SPEECH OF PUNJAB GOVERNOR AND ADMINISTRATOR, UT CHANDIGARH, SHRI GULAB CHAND KATARIA ON THE OCCASION OF INTERNATIONAL MUSEUM DAY PARTICIPATED IN THE PROGRAM ORGANISED AT THE GOVERNMENT MUSEUM AND ART GALLERY, CHANDIGARH ON MAY 18, 2026.

‘अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस’ के अवसर पर

राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी का संबोधन

दिनांकः 18.05.2026, सोमवारसमयः शाम 6:00 बजेस्थानः चंडीगढ़

    

नमस्कार!

आज अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर यहाँ राजकीय संग्रहालय एवं कला दीर्घा, चंडीगढ़ (Government Museum and Art Gallery) में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

संग्रहालय केवल पत्थरों, मूर्तियों या कैनवास पर बिखरे रंगों का संग्रह नहीं होते। ये हमारी सभ्यता के जीवंत दस्तावेज हैं। ये अतीत की खिड़कियां हैं, जिनसे झांककर हम अपनी जड़ों को पहचानते हैं और भविष्य की दिशा तय करते हैं।

जब हम इस भव्य संग्रहालय की बात करते हैं, तो इसका इतिहास भारत के विभाजन की त्रासदी और उसके बाद कला के पुनरुत्थान की एक अद्भुत गाथा है। 1947 में देश के विभाजन से पहले, हमारी कला का एक अमूल्य खजाना लाहौर के सेंट्रल म्यूजियम में सुरक्षित था। विभाजन के बाद, अप्रैल 1948 में उस खजाने का बंटवारा हुआ, जिसमें से 40 प्रतिशत हिस्सा भारत को मिला। इस हिस्से में गांधार शैली की अद्भुत मूर्तियां, बेशकीमती पहाड़ी और मुगल लघु चित्र शामिल थे।

शुरुआत में इन कलाकृतियों को अमृतसर, शिमला और पटियाला में रखा गया, लेकिन अंततः इन्हें इनके स्थायी और सबसे योग्य घर, चंडीगढ़ में लाने का निर्णय लिया गया। इस संग्रहालय की इमारत का डिजाइन आधुनिक वास्तुकला के जनक ली कार्बुजियर ने स्वयं तैयार किया था। 

इस संग्रहालय का उद्घाटन 6 मई, 1968 को कला के प्रसिद्ध पारखी एवं संरक्षक तथा तत्कालीन चंडीगढ़ के मुख्य आयुक्त स्वर्गीय डॉ. एम. एस. रंधावा जी की प्रेरणा, पहल और सक्रिय सहयोग से किया गया था। आज यह संग्रहालय न केवल अपनी कलाकृतियों के लिए, बल्कि अपनी बेमिसाल वास्तुकला के लिए भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

देवियो और सज्जनो,

हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय परिषद के तत्वावधान में मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस हमें यह याद दिलाता है कि संग्रहालय केवल हमारी विरासत को संजोने वाले स्थान नहीं हैं, बल्कि वे संवाद, समझ और शांति को बढ़ावा देने वाले संस्थान भी हैं।

इस वर्ष की थीम "Museums Uniting a Divided World" आज के समय में बहुत प्रासंगिक है। ऐसे समय में, जब दुनिया कई बार भाषा, धर्म, विचारधारा और भौगोलिक सीमाओं के आधार पर बंटी हुई दिखाई देती है, संग्रहालय हमें हमारी साझा मानवता की याद दिलाते हैं। वे ऐसे स्थान हैं जहाँ लोग अलग-अलग संस्कृतियों को समझने, सम्मान देने और उनसे सीखने का अवसर प्राप्त करते हैं।

चंडीगढ़ के संग्रहालय इस भावना को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

राजकीय संग्रहालय एवं कला दीर्घा, चंडीगढ़ का संग्रह विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और कला परंपराओं के आपसी जुड़ाव को दर्शाता है। यहाँ मौजूद गांधार और नागपट्टिनम की बौद्ध मूर्तियाँ यह दिखाती हैं कि किस प्रकार बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ शांति, करुणा और सद्भाव का संदेश लेकर विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचीं। गांधार की मूर्तियाँ भारतीय, यूनानी और मध्य एशियाई कला परंपराओं के सुंदर मेल का उदाहरण हैं।

