SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHANDKATARIA ON THE OCCASION OF PLAY SHER-E- PUNJAB- LALA LAJPAT RAI (LAATHI SE KRANTI TAK) BY SAMVAAD THEATRE GROUP AT CHANDIGARH ON MAY 16, 2026.

लाला लाजपत राय जी पर आधारित ‘शेर-ए-पंजाब’ नाटक के अवसर पर

माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 16.05.2026, शनिवारसमयः शाम 06:30 बजेस्थानः चंडीगढ़

नमस्कार!

आज “शेर-ए-पंजाब” नाटक के इस विशेष आयोजन में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता, गर्व और भावनात्मक संतोष की अनुभूति हो रही है। 

मैं सेंटर फॉर सोशियो कल्चरल स्टडी (सी.एस.सी.एस.) के संस्थापक  व ट्रस्टी और चंडीगढ़ के पूर्व डीजीपी श्री पी.सी. डोगरा जी सहित सी.एस.सी.एस. के सचिव श्री सतिंदर जी तथा इस प्रेरणादायी नाट्य प्रस्तुति को आर्थिक सहयोग प्रदान करने वाले श्री राजीव जी और श्री गौरव जी का अभिनंदन करता हूँ।

मैं विशेष रूप से निर्देशक श्री मुकेश शर्मा जी एवं उनकी पूरी टीम को बधाई देता हूँ, जिन्होंने मंच, प्रकाश, ध्वनि, अभिनय और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से अद्भुत वातावरण निर्मित किया। लेखक डॉ. गुरतेज सिंह जी ने इतिहास को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आत्मा के स्तर पर अभिव्यक्त किया है।

साथ ही, मैं इस “शेर-ए-पंजाब” जैसे ऐतिहासिक नाटक का मंचन करने वाले ‘संवाद थिएटर ग्रुप’ के सभी युवा कलाकारों को भी विशेष बधाई देता हूँ। कला वही सार्थक है जो समाज को जगाने का काम करे, और आपने आज वही किया है।

जानकर हर्ष हुआ कि सतिंदर जी, राजीव जी और गौरव जी के सहयोग एवं प्रेरणा से संवाद थिएटर ग्रुप इससे पूर्व भी भगत सिंह के जीवन पर आधारित “वो हिंदुस्तान”, सरदार पटेल पर “द होम मिनिस्टर”, वीर सावरकर पर “काला पानी”, डॉ. भीमराव आंबेडकर, विभाजन की त्रासदी पर “बंटवारा 1947” तथा लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन पर आधारित प्रभावशाली नाटकों का मंचन कर चुका है।

आज के इस डिजिटल युग में, जब सूचनाओं का जाल बिछा हुआ है, तो वर्ष 2018 में स्थापित सी.एस.सी.एस. ट्रस्ट निरंतर पंजाब और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उत्कृष्ट और प्रामाणिक सामग्री तैयार कर रहा है। हमारी महान संस्कृति में समय के साथ जो भी वैचारिक खाइयां या भ्रांतियां पैदा करने की कोशिश की गई है, यह संस्था उन वैचारिक दूरियों को पाटने का भगीरथ प्रयास कर रही है। 

इनका मुख्य उद्देश्य नैरेटिव (विमर्श) के उस अंतर को खत्म करना है, ताकि पंजाब सहित एक ‘मजबूत और जीवंत भारत’ का निर्माण किया जा सके। इस महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ट्रस्ट द्वारा सोशल मीडिया का प्रभावी उपयोग करने के साथ-साथ समय-समय पर महत्वपूर्ण सेमिनार और वेबिनार भी आयोजित किए जा रहे हैं।

इनके द्वारा सृजित की जा रही यह विचारोत्तेजक सामग्री इतनी उपयोगी है कि देश के नागरिकों में जागरूकता पैदा करने के लिए कोई भी पब्लिशिंग या मीडिया हाउस इसका स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकता है।

