SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF UNSUNG EVERYDAY HEROES AWARDS CEREMONY AT CHANDIGARH ON MAY 3, 2026.
- by Admin
- 2026-05-03 13:35
आर्ट ऑफ लिविंग के ‘अनसंग एवरीडे हीरोज़ अवार्ड’ के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 03.05.2026, रविवार समयः सुबह 10:30 बजे स्थानः चंडीगढ़
नमस्कार!
आज ‘अनसंग एवरीडे हीरोज़ अवार्ड्स’ के इस गरिमामयी समारोह में आप सभी के बीच उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य और गर्व का विषय है। आज का यह विशाल और भव्य जमावड़ा केवल कोई औपचारिक अवसर या सामान्य कार्यक्रम नहीं है। यदि हम गहराई से देखें, तो यह कुछ अत्यंत मानवीय और शाश्वत मूल्यों का एक अद्भुत उत्सव है। यह ‘सेवा’ का उत्सव है, उस निस्वार्थ सेवा का, जो बिना किसी अपेक्षा के, केवल मानवता के कल्याण के लिए की जाती है।
मैं आज इस मंच पर सम्मानित सभी 19 विभूतियों को अपनी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ। आप सभी ने अपने कार्यों, समर्पण और निस्वार्थ सेवा से समाज में सकारात्मक परिवर्तन की जो मिसाल प्रस्तुत की है, वह हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है और राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक सशक्त योगदान भी।
मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई है कि इन पुरस्कारों की रूपरेखा तीन अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभों पर आधारित है, युवा नेतृत्व, खेल उत्कृष्टता, और व्यवसाय एवं परोपकार। ये तीनों ही आयाम, सही मायनों में, एक सशक्त और विकसित राष्ट्र के निर्माण की एक संपूर्ण दृष्टि को प्रस्तुत करते हैं।
‘युवा नेतृत्व’ की श्रेणी में आज जिन 4 होनहार युवाओं को सम्मानित किया गया है, वे हमारे भविष्य की ऊर्जा हैं। इन युवाओं ने अपनी नई पहल, अदम्य साहस और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना से यह सिद्ध कर दिया है कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उम्र की नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।
इसी प्रकार, ‘खेल उत्कृष्टता’ के अंतर्गत सम्मानित किए गए 6 असाधारण खिलाड़ी हमारे समाज में चरित्र और अनुशासन के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इन्होंने अपने धैर्य, निरंतर कड़े अभ्यास और हार न मानने वाले जज़्बे से न केवल अपने व्यक्तित्व को निखारा है, बल्कि पूरे राष्ट्र का गौरव भी बढ़ाया है।
इस पुरस्कार का तीसरा आयाम ‘व्यवसाय एवं परोपकार’ का है, जिसके तहत 9 विशिष्ट व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया है। इन सफल उद्यमियों और समाजसेवियों ने यह प्रमाणित किया है कि सच्ची सफलता केवल धन या पद अर्जित करने में नहीं है, बल्कि अपनी सफलता को समाज की भलाई और मानवीय मूल्यों के निर्माण से जोड़ने में है।
जब हम इन तीनों आयामों, युवाओं की ऊर्जा, खिलाड़ियों के अनुशासन और उद्यमियों की करुणा, को एक साथ देखते हैं, तो हमें एक सशक्त, संतुलित और संवेदनशील भारत की एक स्पष्ट तस्वीर दिखाई देती है।
मेरा मानना है कि ‘द आर्ट ऑफ लिविंग’ द्वारा स्थापित और परम पूज्य गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी की पावन प्रेरणा से शुरू की गई यह उत्कृष्ट पहल एक अत्यंत ही ऐतिहासिक और सार्थक समय पर हमारे सामने आई है।
देवियो और सज्जनो,
हम सभी जानते हैं कि यह वर्ष ‘द आर्ट ऑफ लिविंग’ की निरंतर और निष्काम सेवा के 45 स्वर्णिम वर्षों का गवाह है, और साथ ही यह हमारे मार्गदर्शक, गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी के प्रेरणादायक जीवन का 70वां जन्म वर्ष भी है।