इस संग्रहालय में सोभा सिंह की प्रसिद्ध कलाकृतियाँ भी हैं, जिनमें गुरु नानक देव जी के चित्र समानता, मानवता और भाईचारे का संदेश देते हैं। इसके साथ ही यहाँ मौजूद हिंदू मूर्तियाँ भारत की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करती हैं।

इंटरनेशनल डॉल्स म्यूज़ियम, चंडीगढ़ में विभिन्न देशों की पारंपरिक वेशभूषा में सजी गुड़ियाएँ बच्चों को दुनिया की विविध संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन शैली से परिचित कराती हैं। ये गुड़ियाएँ हमें यह संदेश देती हैं कि भले ही दुनिया के लोग अलग-अलग दिखते हों, लेकिन परिवार, खुशी और समुदाय जैसे मूल्य सबके लिए समान हैं। इससे बच्चों में विविधता के प्रति सम्मान और वैश्विक मित्रता की भावना विकसित होती है।

इसी प्रकार, नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम, चंडीगढ़ डायनासोर जैसे प्राचीन जीवों से लेकर मानव सभ्यता के विकास तक के जीवन के विकास की अद्भुत कहानी को दर्शाता है। यह हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी पर सभी जीव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और प्रकृति की रक्षा करना हमारी साझा जिम्मेदारी है।

चंडीगढ़ आर्कीटेक्चर म्यूज़ियम भी इस शहर के निर्माण में हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कहानी को सामने लाता है। ली कॉर्बूज़ियर और भारतीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा डिज़ाइन किया गया चंडीगढ़ इस बात का प्रतीक है कि जब विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोग साथ मिलकर काम करते हैं, तो बेहतर समाज का निर्माण संभव होता है।

मुझे यह जानकर भी खुशी हुई कि चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्कीटेक्चर के विद्यार्थियों द्वारा एक विशेष इंस्टॉलेशन तैयार किया गया है, जो यह दर्शाता है कि व्यापार मार्गों ने किस प्रकार लोगों, विचारों, संस्कृतियों और ज्ञान को एक-दूसरे से जोड़ा। यह हमें बताता है कि मानव सभ्यता हमेशा आपसी आदान-प्रदान और सहयोग से आगे बढ़ी है।

यह भी प्रसन्नता की बात है कि चंडीगढ़ ललित कला अकादमी चंडीगढ़ के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर "Down the Memory Lane"प्रदर्शनी आयोजित कर रही है, जिसमें शहर की पुरानी तस्वीरों को प्रदर्शित किया गया है। ऐसी प्रदर्शनियाँ लोगों को शहर की यात्रा, विकास और साझा यादों से जोड़ने का कार्य करती हैं।

ये सभी संग्रहालय, प्रदर्शनियाँ और रचनात्मक प्रयास हमें यह संदेश देते हैं कि हमारी भिन्नताओं के बावजूद मानवता संस्कृति, इतिहास, शिक्षा और साझा आकांक्षाओं के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। संग्रहालय समझ, एकता और सद्भाव को बढ़ावा देने के महत्वपूर्ण केंद्र बनते हैं।

महान दार्शनिकों ने कहा है कि जो समाज अपने इतिहास और संस्कृति को भूल जाता है, वह कभी एक मजबूत भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता।

"A people without the knowledge of their past history, origin and culture is like a tree without roots" यानी अपनी बीती हुई कहानी, उद्गम और संस्कृति के ज्ञान के बिना लोग बिना जड़ों वाले पेड़ की तरह होते हैं।

संग्रहालय हमारे समाज के वही मार्गदर्शक हैं जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखते हैं। आज का यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को केवल तकनीकी रूप से सक्षम ही नहीं बनाना है, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति संवेदनशील भी बनाना है।

साथियो,

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, भारत सरकार हमारी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसे आधुनिक रंग देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार ने संग्रहालयों को ‘अतीत के बंद कमरों’ से निकालकर ‘भविष्य के जीवंत केंद्रों’ में बदलने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं।

संस्कृति मंत्रालय ने देश के सभी प्रमुख संग्रहालयों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए ‘म्यूजियम्स ऑफ इंडिया’ नेशनल पोर्टल की शुरुआत की है। इसके तहत लाखों कलाकृतियों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है, ताकि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति हमारी कला को देख सके।

