SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF OPENING CEREMONY OF 5TH INDIAN TRADITIONAL GAMES FESTIVAL, 2026 AT PUNJAB UNIVERSITY CHANDIGARH ON MAY 2, 2026.

‘5वें भारतीय पारंपरिक खेल एवं क्रीड़ा महोत्सव’  के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 02.05.2026, शनिवारसमयः सुबह 9:30 बजेस्थानः चंडीगढ़

         

नमस्कार!

आज इस ऊर्जावान प्रांगण में, ‘5वें भारतीय पारंपरिक खेल एवं क्रीड़ा महोत्सव’ के इस भव्य आयोजन में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत गर्व और अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है, जिसका संयुक्त आयोजन ‘ट्रेडिशनल स्पोर्ट्स एंड गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया’ तथा ‘पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़’ द्वारा किया जा रहा है।

मैं इस अवसर पर सभी आयोजकों, सह-आयोजकों, तकनीकी अधिकारियों, स्वयंसेवकों एवं प्रतिभागियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूं, जिनके प्रयासों से यह महोत्सव संभव हो पाया है। साथ ही, इस आयोजन को एशियाई एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त सहयोग और मान्यता इसे और भी विशेष बनाती है।

आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में, जहाँ युवा वर्ग मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है, वहाँ हमारी मिट्टी से जुड़े इन पारंपरिक खेलों को पुनर्जीवित करने का आपका यह भगीरथ प्रयास वास्तव में वंदनीय है। आप केवल एक खेल महोत्सव का आयोजन नहीं कर रहे हैं, बल्कि आप भारत की महान सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण कर रहे हैं।

मुझे बताया गया है कि वर्ष 2020 में स्थापित ‘ट्रेडिशनल स्पोर्ट्स एंड गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया’ भारत में पारंपरिक खेलों की समृद्ध विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु समर्पित एक अग्रणी संस्था है। दिल्ली के ट्रस्ट अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत यह गैर-लाभकारी, गैर-सरकारी एवं गैर-राजनीतिक बहु-खेल महासंघ पारंपरिक खेलों को पुनः मुख्यधारा में लाने के लिए कार्यरत है।

संस्था का उद्देश्य स्वदेशी खेलों का पुनर्जीवन, प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मंच प्रदान करना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना तथा युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए स्वस्थ जीवनशैली के लिए प्रेरित करना है। इसे एशियन तथा इंटरनेशनल ट्रेडिशनल स्पोर्ट्स एंड गेम्स एसोसिएशन से संबद्धता प्राप्त है, जिससे वैश्विक स्तर पर भारतीय खेलों को अवसर और पहचान मिल रही है।

यह संस्था मल्लयुद्ध, कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा और मल्लखंभ जैसे पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देती है तथा राष्ट्रीय-क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के माध्यम से इनके प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रही है।

हर्ष का विषय है कि भविष्य में यह संगठन जागरूकता बढ़ाने, संस्थागत सहयोग सुदृढ़ करने और पारंपरिक खेलों की स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है, जिससे हमारी सांस्कृतिक विरासत का पुनर्जागरण हो सके।

वहीं यदि पंजाब यूनिवर्सिटी की बात करें तो यह 1882 में लाहौर में स्थापना के समय से ही राष्ट्र चेतना और ज्ञान के प्रकाश को आगे बढ़ाती आई है। विभाजन ने भले इसकी भौगोलिक स्थिति बदली हो, पर इसकी जड़ें और वैचारिक ऊर्जा आज भी उतनी ही सशक्त हैं, जो चंडीगढ़ में और अधिक विस्तार के साथ विकसित हुई हैं।

यह केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों, विचारशीलता और सांस्कृतिक चेतना का संगम है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता का संतुलित मेल दिखाई देता है। इस विश्वविद्यालय की असली शक्ति इसकी वह समृद्ध विरासत है, जिसे इसके विद्यार्थी आगे बढ़ाते हैं।

इसी धरती ने हरगोबिंद खुराना जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता, मनमोहन सिंह और इंदर कुमार गुजराल जैसे प्रधानमंत्री, डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसे राष्ट्रपति और सुषमा स्वराज जैसी प्रभावशाली नेता देश को दिए हैं।

इसके साथ ही, सुनील मित्तल जैसे उद्योगपति, कपिल देव और नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ी, तथा अनुपम खेर, किरण खेर, जसपाल भट्टी और आयुष्मान खुराना जैसे कलाकार इस महान संस्थान की गौरवशाली पहचान हैं।

देवियों और सज्जनों, 

जब हम भारतीय पारंपरिक खेलों की बात करते हैं, तो हम वास्तव में अपनी हज़ारों वर्ष पुरानी सभ्यता की जड़ों की ओर लौटते हैं। प्राचीन भारत में खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का एक अभिन्न अंग थे।