मैं पूज्य गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी को हृदय से नमन करता हूँ, जिन्होंने पूरी दुनिया में शांति, ध्यान और सेवा का संदेश फैलाया है। दी आर्ट ऑफ लीविंग ने करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाकर उन्हें तनावमुक्त, स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दी है।
गुरुदेव जी उन विरले वैश्विक व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। 1956 में तमिलनाडु में जन्मे गुरुदेव बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे, केवल चार वर्ष की आयु में वे भगवद गीता का पाठ करने लगे थे और ध्यान में लीन रहते थे। उन्होंने वैदिक साहित्य और भौतिकी दोनों में शिक्षा प्राप्त की।
वर्ष 1982 में कर्नाटक के शिमोगा में दस दिन के मौन साधना के दौरान सुदर्शन क्रिया जैसी शक्तिशाली श्वास तकनीक का उदय हुआ, जो आज आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रमों का प्रमुख आधार है। उन्होंने 1981 में आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना एक अंतरराष्ट्रीय एवं मानवीय संगठन के रूप में की, जो आज 180 देशों में सक्रिय है और लोगों को आत्म-विकास एवं तनाव मुक्ति के प्रभावी साधन प्रदान कर रहा है।
वर्ष 1997 में उन्होंने इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज़ की स्थापना कर सतत विकास, मानवीय मूल्यों और संघर्ष समाधान के कार्यों को और व्यापक बनाया। इन संगठनों के स्वयंसेवक भारत, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के 70 हजार से अधिक गाँवों तक पहुँचकर सेवा कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं।
मुझे यह जानकर भी प्रसन्नता है कि पिछले वर्ष प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के दौरान, गुरुदेव की प्रेरणा से आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवकों ने लाखों श्रद्धालुओं की सेवा में समर्पित होकर भोजन, आवास और स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान कीं।
वास्तव में, ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ केवल आंतरिक शांति का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि हमें संतुलित, जागरूक और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह एक ऐसा वैश्विक आंदोलन है, जो विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और समुदायों को जोड़ते हुए मानवता के समग्र उत्थान का संदेश देता है।
देवियो और सज्जनो,
आज हम यहाँ जिन ‘अनसंग एवरीडे हीरोज’ को सम्मानित करने के लिए एकत्रित हुए हैं, वे वास्तव में हमारे समाज की आत्मा हैं। हम अक्सर अखबारों के पहले पन्ने पर छपने वाले या टीवी पर दिखने वाले लोगों को ही नायक मान लेते हैं। लेकिन असली नायक तो वे हैं जो हमारे आस-पास रहते हैं, जो अपने दैनिक कार्यों के बीच से समय निकालकर, बिना किसी शोर-शराबे के समाज में अत्यंत सार्थक और गहरा योगदान दे रहे हैं।
इन नायकों की पहचान इनकी ‘निःस्वार्थ सेवा, अपार करुणा और समाज के प्रति गहरी ज़िम्मेदारी’ की भावना है। वे किसी पुरस्कार या तालियों की गड़गड़ाहट के लिए काम नहीं करते। उनका काम शायद किसी कैमरे में कैद नहीं होता, लेकिन उनके कार्यों का प्रभाव लोगों के जीवन पर बहुत गहरा और स्थायी होता है।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘‘परोपकाराय सतां विभूतयः’’ अर्थात, सज्जन पुरुषों की संपत्तियां और सामर्थ्य हमेशा दूसरों की भलाई के लिए ही होते हैं। आज यहाँ बैठे हमारे ये नायक इसी महान वैदिक विचार के जीवंत उदाहरण हैं। आपने गीता के ‘निष्काम कर्म’ को अपने जीवन में उतारा है।
