SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF VICE CHANCELLORS CONFERENCE AT PUNJAB LOK BHAVAN ON MAY 18, 2026.

‘ वाइस-चांसलर्स कॉन्फ्रेंस’ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 18.05.2026, सोमवारसमयः सुबह 10:00 बजेस्थानः लोकभवन, पंजाब

नमस्कार!

आप सभी का पंजाब लोक भवन में आयोजित इस महत्वपूर्ण वाइस-चांसलर्स कॉन्फ्रेंस में हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन है। आज की इस बैठक का विषय है, “उच्च शिक्षा संस्थानों में मेंटल वेलनेस”। यह केवल शैक्षणिक विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि हमारे युवाओं के भविष्य, समाज की दिशा और राष्ट्र निर्माण से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

मुझे प्रसन्नता है कि आज पंजाब की विभिन्न यूनिवर्सिटियों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपति, निदेशक तथा मानसिक स्वास्थ्य एवं छात्र कल्याण से जुड़े फैकल्टी सदस्य एक साझा उद्देश्य के साथ यहाँ उपस्थित हैं। यह सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि हम सभी विद्यार्थियों के समग्र विकास तथा सुरक्षित, सकारात्मक और संवेदनशील शैक्षणिक वातावरण के निर्माण के प्रति गंभीर और प्रतिबद्ध हैं।

मैं विशेष रूप से आज के हमारे विशिष्ट वक्ताओं का स्वागत करना चाहता हूँ।

हमारे बीच डॉ. सुनिता सिवाच उपस्थित हैं, जिन्होंने विश्वविद्यालयों में छात्र कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य एवं परामर्श तंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इसी प्रकार मैं डॉ. राम प्रताप बेनीवाल का भी हार्दिक स्वागत करता हूँ, जो युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि उनके विचार आज की चर्चा को नई दिशा और सार्थक दृष्टि प्रदान करेंगे।

साथियो,

आज का यह विषय सिर्फ एक चर्चा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे देश और विशेषकर पंजाब के भविष्य के निर्माण की आधारशिला है। जब हम उच्च शिक्षा की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान अक्सर डिग्री, प्लेसमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर और सिलेबस पर ही केंद्रित रहता है। लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि इन डिग्रियों को हासिल करने वाला जो ‘मन’ है, अगर वह स्वस्थ नहीं है, तो सारी सफलताएं अधूरी हैं।

युवावस्था जीवन का वह पड़ाव है जहाँ असीम ऊर्जा होती है, बड़े सपने होते हैं। लेकिन इसी पड़ाव पर करियर का दबाव, भविष्य की चिंता, अकादमिक प्रतिस्पर्धा और आज के इस डिजिटल युग में सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव, युवाओं को एक अनजाने तनाव की ओर धकेल रहा है।

हाल ही के आर्थिक सर्वेक्षण और स्वास्थ्य रिपोर्टों ने हमारा ध्यान इस ओर खींचा है कि हमारे युवाओं में ‘डिजिटल एडिक्शन’ (स्क्रीन की लत) और अकेलेपन के कारण मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है।

‘‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’’

हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि असली ताकत शरीर की नहीं, मन की होती है। यदि हमारा युवा मन से टूट जाएगा, तो हम एक मजबूत राष्ट्र की कल्पना कैसे कर सकते हैं? पंजाब की यह धरती गुरुओं, पीरों और योद्धाओं की धरती है, जिसने हमेशा ‘चढ़दी कला’ (निरंतर उत्थानशील अवस्था) का संदेश दिया है। आज हमें अपने शिक्षण संस्थानों में इसी ‘चढ़दी कला’ के भाव को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

