दावा नहीं किया, बल्कि मानव मन की गहराइयों को समझा और दुनिया को सबसे वैज्ञानिक और व्यावहारिक दर्शन दिया। बुद्ध ने मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठना नहीं सिखाया, बल्कि उन्होंने कर्म का सिद्धांत दिया और कहा कि ‘‘अप्प दीपो भव’’ अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो। अपना उद्धार तुम्हें स्वयं अपने सत्कर्मों और ज्ञान से करना होगा।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व बुद्ध ने जो उपदेश दिए थे, वे आज के इस आधुनिक युग में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।
आज जब पूरा विश्व युद्ध की विभीषिका, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, आपसी वैमनस्य और मानसिक तनाव जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब तथागत बुद्ध का शांति, करुणा और ‘अहिंसा’ का संदेश ही एकमात्र ऐसा मार्ग है, जो मानवता को विनाश से बचा सकता है।
तथागत ने कहा था,
‘‘न हि वेरेन वेराणि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो।।’’
अर्थात, इस संसार में घृणा को घृणा से कभी समाप्त नहीं किया जा सकता। घृणा को केवल प्रेम और करुणा से ही जीता जा सकता है। यही शाश्वत नियम है।
मध्यम मार्गः बुद्ध ने हमें अतियों से बचने का ‘मध्यम मार्ग’ सिखाया। आज का युग अत्यधिक उपभोक्तावाद और भौतिक दौड़ का युग बन गया है। बुद्ध का मध्यम मार्ग हमें जीवन में संतुलन स्थापित करना सिखाता है।
समानता और बंधुत्वः बुद्ध ने अपने समय में समाज में व्याप्त ऊंच-नीच, जाति-पाति और भेदभाव का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने एक ऐसे समतामूलक समाज की नींव रखी जहाँ हर मनुष्य केवल अपने कर्मों से महान बनता है, जन्म से नहीं।
जब मैं बुद्ध के समानता और करुणा के इस संदेश को देखता हूँ, तो मुझे पंजाब की इस महान और पवित्र धरती से इसका एक बहुत गहरा जुड़ाव महसूस होता है।
यह गुरुओं, पीरों और सूफी संतों की धरती है। मानवता, समानता और अहंकार त्यागने का जो संदेश तथागत बुद्ध ने सदियों पूर्व दिया था, वही संदेश श्री गुरु नानक देव जी और हमारे महान सिख गुरुओं ने भी दिया। गुरु साहिबानों का ‘‘मानस की जात सबै एकै पहचानबो’’ का महान संदेश और लंगर की पवित्र प्रथा बुद्ध के करुणा और समानता के दर्शन का ही एक जीवंत और व्यावहारिक रूप है।
मैं आज विशेष रूप से अपने युवा साथियों से बात करना चाहता हूँ। आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में हमारे युवा डिप्रेशन, तनाव और कई बार नशे जैसी भयानक सामाजिक बुराइयों का शिकार हो रहे हैं।
भगवान बुद्ध ने ‘अष्टांगिक मार्ग’ और ‘विपश्यना’ (ध्यान) के रूप में जो अनमोल उपहार हमें दिया है, वह आज के युवाओं के लिए एक संजीवनी है। बुद्ध कहते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना अनियंत्रित मन है और सबसे बड़ा मित्र भी उसका अनुशासित मन है।
मैं युवाओं से आह्वान करता हूँ कि वे बुद्ध की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारें। ध्यान को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। जब आपका मन शांत और अनुशासित होगा, तो दुनिया की कोई भी नकारात्मकता, कोई भी बुराई या नशा आपको अपने मार्ग से भटका नहीं सकेगा।
प्रिय श्रद्धालुजनों,
आज भारत ‘विकसित भारत’ और पुनः ‘विश्व गुरु’ बनने के महान संकल्प की ओर अग्रसर है। भारत की असली ताकत हथियारों में नहीं, बल्कि बुद्ध और गांधी के इसी शांति और अहिंसा के दर्शन में निहित है। हम दुनिया को युद्ध नहीं, ‘बुद्ध’ देने वाले देश हैं।
आइए, बुद्ध पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम यह संकल्प लें कि हम अपने मन से घृणा, क्रोध और स्वार्थ का त्याग करेंगे और एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जो करुणा, प्रेम और समानता पर आधारित हो।
अंत में, मैं बुद्ध के ही एक पावन आशीर्वाद के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ:
‘‘भवतु सब्ब मंगलम्’’ अर्थात सभी का मंगल हो, सभी का कल्याण हो!
आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा की अनंत शुभकामनाएँ!
धन्यवाद,
जय हिंद!