पंजाब की इस पवित्र धरती के परिप्रेक्ष्य में जब मैं इन नायकों को देखता हूँ, तो मुझे इसमें हमारे महान गुरुओं की शिक्षाओं की झलक दिखाई देती है। यह वह धरती है जहाँ श्री गुरु नानक देव जी ने ‘वंड छकना’ (बांट कर खाना) और ‘निःस्वार्थ सेवा’ का संदेश दिया था। लंगर की पवित्र प्रथा हमें यही सिखाती है कि समाज के हर व्यक्ति की देखभाल करना हमारा परम धर्म है। आज के हमारे ये पुरस्कार विजेता उसी महान सेवा परंपरा को अपने-अपने तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।
यह महान दृष्टिकोण हमारे भारतीय सभ्यतागत मूल्यों और हमारी जड़ों में गहराई से बसा हुआ है। हमारे शास्त्रों ने हमेशा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात ‘संपूर्ण विश्व ही एक परिवार है’ का उद्घोष किया है। जब हम वास्तव में इस पूरी दुनिया को अपने परिवार के रूप में देखना शुरू कर देते हैं, तो सेवा कोई मजबूरी या कर्तव्य नहीं रह जाती; बल्कि यह अपनेपन और प्रेम की एक अत्यंत स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाती है।
आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ भौतिक और तकनीकी प्रगति ने अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन इस चकाचौंध भरी प्रगति के साथ-साथ, हम समाज में एक बहुत बड़ा विरोधाभास भी देख रहे हैं। हम देख रहे हैं कि लोगों के बीच अलगाव और अकेलापन लगातार बढ़ रहा है, मानसिक तनाव अपने चरम पर है, और हमारे सदियों पुराने सामुदायिक बंधन कमज़ोर पड़ रहे हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में, सेवा केवल एक अच्छा काम भर नहीं रह जाती, बल्कि यह हमारे सामाजिक संतुलन को बनाए रखने के लिए एक परम आवश्यकता बन जाती है।
सेवा ही वह पुल है जो टूटे हुए लोगों को जोड़ता है। सेवा हमारे बीच की दूरियों और भेदभाव की खाइयों को पाटती है। यह हमारे जीवन को एक वास्तविक अर्थ और उद्देश्य प्रदान करती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवा केवल समाज का ही कायाकल्प नहीं करती, बल्कि यह सेवा करने वाले उस व्यक्ति को भी भीतर से पूरी तरह बदल कर रख देती है।
अक्सर, लोगों के मन में यह सवाल उठता है और वे निराशा में सोचते हैं कि, केवल एक व्यक्ति के कुछ करने से आखिर क्या ही फर्क पड़ सकता है? लेकिन हमारा इतिहास और हमारा समाज हमें इसके बिल्कुल विपरीत सच्चाई बताता है। दुनिया का हर बड़ा परिवर्तन, हर बड़ी क्रांति हमेशा एक अकेले व्यक्ति के संकल्प से ही शुरू होती है।
यह तब शुरू होता है जब कोई एक व्यक्ति परवाह करने का विकल्प चुनता है, जब कोई एक व्यक्ति आगे बढ़कर कुछ करने का ठानता है, और जब कोई एक व्यक्ति उस समय कदम आगे बढ़ाता है जब बाकी सभी लोग हिचकिचा रहे होते हैं। उस एक व्यक्ति द्वारा उठाया गया वह एक छोटा सा कदम समाज के शांत जल में एक लहर पैदा करता है, और देखते ही देखते वह छोटी सी लहर एक विशाल जन-आंदोलन का रूप ले लेती है।
देवियो और सज्जनो,
आज, इस मंच से मैं आप सभी के साथ एक बहुत ही सरल लेकिन अत्यंत गहरा विचार साझा करना चाहूँगा। हमें सेवा को किसी बहुत असाधारण, अनोखे या केवल विशेष अवसरों पर किए जाने वाले कार्य के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसे तो हमारी दिनचर्या और हमारे दैनिक जीवन का एक बिल्कुल स्वाभाविक हिस्सा बन जाना चाहिए।
हम अक्सर समाज की सेवा करने के लिए किसी बहुत बड़े अवसर, पद या मंच का इंतज़ार करते रहते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सेवा के लिए हमेशा बड़े संसाधनों या बड़े कार्यों की आवश्यकता नहीं होती।