‘म्यूजियम ग्रांट स्कीम’ (संग्रहालय अनुदान योजना) के अंतर्गत नए संग्रहालयों की स्थापना के साथ-साथ मौजूदा राज्य और क्षेत्रीय संग्रहालयों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इसके तहत संग्रहालयों के बुनियादी ढांचे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जा रहा है, दीर्घाओं का नवीनीकरण हो रहा है, और सबसे महत्वपूर्ण, कलाकृतियों के संरक्षण के लिए उन्नत प्रयोगशालाएं स्थापित की जा रही हैं। 

इस डिजिटल क्रांति के युग में संग्रहालयों के प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए ‘जतन’ (JATAN: Virtual Museum Software) सॉफ्टवेयर एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। 

‘जतन’ एक ऐसा अनूठा वर्चुअल म्यूजियम सॉफ्टवेयर है, जिसका उपयोग देश के विभिन्न संग्रहालयों में रखी अमूल्य कलाकृतियों और धरोहरों का डिजिटल संग्रह तैयार करने के लिए किया जा रहा है। अब तक देश के 8 प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर के संग्रहालयों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 2 प्रमुख संग्रहालयों का इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से पूरी तरह से डिजिटलीकरण किया जा चुका है।

जब हम अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की बात करते हैं, तो भारत सरकार का ‘राष्ट्रीय स्मारक और पुरातात्विक संपदा मिशन’ एक दूरदर्शी पहल के रूप में उभरकर सामने आया है। इसका उद्देश्य देशभर में मौजूद प्राचीन स्मारकों और दुर्लभ पुरावशेषों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण कर हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना है। 

यह मिशन न केवल धरोहरों के संरक्षण को मजबूत कर रहा है, बल्कि प्राचीन कलाकृतियों की चोरी और अवैध तस्करी पर रोक लगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की गौरवशाली विरासत से प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

इसके अलावा सरकार ने देश के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों और जनजातीय नायकों के सम्मान में देश भर में आधुनिक संग्रहालयों की स्थापना की है, जो हमारी युवा पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा दे रहे हैं।

ये सभी पहल दर्शाती हैं कि हमारी सरकार केवल आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए भी पूर्णतः प्रतिबद्ध है। यह आधुनिकता और परंपरा के संतुलित समन्वय का प्रतीक है, जो हमें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ते हुए आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी ‘विकसित भारत’ की मजबूत नींव तैयार कर रहा है।

साथियो,

गुलामी के लंबे कालखंड में भारत ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं खोई, बल्कि अपनी अनेक अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों, पांडुलिपियों और पुस्तकालयों को भी नष्ट होते देखा। यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता की क्षति थी। 

धरोहरों के प्रति जागरूकता की कमी ने इस नुकसान को और बढ़ाया। यही कारण है कि ‘अमृतकाल’ में भारत ने अपने ‘पंच-प्रणों’ में “अपनी विरासत पर गर्व” को प्रमुख स्थान दिया है। देश आज अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के साथ-साथ नए सांस्कृतिक अवसंरचना के निर्माण पर भी विशेष बल दे रहा है।

आज कलाकृतियों की तस्करी और अवैध निर्यात जैसी चुनौतियां हमारे सामने हैं। सदियों से भारत की अनेक अमूल्य कलाकृतियां देश से बाहर ले जाई गईं, लेकिन आज विश्व में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा के कारण अनेक देश हमारी धरोहरें वापस लौटा रहे हैं। बनारस की मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा, गुजरात की महिषासुरमर्दिनी मूर्ति और चोलकालीन नटराज प्रतिमाओं सहित लगभग 240 प्राचीन कलाकृतियां भारत वापस लाई जा चुकी हैं।

भारत की विरासत केवल हमारे अतीत का प्रतीक नहीं, बल्कि वैश्विक एकता का माध्यम भी है। भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को पीढ़ियों से सुरक्षित रखा गया है, जो आज विश्वभर के करोड़ों बौद्ध अनुयायियों को जोड़ते हैं। वर्ष 2022 में बुद्ध पूर्णिमा पर भारत द्वारा चार पवित्र अवशेष मंगोलिया भेजे गए, जहां वह अवसर राष्ट्रीय उत्सव बन गया। 