मुझे यह भी बताया गया है कि वर्तमान में, इस ट्रस्ट की शोधपूर्ण सामग्री को ‘द पंजाब पल्स’ द्वारा फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रमुखता से प्रकाशित और प्रसारित किया जा रहा है। इसका एकमात्र उद्देश्य हमारी राष्ट्रीय भावना को जगाना और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को जन-जन तक पहुँचाना है।

पंजाब और पूरे राष्ट्र के सामाजिक, सांस्कृतिक, रक्षा संबंधी और दिन-प्रतिदिन के समसामयिक विषयों पर प्रतिदिन सही और तथ्यपूर्ण जानकारी जनता तक पहुँचाने का इस ट्रस्ट का यह प्रयास राष्ट्र-निर्माण की दिशा में एक बेहद सराहनीय और ऐतिहासिक कदम है। मैं श्री पी.सी. डोगरा जी और ‘सेंटर फॉर सोशियो कल्चरल स्टडी’ की पूरी टीम के इस जज्बे को हृदय से नमन करता हूँ।

देवियो और सज्जनो,

आज का यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और पंजाब की गौरवशाली आत्मा को पुनः स्मरण करने का एक प्रेरणादायी प्रयास है।

पंजाब की धरती केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि संतों, गुरुओं, वीरों और महान बलिदानियों की पावन तपोभूमि रही है। जब-जब भारत माता पर संकट आया, इस माटी के सपूतों ने सबसे आगे बढ़कर राष्ट्र की रक्षा और स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। वास्तव में, भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पंजाब के वीरों के साहस, संघर्ष और बलिदान के बिना अधूरा है।

इसी गौरवशाली परंपरा के एक महान प्रतीक थे पंजाब केसरी लाला लाजपत राय जी, जिनका जीवन राष्ट्रभक्ति, त्याग और अदम्य साहस की प्रेरणादायी गाथा है। मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि ‘संवाद थिएटर ग्रुप’ के प्रतिभाशाली युवा कलाकारों ने ‘शेर-ए-पंजाब’ नाटक के माध्यम से उनके संघर्षपूर्ण और प्रेरक जीवन को अत्यंत जीवंत एवं प्रभावशाली ढंग से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है।

लाला जी केवल एक स्वाधीनता सेनानी नहीं थे; वे एक विचार थे, एक अखंड क्रांति थे, और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गूंजने वाली एक सिंह गर्जना थे। 

28 जनवरी, 1865 को फिरोजपुर जिले के छोटे से गाँव ढुडीके में जन्मे लाला लाजपत राय जी भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बने। साधारण परिवेश में जन्म लेने के बावजूद उनके भीतर बचपन से ही राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और नेतृत्व क्षमता के अद्भुत गुण दिखाई देते थे।

उनकी गणना महात्मा गांधी जी जैसे महान राष्ट्रीय नेताओं में की जाती है। वे केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज में आत्मसम्मान, शिक्षा और राष्ट्रीय जागरण के भी प्रबल समर्थक थे।

बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने बिपिन चंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआंदोलन को नई दिशा दी। उस समय यह आंदोलन केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और स्वाभिमान की लड़ाई बन चुका था।

इन तीनों महान नेताओं को देशभर में प्रेमपूर्वक ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाना गया। यह त्रयी (तिकड़ी) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उग्र राष्ट्रवाद, जनजागरण और स्वदेशी आंदोलन की सबसे सशक्त आवाज बनकर उभरी।

लाला लाजपत राय जी वास्तव में जन-जन के नायक थे। उनकी लोकप्रियता केवल पंजाब तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे देश के युवा, विद्यार्थी और आम नागरिक उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते थे।

वे दूरदर्शी विचारक और सच्चे राष्ट्रभक्त थे। उन्हें विश्वास था कि अंग्रेज भारत को हमेशा गुलाम बनाकर नहीं रख सकते, इसलिए उन्होंने स्वतंत्र भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे की नींव तैयार करनी शुरू कर दी थी।