हमारे उपनिषदों में कहा गया है, ‘‘शरीरमाद्यम् खलु धर्मसाधनम्’’ यानी यह शरीर ही सभी कर्तव्यों और धर्मों को पूरा करने का प्रथम साधन है।

रामायण और महाभारत काल से ही हमने तीरंदाजी (धनुर्विद्या) और मल्लयुद्ध (कुश्ती) जैसी कलाओं को सर्वोच्च सम्मान दिया है। प्राचीन काल में हमारे गुरुकुलों में शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक सौष्ठव को अनिवार्य माना जाता था। 

चाहे वह महाराष्ट्र और मध्य भारत का ‘मल्लखंब’ हो, जिसने शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध साधना सिखाया; केरल का ‘कलारीपयट्टू’ हो, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट माना जाता है; या फिर हमारी अपनी पंजाब की माटी का ‘गतका’ हो, जिसने हमें आत्मरक्षा और अदम्य साहस का पाठ पढ़ाया, ये सभी खेल हमारी प्राचीन वैज्ञानिक सोच और शारीरिक क्षमता के जीवंत प्रमाण हैं। कबड्डी, खो-खो और चौसर जैसे खेल हमारी सामूहिक चेतना और रणनीतिक कौशल का हिस्सा रहे हैं।

पारंपरिक खेल एवं क्रीड़ाएं केवल शारीरिक गतिविधियों का माध्यम नहीं हैं; वे हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की जीवंत अभिव्यक्तियाँ हैं। ये खेल हमारी सामाजिक संरचना, सामुदायिक जीवन और परंपराओं से गहराई से जुड़े हुए हैं तथा पीढ़ी दर पीढ़ी अनुशासन, साहस, सहयोग और परस्पर सम्मान जैसे मूल्यों का संचार करते हैं। 

हमारे पारंपरिक खेलों ने न केवल शारीरिक क्षमता को विकसित किया है, बल्कि मानसिक दृढ़ता और नैतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ किया है। इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से हम अपनी इस विरासत को पुनः सशक्त कर रहे हैं।

देवियो और सज्जनो,

आज वैश्विक परिदृश्य में खेलों को केवल शारीरिक स्पर्धा के रूप में नहीं, बल्कि ‘सतत विकास’ और ‘विश्व शांति’ के एक अचूक साधन के रूप में देखा जा रहा है। हमारे पारंपरिक खेल, जो अपनी सरलता और सुलभता के कारण सीधे जन-भागीदारी से जुड़े होते हैं, इस दिशा में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाने में सक्षम हैं।

मुझे यह जानकर विशेष संतोष है कि इस महोत्सव में एरोबिक्स, आइनबॉल, अत्यापाट्या, गड्डा युद्ध, गतका, गिल्ली डंडा, गिट्टियां, कंचे, खो-खो, लाठी, लट्टू, मल्लखंभ, मल्लयुद्ध, पचीसी, पिट्टू, रस्सी कूद और योग जैसी हमारी 17 पारंपरिक खेल विधाओं को संयुक्त राष्ट्र के 17 ‘सतत विकास लक्ष्यों’ के साथ जोड़ा गया है। 

यह एक अत्यंत अभिनव और दूरदर्शी पहल है। यह प्रयास स्पष्ट करता है कि हमारी प्राचीन क्रीड़ाएं केवल मनोरंजन मात्र नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक विकास, समावेशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, शांति और पर्यावरणीय जागरूकता एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे महान वैश्विक संकल्पों की सिद्धि का सशक्त माध्यम भी हैं।

इसके अतिरिक्त, यह आयोजन ‘निष्पक्ष खेल’ और ‘उच्च नैतिक मूल्यों’ की नींव को भी सुदृढ़ करता है। याद रखिए, निष्पक्षता केवल खेल का सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक श्रेष्ठ संस्कार है, जो हमें ईमानदारी, आत्म-अनुशासन और परस्पर सम्मान की सीख देता है।

ओलंपिक की भावना हमें यह प्रेरणा देती है कि खेल केवल शारीरिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं, बल्कि यह शिक्षा, संस्कृति और शांति का माध्यम है। इसी प्रकार, पैरालंपिक मूल्य हमें यह स्मरण कराते हैं कि खेल सभी के लिए समान रूप से सुलभ होना चाहिए।

मैं आयोजकों की सराहना करता हूं कि उन्होंने समावेशी खेल शिक्षा, सामुदायिक सहभागिता और युवा सशक्तिकरण को प्राथमिकता दी है। इस प्रकार के प्रयास राष्ट्र निर्माण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

विश्वविद्यालय, विशेष रूप से पंजाब विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान, इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समग्र शिक्षा में शारीरिक शिक्षा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायक होती है।