आज का विद्यार्थी केवल शैक्षणिक दबाव का सामना नहीं कर रहा है। तीव्र प्रतिस्पर्धा, सामाजिक अपेक्षाएँ, रोजगार की चिंता, डिजिटल जीवनशैली, सोशल मीडिया का प्रभाव, अकेलापन तथा नशे जैसी चुनौतियाँ उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। कई बार विद्यार्थी बाहर से सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर से तनाव, चिंता और असुरक्षा से जूझ रहा होता है। यह स्थिति केवल उसके व्यक्तिगत जीवन को ही नहीं, बल्कि उसकी पढ़ाई, आत्मविश्वास और भविष्य को भी प्रभावित करती है।

हमें यह समझना होगा कि यदि विद्यार्थी मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा, तो वह अपनी शिक्षा, प्रतिभा और क्षमताओं का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाएगा। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को अब “अतिरिक्त विषय” के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के मूल आधार के रूप में देखने की आवश्यकता है।

ऐसे समय में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं रह सकती। हमें ऐसे शिक्षण परिसर विकसित करने होंगे, जहाँ विद्यार्थी स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और मानसिक रूप से समर्थ महसूस करें। मैं चाहता हूँ कि हमारे सभी विश्वविद्यालय और कॉलेज विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता बनाएं।

इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदमों पर गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है।

सबसे पहले, प्रत्येक संस्थान में नियमित काउंसलिंग सेशन आयोजित किए जाएँ। विद्यार्थियों को यह महसूस होना चाहिए कि यदि वे किसी मानसिक दबाव, तनाव या भावनात्मक समस्या से गुजर रहे हैं, तो उनके पास सहायता लेने का एक सहज और सम्मानजनक माध्यम उपलब्ध है। कई बार केवल किसी का धैर्यपूर्वक सुन लेना भी एक विद्यार्थी को टूटने से बचा सकता है।

दूसरा, विद्यार्थियों को अधिक से अधिक खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों, योग, संगीत, साहित्य और सामूहिक कार्यक्रमों से जोड़ा जाए। शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जब विद्यार्थी खेल, कला और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, तनाव कम होता है और उनमें टीम भावना विकसित होती है।

तीसरा, हमें संस्थानों में ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ कोई विद्यार्थी स्वयं को अकेला महसूस न करे। मैं विशेष रूप से यह सुझाव देना चाहता हूँ कि “स्टूडेंट-टू-स्टूडेंट सपोर्ट सिस्टम” विकसित किया जाए, जिसमें वरिष्ठ और कनिष्ठ विद्यार्थियों को आपस में जोड़ा जाए। नए विद्यार्थियों को ऐसे साथियों से जोड़ा जाए जो उनका मार्गदर्शन करें, उनसे संवाद बनाए रखें और उन्हें संस्थान के वातावरण में सहज होने में सहायता दें। इससे अकेलेपन और मानसिक तनाव की भावना काफी कम हो सकती है।

हमें अपने शिक्षण संस्थानों में संवादहीनता की दीवार को तोड़ना होगा। हमें ऐसा संवेदनशील और विश्वासपूर्ण वातावरण बनाना होगा, जहाँ विद्यार्थी अपने तनाव, असफलता, चिंता या अवसाद के बारे में खुलकर बात कर सकें। 

जब छात्र यह महसूस करेगा कि उसका संस्थान केवल उसकी उपलब्धियों ही नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं और मानसिक स्थिति की भी परवाह करता है, तभी वह वास्तव में सुरक्षित और समर्थ महसूस करेगा।

मैं यह भी आग्रह करता हूँ कि प्रत्येक कॉलेज और विश्वविद्यालय में केवल ‘प्लेसमेंट सेल’ ही नहीं, बल्कि एक सक्रिय और प्रभावी ‘हैप्पीनेस एवं वेलनेस सेल’ की स्थापना की जाए। इन केंद्रों में प्रशिक्षित काउंसलर्स, मेंटर्स और विशेषज्ञ उपलब्ध हों, जो विद्यार्थियों को समय पर उचित मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग प्रदान कर सकें। 

