SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHANDKATARIA ON THE OCCASION OF BIRTH ANNIVERSARY CELEBRATION OF SARDAR JASSA SINGH RAMGARIA AT NABHA ON MAY 17, 2026.
- by Admin
- 2026-05-17 18:05
‘जस्सा सिंह रामगढ़िया की 303वीं जयंती’ के अवसर पर माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधनदिनांकः 17.05.2026, रविवार समयः दोपहर 04:00 बजे स्थानः नाभा
वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह!
इस पावन समारोह में उपस्थित सभी गुरसिखों, रामगढ़िया समाज के प्रिय बंधुओं और बहनों, और यहाँ पधारे सभी गणमान्य अतिथियों को मेरा हार्दिक प्रणाम।
आज हम सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया की 303वीं जयंती मना रहे हैं। यह केवल एक तिथि का स्मरण नहीं है, यह उस महायोद्धा को श्रद्धांजलि है जिन्होंने अठारहवीं सदी के सबसे कठिन दौर में खालसा पंथ की ज्योति को जलाए रखा।
मुझे इस अत्यंत गरिमामयी और प्रेरणादायी समारोह में आमंत्रित करने के लिए मैं ‘विश्वकर्मा वेलफेयर सोसाइटी’ के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। मेरे लिए यह अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि यह संस्था वर्ष 1958 से ही समाज सेवा और जनकल्याण के महायज्ञ में पूर्ण समर्पण भाव से जुटी हुई है।
इस सोसाइटी ने पिछले कई दशकों से समाज के जरूरतमंद वर्गों के लिए जो कार्य किए हैं, वे वास्तव में वंदनीय हैं। इसके द्वारा समय-समय पर रक्तदान शिविरों, नेत्र जांच और निशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है। इसके साथ ही, दिव्यांगजनों को ट्राइसाइकिल वितरित कर उनके जीवन को सुगम बनाना, यह सब सच्चे अर्थों में ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ को चरितार्थ करता है।
मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई है कि वर्ष 2023 में सरदार चरण सिंह जी के अध्यक्ष निर्वाचित होने के पश्चात, इस संस्था के जनकल्याण कार्यों को एक नई गति और ऊर्जा मिली है। उनके कुशल नेतृत्व और आप सभी के सहयोग से मात्र डेढ़ वर्ष के रिकॉर्ड समय में “विश्वकर्मा भवन” का निर्माण पूरा करना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। इस भवन में एक विशाल हॉल और बाबा विश्वकर्मा जी के भव्य मंदिर का निर्माण हमारी संस्कृति और शिल्प के प्रति आपकी अगाध श्रद्धा को दर्शाता है।
मुझे यह जानकर बहुत संतोष होता है कि यह सुविधायुक्त भवन समाज के सामान्य और मध्यम वर्ग को विवाह, जन्मदिन, भोग समारोह और अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए अत्यंत रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे समाज के एक बड़े वर्ग को बहुत आर्थिक राहत मिल रही है।
इन तमाम उपलब्धियों के साथ-साथ, जिस बात ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, वह है सोसाइटी की भविष्य की कार्ययोजना। विश्वकर्मा भवन की प्रथम मंजिल पर 15 कमरों वाले वृद्धाश्रम के निर्माण का आपका संकल्प, हमारी उस महान भारतीय परंपरा का रक्षक है जहाँ बुजुर्गों को भगवान का दर्जा दिया जाता है।
मैं ‘विश्वकर्मा वेलफेयर सोसाइटी’ के इस सेवा भाव को नमन करता हूँ और आपके उज्ज्वल भविष्य व इस नेक कार्य की सफलता के लिए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
आज जब हम सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया जी की 303वीं जयंती के अवसर पर एकत्रित हुए हैं, तो हमें उनके संघर्ष, साहस, राष्ट्रभक्ति और प्रेरणादायी जीवन से अवश्य परिचित होना चाहिए। सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया जी का जीवन केवल वीरता की गाथा नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मसम्मान, दूरदृष्टि और सामाजिक चेतना का अद्भुत उदाहरण है।
उनका जन्म वर्ष 1723 में लाहौर के निकट इच्छोगिल गाँव में एक साधारण तरखाण (बढ़ई एवं कारीगर) परिवार में हुआ। जन्म से उनका नाम था ‘जस्सा सिंह ठोका’, ठोका अर्थात् बढ़ई। यही उनकी जाति की पहचान थी। लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी कारीगर परिवार के पुत्र ने अपने साहस और नेतृत्व से ऐसा स्थान प्राप्त किया, जो बड़े-बड़े राजवंशों के शासक भी नहीं प्राप्त कर सके।