साथियों,

एक लंबे समय तक हमारे स्वदेशी खेल उपेक्षा का शिकार रहे। लेकिन आज, मुझे यह बताते हुए अत्यंत गर्व होता है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, केंद्र सरकार ने भारतीय खेलों को उनका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाने का दृढ़ संकल्प लिया है।

‘खेलो इंडिया’ और ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ केवल सरकारी योजनाएं नहीं, बल्कि जन-आंदोलन बन चुके हैं। सबसे बड़ी प्रसन्नता का विषय यह है कि भारत सरकार ने ‘खेलो इंडिया यूथ गेम्स’ में चार प्रमुख स्वदेशी खेलों, गतका, कलारीपयट्टू, थांग-ता, सिलंबम और मल्लखंब को विशेष रूप से शामिल किया है। इसके अलावा, हमारी पारंपरिक ‘योगासन’ विद्या को भी अब एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में वैश्विक मान्यता मिल रही है।

सरकार की ‘टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ (TOPS) जैसी पहलों के साथ-साथ, स्वदेशी खेलों के लिए विशेष वित्तीय सहायता और अकादमियों का निर्माण यह सुनिश्चित कर रहा है कि हमारी माटी के खेल अब केवल गाँव के अखाड़ों तक सीमित न रहें, बल्कि वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना परचम लहराएं।

आज केंद्र सरकार की पहल ‘खेलो इंडिया’ के अंतर्गत आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स ने युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने और आगे बढ़ने का सशक्त मंच प्रदान किया है। इसी प्रकार खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के नए अवसर दे रहे हैं। वहीं खेलो इंडिया पैरा गेम्स के माध्यम से हमारे पैरा एथलीट्स भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं, जो समावेशी और सशक्त भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मेरे युवा खिलाड़ियों, 

खेल हमें वह सिखाते हैं जो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ भी नहीं सिखा पातीं। पारंपरिक खेल हमें अपनी मिट्टी से जोड़ते हैं, हमें संघर्ष करना, गिरकर फिर उठना और धैर्य के साथ आगे बढ़ना सिखाते हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, “मुझे लोहे की मांसपेशियों और फौलाद की नसों वाले युवाओं की आवश्यकता है।” उनका स्पष्ट संदेश था कि एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण केवल सशक्त शरीर और दृढ़ चरित्र वाले युवाओं से ही संभव है।

मुझे यह देखकर गर्व हो रहा है कि आज देश में हमारे पारंपरिक खेलों के पुनरुत्थान को जो नई ऊर्जा और व्यापक स्वीकार्यता मिल रही है, वह हमारी सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का सशक्त संकेत है। हमारे पारंपरिक खेल न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रख रहे हैं, बल्कि आज की युवा पीढ़ी में आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना भी सुदृढ़ कर रहे हैं। यही खेल हमारे युवाओं को ‘विकसित भारत’ के निर्माण का सशक्त आधार बना रहे हैं।

पंजाब और चंडीगढ़ के संदर्भ में मैं विशेष रूप से यह कहना चाहूँगा कि आज जब नशे जैसी भयानक बुराई हमारे समाज को दीमक की तरह चाटने का प्रयास कर रही है, तब ये पारंपरिक खेल हमारे युवाओं के लिए एक अमोघ अस्त्र (सबसे बड़ी ढाल) हैं। 

जब एक युवा अखाड़े में उतरता है, गतका खेलता है या मल्लखंब पर चढ़ता है, तो उसके भीतर एक ऐसा अनुशासन और आत्मविश्वास जन्म लेता है, जिसे कोई भी नशा या नकारात्मकता छू भी नहीं सकती। असली नशा तो पसीने का है, असली नशा तो अपनी माटी और अपने देश का नाम रोशन करने का है!

 

साथियो,

आज जब हमारा देश ‘विकसित भारत 2047’ और पुनः ‘विश्व गुरु’ बनने के महान संकल्प की ओर तीव्र गति से अग्रसर है, तो हमें अपनी जड़ों को और अधिक मजबूत करना होगा। यह महोत्सव उसी दिशा में एक मील का पत्थर है।

अंत में, मैं देश भर से आए सभी प्रतिभागियों और खिलाड़ियों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। हार और जीत खेल का हिस्सा हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है ‘खेल भावना’। आप जब इस मैदान में उतरते हैं, तो आप केवल एक खिलाड़ी नहीं होते, बल्कि आप भारत की महान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के ध्वजवाहक होते हैं।

मैं ट्रेडिशनल स्पोर्ट्स एंड गेम्स फेडरेशन और पंजाब यूनिवर्सिटी को एक बार फिर से इस शानदार और सफल आयोजन के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

आइए, हम सब मिलकर अपनी माटी के खेलों को बढ़ावा दें और एक स्वस्थ, सशक्त एवं समरस भारत का निर्माण करें।

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद!

जय हिंद! जय भारत!