मैं विशेष रूप से ‘पीयर-मेंटॉरिंग’ (सहकर्मी मार्गदर्शन) व्यवस्था को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल देना चाहूँगा। विद्यार्थियों के बीच ऐसे सहयोगी समूह बनाए जाएँ, जहाँ वे एक-दूसरे से खुलकर अपने अनुभव, चिंताएँ और भावनाएँ साझा कर सकें। कई बार एक छात्र अपने मित्र या सहपाठी की मानसिक स्थिति को सबसे पहले और सबसे बेहतर समझ पाता है। यदि हम इस सहयोगी संस्कृति को विकसित कर सकें, तो हमारे शिक्षण संस्थान वास्तव में संवेदनशील और सहायक समुदायों में परिवर्तित हो सकते हैं।

इसके साथ-साथ, मैं एक और महत्वपूर्ण विषय की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। आज के समय में विद्यार्थियों के मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण उनके भविष्य और रोजगार को लेकर असुरक्षा की भावना भी है। जब किसी विद्यार्थी को यह चिंता होती है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे उचित रोजगार मिलेगा या नहीं, तब यह चिंता धीरे-धीरे मानसिक दबाव का रूप ले लेती है।

इसलिए यह आवश्यक है कि हमारे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में चलाए जा रहे पाठ्यक्रमों और कोर्सों की समय-समय पर समीक्षा और फाइन-ट्यूनिंग की जाए, ताकि वे वर्तमान समय की आवश्यकताओं और रोजगार बाजार की मांगों के अनुरूप बने रहें। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो केवल डिग्री प्रदान न करे, बल्कि विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन के लिए सक्षम और आत्मनिर्भर बनाए।

मैं चाहता हूँ कि सभी संस्थान विद्यार्थियों के स्किल डेवलपमेंट, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, इंटर्नशिप, इंडस्ट्री इंटरफेस और रोजगारोन्मुख शिक्षा पर विशेष ध्यान दें। विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ ऐसे कौशल भी दिए जाएँ, जिनसे वे शिक्षा पूर्ण करते ही रोजगार प्राप्त कर सकें या स्वयं स्वरोजगार के अवसर विकसित कर सकें।

जब युवा आत्मनिर्भर बनता है, अपनी मेहनत से कमाना शुरू करता है और उसे अपने भविष्य के प्रति विश्वास मिलता है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और मानसिक तनाव स्वतः कम होने लगता है। रोजगार केवल आर्थिक सुरक्षा नहीं देता, बल्कि जीवन में सम्मान, उद्देश्य और सकारात्मकता भी प्रदान करता है। इसलिए मेंटल वेलनेस और स्किल-आधारित शिक्षा, दोनों को हमें एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्राथमिकताओं के रूप में देखना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी इसी दिशा में स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। नई शिक्षा नीति समग्र शिक्षा, भावनात्मक विकास, कौशल निर्माण, परामर्श व्यवस्था तथा छात्र-केंद्रित वातावरण पर विशेष बल देती है। पंजाब के अनेक विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों ने इस दिशा में सराहनीय पहल की हैं, और आज की यह बैठक उन अनुभवों को साझा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

साथियो,

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्वीकार करते हुए अनेक महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं। सरकार अब मानसिक स्वास्थ्य को केवल चिकित्सीय विषय नहीं, बल्कि मानव विकास और राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार मानती है।

“राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है तथा मानसिक रोगों से जुड़े सामाजिक कलंक को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

इसी क्रम में “टेली-मानस (Tele-MANAS)” कार्यक्रम के अंतर्गत 24X7 हेल्पलाइन ‘14416’ के माध्यम से देशभर में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श उपलब्ध कराया जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, टेली-मानस ऐप और एआई आधारित चैटबॉट ‘अस्मि’ जैसी पहलें युवाओं और विद्यार्थियों को समय पर सहायता प्रदान कर रही हैं।