उनके परिवार की पृष्ठभूमि त्याग और बलिदान से भरी हुई थी। उनके दादा हरदास सिंह ने गुरु गोबिंद सिंह जी से अमृत ग्रहण किया था और बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। उनके पिता भगवान सिंह भी 1739 में नादिर शाह के आक्रमण के विरुद्ध युद्ध करते हुए शहीद हो गए। इस प्रकार, सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया जी ने बचपन से ही राष्ट्र, धर्म और पंथ के लिए समर्पण की परंपरा को देखा और उसी मार्ग को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।
अठारहवीं शताब्दी का पंजाब विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। लाहौर के गवर्नर मीर मन्नू ने अपनी सत्ता पर बढ़ते सिख प्रभाव को खतरा माना और अमृतसर के निकट बने राम रउणी किले को घेर लिया। उस समय जस्सा सिंह जलंधर दोआब के फौजदार अदीना बेग की सेवा में थे।
उन्हें अपने ही सिख भाइयों के विरुद्ध लड़ने का आदेश दिया गया, लेकिन जब उन्होंने किले के भीतर भूख और कठिनाइयों से जूझ रहे सिखों की स्थिति देखी, तो उन्होंने सत्ता का साथ छोड़कर अपने पंथ के साथ खड़े होने का साहसिक निर्णय लिया।
उन्होंने न केवल किले की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि अपनी कूटनीति और नेतृत्व क्षमता से घेरा भी हटवाया। बाद में इस किले का पुनर्निर्माण किया गया और गुरु राम दास जी के सम्मान में इसका नाम “रामगढ़” रखा गया। तभी से जस्सा सिंह “रामगढ़िया” के नाम से प्रसिद्ध हुए, अर्थात् “रामगढ़ के रक्षक”।
इसके बाद उन्होंने अपनी वीरता और संगठन क्षमता के बल पर रामगढ़िया मिसल (सिख राज्यसंघ) को मजबूत किया। अदीना बेग की मृत्यु के बाद पंजाब में उत्पन्न सत्ता शून्यता के दौर में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया और अहमद शाह अब्दाली जैसे आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1767 में जब अब्दाली ने आठवीं बार भारत पर आक्रमण किया, तब जस्सा सिंह रामगढ़िया और जस्सा सिंह अहलूवालिया ने मिलकर उसके मार्ग को रोकने का साहस दिखाया।
सन् 1770 में उन्होंने कांगड़ा और कई पहाड़ी रियासतों पर विजय प्राप्त कर अपनी शक्ति और नेतृत्व का परिचय दिया। उनके प्रभाव क्षेत्र में पंजाब और पहाड़ी इलाकों के अनेक महत्वपूर्ण नगर और क्षेत्र शामिल हो गए। यह उनके संगठन, सैन्य कौशल और दूरदृष्टि का प्रमाण था।
लेकिन एक सच्चे योद्धा की पहचान केवल उसकी जीत से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में उसके धैर्य और संघर्ष से होती है। मिसलों के आपसी संघर्ष के कारण एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें पंजाब छोड़कर हिसार में शरण लेनी पड़ी। परंतु उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी सेना को पुनर्गठित किया, दिल्ली तक अपनी शक्ति का प्रभाव स्थापित किया और बाद में पुनः पंजाब लौटकर अपने क्षेत्रों को प्राप्त किया।
सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया जी के जीवन का सबसे प्रेरणादायी संदेश यह है कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म, साहस और निष्ठा से प्राप्त होती है। वे एक कारीगर परिवार में जन्मे, लेकिन अपने पराक्रम और नेतृत्व से महाराजा के समान सम्मान प्राप्त किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि समाज में व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कार्यों और चरित्र से होती है।
वे केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि कुशल कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शी नेता भी थे। उन्होंने तलवार और संवाद, दोनों के माध्यम से अपने उद्देश्यों को प्राप्त किया। यही कारण है कि आज “रामगढ़िया” केवल एक समुदाय का नाम नहीं, बल्कि परिश्रम, सम्मान और उपलब्धि का प्रतीक बन चुका है।
20 अप्रैल 1803 को सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया जी का निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। अमृतसर स्थित “रामगढ़िया बुंगा” उनकी स्मृति और स्थापत्य कला का अद्भुत प्रतीक है। पंजाब और विश्वभर में बसे रामगढ़िया समाज के लोग आज भी उनके आदर्शों और परिश्रम की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
साथियो,
आज जब हम नाभा के इस ऐतिहासिक और जीवंत शहर में एकत्रित हुए हैं, तो यह आवश्यक है कि हम इसके उस गौरवशाली इतिहास पर भी एक गर्व भरी नज़र डालें, जिसने इस पूरे क्षेत्र को एक अलग पहचान दी है।