इसी उद्देश्य से उन्होंने 1886 में डीएवी संस्थान की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा 1895 में पंजाब नेशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कंपनी जैसी राष्ट्रीय संस्थाओं की आधारशिला रखी। उनका मानना था कि आत्मनिर्भर भारत ही वास्तविक स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकता है।

लाला जी स्वावलंबन के माध्यम से स्वराज्य प्राप्त करना चाहते थे। वे चाहते थे कि भारतीय आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनें, ताकि विदेशी शासन पर निर्भरता समाप्त हो सके।

वे एक महान लेखक, चिंतक और पत्रकार भी थे। उन्होंने अपने लेखन और पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रवाद, सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता की चेतना को जन-जन तक पहुँचाया।

उन्होंने कई समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की स्थापना और संपादन किया। ‘द रीजेनरेटर ऑफ आर्यावर्त’, ‘द पंजाबी’, ‘द पीपल’, ‘देशोपकारक’ और ‘वंदे मातरम्’ जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों का खुलकर विरोध किया और जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।

उनकी लिखी पुस्तकें, "Unhappy India", "Young India", "History of Arya Samaj" और "England's Debt to India"] उस समय के राजनीतिक और सामाजिक चिंतन की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती हैं। उनके लेखन में राष्ट्रभक्ति, आत्मसम्मान और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है।

उन्होंने इटली के महान देशभक्त, दार्शनिक, पत्रकार और राजनेता मेजिनी; इटली के महान सेनापति और स्वतंत्रता सेनानी गैरीबाल्डी और भारत के महान दार्शनिक, समाज सुधारक और ‘आर्य समाज’ (1875) के संस्थापक स्वामी दयानंद जैसे महान व्यक्तित्वों पर लोकप्रिय जीवनियाँ भी लिखीं। इन रचनाओं के माध्यम से वे युवाओं को त्याग, संघर्ष और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देना चाहते थे।

लाला जी कहा करते थे, “स्वतंत्रता के बिना कोई जीवन नहीं है और स्वराज्य के बिना कोई स्वतंत्रता नहीं है।” यह विचार उनके सम्पूर्ण जीवन और संघर्ष का मूल मंत्र था।

जनता के नेता के रूप में उन्होंने हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहकर नेतृत्व किया। वे केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि हर आंदोलन में स्वयं सक्रिय भागीदारी निभाते थे।

वे गरम दल के प्रमुख नेताओं में से एक थे। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे अनेक क्रांतिकारी उन्हें अपना आदर्श मानते थे और उनके साहस तथा राष्ट्रभक्ति से प्रेरणा लेते थे।

लालाजी अपने आप में एक संस्था थे। सामाजिक सुधार, शिक्षा, राजनीति, पत्रकारिता और राष्ट्रसेवा, हर क्षेत्र में उनका योगदान असाधारण था। शायद ही कोई ऐसा जनआंदोलन रहा हो, जिसमें उन्होंने भाग न लिया हो।

लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते समय अंग्रेज पुलिस ने उन पर निर्ममता से लाठीचार्ज किया। इस हमले में वे गंभीर रूप से घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को यह महान स्वतंत्रता सेनानी देश के लिए बलिदान हो गया।

लेकिन मृत्यु से पहले भी उन्होंने अंग्रेजी शासन को चेतावनी देते हुए कहा था, “मेरे शरीर पर पड़ी प्रत्येक चोट ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की अंतिम कील साबित होगी।” यह केवल एक कथन नहीं, बल्कि उनकी अटूट राष्ट्रभक्ति और अदम्य साहस का प्रतीक था।

जब लाला जी शहीद हुए, तब महात्मा गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा, “जब तक भारतीय आकाश में सूरज चमकता रहेगा, लालाजी जैसे लोग कभी नहीं मर सकते।” यह श्रद्धांजलि उनके अमर व्यक्तित्व और राष्ट्र पर उनके प्रभाव को दर्शाती है।

लाला लाजपत राय जी वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता, समाज सुधारक, लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद और प्रभावशाली वक्ता थे। उनके अद्भुत योगदान के कारण ही उन्हें सम्मानपूर्वक ‘पंजाब केसरी’ कहा जाता है।

मेरे युवा साथियो! 