शिक्षा मंत्रालय की “मनोदर्पण” पहल भी छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को मनोसामाजिक सहयोग प्रदान करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है। इसके माध्यम से परामर्श, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को और सशक्त बनाने हेतु उत्तर भारत में "NIMHANS-2" (a second National Institute of Mental Health and Neuro Sciences) की स्थापना की घोषणा की गई है, जिससे युवाओं को उन्नत उपचार, अनुसंधान और विशेषज्ञ परामर्श की सुविधाएँ मिल सकेंगी।

इसके साथ ही “आयुष्मान भारत” और “आयुष्मान आरोग्य मंदिर” जैसी योजनाओं के माध्यम से प्राथमिक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग और परामर्श सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है। जिला अस्पतालों में आपातकालीन एवं ट्रॉमा केयर सुविधाओं को भी मजबूत किया जा रहा है, ताकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ अधिक सुलभ और प्रभावी बन सकें।

साथियो,

मुझे विशेष संतोष है कि पंजाब में नशामुक्ति एवं युवा जागरूकता को लेकर पिछले कुछ समय में व्यापक अभियान चलाए गए हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में संवाद कार्यक्रम, जागरूकता यात्राएँ, व्याख्यान तथा छात्र सहभागिता गतिविधियाँ आयोजित की गईं। मुझे स्वयं अनेक शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों और शिक्षकों से संवाद करने का अवसर मिला, और मैंने अनुभव किया कि यदि युवाओं को सही मार्गदर्शन, संवेदनशील वातावरण और सकारात्मक सहयोग मिले, तो वे समाज को नई दिशा देने की अपार क्षमता रखते हैं।

पिछली वाइस-चांसलर्स कॉन्फ्रेंस में भी इन विषयों पर गंभीर चर्चा हुई थी। उसी निरंतरता में आज की यह बैठक आयोजित की गई है। कार्यक्रम के अंतर्गत आज पाँच विश्वविद्यालयों द्वारा विशेष प्रस्तुतियाँ भी दी जाएँगी, जिनमें वे मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति, छात्र कल्याण तथा नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े अपने अनुभव साझा करेंगे। इनमें जगत गुरू नानक देव ओपन यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, गुरू अंगद देव वेटरनरी एंड ऐनिमल साईंसिस यूनिवर्सिटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी शामिल हैं।

यह सम्मेलन केवल रिपोर्ट प्रस्तुत करने का मंच नहीं है, बल्कि एक-दूसरे से सीखने, सहयोग बढ़ाने और एक साझा कार्ययोजना विकसित करने का अवसर भी है। मुझे विश्वास है कि आज की चर्चा से ऐसे व्यावहारिक सुझाव सामने आएँगे, जिन्हें पंजाब के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रभावी रूप से लागू किया जा सकेगा।

मैं सभी कुलपतियों, निदेशकों, विशेषज्ञों और शिक्षकों से आग्रह करता हूँ कि मानसिक स्वास्थ्य और नशामुक्ति को केवल एक कार्यक्रम या अभियान के रूप में न देखें। इसे हमें अपने संस्थानों की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज ऐसा वातावरण विकसित करे, जहाँ विद्यार्थी मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी, संवेदनशील और सकारात्मक सोच वाले नागरिक बन सकें।

मैं आज के इस मंच से पंजाब के सभी शैक्षणिक संस्थानों और हमारे ऊर्जावान युवाओं को यह संदेश देना चाहता हूँ कि असफलता जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह एक नया अनुभव है।

‘‘परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन, ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं।

वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर, ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं।’’

 

लेकिन इस हुनर को निखारने के लिए मन का शांत और स्वस्थ होना जरूरी है। संस्थानों को अपने छात्रों को यह सिखाना होगा कि ‘मार्क्स’ यानी ‘अंक’ जीवन की दिशा तय कर सकते हैं, लेकिन वे जीवन की कीमत तय नहीं कर सकते।

अंत में, मैं आप सभी को इस महत्वपूर्ण पहल का हिस्सा बनने के लिए हृदय से धन्यवाद देता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि पंजाब के विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान इस दिशा में देश के लिए एक आदर्श स्थापित करेंगे।

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

जय हिन्द!

जय भारत!