पटियाला जिले के अंतर्गत आने वाला यह नगर अपनी प्राचीन सैन्य वास्तुकला, पंजाब पब्लिक स्कूल नाभा जैसे उच्च कोटि के शैक्षणिक संस्थानों और वर्तमान में भारत के ‘कंबाइन हार्वेस्टर हब’ के रूप में विख्यात है। ‘नाभा’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के मूल शब्द ‘नाभि’ से मानी जाती है, जिसका अर्थ केंद्र या धुरी होता है। यह स्पष्ट रूप से इस बात का प्रतीक है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से, नाभा केवल एक शहर नहीं, बल्कि हमेशा से ही इस संपूर्ण क्षेत्र का एक प्रमुख केंद्र और गहरे आध्यात्मिक महत्व का एक पवित्र स्थल रहा है।
नाभा रियासत का इतिहास सिख इतिहास के सबसे प्रभावशाली राजवंशों में से एक, ‘फुलकियाँ’ राजवंश से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। इस राजवंश के शासक चौधरी फूल के वंशज थे, जो एक सिद्धू जाट सिख थे। चौधरी फूल ने 17वीं शताब्दी के मध्य में इस वंश की नींव रखी थी। फुलकियाँ मिसल (सिख राज्यसंघ) के तहत तीन प्रमुख राज्यों का उदय हुआ, पटियाला, जींद और नाभा।
नाभा रियासत के संस्थापक राजा हमीर सिंह (शासन 1763-1783) को माना जाता है। उन्होंने 1755 में नाभा नगर की स्थापना की थी। 1763 में सरहिंद के पतन के बाद, जब मुग़लों और अफगानों की सत्ता क्षीण हुई, हमीर सिंह ने नाभा को एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य के रूप में स्थापित किया। उस समय यह राज्य 12 बिखरे हुए क्षेत्रों में विभाजित था।
वहीं, नाभा के अंतिम शासक महाराजा प्रताप सिंह जी थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी के समय अत्यंत दूरदर्शिता दिखाई। उन्होंने ही भारत के साथ विलय पत्र (Instrument of Accession)पर हस्ताक्षर किए और नाभा को भारतीय संघ का हिस्सा बनाया। नाभा के शासकों ने हमेशा सिख पंथ और राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखा है।
इतिहास की बात हो तो PEPSU (Patiala and East Punjab States Union) का जिक्र अनिवार्य है। 15 जुलाई 1948 को जब आठ रियासतों (पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, फरीदकोट, कलसिया, मलेरकोटला और नालागढ़) को मिलाकर पेप्सू बनाया गया, तब नाभा इसका एक प्रमुख केंद्र था। 1956 में पंजाब के साथ विलय होने तक पेप्सू ने इस क्षेत्र के प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। नाभा हमेशा से ही शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा है।
आज विश्वकर्मा वेलफेयर सोसाइटी का यह मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नाभा को पूरे भारत में ‘कंबाइन सिटी’ के नाम से जाना जाता है। भारत की हरित क्रांति को अगर किसी शहर ने तकनीकी पंख दिए हैं, तो वह नाभा है। यहाँ की एग्रीकल्चरल कंबाइन हार्वेस्टर इंडस्ट्री ने नाभा का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है।
नाभा की बनी कंबाइन मशीनें आज न केवल पंजाब और भारत, बल्कि विदेशों के खेतों में भी फसल काट रही हैं। यह उद्योग हजारों परिवारों को रोजगार दे रहा है और पंजाब की आर्थिकी की रीढ़ है।
साथियो,
पंजाब की मिट्टी का स्वभाव ही ‘चढ़दी कला’ का है। यह गुरुओं, पीरों और पैगंबरों की धरती है। यहाँ के लोग ‘मेहनत’ और ‘मेहमानी’ के लिए जाने जाते हैं।
पंजाब ने हमेशा देश का पेट भरा है और सीमाओं पर सीना तानकर रक्षा की है। लेकिन आज हमारे सामने नशे की गंभीर चुनौती है, जो हमारे पंजाब की जवानी को खोखला करने की कोशिश कर रहा है।
मैं आज महाराजा जस्सा सिंह रामगढ़िया की जयंती पर युवाओं से आह्वान करता हूँ कि अपने भीतर के उस योद्धा को जगाएं। नशे की गुलामी को छोड़कर ‘कौशल’ को अपनाएं। नाभा की इंडस्ट्री की तरह खुद को हुनरमंद बनाएं। हमें मिलकर ‘नशा-मुक्त पंजाब’ और ‘रंगला पंजाब’ बनाना है। ‘रंगला पंजाब’ वह होगा जहाँ हर हाथ में हुनर होगा, हर खेत में खुशहाली होगी और हर चेहरे पर मुस्कान होगी।
माननीय प्रधानमंत्री जी ने ‘विकसित भारत 2047’ का जो संकल्प लिया है, उसमें पंजाब की भूमिका सबसे अग्रणी होनी चाहिए। महाराजा जस्सा सिंह रामगढ़िया के सिद्धांतों पर चलते हुए हमें साहस और तकनीक का संगम करना होगा।
मैं विश्वकर्मा वेलफेयर सोसाइटी की सराहना करता हूँ जो समाज के कारीगरों, शिल्पकारों और मेहनतकश लोगों को एकजुट कर रही है। आप ही इस राष्ट्र के असली निर्माता हैं।
अंत में, मैं यही कहूँगाः
‘‘मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है,
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’’
आइए, आज महाराजा जस्सा सिंह रामगढ़िया जी को सच्ची श्रद्धांजलि यही दें कि हम पंजाब को फिर से गौरव के शिखर पर ले जाएं।
वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह!
बहुत-बहुत धन्यवाद!
जय हिंद! जय भारत!