इसी प्रकार श्रीलंका से बुद्ध अवशेषों को कुशीनगर लाया गया तथा गोवा में संरक्षित सेंट क्वीन केटेवान के पवित्र अवशेषों को जॉर्जिया भेजे जाने पर वहां अभूतपूर्व जन-उत्साह देखने को मिला। यह दर्शाता है कि हमारी विरासत विश्वबंधुत्व और सांस्कृतिक आत्मीयता की भी आधारशिला है।

साथियो,

चंडीगढ़ को हम केवल एक आधुनिक, सुनियोजित शहर के रूप में ही नहीं देखते, बल्कि यह कला और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र भी है। इस अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर, मैं कुछ महत्वपूर्ण बातें आप सभी के सम्मुख रखना चाहता हूँ।

मैं शहर के सभी स्कूलों और कॉलेजों के प्राचार्यों से आग्रह करता हूँ कि वे हर महीने छात्रों के लिए ‘म्यूजियम विजिट’ को अपने कैलेंडर का हिस्सा बनाएं। इतिहास को किताबों से ज्यादा संग्रहालय की दीवारों और दीर्घाओं में देखकर बेहतर समझा जा सकता है।

हमें अपने इस राजकीय संग्रहालय एवं कला दीर्घा को रॉक गार्डन और सुखना लेक की तरह ही पर्यटकों के लिए एक अनिवार्य आकर्षण केंद्र बनाना है। इसके लिए नाइट टूरिज्म, म्यूजियम वॉक और क्युरेटेड टूर्स जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

आज संग्रहालय केवल इतिहास के संरक्षण केंद्र नहीं रहे, बल्कि पर्यावरण जागरूकता, सांस्कृतिक संवाद और युवा सहभागिता के महत्वपूर्ण मंच भी बन रहे हैं। हमें प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी की बदलती परिस्थितियों से जुड़ी स्मृतियों एवं चित्रों को भी संग्रहालयों में स्थान देना चाहिए, ताकि समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़े।

मुझे प्रसन्नता है कि आज संग्रहालय युवाओं के लिए करियर और वैश्विक सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी बन रहे हैं। इतिहास, स्थापत्य और संस्कृति से जुड़े युवा भारत की विरासत को विश्व तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

मेरा मानना है कि संग्रहालय केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं। इसमें समाज के प्रबुद्ध वर्ग, कलाकारों और कॉर्पोरेट जगत को भी आगे आना चाहिए ताकि हम अपनी इस धरोहर को और अधिक समृद्ध बना सकें।

देवियो और सज्जनो,

आज के कार्यक्रम में स्कूली विद्यार्थियों की भागीदारी देखकर मुझे विशेष खुशी हो रही है। संग्रहालयों का भ्रमण बच्चों में जिज्ञासा, कल्पनाशक्ति और संवेदनशीलता को बढ़ावा देता है। इससे वे न केवल इतिहास और संस्कृति को समझते हैं, बल्कि वर्तमान समय में आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व का महत्व भी सीखते हैं।

मैं संग्रहालय प्रशासन, क्यूरेटर, शिक्षकों, विद्यार्थियों और इस कार्यक्रम के आयोजन से जुड़े सभी लोगों को बधाई देता हूँ। कला, इतिहास, विज्ञान और संस्कृति को एक साथ लाकर आप एक अधिक जागरूक, संवेदनशील और एकजुट समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

मैं चंडीगढ़ के सभी संग्रहालयों और सांस्कृतिक संस्थानों की निरंतर सफलता की कामना करता हूँ, ताकि वे शिक्षा, विरासत संरक्षण और जन-जागरूकता के केंद्र के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहें।

मुझे विश्वास है कि हम अपनी विरासत को सहेजते हुए भविष्य के लिए नई सांस्कृतिक धरोहरों का निर्माण भी करते रहेंगे और अपनी सभ्यता की इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक गर्व के साथ पहुंचाएंगे।

‘‘संस्कृति ही जीवन का दर्पण है, और संग्रहालय उस दर्पण को संजोकर रखने वाले प्रहरी हैं।’’

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

जय हिन्द! 

जय भारत!