इसकी शुरुआत अत्यंत छोटे-छोटे कदमों से हो सकती है, जैसे किसी दुखी या परेशान व्यक्ति की बात को धैर्यपूर्वक सुन लेना, किसी ज़रूरतमंद बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने में मदद कर देना, संकट में फंसे किसी परिवार का सहारा बन जाना, या फिर अपने आस-पास के पर्यावरण, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की रक्षा करना। पूरी निष्ठा, ईमानदारी और सच्चे मन से किए गए ये छोटे-छोटे कार्य मिलकर समाज में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव लाते हैं।
हमें यह समझना होगा कि एक मज़बूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण केवल सरकारों या प्रशासन के भरोसे नहीं किया जा सकता। एक महान राष्ट्र का निर्माण हमेशा ज़िम्मेदार नागरिकों, एक-दूसरे के प्रति करुणा रखने वाले समुदायों और जागरूक व्यक्तियों द्वारा ही होता है।
जब आम लोग अपने आस-पास के माहौल, अपने मोहल्ले और अपने शहर की ज़िम्मेदारी स्वयं लेना शुरू कर देते हैं, तब जाकर सही मायनों में समाज बदलता है। और जब समाज सकारात्मक रूप से बदलता है, तो राष्ट्र अपने आप प्रगति के शिखर पर पहुँच जाता है।
आज यहाँ बड़ी संख्या में उपस्थित युवाओं से मैं विशेष रूप से यह कहना चाहूँगा कि आप केवल इस देश का भविष्य नहीं हैं, बल्कि आप इस देश का वर्तमान हैं। समाज में कोई सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आपको किसी की अनुमति या किसी बड़े पद का इंतज़ार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप जीवन में जिस भी मुकाम पर हैं, वहीं से शुरुआत करें। आपके पास जो भी संसाधन, ज्ञान या क्षमता है, उसका उपयोग करें। आप अपने स्तर पर जो कुछ भी भलाई कर सकते हैं, वह अवश्य करें। क्योंकि सच्चा नेतृत्व कोई कुर्सी या पद हासिल करने का नाम नहीं है, बल्कि यह सही समय पर सही पहल करने का नाम है।
अंत में, मैं इस अत्यंत सार्थक, प्रेरणादायक और बदलाव लाने वाले मंच का निर्माण करने के लिए एक बार फिर द आर्ट ऑफ लिविंग परिवार को हृदय से बधाई देता हूँ। इस तरह की शानदार पहल केवल कुछ विशेष व्यक्तियों को सम्मानित भर नहीं करती, बल्कि वे समाज में एक पूरी नई संस्कृति का निर्माण करती है।
अपने शब्दों को विराम देते हुए, मैं आप सभी के मन-मस्तिष्क में एक बहुत ही सरल लेकिन जीवन बदलने वाला विचार छोड़कर जाना चाहूँगा। यह सच है कि हो सकता है हम सभी अपने जीवन में बहुत महान या ऐतिहासिक कार्य न कर सकें, लेकिन हम सभी छोटे-छोटे कार्यों को बहुत महान प्रेम और पूर्ण समर्पण के साथ अवश्य कर सकते हैं। और कभी-कभी, यही वो निस्वार्थ प्रेम और छोटे-छोटे प्रयास होते हैं जो पूरी दुनिया की तस्वीर को बदल कर रख देते हैं।
आइए हम सब आज यहाँ से जाने के बाद एक पल के लिए रुकें, स्वयं से जुड़ें और खुद से यह सवाल पूछें कि मैं आज किसी और के लिए या समाज के लिए क्या कर सकता हूँ? क्योंकि यकीन मानिए, जिस पल यह प्रश्न हमारी दैनिक आदत बन जाएगा, उसी पल से हमारा समाज एक स्वर्णिम युग की ओर बदलना शुरू हो जाएगा।
मैं एक बार फिर इस महान पहल से जुड़े सभी स्वयंसेवकों, आयोजकों और पुरस्कार विजेताओं को अपनी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूँ। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि सेवा का यह पवित्र आंदोलन दिन-प्रतिदिन और अधिक मज़बूत हो, और यह आने वाली पीढ़ियों सहित कई अन्य लोगों को इस सुंदर, परोपकारी और शांतिपूर्ण मार्ग पर चलने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहे।
धन्यवाद, जय हिंद! जय भारत!