आज जब हम इस आज़ाद और खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस आज़ादी की कीमत लाला लाजपत राय, करतार सिंह सराभा, भगत सिंह और राजगुरु जैसे वीरों ने अपनी जान देकर चुकाई है।

लाला जी ने भारत को विदेशी अंग्रेजों की बेड़ियों से आज़ाद कराने के लिए लड़ाई लड़ी थी। लेकिन आज, हमारे पंजाब की लड़ाई एक दूसरे और कहीं ज्यादा खतरनाक दुश्मन से है, और वह दुश्मन है ‘नशा’।

आज मुझे यह देखकर गहरी पीड़ा होती है कि पंजाब का वह युवा, जिसके खून में लाला लाजपत राय का शौर्य और गुरुओं का तेज होना चाहिए, वह सिंथेटिक नशे के जाल में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर रहा है। सीमा पार बैठे दुश्मन जब हमसे आमने-सामने की जंग नहीं जीत पाए, तो वे इस नशे के जहर से हमारी जवानी को खोखला करने की साजिश कर रहे हैं। जो हाथ देश का भविष्य संवारने और उद्योग चलाने के लिए उठने चाहिए, वे आज नशे की लत में कांप रहे हैं।

मैं आज पंजाब के हर युवा से यह आह्वान करता हूँ, उठो! जागो! अपने भीतर के उस ‘शेर-ए-पंजाब’ को जगाओ। नशा कमजोरी की और कायरता की निशानी है, और पंजाब कभी कायर नहीं रहा। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, ‘‘मंजिलें क्या हैं, रास्ता क्या है? हौसला हो तो फासला क्या है!’’

अपनी इस असीम ऊर्जा को शिक्षा, खेल के मैदानों, कला और राष्ट्र निर्माण में लगाओ। नशे रूपी इस साइमन कमीशन का हमें आज डटकर बहिष्कार करना है।

साथियो,

हमें मिलकर पंजाब के उस खोए हुए गौरव को वापस लाना है। हमें एक ऐसा पंजाब बनाना है जहाँ के खेत पहले की तरह लहलहाते हों, जहाँ के युवा खेल के मैदानों में ओलिंपिक मेडल जीत रहे हों, जहाँ उद्योग और व्यापार फल-फूल रहा हो। हमें नशे और गैंग कल्चर के इस काले साये को हमेशा के लिए मिटाकर अपने गुरुओं और शहीदों के सपनों का ‘रंगला पंजाब’ बनाना है।

‘रंगला पंजाब’ वह पंजाब है जो गुरुओं की बाणी पर चलता है, जो मेहनत की खाता है, जो पूरे देश के अन्न भंडार भरता है और जहाँ लाला लाजपत राय के विचार हर युवा के सीने में धड़कते हैं।

आज जब विश्व तेजी से बदल रहा है, तब ऐसी प्रस्तुतियाँ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, राष्ट्रनायकों और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज निर्माण की एक सशक्त शक्ति है।

आइए, आज इस शानदार नाटक से प्रेरणा लेकर हम सब यह संकल्प लें कि हम अपने चरित्र को फौलाद सा मजबूत बनाएंगे। हम अपनी मातृभूमि की रक्षा, अपनी संस्कृति के सम्मान और एक नशा-मुक्त, खुशहाल पंजाब के निर्माण के लिए अपना शत-प्रतिशत योगदान देंगे।

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा, “जो राष्ट्र अपने महापुरुषों को स्मरण रखता है, वही इतिहास में अमर रहता है।”

एक बार फिर, मैं सेंटर फॉर सोशियो कल्चरल स्टडी तथा इस आयोजन से जुड़े सभी संस्कृति साधकों को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ कि वे इसी प्रकार राष्ट्रचेतना और भारतीय संस्कृति के संवाहक बने रहें। 

ईश्वर आप सभी को शक्ति और समृद्धि प्रदान करे।

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद ।

जय हिंद! 

जय भारत!